14 Oct महंगाई की मार: ग्रामीण भारत पर खाद्य मुद्रास्फीति का बढ़ता बोझ
✎ सितंबर में CPI मुद्रास्फीति 5.54% (ग्रामीण 6.08%, ग्रामीण खाद्य 8.06%) रही, जो RBI के 4% लक्ष्य और 6% की ऊपरी सीमा के निकट है। इसके पीछे खाद्य कीमतें, कच्चे तेल का 116.09 डॉलर प्रति बैरल पहुँचना, रुपये का मूल्यह्रास और FPI की…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: मुद्रास्फीति, मौद्रिक नीति, समावेशी संवृद्धि | GS Paper III — कृषि: कृषि उपज का मूल्य, भंडारण और विपणन; मानसून तथा फसल जोखिम | GS Paper III — बाह्य क्षेत्र: रुपये का मूल्यह्रास, पूँजी प्रवाह, कच्चे तेल पर आयात-निर्भरता | GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध: पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- Prelims: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (4% ± 2%), मौद्रिक नीति समिति (MPC), रेपो दर और आधार अंक, मूल मुद्रास्फीति (Core Inflation), आयातित मुद्रास्फीति, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI), रुपये का मूल्यह्रास, आधार प्रभाव (Base Effect), अल नीनो, पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) और भारतीय कच्चे तेल की टोकरी
- Essay: मुद्रास्फीति: गरीबों पर लगने वाला मौन कर, बाह्य आघात के दौर में मूल्य-स्थिरता और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: सितंबर में CPI मुद्रास्फीति 5.54% (ग्रामीण 6.08%, ग्रामीण खाद्य 8.06%) रही, जो RBI के 4% लक्ष्य और 6% की ऊपरी सीमा के निकट है। इसके पीछे खाद्य कीमतें, कच्चे तेल का 116.09 डॉलर प्रति बैरल पहुँचना, रुपये का मूल्यह्रास और FPI की निकासी जैसे कारण हैं। आपूर्ति-जनित और आयातित मुद्रास्फीति पर ब्याज दर का असर सीमित होता है, इसलिए मौद्रिक नीति के साथ आपूर्ति-पक्ष के उपाय भी आवश्यक हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सितंबर में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 5.54% हो गई, जो लगभग दो वर्ष का उच्चतम स्तर है। यह लगातार चौथा महीना है जब समग्र CPI मुद्रास्फीति RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर रही। ग्रामीण मुद्रास्फीति 6.08% और ग्रामीण खाद्य मुद्रास्फीति 8.06% तक पहुँच गई। इसके पीछे प्याज़, लहसुन और अदरक की कीमतों में भारी वृद्धि रही। साथ ही पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद भारतीय कच्चे तेल की टोकरी जुलाई के 82.04 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर सितंबर में 116.09 डॉलर प्रति बैरल हो गई, और रुपया कमज़ोर हुआ। मूल मुद्रास्फीति भी 4.16% से बढ़कर 4.6% हो गई, यानी मूल्य-दबाव अब व्यापक हो रहा है। समाचार के अनुसार MPC ने अक्टूबर में रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50% कर दी। इसी कारण यह विषय परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- भारत में 2016 में RBI अधिनियम, 1934 में संशोधन कर लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा अपनाया गया। इसमें CPI मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4% है और सहनीय सीमा ±2 प्रतिशत अंक (अर्थात 2% से 6%) है। लक्ष्य केंद्र सरकार RBI के परामर्श से अधिसूचित करती है।
- मुद्रास्फीति का निर्धारण MPC करती है। इसमें 6 सदस्य होते हैं: RBI के 3 और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 3 बाह्य सदस्य। निर्णय बहुमत से होते हैं और बराबरी की स्थिति में गवर्नर के पास निर्णायक मत होता है।
- लगातार तीन तिमाहियों तक औसत मुद्रास्फीति सहनीय सीमा से बाहर रहे, तो इसे लक्ष्य की विफलता माना जाता है। तब RBI को केंद्र सरकार को रिपोर्ट देनी होती है, जिसमें कारण और सुधारात्मक कदम बताए जाते हैं।
- भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का अधिकांश भाग आयात करता है। इसलिए वैश्विक तेल कीमतें, परिवहन लागत और विनिमय दर घरेलू कीमतों को सीधे प्रभावित करती हैं। यही आयातित मुद्रास्फीति का मूल कारण है।
- CPI में खाद्य एवं पेय पदार्थों का भार अधिक है, और ग्रामीण परिवारों के उपभोग में खाद्य का हिस्सा शहरी परिवारों से अधिक रहता है। इसलिए खाद्य कीमतें बढ़ने पर ग्रामीण परिवार अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित होते हैं।
- प्याज़, टमाटर और आलू जैसी सब्ज़ियों की कीमतें मौसमी और अस्थिर होती हैं। मानसून की कमी, अत्यधिक गर्मी और अल नीनो जैसे जलवायु कारक उत्पादन तथा आपूर्ति शृंखला पर सीधा असर डालते हैं।
मुद्रास्फीति और इसके वर्तमान दबाव क्या हैं?
