13 Oct मध्य प्रदेश: सीहोर में आदिवासी मकानों के विध्वंस पर ST आयोग ने सरकार को नोटिस भेजा
✎ NCST अनुच्छेद 338A के अंतर्गत (89वें संशोधन, 2003 से) बना संवैधानिक निकाय है; उसे जाँच में सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं, पर उसकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं हैं; और वन अधिकार अधिनियम की धारा 4(5) के अनुसार…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — संवैधानिक निकाय: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338A), उसकी शक्तियाँ और कार्य | GS Paper II — अनुसूचित जनजातियों के लिए कल्याणकारी विधान और संरक्षण-उपाय; वन अधिकार अधिनियम, 2006 | GS Paper II — शासन: कार्यपालिका की जवाबदेही, प्रक्रियागत न्याय और विधि का शासन | GS Paper I — भारतीय समाज: जनजातीय समुदायों के मुद्दे, विस्थापन और आजीविका का संकट
- Prelims: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), अनुच्छेद 338A, 89वाँ संविधान संशोधन, 2003, वन अधिकार मान्यता अधिनियम, 2006 की धारा 4(5), ग्राम सभा, आवास का अधिकार और अनुच्छेद 21, ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985), ध्वस्तीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश (नवंबर 2024), सिविल न्यायालय की शक्तियाँ (अनुच्छेद 338A(8)), अनुसूचित जनजाति (अनुच्छेद 342)
- Essay: विकास, संरक्षण और विस्थापन: वनवासी समुदायों के अधिकारों का संतुलन, विधि का शासन और प्रक्रियागत न्याय: प्रशासनिक कार्रवाई में नोटिस, सुनवाई और जवाबदेही का महत्त्व
त्वरित पुनरावृत्ति: NCST अनुच्छेद 338A के अंतर्गत (89वें संशोधन, 2003 से) बना संवैधानिक निकाय है; उसे जाँच में सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं, पर उसकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं हैं; और वन अधिकार अधिनियम की धारा 4(5) के अनुसार मान्यता-प्रक्रिया पूरी होने तक वन-निवासी को बेदखल नहीं किया जा सकता।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के कोसमी गांव में 11 अक्टूबर 2026 को वन विकास निगम की कार्रवाई के दौरान आदिवासी परिवारों के 12 मकान तोड़े गए। समाचारों के अनुसार इस कार्रवाई में फसलों को भी नुकसान पहुँचा और कुओं को मिट्टी से भर दिया गया, जिससे प्रभावित परिवारों के सामने आवास और आजीविका का संकट खड़ा हो गया। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes) ने इस पर संज्ञान लेकर मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, वन विभाग के प्रमुख सचिव, सीहोर के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी किया है। आयोग ने तीन दिन में जवाब और संबंधित दस्तावेज़ माँगे हैं। निर्धारित समय में जवाब न मिलने पर वह अधिकारियों को समन जारी कर सकता है। मुख्यमंत्री ने भी मुख्य सचिव से जाँच कर रिपोर्ट देने को कहा है। यह प्रकरण संवैधानिक निकाय की जाँच-शक्तियों, वन भूमि पर बसे समुदायों के अधिकारों और ध्वस्तीकरण की विधिक प्रक्रिया से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि
- संविधान के मूल रूप में अनुच्छेद 338 के अंतर्गत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए एक ही आयोग था। 89वें संविधान संशोधन, 2003 से यह आयोग दो भागों में बँटा और अनुच्छेद 338A जोड़ा गया। इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग 2004 में अलग संवैधानिक निकाय बना।
- अनुसूचित जनजातियों की सूची अनुच्छेद 342 के अंतर्गत राष्ट्रपति की अधिसूचना से तय होती है। इन समुदायों की आजीविका प्रायः वन, भूमि और जल-संसाधनों पर निर्भर रहती है, इसलिए भूमि और वन से जुड़े विवाद उनके लिए अस्तित्व का प्रश्न बन जाते हैं।
