स्वदेशी युद्धपोत ‘समर्थक’ का नौसेना में शामिल होना: आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

स्वदेशी युद्धपोत 'समर्थक' का नौसेना में शामिल होना: आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

स्वदेशी युद्धपोत ‘समर्थक’ का नौसेना में शामिल होना: आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

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स्वदेशी युद्धपोत निर्माण प्रक्रिया

✎ 'समर्थक' L&T द्वारा 'मेक इन इंडिया' के अंतर्गत निर्मित, चार बहुउद्देशीय पोतों में पहला स्वदेशी पोत है, जिसका कमीशन 16 अक्टूबर 2026 को कारवार (कर्नाटक) में होगा; यह निगरानी, गश्त, LIMO, HADR और मानवरहित प्रणालियों के मदरशिप की…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा एवं रक्षा: रक्षा विनिर्माण में स्वदेशीकरण, समुद्री सुरक्षा  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था: ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा उद्योग में निजी क्षेत्र की भागीदारी  |  GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध: हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत
  • Prelims: समर्थक (बहुउद्देशीय पोत), निम्न-तीव्रता समुद्री अभियान (LIMO), मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR), मेक इन इंडिया, कारवार नौसैनिक अड्डा (कर्नाटक), स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित एवं विनिर्मित (IDDM) श्रेणी, मानवरहित स्वायत्त प्रणाली (Unmanned Autonomous System) मदरशिप, पोत का कमीशन (Commissioning), समुद्री निगरानी एवं गश्त
  • Essay: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संवृद्धि की साझा आधारशिला, हिंद महासागर में भारत की भूमिका: सुरक्षा प्रदाता से लेकर प्रथम सहायताकर्ता तक

त्वरित पुनरावृत्ति: ‘समर्थक’ L&T द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत निर्मित, चार बहुउद्देशीय पोतों में पहला स्वदेशी पोत है, जिसका कमीशन 16 अक्टूबर 2026 को कारवार (कर्नाटक) में होगा; यह निगरानी, गश्त, LIMO, HADR और मानवरहित प्रणालियों के मदरशिप की भूमिका निभाएगा।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

रक्षा मंत्रालय ने 13 अक्टूबर 2026 को बताया कि स्वदेश-निर्मित बहुउद्देशीय युद्धपोत ‘समर्थक’ 16 अक्टूबर को कर्नाटक के कारवार नौसैनिक अड्डे पर भारतीय नौसेना में कमीशन किया जाएगा। इसे लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के अंतर्गत बनाया है। यह नौसेना में शामिल किए जा रहे चार बहुउद्देशीय पोतों में पहला है। इसकी विशेषता चुनौतीपूर्ण समुद्री परिवेश के अनुरूप तैयार स्वदेशी संवेदक (Sensors), हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियाँ हैं। मंत्रालय के अनुसार यह रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

पृष्ठभूमि

  • भारत की तटरेखा लगभग 7,500 किमी लंबी है। इसके अलावा विशाल विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्ग हैं। इन सबकी सुरक्षा के लिए निरंतर निगरानी और गश्त आवश्यक है।
  • भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। इसलिए समुद्री सुरक्षा सीधे आर्थिक सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है।
  • दशकों तक भारत सैन्य उपकरणों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहा। इस निर्भरता को घटाने के लिए 2014 में ‘मेक इन इंडिया’ पहल शुरू हुई और बाद में आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत रक्षा क्षेत्र पर विशेष बल दिया गया।
  • रक्षा अधिप्राप्ति प्रक्रिया (DAP) 2020 में ‘खरीदें (भारतीय-IDDM)’ श्रेणी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। साथ ही रक्षा मंत्रालय समय-समय पर सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ जारी करता रहा है, जिनमें शामिल मदों का आयात प्रतिबंधित होता है।
  • जहाज़ निर्माण में पहले मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र के पोत-निर्माण उपक्रम और शिपयार्ड अग्रणी थे। अब L&T जैसी निजी कंपनियाँ भी नौसेना के लिए पोत बना रही हैं, जिससे रक्षा औद्योगिक आधार का विस्तार हो रहा है।
  • आधुनिक नौसेनाओं के सामने चुनौतियाँ बहुआयामी हैं। इनमें समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मत्स्यन और प्राकृतिक आपदाएँ शामिल हैं, और मानवरहित प्रणालियों का उपयोग भी बढ़ रहा है। इसलिए एक ही मंच से कई भूमिकाएँ निभाने वाले पोतों की माँग बढ़ी है।