- मुद्रास्फीति (Inflation) वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य-स्तर में निरंतर वृद्धि है, जिससे मुद्रा की क्रय-शक्ति घटती है। भारत में मौद्रिक नीति के लिए CPI (संयुक्त) मुद्रास्फीति को मापदंड माना जाता है।
- समग्र मुद्रास्फीति (Headline Inflation) में सभी मदें शामिल होती हैं। मूल मुद्रास्फीति (Core Inflation) में खाद्य और ईंधन को हटाकर मूल्य-प्रवृत्ति देखी जाती है। इस समाचार में मूल मुद्रास्फीति में वृद्धि (4.16% से 4.6%) यह संकेत देती है कि दबाव केवल सब्ज़ियों तक सीमित नहीं है।
- आपूर्ति-पक्ष के आघात (खराब मौसम, तेल कीमतें, परिवहन लागत) की स्थिति में केवल ब्याज दर बढ़ाने से मुद्रास्फीति पर सीमित असर पड़ता है। फिर भी मौद्रिक नीति मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को स्थिर रखने और दूसरे चरण के प्रभावों को रोकने में भूमिका निभाती है।
- रेपो दर वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। इसे बढ़ाने से ऋण महँगा होता है, माँग घटती है और मुद्रास्फीति पर दबाव कम होता है। समाचार के अनुसार रेपो दर 25 आधार अंक (0.25 प्रतिशत अंक) बढ़कर 5.50% हुई है।
- आयातित मुद्रास्फीति तब बनती है जब आयातित वस्तुओं, विशेषकर कच्चे तेल, की कीमत बढ़ने या रुपये के कमज़ोर होने से घरेलू लागत बढ़ती है। इससे माल-भाड़ा, उत्पादन और वितरण की लागत ऊपर जाती है। समाचार में माल के लिए परिवहन सेवाओं की मुद्रास्फीति 14.73% बताई गई है।
- FPI की निकासी रुपये पर दोहरा दबाव डालती है। डॉलर की माँग बढ़ने से रुपये का मूल्यह्रास होता है, जिससे आयात और महँगे हो जाते हैं। समाचार के अनुसार सितंबर तक नौ महीनों में FPI ने भारतीय इक्विटी से रिकॉर्ड ₹3.08 ट्रिलियन निकाले, और रुपया एक वर्ष में लगभग 7% कमज़ोर हुआ।
- RBI विदेशी मुद्रा बाज़ार में डॉलर बेचकर और विदेशी मुद्रा प्रवाह आकर्षित करके रुपये को सहारा देता है। तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर सुविधा से हाज़िर बाज़ार में डॉलर की माँग का दबाव घट सकता है, पर यह अस्थायी राहत है। स्थायी समाधान के लिए तेल पर आयात-निर्भरता घटाना और बाह्य क्षेत्र को मज़बूत करना ज़रूरी है।
- खाद्य कीमतों के लिए आपूर्ति-पक्ष के उपाय अधिक प्रभावी होते हैं, जैसे भंडारण और परिवहन ढाँचे में सुधार, बफर स्टॉक का प्रबंधन, आयात-निर्यात नीति में समयबद्ध समायोजन और बाज़ार-सूचना तंत्र। राजकोषीय उपाय, जैसे ईंधन पर करों का समायोजन, भी सहायक हो सकते हैं। इनमें राजकोषीय घाटे की सीमा का ध्यान रखना पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| समग्र मुद्रास्फीति 5.54% (सितंबर) — लगभग दो वर्ष का उच्चतम स्तर | लगातार चौथे महीने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर रहा। यह 6% की ऊपरी सहनसीमा से केवल 0.46 प्रतिशत अंक नीचे है, इसलिए नीतिगत सतर्कता बढ़ गई है। |
| ग्रामीण मुद्रास्फीति 6.08% और ग्रामीण खाद्य मुद्रास्फीति 8.06% | ग्रामीण परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा खाद्य पदार्थों पर खर्च होता है, इसलिए खाद्य कीमतों की मार उन पर अधिक पड़ती है। यह मुद्रास्फीति के वितरणात्मक (असमान) प्रभाव को दर्शाता है। |