- वन अधिकार मान्यता अधिनियम, 2006 (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) का उद्देश्य औपनिवेशिक काल से चले आ रहे ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को दूर करना है। यह अधिनियम वन में निवास और खेती के अधिकारों को वैधानिक मान्यता देता है।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में आश्रय और आजीविका का अधिकार भी सम्मिलित माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985) में कहा कि फुटपाथ-निवासियों को भी उचित प्रक्रिया के बिना बेदखल नहीं किया जा सकता। चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1996) में आश्रय के अधिकार को मूल अधिकार माना गया।
- नवंबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाइयों पर अखिल भारतीय दिशानिर्देश जारी किए। इनमें पूर्व कारण-बताओ नोटिस (सामान्यतः 15 दिन), व्यक्तिगत सुनवाई, तर्कसंगत अंतिम आदेश और अपील के लिए समय देने की व्यवस्था है। ये दिशानिर्देश सार्वजनिक स्थानों, जैसे सड़क, रेल पटरी और जलाशय पर अतिक्रमण तथा न्यायालय के आदेश से हुई कार्रवाई पर लागू नहीं होते।
- वन विकास निगम राज्य सरकार का उपक्रम है, जो मुख्यतः वृक्षारोपण और वन-उपज के वाणिज्यिक प्रबंधन से जुड़ा है। उसके अधीन भूमि पर किसी बसाहट को हटाने से पहले भूमि की वैधानिक स्थिति, दावों की मान्यता और विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है। इस प्रकरण में इन्हीं बिंदुओं की जाँच अपेक्षित है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) और जनजातीय आवास-अधिकारों का विधिक ढाँचा क्या है?
- संवैधानिक स्थिति: NCST अनुच्छेद 338A के अंतर्गत स्थापित संवैधानिक निकाय है। इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसके विपरीत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक सांविधिक निकाय है।
- मुख्य कार्य (अनुच्छेद 338A(5)): अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान या अन्य विधि में दिए गए रक्षोपायों की जाँच और निगरानी करना; अधिकारों से वंचित किए जाने की विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना; उनके सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना-प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना; तथा राष्ट्रपति को वार्षिक प्रतिवेदन देना।
- सिविल न्यायालय की शक्तियाँ (अनुच्छेद 338A(8)): किसी शिकायत की जाँच करते समय आयोग को सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं। वह देश के किसी भी भाग से व्यक्ति को समन कर उपस्थित करा सकता है और शपथ पर उसकी परीक्षा कर सकता है। वह दस्तावेज़ों के प्रकटीकरण और प्रस्तुतीकरण की अपेक्षा कर सकता है तथा शपथपत्रों पर साक्ष्य ले सकता है। इन्हीं शक्तियों के आधार पर वह समय पर जवाब न मिलने पर समन की चेतावनी दे सकता है।
- परामर्श और प्रतिवेदन: अनुच्छेद 338A(9) के अनुसार संघ और प्रत्येक राज्य सरकार अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करेगी। आयोग के प्रतिवेदन संसद के समक्ष रखे जाते हैं, और राज्य से संबंधित विषयों के प्रतिवेदन राज्य विधानमंडल के समक्ष रखे जाते हैं। आयोग की सिफ़ारिशें सलाहकारी होती हैं, बाध्यकारी नहीं।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006: इसके अंतर्गत वन भूमि पर निवास या स्वयं खेती के अधिकार को मान्यता मिलती है। मान्यता की प्रक्रिया ग्राम सभा से शुरू होती है और उपखंड तथा जिला स्तर की समितियों से होकर गुजरती है। अनुसूचित जनजातियों के लिए कट-ऑफ तिथि 13 दिसंबर 2005 है, जबकि अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए 75 वर्ष का निवास आवश्यक है।
- धारा 4(5) का रक्षोपाय: अधिनियम की धारा 4(5) के अनुसार मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक वन-निवासी अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन निवासी के कब्ज़े वाली वन भूमि से उसे बेदखल या हटाया नहीं जा सकेगा। किसी बसाहट को हटाने से पहले यह देखना होता है कि दावा लंबित है या मान्य हो चुका है।
