24 Sep केरल उच्च न्यायालय ने नौसेना नियमों में न्यायाधिकरण नियुक्त करने के नियम को बरकरार रखा
✎ केरल उच्च न्यायालय ने माना है कि नौसेना विनियमों के तहत जांच अधिकारी को कोर्ट-मार्शल में अभियोजक नियुक्त किया जा सकता है और यह निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता, जो अनुच्छेद 33 के तहत सशस्त्र बलों के मौलिक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, न्यायपालिका, मौलिक अधिकार | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा
- Prelims: केरल उच्च न्यायालय, कोर्ट-मार्शल, नौसेना अधिनियम, 1957, नौसेना (अनुशासन और विविध प्रावधान) विनियम, 1965, अनुच्छेद 33, निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
- Essay: न्यायपालिका की भूमिका और मौलिक अधिकारों का संरक्षण, सशस्त्र बलों के विशेष प्रावधान और मानवाधिकार
त्वरित पुनरावृत्ति: केरल उच्च न्यायालय ने माना है कि नौसेना विनियमों के तहत जांच अधिकारी को कोर्ट-मार्शल में अभियोजक नियुक्त किया जा सकता है और यह निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता, जो अनुच्छेद 33 के तहत सशस्त्र बलों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों को दर्शाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया है कि नौसेना (अनुशासन और विविध प्रावधान) विनियम, 1965 के अनुसार, एक जांच अधिकारी को कोर्ट-मार्शल (Court-Martial) मामले में अभियोजक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह आरोपी व्यक्ति के निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करेगा। यह निर्णय सशस्त्र बलों के कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों और सैन्य न्याय प्रणाली की विशिष्ट प्रकृति से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों को उठाता है।
पृष्ठभूमि
- एक नौसेना कर्मी ने केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया है, क्योंकि उसके मामले में अभियोजक वही व्यक्ति था जिसने उसके खिलाफ आरोपों की जांच की थी।
- याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसे आवश्यक दस्तावेजों तक पहुंच और अपने मामले का बचाव करने के पर्याप्त अवसर से वंचित किया गया था।
- याचिकाकर्ता ने उस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी जो कोर्ट-मार्शल अभियोजक को एक सक्षम गवाह के रूप में गवाही देने की अनुमति देता है, क्योंकि यह निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन करता है।
- एकल पीठ ने चुनौती दिए गए विनियमन की संवैधानिकता को बरकरार रखा था, लेकिन यह माना था कि जब एक ही जांच अधिकारी अभियोजक की भूमिका निभाता है तो निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार बाधित होगा।
- केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि नौसेना अधिनियम के प्रावधानों में कहा गया है कि नौसेना कानून के अधीन व्यक्तियों के संबंध में मौलिक अधिकारों को संशोधित किया जा सकता है।
- खंडपीठ ने माना कि जांच अधिकारी कोर्ट-मार्शल कार्यवाही में मामले का अभियोजन करने के लिए एक उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है।
सशस्त्र बलों के मौलिक अधिकार और सैन्य न्याय प्रणाली
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को सीमित या निरस्त कर सकती है।
- इस अनुच्छेद का उद्देश्य इन बलों में अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा सुनिश्चित करना है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- नौसेना अधिनियम, 1957 और नौसेना (अनुशासन और विविध प्रावधान) विनियम, 1965, नौसेना कर्मियों के लिए विशिष्ट कानूनी और अनुशासनात्मक ढांचा प्रदान करते हैं।
- कोर्ट-मार्शल सैन्य कर्मियों के लिए एक विशेष न्यायिक प्रणाली है, जो सैन्य कानूनों के तहत अपराधों की सुनवाई करती है। इसका उद्देश्य सशस्त्र बलों में अनुशासन बनाए रखना है।
- आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure), 1973 के प्रावधान सैन्य न्याय प्रणाली पर पूरी तरह से लागू नहीं होते हैं, क्योंकि सैन्य बलों के लिए अपने विशेष कानून और प्रक्रियाएं होती हैं।
- न्यायपालिका ने समय-समय पर सशस्त्र बलों के कर्मियों के मौलिक अधिकारों और सैन्य न्याय प्रणाली की समीक्षा की है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विशेष प्रावधानों के बावजूद निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाए।
- निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार (Right to Fair Trial) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंतर्निहित हिस्सा है।
- सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (Armed Forces Tribunal) सैन्य कर्मियों से संबंधित सेवा मामलों और अपीलों की सुनवाई के लिए स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| जांच अधिकारी का अभियोजक के रूप में कार्य | नौसेना (अनुशासन और विविध प्रावधान) विनियम, 1965 के तहत अनुमेय। |
| संवैधानिक अधिकार | सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध संभव। |
| निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार | केरल उच्च न्यायालय के अनुसार, यह उल्लंघन नहीं। |
| साक्ष्य के रूप में जांच अधिकारी | जांच अधिकारी अभियोजक के रूप में भी गवाह हो सकता है। |
| न्यायपालिका की भूमिका | सैन्य कानून और नागरिक कानून के बीच संतुलन स्थापित करना। |
महत्व
न्यायिक
- यह निर्णय सैन्य न्याय प्रणाली की विशिष्ट प्रकृति को रेखांकित करता है, जहां नागरिक आपराधिक न्याय प्रणाली के कुछ सिद्धांत भिन्न हो सकते हैं।
- यह सशस्त्र बलों के कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर लगाए जा सकने वाले प्रतिबंधों की संवैधानिक वैधता की पुष्टि करता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 33 में परिकल्पित है।
- यह सैन्य अदालतों (Court-Martial) में जांच अधिकारी को अभियोजक के रूप में नियुक्त करने की नौसेना विनियमों की वैधता को बरकरार रखता है, जिससे सैन्य अनुशासनात्मक कार्यवाही की दक्षता सुनिश्चित होती है।
रक्षा एवं सुरक्षा
- यह निर्णय सशस्त्र बलों में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सैन्य न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता को मजबूत करता है।
- यह सैन्य कर्मियों के बीच विश्वास और जवाबदेही की भावना को बढ़ावा देता है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि अपराधों की जांच और मुकदमा प्रभावी ढंग से चलाया जा सके।
- यह सैन्य अभियानों और प्रशासनिक कार्यों में आवश्यक त्वरित निर्णय लेने और कार्रवाई करने की क्षमता को बनाए रखने में मदद करता है।
शासन
- यह निर्णय इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे विशेष कानूनों और विनियमों के माध्यम से शासन के सिद्धांतों को विशिष्ट संदर्भों, जैसे कि सशस्त्र बलों, में अनुकूलित किया जाता है।
- यह केंद्र सरकार के इस रुख का समर्थन करता है कि नौसेना अधिनियम के प्रावधानों के तहत मौलिक अधिकारों को संशोधित किया जा सकता है, जो रक्षा नीति के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह सैन्य न्याय प्रणाली के भीतर पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा की भूमिका को दर्शाता है, भले ही कुछ प्रक्रियाओं में नागरिक न्याय प्रणाली से भिन्नता हो।
चुनौतियाँ
1. निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
- जांच अधिकारी का अभियोजक के रूप में कार्य करने से निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन की आशंका उत्पन्न हो सकती है, क्योंकि जांच और अभियोजन के बीच हितों का टकराव हो सकता है।
- अभियुक्त को पर्याप्त दस्तावेज़ों तक पहुंच और अपने बचाव के लिए पर्याप्त अवसर न मिलने की शिकायतें उठ सकती हैं, जिससे न्याय की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: संविधान – मौलिक अधिकार, न्यायपालिका
2. शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत
- जांच और अभियोजन की भूमिकाओं का एक ही व्यक्ति में विलय शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत प्रतीत हो सकता है, जो निष्पक्ष न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण आधार है।
- यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि जांच अधिकारी के पास अभियोजक के रूप में कार्य करते समय भी निष्पक्षता बनी रहे और वह पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो।
यूपीएससी लिंक: संविधान – शक्ति पृथक्करण, न्यायपालिका
3. सैन्य कानून बनाम नागरिक कानून
- सैन्य कानून और नागरिक आपराधिक कानून के बीच संतुलन स्थापित करना एक चुनौती है, खासकर जब मौलिक अधिकारों का प्रश्न उठता है।
- यह सुनिश्चित करना कि सैन्य कर्मियों को भी न्याय के बुनियादी सिद्धांतों से वंचित न किया जाए, जबकि सशस्त्र बलों की विशिष्ट आवश्यकताओं को भी पूरा किया जाए।
यूपीएससी लिंक: संविधान – मौलिक अधिकार, संघवाद
4. संवैधानिक व्याख्या
- संविधान के अनुच्छेद 33 की व्याख्या और सशस्त्र बलों के कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर लगाए जा सकने वाले प्रतिबंधों की सीमा का निर्धारण एक जटिल न्यायिक चुनौती है।
- न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना होता है कि ऐसे प्रतिबंध मनमाने न हों और वे सशस्त्र बलों के उचित कार्यकरण के लिए आवश्यक हों।