| वस्तु-विशेष उछाल: प्याज 108.09%, लहसुन 54.62%, अदरक 62.85%, जबकि आलू (-11.50%) और टमाटर (-8.62%) में गिरावट | यह कीमतों का व्यापक नहीं बल्कि चुनिंदा उछाल है। नाशवान वस्तुओं में आपूर्ति-पक्ष के झटके और आधार प्रभाव (Base effect) का असर दिखता है। प्याज-जैसी वस्तुओं के लिए भंडारण और बफर-स्टॉक नीति की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। |
| कच्चे तेल की भारतीय टोकरी जुलाई के $82.04 से बढ़कर सितंबर में $116.09 प्रति बैरल (लगभग 41% वृद्धि) | पश्चिम एशिया के संघर्ष से आयातित मुद्रास्फीति बढ़ी है। ईंधन महँगा होने से माल-भाड़ा, उत्पादन और वितरण की लागत बढ़ती है। माल-परिवहन सेवाओं की मुद्रास्फीति 14.73% रही। |
| मूल मुद्रास्फीति (Core inflation) अगस्त के 4.16% से बढ़कर सितंबर में 4.6% | खाद्य और ईंधन से बाहर की वस्तुओं में भी कीमतें बढ़ रही हैं, यानी दबाव व्यापक हो रहा है। केंद्रीय बैंक के लिए यह अस्थायी झटके और स्थायी प्रवृत्ति में अंतर करने का संकेत है। |
| MPC द्वारा रेपो दर में 25 आधार अंक की वृद्धि कर 5.50% करना | लंबे समय बाद दर-वृद्धि का चक्र शुरू हुआ है और दिसंबर में एक और वृद्धि की संभावना खुली है। इसका उद्देश्य मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को स्थिर रखना है। |
| रुपये का लगभग 7% मूल्यह्रास और FPI की रिकॉर्ड निकासी (₹3.08 लाख करोड़ — नौ माह में) | पूँजी-निकासी से रुपया कमज़ोर होता है, जिससे आयात और महँगे होते हैं। इस प्रकार बाह्य क्षेत्र और घरेलू कीमतें आपस में जुड़ जाती हैं। |
महत्व
आर्थिक आयाम
- मुद्रास्फीति परिवारों की वास्तविक आय और क्रय-शक्ति घटाती है। इसका सबसे अधिक बोझ ग्रामीण तथा निम्न आय वर्ग पर पड़ता है, क्योंकि उनकी उपभोग-टोकरी में खाद्य पदार्थों का भार अधिक होता है।
- समग्र मुद्रास्फीति का 6% की सीमा के निकट पहुँचना मौद्रिक नीति के लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting) ढाँचे की परीक्षा है।
- कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि से माल-परिवहन की लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था में दूसरे दौर के प्रभाव (Second-round effects) के रूप में फैलता है।
- ऊँची ब्याज दरें ऋण महँगा करके निवेश और आर्थिक संवृद्धि पर दबाव डाल सकती हैं। इसलिए संवृद्धि और मूल्य-स्थिरता के बीच संतुलन आवश्यक है।
सामाजिक आयाम
- त्योहारी मौसम में खाद्य कीमतों की वृद्धि पोषण-स्तर और घरेलू बजट पर असर डालती है, विशेषकर कमज़ोर मानसून से प्रभावित किसान परिवारों पर।
- जो ग्रामीण परिवार उपभोक्ता भी हैं और किसान भी, उन पर कीमतों और उपज दोनों के जोखिम का दोहरा दबाव पड़ता है।
- खाद्य कीमतों का अस्थिर रहना खाद्य सुरक्षा और पोषण संबंधी लक्ष्यों के लिए चुनौती है।
बाह्य क्षेत्र एवं भू-राजनीतिक आयाम
- कच्चे तेल की आयात-निर्भरता के कारण पश्चिम एशिया का संघर्ष सीधे घरेलू कीमतों तक पहुँचता है।
- FPI की निकासी और रुपये का मूल्यह्रास आयातित मुद्रास्फीति को बढ़ाते हैं तथा वित्तीय बाज़ारों की संवेदनशीलता उजागर करते हैं।