- ध्वस्तीकरण में प्रक्रियागत न्याय: प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किसी को सुनवाई का अवसर दिए बिना उसका आवास नहीं तोड़ा जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश इसी सिद्धांत को ठोस रूप देते हैं। प्रक्रिया के उल्लंघन पर अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है और प्रभावित व्यक्ति मुआवज़े तथा पुनर्स्थापन की माँग कर सकते हैं।
- कार्रवाई की विधिक आलोचना: उपलब्ध समाचारों के आधार पर कार्रवाई की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। भूमि की वैधानिक स्थिति, नोटिस की तामील और दावों की मान्यता जैसे बिंदु जाँच से स्पष्ट होंगे। जवाबदेही-तंत्र के रूप में आयोग की जाँच और राज्य स्तर की प्रशासनिक जाँच साथ-साथ चल सकती हैं, और अंतिम उपचार उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में रिट (अनुच्छेद 226 और 32) के माध्यम से उपलब्ध है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| संवैधानिक दर्जा: अनुच्छेद 338A | राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes – NCST) एक संवैधानिक निकाय है। इसे 89वें संविधान संशोधन (2003) से अनुसूचित जाति आयोग से अलग किया गया। इसी कारण इसके नोटिस को वैधानिक गंभीरता मिलती है। |
| सुरक्षा उपायों की निगरानी | आयोग का कर्तव्य है कि वह संविधान और अन्य विधियों में अनुसूचित जनजातियों को दिए गए रक्षोपायों की जाँच और निगरानी करे। साथ ही वह अधिकारों से वंचित किए जाने की शिकायतों की पूछताछ भी करता है। कोसमी गाँव का मामला इसी दायरे में आता है। |
| सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ: अनुच्छेद 338A(8) | आयोग किसी को समन भेजकर उपस्थित करा सकता है और शपथ पर उसकी परीक्षा कर सकता है। वह दस्तावेज़ प्रस्तुत करवा सकता है और शपथ-पत्र पर साक्ष्य ले सकता है। इसी शक्ति के आधार पर तीन दिन में जवाब न मिलने पर समन की चेतावनी दी गई है। |
| परामर्श और प्रतिवेदन की व्यवस्था | केंद्र और राज्य सरकारें अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करती हैं (अनुच्छेद 338A(9))। आयोग का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को जाता है और संसद में रखा जाता है। राज्य से जुड़े विषयों पर प्रतिवेदन की प्रति राज्यपाल के माध्यम से राज्य विधानमंडल में रखी जाती है। |
| सिफ़ारिशी स्वरूप | आयोग की सिफ़ारिशें सामान्यतः बाध्यकारी नहीं होतीं। इसका प्रभाव जवाबदेही और नैतिक दबाव से आता है। उसकी वास्तविक शक्ति साक्ष्य जुटाने और सार्वजनिक रिपोर्टिंग में है। |
| प्रकरण का तथ्यात्मक पक्ष | समाचार के अनुसार 11 अक्टूबर को सीहोर के कोसमी गाँव में वन विकास निगम की कार्रवाई में आदिवासियों के 12 मकान तोड़े गए। आयोग ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, वन विभाग के प्रमुख सचिव, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से जवाब माँगा है। मुख्यमंत्री ने जाँच की बात कही है। कार्रवाई की वैधता अभी जाँच का विषय है। |
महत्व
संवैधानिक एवं विधिक महत्त्व
- यह प्रकरण दिखाता है कि राज्य की ध्वस्तीकरण कार्रवाई अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आश्रय और आजीविका के अधिकार की कसौटी पर परखी जाती है।
- अनुच्छेद 338A जैसी संवैधानिक संस्था राज्य के कार्यपालक अधिकारियों से सीधे जवाब माँग सकती है। यह संघीय ढाँचे में निगरानी की बाहरी व्यवस्था का उदाहरण है।
- वन भूमि पर बसे जनजातीय परिवारों के मामले में वन अधिकार अधिनियम, 2006 की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया निर्णायक है। इस पर कार्रवाई से पहले अधिकारों के निर्धारण का प्रश्न उठता है।