यूपीएससी लिंक: संविधान – मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जांच अधिकारी का अभियोजक के रूप में कार्य | निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन और हितों का टकराव। |
| सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकार | अनुच्छेद 33 के तहत प्रतिबंधों की सीमा और उनका औचित्य। |
| साक्ष्य तक पहुंच | अभियुक्त को पर्याप्त दस्तावेज़ों और बचाव के अवसरों से वंचित करना। |
| न्यायिक समीक्षा की भूमिका | सैन्य न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना। |
| न्यायपालिका का हस्तक्षेप | सैन्य मामलों में नागरिक अदालतों के हस्तक्षेप की सीमा। |
आगे की राह
- सैन्य न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए प्रक्रियाओं की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए।
- जांच और अभियोजन की भूमिकाओं में स्पष्ट पृथक्करण सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश विकसित किए जा सकते हैं, जहां संभव हो।
- सैन्य कर्मियों को उनके अधिकारों और उपलब्ध कानूनी उपायों के बारे में पर्याप्त जानकारी प्रदान की जानी चाहिए।
- सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (Armed Forces Tribunal) को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि सैन्य कर्मियों की शिकायतों का प्रभावी ढंग से निवारण हो सके।
- सैन्य कानून और नागरिक आपराधिक कानून के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए निरंतर संवाद और विचार-विमर्श आवश्यक है।
- जांच अधिकारियों और अभियोजकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे अपनी भूमिकाओं को निष्पक्षता और व्यावसायिकता के साथ निभा सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
न्यायपालिका · सैन्य कानून · सशस्त्र बल · मौलिक अधिकार · निष्पक्ष सुनवाई · कोर्ट-मार्शल · जांच अधिकारी · अभियोजक · नौसेना अधिनियम · संवैधानिक प्रतिबंध · न्यायिक समीक्षा · प्राकृतिक न्याय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘विधि के समक्ष समता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 33’, ‘note’: ‘मौलिक अधिकारों पर संसद द्वारा प्रतिबंध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
नौसेना विनियमों के तहत जांच अधिकारी का अभियोजक बनना। → अभियुक्त द्वारा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन का दावा। → केरल उच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक प्रावधानों का विश्लेषण। → सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों की वैधता। → न्यायालय द्वारा नौसेना विनियमों की संवैधानिकता को बरकरार रखना।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 33 संसद को सशस्त्र बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है।
2. सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (Armed Forces Tribunal) केवल कोर्ट-मार्शल के मामलों में अपील सुनने के लिए स्थापित किया गया है।
3. दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure), 1973, सशस्त्र बलों पर पूर्ण रूप से लागू होती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 33 संसद को कानून द्वारा यह निर्धारित करने का अधिकार देता है कि सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों आदि के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को किस हद तक प्रतिबंधित किया जा सकता है।
कथन 2 गलत है। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) की स्थापना सशस्त्र बलों के कर्मियों से संबंधित विवादों और शिकायतों के न्यायनिर्णयन के लिए की गई थी। यह न केवल कोर्ट-मार्शल के मामलों में अपील सुनता है, बल्कि सेवा से संबंधित अन्य मामलों जैसे वेतन, पदोन्नति, पेंशन आदि पर भी सुनवाई करता है।
कथन 3 गलत है। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) सशस्त्र बलों पर पूर्ण रूप से लागू नहीं होती है। सशस्त्र बलों के अपने विशेष कानून और प्रक्रियाएं हैं, जैसे नौसेना अधिनियम, सेना अधिनियम और वायु सेना अधिनियम, जो उनके कर्मियों पर लागू होते हैं।
Q2. अभिकथन (A): केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में माना कि नौसेना विनियमों के अनुसार एक जांच अधिकारी को कोर्ट-मार्शल मामले में अभियोजक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