- तेल विपणन कंपनियों के लिए RBI की विशेष डॉलर सुविधा हाजिर बाज़ार में डॉलर की माँग का दबाव कम कर सकती है, पर यह अस्थायी उपाय है।
संस्थागत एवं नीतिगत आयाम
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) की कार्रवाई RBI अधिनियम, 1934 में निहित मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की संस्थागत व्यवस्था की कार्यशीलता दर्शाती है।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण में मौद्रिक नीति (माँग-पक्ष) और राजकोषीय व आपूर्ति-पक्ष उपायों (भंडारण, आयात-निर्यात नीति, बफर स्टॉक) के समन्वय की आवश्यकता रेखांकित होती है।
चुनौतियाँ
1. आपूर्ति-पक्ष के झटके और खाद्य कीमतों की अस्थिरता
- कमज़ोर मानसून, El Niño का जोखिम और असामान्य रूप से ऊँचा तापमान उत्पादन तथा आय दोनों को अनिश्चित बनाते हैं।
- प्याज, लहसुन और अदरक जैसी नाशवान वस्तुओं में उतार-चढ़ाव तीव्र होता है, क्योंकि भंडारण और शीत-शृंखला की सुविधाएँ अपर्याप्त हैं।
- मौद्रिक नीति आपूर्ति-जनित खाद्य मुद्रास्फीति पर सीधे असर नहीं डाल सकती।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि विपणन, खाद्य प्रसंस्करण एवं भंडारण; मुद्रास्फीति के प्रकार
2. आयातित मुद्रास्फीति और ऊर्जा-निर्भरता
- कच्चे तेल की टोकरी का 41% महँगा होना परिवहन, उर्वरक और उत्पादन लागत बढ़ाता है।
- रुपये के मूल्यह्रास से आयात-बिल और बढ़ता है, जिससे लागत-जनित मुद्रास्फीति (Cost-push inflation) को बल मिलता है।
- पश्चिम एशिया संघर्ष के समाधान की स्पष्टता न होने से अनिश्चितता बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: ऊर्जा सुरक्षा; भुगतान-संतुलन; GS-2: अंतरराष्ट्रीय संबंध
3. मुद्रास्फीति का व्यापक होना (मूल मुद्रास्फीति में वृद्धि)
- मूल मुद्रास्फीति 4.16% से 4.6% होना बताता है कि माल-भाड़े और लागत का असर अन्य वस्तुओं-सेवाओं में पहुँच रहा है।
- रेस्तराँ एवं आवास सेवाओं में 9.36% की मुद्रास्फीति सेवा क्षेत्र में दबाव का संकेत है।
- यदि अपेक्षाएँ अस्थिर होने लगें तो मज़दूरी-कीमत चक्र बनने का जोखिम रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति के कारण एवं प्रभाव
4. पूँजी-निकासी और बाह्य क्षेत्र का दबाव
- नौ महीनों में FPI द्वारा ₹3.08 लाख करोड़ की रिकॉर्ड निकासी हुई, जो पूरे CY2025 की निकासी से लगभग दोगुनी है।
- डॉलर-आधारित अधिक प्रतिफल और सुरक्षित निवेश की तलाश में निवेशक भारत से पूँजी निकाल रहे हैं।
- RBI की डॉलर बिक्री से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और हस्तक्षेप की भी सीमाएँ हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: विदेशी पूँजी प्रवाह, विनिमय दर प्रबंधन
5. संवृद्धि और मूल्य-स्थिरता के बीच नीतिगत दुविधा
- दर-वृद्धि आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति पर कम प्रभावी है, जबकि ऋण महँगा होने से निवेश और उपभोग धीमे पड़ सकते हैं।
- ईंधन पर कर में कटौती या सब्सिडी बढ़ाने से राजकोषीय घाटे पर दबाव पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: राजकोषीय-मौद्रिक नीति समन्वय
6. ग्रामीण परिवारों पर असमान बोझ