सामाजिक-आर्थिक महत्त्व
- मकान, कुएँ और फसल का एक साथ नष्ट होना आवास के साथ आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर भी आघात है।
- भूमि और वन पर निर्भर जनजातीय समुदायों के लिए विस्थापन का असर पीढ़ियों तक रहता है, क्योंकि पुनर्वास के अभाव में वे ऋण, पलायन और दिहाड़ी मज़दूरी की ओर धकेले जाते हैं।
प्रशासनिक एवं शासन-संबंधी महत्त्व
- कार्रवाई के समय वरिष्ठ अधिकारियों की अनुपस्थिति का प्रश्न उठा है। इससे निर्णय-स्तर पर उत्तरदायित्व और पर्यवेक्षण की कमी का मुद्दा सामने आता है।
- वन विभाग, वन विकास निगम, राजस्व विभाग और पुलिस के बीच समन्वय की कमी भूमि-अभिलेख और सीमांकन के विवादों को बढ़ाती है।
- मुख्यमंत्री द्वारा मुख्य सचिव से जाँच-प्रतिवेदन माँगना आंतरिक जवाबदेही तंत्र का उदाहरण है। उसकी विश्वसनीयता समयबद्ध और सार्वजनिक निष्कर्ष पर निर्भर करती है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्व
- GS-2 के लिए: अनुसूचित जनजातियों के लिए तंत्र, कानून, संस्थाएँ और निकाय, तथा कमज़ोर वर्गों के संरक्षण की व्यवस्था।
- निबंध और नीतिशास्त्र के लिए: विकास/संरक्षण बनाम आजीविका, तथा विधि-सम्मत प्रक्रिया बनाम प्रशासनिक त्वरा की दुविधा।
चुनौतियाँ
1. विधि-सम्मत प्रक्रिया का पालन
- बिना पूर्व नोटिस, सुनवाई और अभिलेख-सत्यापन के ध्वस्तीकरण की शिकायतें बार-बार सामने आती हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने नवंबर 2024 के निर्णय में ध्वस्तीकरण के लिए पूर्व कारण-बताओ नोटिस, सुनवाई का अवसर और लगभग 15 दिन का समय जैसे दिशानिर्देश दिए। इनके अपवाद सार्वजनिक स्थल पर अनधिकृत निर्माण और न्यायालय-आदेशित मामलों तक सीमित हैं।
- कोसमी में ये सुरक्षा उपाय अपनाए गए या नहीं, यह जाँच से तय होगा।
यूपीएससी लिंक: GS-2: प्रशासनिक प्रक्रिया, अनुच्छेद 21 और प्राकृतिक न्याय
2. वन अधिकारों की मान्यता में विलंब और अस्पष्टता
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) के अनुसार मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक पात्र वनवासियों को कब्ज़े वाली वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता।
- दावों के बड़ी संख्या में अस्वीकृत या लंबित रहने से परिवार कानूनी रूप से ‘अतिक्रमणकर्ता’ माने जाने के जोखिम में रहते हैं।
- ग्राम सभा और वन अधिकार समिति की भूमिका कमज़ोर होने पर दावों का निपटान प्रभावित होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: वन अधिकार अधिनियम और जनजातीय अधिकार
3. भूमि-अभिलेख और सीमांकन के विवाद
- राजस्व, वन और निगम की भूमि की सीमाएँ अक्सर अभिलेखों में अस्पष्ट या परस्पर-विरोधी होती हैं।
- पुराने बसे परिवारों के पास औपचारिक पट्टे या दस्तावेज़ न होने से स्वामित्व सिद्ध करना कठिन हो जाता है।
- वन विकास निगम जैसी इकाइयाँ वृक्षारोपण भूमि का प्रबंधन करती हैं, पर पूर्व-बसे समुदायों के दावों का निपटारा नहीं करतीं। इससे टकराव की स्थिति बनती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2/GS-3: भूमि प्रशासन, अभिलेख, वन प्रबंधन
4. पुनर्वास और क्षतिपूर्ति का अभाव
- मकान और फसल नष्ट होने के बाद तत्काल आश्रय, राहत और मुआवज़े की व्यवस्था न होने से परिवार सीधे आजीविका-संकट में आते हैं।
- कुओं को मिट्टी से भरे जाने की बात सामने आई है। इससे पेयजल और सिंचाई का स्रोत भी छिनता है।
- कार्रवाई के बाद के मानवीय और पुनर्वास-संबंधी प्रोटोकॉल प्रायः स्पष्ट नहीं होते।
यूपीएससी लिंक: GS-2: कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी तंत्र
5. निगरानी संस्थाओं की सीमित शक्ति
- आयोग की सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। उसका असर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और राजनीतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