‘समर्थक’ बहुउद्देशीय पोत क्या है?

  • ‘समर्थक’ एक स्वदेशी बहुउद्देशीय युद्धपोत है, जिसे नौसेना का भावी और आदर्श ‘उपयोगिता पोत’ (Utility Ship) बताया गया है। यह सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण अभियानों के लिए उपयोगी माना गया है।
  • इसका प्राथमिक कार्य समुद्री निगरानी और गश्त है। इसके साथ यह निम्न-तीव्रता समुद्री अभियान (LIMO) कर सकता है, जैसे समुद्री डकैती-रोधी और तस्करी-रोधी कार्रवाई।
  • अन्य क्षमताओं में लक्ष्य तैनाती एवं परीक्षण मंच, मानवरहित स्वायत्त प्रणालियों का मदरशिप, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) तथा सीमित अस्पताल पोत में रूपांतरण शामिल हैं। मंत्रालय के वक्तव्य में उद्धार (Salvage) कार्यों का भी उल्लेख है।
  • इसका एकीकृत युद्ध तंत्र स्वदेशी संवेदकों, हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को जोड़ता है। इन्हें चुनौतीपूर्ण समुद्री परिवेश में संचालन के लिए विशेष रूप से अनुकूलित किया गया है।
  • निर्माण L&T ने ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत किया है। यह नौसेना में शामिल होने वाले चार बहुउद्देशीय पोतों में पहला है। इसका कमीशन कारवार नौसैनिक अड्डे (कर्नाटक) पर 16 अक्टूबर को होगा।
  • कारवार में ‘प्रोजेक्ट सीबर्ड’ के अंतर्गत विकसित भारत का एक प्रमुख नौसैनिक अड्डा है, जो पश्चिमी तट पर नौसेना की उपस्थिति को सुदृढ़ करता है।
  • पोत के प्रतीक-चिह्न में लहरों से निकलता भारतीय हाथी बना है, जो शक्ति, बुद्धिमत्ता और चपलता का द्योतक है। इसका आदर्श वाक्य ‘विजयार्थम् एकनिष्ठता’ है, जिसका अर्थ है ‘विजय ही हमारा एकमात्र लक्ष्य’।
  • कमीशन का अर्थ है कि पोत औपचारिक रूप से नौसेना के बेड़े में शामिल होकर परिचालन के लिए तैयार हो जाता है। यह प्रक्रिया पोत के जलावतरण (Launch) और समुद्री परीक्षणों के बाद पूरी होती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
बहु-उद्देशीय स्वदेशी युद्धपोत, जिसे चार बहु-उद्देशीय पोतों की शृंखला में पहले पोत के रूप में नौसेना में शामिल किया जा रहा है एक ही पोत कई कार्य कर सकता है, इसलिए महँगे विशिष्ट पोतों पर निर्भरता घटती है और बेड़े का उपयोग-दक्षता बढ़ती है
समुद्री निगरानी और गश्ती इसके प्रमुख कार्य हैं; निम्न-तीव्रता समुद्री अभियान (LIMO) की क्षमता भी है भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र में सतत निगरानी और तटीय तथा अपतटीय सुरक्षा सुदृढ़ होती है
लक्ष्य-तैनाती (Target Deployment) और परीक्षण मंच के रूप में उपयोग हथियारों और प्रणालियों के परीक्षण तथा नौसैनिक प्रशिक्षण के लिए अलग से समर्पित पोत उपलब्ध रहता है
मानवरहित स्वायत्त प्रणालियों का मातृ पोत (Mothership) ड्रोन तथा मानवरहित जलयानों को संचालित करने की क्षमता मिलती है, जो भविष्य के नौसैनिक युद्ध की दिशा के अनुरूप है
मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR), सीमित अस्पताल-पोत में रूपांतरण तथा पोत उद्धार (Salvage) की क्षमता चक्रवात, समुद्री दुर्घटना जैसी आपदाओं में नौसेना की भूमिका बढ़ती है और भारत की ‘प्रथम प्रतिक्रियादाता’ छवि सुदृढ़ होती है
स्वदेशी सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों वाला एकीकृत युद्ध तंत्र (Integrated Combat Suite); निर्माण L&T द्वारा, कमीशनिंग कारवार नौसैनिक अड्डे पर निजी क्षेत्र की भागीदारी और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बल मिलता है; कारवार पश्चिमी तट का रणनीतिक अड्डा है