- ग्रामीण खाद्य मुद्रास्फीति 8.06% है, जबकि शहरी स्तर पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम है।
- उपभोक्ता और उत्पादक दोनों रूपों में ग्रामीण परिवार जोखिम में हैं; किसान को ऊँची खुदरा कीमत का लाभ अक्सर नहीं मिलता, क्योंकि मूल्य-शृंखला में बिचौलियों का हिस्सा बड़ा होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2/3: समावेशी संवृद्धि, ग्रामीण संकट, कमज़ोर वर्गों के लिए नीतियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| खाद्य कीमतें | मानसून और तापमान के झटकों से प्याज, लहसुन, अदरक में तीव्र उछाल; आलू-टमाटर में गिरावट से मूल्य-असंतुलन भी दिखता है। |
| कच्चा तेल | $82.04 से $116.09 प्रति बैरल का उछाल माल-भाड़े और उत्पादन-लागत को बढ़ा रहा है। |
| रुपया | लगभग 7% मूल्यह्रास से आयात महँगे होते हैं; RBI के हस्तक्षेप से मिली राहत अस्थायी है। |
| FPI निकासी | ₹3.08 लाख करोड़ की निकासी से बाज़ार और विनिमय दर दोनों पर दबाव है। |
| मूल मुद्रास्फीति | 4.6% तक वृद्धि से दबाव के व्यापक होने और दूसरे दौर के प्रभाव का जोखिम बढ़ा है। |
| मौद्रिक नीति | रेपो दर 5.50% हो चुकी है; आगे वृद्धि से संवृद्धि पर असर और ऋण-लागत बढ़ने की आशंका है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- मूल्य स्थिरीकरण कोष (Price Stabilisation Fund – PSF): प्याज जैसी नाशवान कृषि-वस्तुओं का बफर स्टॉक बनाकर कीमतें स्थिर करने की व्यवस्था।
- ऑपरेशन ग्रीन्स (Operation Greens): टमाटर, प्याज और आलू (TOP) की मूल्य-शृंखला में उत्पादन, भंडारण और विपणन सुधारने की योजना।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act): खाद्य पदार्थों की जमाखोरी रोकने और भंडारण-सीमा लगाने का वैधानिक साधन।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): कमज़ोर मानसून या प्राकृतिक आपदा से फसल-हानि की स्थिति में किसानों की आय-सुरक्षा।
आगे की राह
- खाद्य कीमतों के लिए आपूर्ति-पक्ष उपाय: बफर स्टॉक, समयबद्ध आयात-निर्यात नीति और पर्याप्त शीत-भंडारण, ताकि नाशवान वस्तुओं की कीमतों में अचानक उछाल रोका जा सके।
- मानसून और El Niño की स्थिति पर सतत निगरानी करके बुवाई, उत्पादन और मंडी-आवक का पूर्वानुमान लगाना तथा प्रभावित क्षेत्रों में फसल बीमा व आय-सहायता को सुदृढ़ करना।
- ऊर्जा सुरक्षा के लिए कच्चे तेल के स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक भंडार, इथेनॉल मिश्रण और विद्युत गतिशीलता जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना, जिससे आयात-निर्भरता घटे।
- MPC द्वारा मूल मुद्रास्फीति और मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं पर नज़र रखते हुए आँकड़ों पर आधारित, पारदर्शी और संतुलित दर-नीति अपनाना।
- रुपये की अस्थिरता घटाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का विवेकपूर्ण उपयोग, दीर्घकालिक पूँजी प्रवाह (FDI) को आकर्षित करना और निर्यात बढ़ाना।
- राजकोषीय-मौद्रिक समन्वय: लक्षित सहायता से कमज़ोर वर्ग की रक्षा करते हुए राजकोषीय घाटे का अनुशासन बनाए रखना।