- तीन दिन जैसी अल्प अवधि में विस्तृत जवाब और दस्तावेज़ जुटाना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है। इसलिए गहन जाँच के लिए आगे की प्रक्रिया ज़रूरी होती है।
- आयोग की जाँच और राज्य की आंतरिक जाँच का दोहराव भ्रम पैदा कर सकता है, यदि निष्कर्ष सार्वजनिक न हों।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संवैधानिक निकाय, उनकी शक्तियाँ और सीमाएँ
6. जवाबदेही और पर्यवेक्षण की कमी
- समाचार के अनुसार कार्रवाई के समय किसी वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति नहीं थी। यदि यह सही सिद्ध हुआ तो यह निर्णय-स्तर के पर्यवेक्षण की चूक होगी।
- दोषी पाए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कम ही होती है, जिससे निवारक प्रभाव कमज़ोर पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता; GS-4: लोक सेवा मूल्य
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| ध्वस्तीकरण से पूर्व नोटिस और सुनवाई | सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के पालन पर प्रश्न; पालन न होने पर कार्रवाई मनमानी मानी जा सकती है। |
| वन अधिकार दावों की स्थिति | दावा दाखिल, लंबित या अस्वीकृत होने की स्थिति स्पष्ट न होने से बेदखली की वैधता तय करना कठिन। |
| भूमि की स्वामित्व-स्थिति | राजस्व, वन और निगम अभिलेखों में अंतर तथा पुराने बसे परिवारों के औपचारिक दस्तावेज़ों की कमी। |
| आश्रय एवं आजीविका की क्षति | घर, फसल और कुएँ का नुकसान; तत्काल राहत और पुनर्वास की अनिश्चितता। |
| आयोग की शक्ति की सीमा | समन जारी करने तक की शक्ति है, पर सिफ़ारिशों का क्रियान्वयन सरकार के विवेक पर निर्भर। |
| जाँच की विश्वसनीयता | आंतरिक रिपोर्ट सार्वजनिक न होने और समय-सीमा तय न होने पर निष्कर्ष तथा दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई अनिश्चित। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G): ग्रामीण क्षेत्रों में बेघर और कच्चे घर वाले पात्र परिवारों को पक्के आवास के लिए सहायता; पात्र पाए गए प्रभावित परिवारों के पुनर्वास में उपयोगी हो सकती है, परंतु यह समाचार में नामित नहीं है।
- धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (2024): जनजातीय बहुल गाँवों में आवास, बुनियादी ढाँचे और आजीविका के लिए बहु-क्षेत्रीय पहल; पात्र गाँवों के संदर्भ में प्रासंगिक।
आगे की राह
- कोसमी प्रकरण की समयबद्ध, निष्पक्ष जाँच कर निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएँ। प्रक्रिया-उल्लंघन सिद्ध होने पर उत्तरदायी अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
- प्रभावित परिवारों को तत्काल अस्थायी आश्रय, खाद्य सहायता और फसल-क्षति का मुआवज़ा दिया जाए। पात्र परिवारों को पक्के आवास की योजनाओं से जोड़ा जाए।
- वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लंबित और अस्वीकृत दावों की ग्राम सभा के स्तर पर पुनः समीक्षा हो। दावों की स्थिति का सत्यापन पूरा होने तक बेदखली पर रोक रहे।
- वन, राजस्व और निगम की भूमि का संयुक्त सीमांकन तथा अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया जाए। इससे स्वामित्व-विवादों की गुंजाइश घटेगी।
- ध्वस्तीकरण से पहले लिखित नोटिस, सुनवाई, वीडियोग्राफ़ी और वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य करने वाला मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी हो, जो सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुरूप हो।
- वन विकास निगम जैसी संस्थाओं के लिए पूर्व-बसे समुदायों से जुड़े मामलों में ग्राम सभा से परामर्श और जिला-स्तरीय समिति की स्वीकृति का प्रावधान किया जाए।
- राज्य स्तर पर अधिकारियों को जनजातीय अधिकारों, वन अधिकार अधिनियम और अत्याचार निवारण कानून पर संवेदीकरण प्रशिक्षण दिया जाए।