महत्व

रणनीतिक और सामरिक

  • हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री क्षेत्र जागरूकता (Maritime Domain Awareness) बढ़ती है, जो अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
  • निम्न-तीव्रता अभियानों की क्षमता से तस्करी, समुद्री डकैती और अवैध मत्स्यन जैसे गैर-पारंपरिक खतरों से निपटने में सुविधा होती है।
  • बड़े और महँगे युद्धपोतों को कठिन अभियानों के लिए मुक्त रखा जा सकता है, क्योंकि सहायक कार्य बहु-उद्देशीय पोत सँभाल लेते हैं।
  • कारवार में कमीशनिंग पश्चिमी समुद्र-तट पर नौसेना की उपस्थिति और परिचालन तत्परता को सुदृढ़ करती है।

आर्थिक और औद्योगिक

  • घरेलू पोत-निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और सहायक उद्योगों (MSME) को माँग मिलती है तथा रोज़गार सृजित होता है।
  • रक्षा आयात पर निर्भरता घटने से विदेशी मुद्रा की बचत होती है और रक्षा उत्पादन का आधार व्यापक होता है।
  • निजी क्षेत्र की कंपनी द्वारा निर्मित युद्धपोत यह दर्शाता है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी से जटिल नौसैनिक परियोजनाएँ पूरी की जा सकती हैं।

तकनीकी और स्वदेशीकरण

  • स्वदेशी सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियाँ सुरक्षा-संवेदनशील तकनीक पर नियंत्रण बढ़ाती हैं।
  • मानवरहित स्वायत्त प्रणालियों के मातृ पोत की अवधारणा से नौसेना के आधुनिकीकरण और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमता को गति मिलती है।
  • परीक्षण मंच की भूमिका से स्वदेशी हथियारों के विकास और परीक्षण का चक्र छोटा हो सकता है।

मानवीय और कूटनीतिक

  • HADR और सीमित अस्पताल-पोत की क्षमता से भारत पड़ोसी तथा हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को सहायता पहुँचा सकता है, जिससे ‘प्रथम प्रतिक्रियादाता’ और ‘क्षेत्र में पसंदीदा सुरक्षा साझेदार’ की छवि मज़बूत होती है।
  • पोत उद्धार की क्षमता समुद्री दुर्घटनाओं, जहाज़ों के फँसने या तेल रिसाव जैसी स्थितियों में तटीय पर्यावरण और नौवहन की सुरक्षा में सहायक है।

चुनौतियाँ

1. बहु-उद्देशीय डिज़ाइन की सीमाएँ

  • एक ही पोत पर कई कार्य थोपने से किसी एक कार्य में विशेषज्ञ पोत जैसी दक्षता नहीं मिल पाती।
  • अलग-अलग भूमिकाओं के लिए उपकरणों के रूपांतरण में समय और प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता पड़ती है।