- कृषि विपणन सुधार: किसान उत्पादक संगठनों (FPO), इलेक्ट्रॉनिक मंडी (e-NAM) और प्रत्यक्ष विपणन के माध्यम से बिचौलियों का हिस्सा घटाना, ताकि किसान को बेहतर मूल्य और उपभोक्ता को कम कीमत मिले।
- ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग मूल्य-निगरानी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करना, ताकि खाद्य मुद्रास्फीति का बोझ घटे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting) – 4% ± 2% · खाद्य-प्रेरित मुद्रास्फीति (Food-led Inflation) एवं आपूर्ति पक्ष के आघात · आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) – कच्चा तेल एवं रुपये का अवमूल्यन · मूल मुद्रास्फीति (Core Inflation) एवं द्वितीय-चरण प्रभाव (Second-round Effects) · मौद्रिक नीति समिति (MPC) एवं रेपो दर में वृद्धि · विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी एवं पूँजी प्रवाह · ग्रामीण मुद्रास्फीति एवं वास्तविक आय पर प्रभाव · मूल्य स्थिरीकरण कोष (Price Stabilisation Fund) एवं बफर स्टॉक · आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 एवं भंडारण सीमा · राजकोषीय–मौद्रिक नीति समन्वय · अपेक्षाओं का स्थिरीकरण (Anchoring of Expectations) · शीत-श्रृंखला एवं कृषि आपूर्ति-शृंखला सुधार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 47 — पोषण-स्तर, जीवन-स्तर ऊँचा उठाना राज्य का कर्तव्य
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 — खाद्य पदार्थों का व्यापार और वाणिज्य
अवधारणा प्रवाह
पश्चिम एशिया संघर्ष → कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि (जुलाई के $82.04 से सितंबर में $116.09) → तेल आयात महँगा + FPI निकासी → रुपये का मूल्यह्रास → आयातित मुद्रास्फीति → माल-भाड़ा और उत्पादन-लागत में वृद्धि (माल-परिवहन सेवाओं की मुद्रास्फीति 14.73%) → कमज़ोर मानसून, El Niño और ऊँचे तापमान से खाद्य आपूर्ति पर दबाव → प्याज, लहसुन, अदरक महँगे → ग्रामीण खाद्य मुद्रास्फीति 8.06% तथा समग्र CPI 5.54% और मूल मुद्रास्फीति 4.6% तक पहुँची → MPC द्वारा रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50% → माँग-पक्ष पर नियंत्रण और अपेक्षाओं का स्थिरीकरण → आपूर्ति-पक्ष और राजकोषीय उपायों के समन्वय से मूल्य-स्थिरता की ओर वापसी
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत के लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुद्रास्फीति लक्ष्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
2. वर्तमान ढाँचे में लक्ष्य 4% है और सहनशीलता सीमा ± 2 प्रतिशत अंक (अर्थात् 2% से 6%) है।
3. यदि किसी एक तिमाही में भी औसत मुद्रास्फीति इस सीमा से बाहर रहती है, तो इसे लक्ष्य-प्राप्ति में विफलता माना जाता है और RBI को केंद्र सरकार को रिपोर्ट देनी होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: लक्ष्य CPI (संयुक्त) पर आधारित है, WPI पर नहीं। कथन 2 सही है: 4% का लक्ष्य और 2%–6% की सीमा है। कथन 3 गलत है: RBI अधिनियम की धारा 45ZN के अनुसार विफलता तब मानी जाती है जब औसत मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक सीमा से बाहर रहे, केवल एक तिमाही से नहीं।