- राज्य सरकार आयोग की सिफ़ारिशों पर की गई कार्रवाई का प्रतिवेदन निर्धारित समय में प्रस्तुत करे, ताकि निगरानी तंत्र प्रभावी बने।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338A) · वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) · ग्राम सभा की भूमिका · अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आश्रय का अधिकार · विधि की सम्यक् प्रक्रिया · ध्वस्तीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश (2024) · पाँचवीं अनुसूची और PESA अधिनियम, 1996 · प्राकृतिक न्याय (पूर्व सूचना और सुनवाई) · अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी · प्रशासनिक उत्तरदायित्व · पुनर्वास और क्षतिपूर्ति · सिविल न्यायालय की शक्तियाँ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 338A: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना
- अनुच्छेद 338A(8): आयोग को सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ
- अनुच्छेद 21: जीवन में आश्रय-आजीविका का अधिकार
- अनुच्छेद 300A: विधि के बिना संपत्ति से वंचित नहीं
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जनजातियों के हितों का संवर्धन
- अनुच्छेद 14: मनमानी कार्रवाई के विरुद्ध समानता
अवधारणा प्रवाह
वन विकास निगम की भूमि पर पुराने बसे आदिवासी परिवारों के कब्ज़े और स्वामित्व का विवाद → 11 अक्टूबर को कोसमी गाँव में 12 मकानों का ध्वस्तीकरण; फसल और कुओं को भी नुकसान की सूचना → परिवारों पर आश्रय और आजीविका का संकट; कार्रवाई की प्रक्रिया पर प्रश्न → शिकायतों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का संज्ञान और वरिष्ठ अधिकारियों को तीन दिन में जवाब का नोटिस → जवाब न मिलने पर अनुच्छेद 338A(8) के अंतर्गत समन जारी करने की संभावना → राज्य सरकार द्वारा मुख्य सचिव से आंतरिक जाँच-प्रतिवेदन की माँग → जाँच के निष्कर्ष पर उत्तरदायित्व निर्धारण, राहत और पुनर्वास तथा प्रक्रिया-सुधार
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 338A 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया, जिसके बाद अनुसूचित जनजातियों के लिए पृथक् आयोग बना।
2. किसी शिकायत की जाँच करते समय आयोग को किसी व्यक्ति को समन कर उपस्थित कराने और दस्तावेज़ मँगाने के लिए सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
3. यह संसद के किसी अधिनियम द्वारा गठित एक सांविधिक निकाय है, संवैधानिक निकाय नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: 89वें संशोधन (2003) से अनुच्छेद 338A जोड़ा गया और NCSC से अलग NCST बना। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 338A(8) में समन, दस्तावेज़ मँगाने और शपथपत्र पर साक्ष्य लेने जैसी सिविल न्यायालय की शक्तियाँ दी गई हैं। कथन 3 गलत है: NCST एक संवैधानिक निकाय है, सांविधिक नहीं।
Q2. अभिकथन (A): वन भूमि पर काबिज़ अनुसूचित जनजाति के किसी परिवार के आवास को वन अधिकारों की मान्यता-प्रक्रिया पूरी हुए बिना गिराना विधिक रूप से संदिग्ध है।
कारण (R): वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) के अनुसार मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी वन-निवासी अनुसूचित जनजाति सदस्य को उसके कब्ज़े की वन भूमि से बेदखल या हटाया नहीं जाएगा।
निम्नलिखित में से सही विकल्प चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — धारा 4(5) बेदखली पर स्पष्ट रोक लगाती है, जब तक मान्यता और सत्यापन पूरा न हो। इसी कारण बिना इस प्रक्रिया के आवास गिराना विधिक रूप से कमज़ोर ठहरता है। अतः R, A की सही व्याख्या है।
Q3. नवंबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाइयों के संबंध में दिशानिर्देश दिए। निम्नलिखित में से कौन-सा कथन इन दिशानिर्देशों के अनुरूप है?