2. स्वदेशी घटकों की वास्तविक गहराई

  • पोत में स्वदेशी सामग्री का प्रतिशत भले अधिक हो, इंजन, विशिष्ट सेंसर और कुछ उप-प्रणालियों के लिए आयातित कलपुर्ज़ों पर निर्भरता बनी रह सकती है।
  • आपूर्ति शृंखला में वैश्विक व्यवधान होने पर परियोजना की समय-सीमा प्रभावित होती है।

3. निर्माण में विलंब और लागत वृद्धि

  • युद्धपोत परियोजनाओं में डिज़ाइन परिवर्तन, अनुमोदन-प्रक्रिया और आपूर्तिकर्ताओं के कारण विलंब आम है।
  • विलंब से नौसेना की क्षमता-अंतराल बढ़ता है और परियोजना लागत में वृद्धि होती है।

4. मानवरहित प्रणालियों का एकीकरण और साइबर सुरक्षा

  • स्वायत्त प्रणालियों के संचालन के लिए सुरक्षित संचार, डेटा-लिंक और नियंत्रण प्रणाली आवश्यक है।
  • नेटवर्क-आधारित प्रणालियों पर साइबर हमले और इलेक्ट्रॉनिक अवरोध का जोखिम रहता है।

5. संख्यात्मक बल और व्यापक समुद्री सुरक्षा परिवेश

  • हिंद महासागर में अन्य शक्तियों की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति के बीच केवल एक या कुछ पोतों से सामर्थ्य-अंतराल नहीं भरता।
  • समग्र नौसैनिक आधुनिकीकरण के लिए पनडुब्बी, विमानवाहक पोत और विमानन क्षमता का संतुलित विकास भी आवश्यक है।

6. रक्षा बजट और संसाधन प्राथमिकताएँ

  • पूँजीगत व्यय और राजस्व व्यय (वेतन-पेंशन) के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन है।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने पर गुणवत्ता-नियंत्रण और जवाबदेही की सुदृढ़ व्यवस्था चाहिए।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
बहु-उद्देशीय भूमिका अनेक कार्य एक साथ करने से विशेषज्ञ पोतों की तुलना में दक्षता घट सकती है
आयात निर्भरता इंजन तथा उन्नत सेंसर जैसे घटकों के लिए विदेशी आपूर्ति का जोखिम
समय-सीमा परियोजना में विलंब से नौसेना की क्षमता-अंतराल बना रहता है
साइबर और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा स्वायत्त तथा नेटवर्क-आधारित प्रणालियाँ अवरोध और हमले के प्रति संवेदनशील
बजट आधुनिकीकरण और परिचालन व्यय के बीच संसाधनों का संतुलन
निजी क्षेत्र की भागीदारी गुणवत्ता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक रखरखाव की ज़िम्मेदारी तय करना आवश्यक

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मेक इन इंडिया (Make in India) पहल — समाचार में स्पष्ट रूप से उल्लिखित; पोत का निर्माण इसी के अंतर्गत हुआ है
  • आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण — रक्षा मंत्रालय ने इसे ‘रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम’ बताया है
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure) 2020 — ‘खरीदें (भारतीय-स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित)’ श्रेणी को प्राथमिकता देती है, जो स्वदेशी युद्धपोत अधिग्रहण का ढाँचा है
  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ (Positive Indigenisation Lists) — इनमें शामिल मदों के आयात पर रोक लगाकर घरेलू उद्योग से ही खरीद की जाती है