Q2. अभिकथन (A): सब्ज़ियों जैसी शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं की कीमतों में उछाल से उत्पन्न मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में केवल रेपो दर बढ़ाना सीमित रूप से प्रभावी होता है।
कारण (R): ब्याज दरों में वृद्धि मुख्यतः समग्र माँग को प्रभावित करती है, जबकि वह नष्ट होने वाली कृषि वस्तुओं की आपूर्ति को प्रत्यक्ष रूप से नहीं बढ़ाती।
निम्नलिखित में से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — प्याज़, अदरक जैसी वस्तुओं की कीमतें मौसम, भंडारण और परिवहन जैसे आपूर्ति पक्ष के कारकों से तय होती हैं। रेपो दर माँग को घटाती है, आपूर्ति को नहीं बढ़ाती। इसलिए आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति में मौद्रिक नीति की भूमिका सीमित रहती है और R, A की सही व्याख्या करता है।
Q3. स्तंभ-I (अवधारणा) का स्तंभ-II (विवरण) से मिलान कीजिए:
स्तंभ-I: A. मुख्य (हेडलाइन) मुद्रास्फीति; B. मूल मुद्रास्फीति (Core Inflation); C. आयातित मुद्रास्फीति; D. आधार प्रभाव (Base Effect)
स्तंभ-II: 1. पिछले वर्ष की समान अवधि के मूल्य-स्तर के कारण वार्षिक मुद्रास्फीति दर में आने वाली विकृति; 2. खाद्य एवं ईंधन सहित CPI की सभी मदों पर मापी गई मुद्रास्फीति; 3. महँगे आयातित आगतों और कमज़ोर मुद्रा के माध्यम से संचारित मूल्य-वृद्धि; 4. अस्थिर खाद्य एवं ईंधन मदों को छोड़कर मापी गई मुद्रास्फीति
- A-2, B-4, C-3, D-1
- A-4, B-2, C-3, D-1
- A-2, B-4, C-1, D-3
- A-1, B-3, C-4, D-2
उत्तर: A-2, B-4, C-3, D-1 — हेडलाइन मुद्रास्फीति सभी मदों को समाहित करती है (A-2)। मूल मुद्रास्फीति में अस्थिर खाद्य एवं ईंधन को अलग रखा जाता है (B-4)। कच्चे तेल की महँगाई और रुपये के अवमूल्यन से आयातित मुद्रास्फीति बनती है (C-3)। आधार प्रभाव पिछले वर्ष के मूल्य-स्तर से जुड़ा है (D-1)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “खाद्य-प्रेरित और आयात-जनित मुद्रास्फीति को केवल मौद्रिक नीति से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।” सितंबर 2026 में ग्रामीण खाद्य मुद्रास्फीति के 8.06% तक पहुँचने तथा कच्चे तेल और रुपये के दबाव के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही मुद्रास्फीति प्रबंधन के लिए आवश्यक समन्वित नीतिगत उपाय सुझाइए। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): सितंबर 2026 में CPI मुद्रास्फीति 5.54% (लगभग दो वर्ष का उच्चतम स्तर) रही और लगातार चौथे माह 4% के लक्ष्य से ऊपर रही। ग्रामीण मुद्रास्फीति 6.08% और ग्रामीण खाद्य मुद्रास्फीति 8.06% रही। प्याज़ (108.09%), लहसुन और अदरक में तेज़ वृद्धि हुई, जबकि आलू और टमाटर के दाम पिछले वर्ष से कम रहे। मूल मुद्रास्फीति 4.16% से बढ़कर 4.6% हुई, जो दबाव के विस्तार का संकेत है।
खंड 1 – मौद्रिक नीति की भूमिका और सीमाएँ:
(क) ढाँचा: RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZA के अंतर्गत CPI पर आधारित 4% ± 2% का लक्ष्य, जो 2016 के संशोधन से आया और जिसकी हर पाँच वर्ष में समीक्षा होती है। 6 सदस्यीय MPC (3 RBI और 3 केंद्र द्वारा नियुक्त) में गवर्नर के पास निर्णायक मत है। उर्जित पटेल समिति (2014) की सिफ़ारिश इसका आधार थी। धारा 45ZN के अनुसार लगातार तीन तिमाहियाँ सीमा से बाहर रहने पर विफलता मानी जाती है।
(ख) प्रभावी पक्ष: अक्टूबर में रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50% की गई। इससे माँग-जनित दबाव, मूल मुद्रास्फीति और द्वितीय-चरण प्रभावों पर अंकुश लगता है और मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ स्थिर रहती हैं। साथ ही ब्याज अंतर बढ़ने से रुपये को सहारा मिल सकता है।
(ग) सीमाएँ: प्याज़, अदरक जैसी वस्तुओं की कीमतें मौसम, भंडारण और परिवहन जैसे आपूर्ति पक्ष के कारकों से तय होती हैं, जिन पर ब्याज दर का सीधा असर नहीं पड़ता। कच्चा तेल 82.04 डॉलर से 116.09 डॉलर प्रति बैरल (लगभग 41%) हुआ, जो बाह्य आघात है। माल-परिवहन सेवाओं में 14.73% मुद्रास्फीति लागत-जनित है। दर-वृद्धि से ऋण-लागत बढ़ती है, जिससे संवृद्धि और निवेश पर दबाव पड़ सकता है (स्टैगफ्लेशन का जोखिम)।
खंड 2 – अन्य आयाम:
(क) ग्रामीण प्रभाव: खाद्य पर अधिक व्यय-अनुपात होने से ग्रामीण परिवारों की वास्तविक आय घटती है। कमज़ोर मानसून, अल नीनो और उच्च तापमान जोखिम बढ़ाते हैं।
(ख) बाह्य क्षेत्र: FPI की रिकॉर्ड निकासी (9 माह में ₹3.08 लाख करोड़ यानी 3.08 ट्रिलियन), रुपये में लगभग 7% की गिरावट और आयातित मुद्रास्फीति। RBI की विशेष डॉलर सुविधा और प्रत्यक्ष डॉलर बिक्री केवल अल्पकालिक राहत देती हैं।
(ग) बहस: एक मत के अनुसार खाद्य को लक्ष्य से बाहर रखा जाए, क्योंकि वह आपूर्ति-जनित है। दूसरा मत कहता है कि CPI में खाद्य का भारांश बड़ा है और खाद्य अपेक्षाएँ मज़दूरी तथा मूल मुद्रास्फीति को प्रभावित करती हैं, इसलिए RBI का खाद्य पर ध्यान जायज़ है। इस पर आर्थिक समीक्षा में भी बहस हुई है।
खंड 3 – समन्वित उपाय:
(क) आपूर्ति पक्ष: बफर स्टॉक का समयबद्ध निस्तारण, मूल्य स्थिरीकरण कोष, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत भंडारण सीमा और जमाखोरी पर नियंत्रण, आयात-निर्यात नीति का लचीला प्रयोग (जैसे प्याज़ पर निर्यात प्रतिबंध या शुल्क, जिसके किसान-हित से जुड़े पक्ष का संतुलन आवश्यक है), ‘ऑपरेशन ग्रीन्स’, शीत-श्रृंखला, भंडारण और e-NAM।
(ख) राजकोषीय: ईंधन पर उत्पाद शुल्क में सामयिक समायोजन, लक्षित खाद्य सब्सिडी, PDS और MGNREGA से ग्रामीण आय का संरक्षण, राजकोषीय घाटे के अनुशासन के साथ संतुलन।
(ग) बाह्य: तेल आयात स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, ऊर्जा संक्रमण और स्थिर पूँजी प्रवाह (FDI) पर बल।
(घ) संस्थागत: केंद्र–राज्य समन्वय (कृषि और बाज़ार राज्य सूची के विषय हैं), बेहतर मूल्य और उत्पादन पूर्वानुमान।
निष्कर्ष: मौद्रिक नीति माँग और अपेक्षाओं को थामने के लिए आवश्यक है, किंतु आपूर्ति और बाह्य आघातों के लिए पर्याप्त नहीं है। विश्वसनीय लक्ष्यीकरण के साथ संरचनात्मक आपूर्ति सुधार और राजकोषीय–मौद्रिक समन्वय ही दीर्घकालिक समाधान है।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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