- ध्वस्तीकरण से पूर्व पंजीकृत डाक से कारण बताओ नोटिस भेजा जाए, उसे संरचना पर चस्पा किया जाए और जवाब के लिए कम से कम 15 दिन दिए जाएँ
- केवल 7 दिन का नोटिस पर्याप्त है और व्यक्तिगत सुनवाई आवश्यक नहीं है
- नोटिस केवल उन आवासीय संरचनाओं के लिए आवश्यक है जो वर्ष 2000 के बाद बनी हों
- किसी भी सरकारी भूमि पर बनी संरचना के लिए पुलिस अधीक्षक की मौखिक अनुमति पर्याप्त है
उत्तर: ध्वस्तीकरण से पूर्व पंजीकृत डाक से कारण बताओ नोटिस भेजा जाए, उसे संरचना पर चस्पा किया जाए और जवाब के लिए कम से कम 15 दिन दिए जाएँ — न्यायालय ने पंजीकृत डाक से नोटिस, उसे संरचना पर चस्पा करना, कम से कम 15 दिन का समय, व्यक्तिगत सुनवाई, तर्कसंगत अंतिम आदेश और कार्रवाई की वीडियोग्राफ़ी अनिवार्य की। सड़क, रेल पटरी और जलाशय जैसे सार्वजनिक स्थानों पर अनधिकृत निर्माण और न्यायालय के आदेश वाले मामले इसके अपवाद हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वनभूमि पर बसे आदिवासी परिवारों के आवासों के ध्वस्तीकरण की हाल की घटनाएँ अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा-कवच की परीक्षा लेती हैं। इन सुरक्षा उपायों का परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भूमिका ऐसी स्थितियों में कितनी प्रभावी है। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले के कोसमी गाँव में वन विकास निगम की कार्रवाई में 12 आदिवासी मकान गिराए जाने के आरोप हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, वन विभाग के प्रमुख सचिव, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से 3 दिन में जवाब माँगा, और राज्य सरकार ने जाँच की बात कही है। इसी संदर्भ में विधिक ढाँचे की पड़ताल करें। भाग 1 (सुरक्षा-कवच): (क) अनुच्छेद 21 में आश्रय और आजीविका का अधिकार, यानी विधि की सम्यक् प्रक्रिया (ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम, 1985; सुदामा सिंह बनाम दिल्ली सरकार, 2010)। (ख) अनुच्छेद 46: राज्य अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा करे और उन्हें सामाजिक अन्याय से बचाए। (ग) वन अधिकार अधिनियम, 2006: धारा 3(1)(क) में निवास और स्वयं-कृषि का अधिकार, धारा 4(5) में मान्यता पूरी होने तक बेदखली पर रोक, और धारा 6 में ग्राम सभा तथा उपखंड और ज़िला स्तरीय समितियों की भूमिका। (घ) पाँचवीं अनुसूची और PESA अधिनियम, 1996 में ग्राम सभा की शक्तियाँ। (ङ) अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में बेदखली और अवैध कब्ज़े संबंधी प्रावधान। (च) सर्वोच्च न्यायालय के नवंबर 2024 के ध्वस्तीकरण दिशानिर्देश: 15 दिन का नोटिस, सुनवाई, तर्कसंगत आदेश, वीडियोग्राफ़ी, और उल्लंघन पर अवमानना तथा अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही। भाग 2 (आयोग की भूमिका): अनुच्छेद 338A (89वाँ संशोधन, 2003)। 338A(5) में सुरक्षा उपायों की जाँच और निगरानी, शिकायतों की जाँच और संवृद्धि-योजना पर परामर्श शामिल है। 338A(8) में सिविल न्यायालय की शक्तियाँ हैं: समन, दस्तावेज़, शपथपत्र पर साक्ष्य। 338A(9) में बड़े नीतिगत विषयों पर परामर्श है। शक्तियाँ: तेज़ संज्ञान और अधिकारियों को जवाबदेह बनाना। सीमाएँ: सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं, राज्य स्तर पर कार्यान्वयन कमज़ोर, कोई दंडात्मक अधिकार नहीं, और रिपोर्ट संसद में देर से रखी जाती हैं। संतुलित मूल्यांकन: एकीकृत वन-अभिलेख, दावों का डिजिटल अभिलेखन और ग्राम सभा को शामिल किए बिना कार्रवाई पर रोक जैसे सुझाव। निष्कर्ष: विकास या वन-संरक्षण की आवश्यकता और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन विधि की सम्यक् प्रक्रिया से ही संभव है; आयोग को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सिफ़ारिशों पर कार्रवाई-रिपोर्ट की बाध्यता हो।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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