आगे की राह

  • स्वदेशी सामग्री के वास्तविक प्रतिशत का स्वतंत्र आकलन किया जाए और इंजन तथा उन्नत सेंसर जैसे महत्त्वपूर्ण घटकों के स्वदेशी विकास को प्राथमिकता मिले।
  • शृंखला के शेष तीन पोतों की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट मील-पत्थर, दंड-प्रावधान और नियमित समीक्षा तंत्र अपनाया जाए।
  • मानवरहित स्वायत्त प्रणालियों के संचालन हेतु सुरक्षित संचार, साइबर सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध-प्रतिरोधी क्षमता विकसित की जाए।
  • निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के पोत-निर्माताओं और MSME आपूर्तिकर्ताओं की साझेदारी को बढ़ावा देकर घरेलू आपूर्ति शृंखला मज़बूत की जाए।
  • HADR और पोत उद्धार जैसी भूमिकाओं के लिए पड़ोसी देशों के साथ संयुक्त अभ्यास और समन्वय तंत्र को नियमित किया जाए।
  • बहु-उद्देशीय पोतों के साथ पनडुब्बी, विमानन और निगरानी क्षमताओं का संतुलित विकास करते हुए दीर्घकालिक नौसैनिक योजना बनाई जाए।
  • रक्षा पूँजीगत व्यय में घरेलू खरीद का हिस्सा बनाए रखा जाए और रखरखाव तथा पुर्ज़ों की स्वदेशी उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 53(2) — संघ के रक्षा बलों की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति में निहित
  • अनुच्छेद 246(1) तथा सातवीं अनुसूची की संघ सूची, प्रविष्टि 1 — भारत की रक्षा संघ का विषय

अवधारणा प्रवाह

हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक चुनौतियाँ और गैर-पारंपरिक समुद्री खतरे  →  निगरानी, गश्ती और बहु-भूमिका वाले पोतों की आवश्यकता  →  मेक इन इंडिया के अंतर्गत L&T को चार बहु-उद्देशीय पोतों का निर्माण-कार्य  →  स्वदेशी सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों से युक्त पहला पोत तैयार  →  16 अक्टूबर को कारवार में समर्थक की कमीशनिंग  →  निगरानी, HADR, मानवरहित प्रणालियों के मातृ पोत जैसी भूमिकाओं से नौसैनिक क्षमता में वृद्धि  →  रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदार की भूमिका सुदृढ़

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारतीय नौसेना के स्वदेशी बहुउद्देशीय पोत ‘समर्थक’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह लार्सन एंड टूब्रो द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ पहल के अंतर्गत निर्मित चार बहुउद्देशीय पोतों में से पहला है।
2. इसे कर्नाटक में कारवार नौसैनिक अड्डे पर नौसेना में सम्मिलित किया जाना है।
3. इसे मुख्यतः विमानवाहक पोत के रूप में लड़ाकू विमानों के संचालन के लिए डिज़ाइन किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: यह लार्सन एंड टूब्रो द्वारा निर्मित चार पोतों में पहला है। कथन 2 सही है: इसे कारवार में नौसेना में सम्मिलित किया जाएगा। कथन 3 गलत है: इसे मुख्यतः समुद्री निगरानी और गश्त के लिए बनाया गया है, विमानवाहक पोत के रूप में नहीं।

Q2. अभिकथन (A): निजी शिपयार्डों द्वारा युद्धपोतों का निर्माण रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करता है।
कारण (R): स्वदेशी सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के उपयोग से आयात पर निर्भरता घटती है और आपूर्ति शृंखला पर देश का नियंत्रण बढ़ता है।
निम्नलिखित में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — निजी शिपयार्ड स्वदेशी निर्माण क्षमता और औद्योगिक आधार का विस्तार करते हैं, जिससे आत्मनिर्भरता बढ़ती है। स्वदेशी प्रणालियों से आयात निर्भरता घटती है और सामरिक स्वायत्तता बढ़ती है। इस प्रकार R, A की सही व्याख्या करता है।

Q3. समाचार के अनुसार ‘समर्थक’ की संभावित भूमिकाओं में निम्नलिखित में से कौन-सी शामिल नहीं है?