कारण (R): न्यायालय ने कहा कि सशस्त्र बलों के मामलों में सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि केरल उच्च न्यायालय ने वास्तव में यह निर्णय दिया है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि न्यायालय ने अपने निर्णय में संविधान, दंड प्रक्रिया संहिता, नौसेना अधिनियम और नौसेना विनियमों के संयुक्त विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि सशस्त्र बलों के मामलों में सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है, क्योंकि मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध की संभावना ही जांच अधिकारी को अभियोजक नियुक्त करने की अनुमति देने का आधार है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सशस्त्र बलों के कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर लगाए गए संवैधानिक प्रतिबंधों की प्रकृति का परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, क्या एक ही व्यक्ति का जांच अधिकारी और अभियोजक दोनों के रूप में कार्य करना निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत का उल्लंघन करता है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सशस्त्र बलों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों की सामान्य पृष्ठभूमि और उनके पीछे के तर्क का संक्षिप्त परिचय।
2. **संवैधानिक प्रावधान:** भारतीय संविधान के अनुच्छेद 33 का विस्तृत उल्लेख, जो संसद को सशस्त्र बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है। इसमें अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अन्य पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख।
3. **प्रतिबंधों की प्रकृति और औचित्य:** इन प्रतिबंधों के पीछे के कारणों पर चर्चा करें, जैसे अनुशासन बनाए रखना, राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना, कर्तव्य का प्रभावी निर्वहन। विभिन्न न्यायिक निर्णयों (जैसे ‘आर.के. गर्ग बनाम भारत संघ’ या ‘राम स्वरूप बनाम भारत संघ’) का उल्लेख, जिन्होंने इन प्रतिबंधों की संवैधानिकता को बरकरार रखा है।
4. **जांच अधिकारी और अभियोजक की भूमिका:** जांच अधिकारी और अभियोजक की अलग-अलग भूमिकाओं को स्पष्ट करें और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत के महत्व पर प्रकाश डालें। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (जैसे ‘कोई भी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता’) का उल्लेख।
5. **केरल उच्च न्यायालय का निर्णय और तर्क:** केरल उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का उल्लेख करें, जिसमें कहा गया है कि नौसेना विनियमों के तहत एक जांच अधिकारी को कोर्ट-मार्शल मामले में अभियोजक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है और यह निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है। न्यायालय द्वारा दिए गए तर्कों को प्रस्तुत करें, जैसे कि सशस्त्र बलों के लिए विशेष कानून, सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध और जांच अधिकारी का मामले के तथ्यों से परिचित होना।
6. **आलोचनात्मक विश्लेषण/विपरीत दृष्टिकोण:** इस निर्णय के संभावित निहितार्थों और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत पर इसके प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। यह तर्क दें कि भले ही सैन्य कानून विशेष प्रकृति के होते हैं, फिर भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना महत्वपूर्ण है। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) की भूमिका का भी उल्लेख करें।
7. **निष्कर्ष:** एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें, जिसमें सशस्त्र बलों की विशिष्ट आवश्यकताओं और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया जाए।
स्रोत: The Hindu
Kerala PCS (Kerala PSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: केरल उच्च न्यायालय ने किस मामले में न्यायालय-सैनिक (कोर्ट-मार्शल) के लिए अन्वेषण अधिकारी को अभियोजक नियुक्त करने की अनुमति दी है, जैसा कि नौसेना विनियमों के अनुसार है?
- A. सिविल मामले
- B. सैन्य अनुशासनात्मक मामले
- C. आपराधिक मामले
- D. प्रशासनिक विवाद
उत्तर: B. सैन्य अनुशासनात्मक मामले — केरल उच्च न्यायालय ने नौसेना विनियमों के अनुसार सैन्य अनुशासनात्मक मामलों (कोर्ट-मार्शल) में अन्वेषण अधिकारी को अभियोजक नियुक्त करने की अनुमति दी है।
Mains: विस्तृत चर्चा करें कि केरल उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय सैन्य न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही को कैसे प्रभावित कर सकता है। इसके साथ ही, केरल राज्य में सैन्य कानूनों के प्रशासनिक पहलुओं पर भी प्रकाश डालें।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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