  1. समुद्री निगरानी एवं गश्त
  2. मानवरहित स्वायत्त प्रणालियों के लिए मातृ-पोत (Mothership) का कार्य
  3. सीमित अस्पताल पोत में रूपांतरण
  4. बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी के रूप में सामरिक परमाणु प्रतिरोध गश्त

उत्तर: बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी के रूप में सामरिक परमाणु प्रतिरोध गश्त — निगरानी एवं गश्त, मानवरहित स्वायत्त प्रणाली मातृ-पोत और सीमित अस्पताल पोत में रूपांतरण, तीनों इसकी बताई गई भूमिकाएँ हैं। यह सतही बहुउद्देशीय पोत है, पनडुब्बी नहीं, इसलिए परमाणु प्रतिरोध गश्त इसकी भूमिका नहीं है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ‘युद्धपोत ‘समर्थक’ जैसे स्वदेशी बहुउद्देशीय पोतों का निर्माण भारत की नौसैनिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।’ इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि युद्धपोत निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए कौन-से नीतिगत उपाय किए गए हैं और अब भी कौन-सी बाधाएँ शेष हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका: ‘समर्थक’ चार बहुउद्देशीय पोतों में पहला है। इसे लार्सन एंड टूब्रो ने बनाया है और इसे कारवार में नौसेना में सम्मिलित किया जाना है। इसकी भूमिकाएँ हैं: निगरानी एवं गश्त, निम्न-तीव्रता समुद्री अभियान (LIMO), परीक्षण मंच, मानवरहित स्वायत्त प्रणाली मातृ-पोत, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) और सीमित अस्पताल पोत में रूपांतरण। इसका एकीकृत युद्ध तंत्र स्वदेशी सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों पर आधारित है।

भाग 1 (महत्त्व): (i) आयात निर्भरता में कमी और सामरिक स्वायत्तता; (ii) निजी शिपयार्ड और MSME आपूर्ति शृंखला का विस्तार तथा रोज़गार सृजन; (iii) हिंद महासागर क्षेत्र में ‘प्रथम प्रत्युत्तरदाता’ की भूमिका, जिसमें HADR और निगरानी शामिल हैं; (iv) अन्य स्वदेशी उपलब्धियों से तुलना: आईएनएस विक्रांत (प्रथम स्वदेशी विमानवाहक पोत, 2022 में कमीशन), प्रोजेक्ट 17A, नौसेना डिज़ाइन निदेशालय।

भाग 2 (नीतिगत उपाय): रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 में ‘खरीदें (भारतीय-IDDM)’ श्रेणी को वरीयता; सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ; iDEX और रक्षा गलियारे; रक्षा में FDI उदारीकरण (स्वचालित मार्ग से 74%); रणनीतिक भागीदारी मॉडल (2017); केलकर समिति (2005) और धीरेंद्र सिंह समिति (2015) की सिफ़ारिशें; आयुध निर्माणी बोर्ड का निगमीकरण (2021) और सात रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों का गठन।

भाग 3 (बाधाएँ और समीक्षा): गैस टर्बाइन और इंजन जैसे प्रणोदन तंत्र तथा कुछ महत्त्वपूर्ण उप-प्रणालियों के लिए आयात पर निर्भरता; निर्माण में देरी और लागत वृद्धि; दीर्घ अधिग्रहण चक्र; निजी क्षेत्र के लिए कम और अनिश्चित ऑर्डर; शिपयार्ड अवसंरचना और कुशल श्रमबल की कमी; डिज़ाइन और अनुसंधान पर कम निवेश।

निष्कर्ष: संतुलित मत यह है कि पोत-निर्माण में सफलता ठोस है, पर वास्तविक आत्मनिर्भरता के लिए ‘स्वदेशी सामग्री’ के साथ मूल प्रौद्योगिकी और इंजन पर नियंत्रण भी चाहिए। आगे का मार्ग: दीर्घकालिक ऑर्डर पाइपलाइन, अनुसंधान एवं विकास में निवेश, समयबद्ध अधिग्रहण और निर्यात प्रोत्साहन।

स्रोत: orissapost.com


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