छत्तीसगढ़: अहिवारा सीट रिक्त, उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू

छत्तीसगढ़: अहिवारा सीट रिक्त, उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू

छत्तीसगढ़: अहिवारा सीट रिक्त, उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू

विधानसभा सीट रिक्त होने पर उपचुनाव प्रक्रियाविधायक निधनसीट रिक्त होती हैसूचना भेजनाजिला निर्वाचन अधिकारी द्वाराआयोग को अग्रेषितविधानसभा सचिवालय द्वाराउपचुनाव प्रक्रियाआयोग द्वारा आरंभतिथि घोषणाआयोग द्वारानया प्रतिनिधिउपचुनाव संपन्न होने पर
विधानसभा सीट रिक्त होने पर उपचुनाव प्रक्रिया

✎ निधन, त्यागपत्र या अयोग्यता से रिक्त हुई विधानसभा सीट पर उपचुनाव रिक्ति की तारीख से छह माह के भीतर कराना होता है (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क), और इसका संचालन निर्वाचन आयोग करता है (अनुच्छेद 324)।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (भारतीय संविधान, निर्वाचन आयोग, जन प्रतिनिधित्व)  |  GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (राज्य विधानमंडल, संघवाद और राज्य विधानसभा की संरचना)
  • Prelims: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क (उपचुनाव की छह माह की समय-सीमा), अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण), अनुच्छेद 190 (राज्य विधानमंडल में सीट रिक्त होने की स्थितियाँ), अनुच्छेद 332 (विधानसभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें), अनुच्छेद 329(ख) (निर्वाचन प्रक्रिया में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर रोक), आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का उपचुनाव में लागू होना, परिसीमन अधिनियम, 2002 और परिसीमन आयोग की भूमिका, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 69 (एक से अधिक सदनों के लिए चुने जाने पर सीट छोड़ना)
  • Essay: लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की निरंतरता: उपचुनाव की संवैधानिक भूमिका और उसकी चुनौतियाँ, भारतीय निर्वाचन प्रणाली में निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और प्रशासनिक समन्वय

त्वरित पुनरावृत्ति: निधन, त्यागपत्र या अयोग्यता से रिक्त हुई विधानसभा सीट पर उपचुनाव रिक्ति की तारीख से छह माह के भीतर कराना होता है (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क), और इसका संचालन निर्वाचन आयोग करता है (अनुच्छेद 324)।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की अहिवारा विधानसभा सीट एक निर्वाचित विधायक के निधन के कारण रिक्त हो गई है। जिला निर्वाचन अधिकारी ने यह सूचना विधानसभा सचिवालय को भेजी और विधानसभा सचिवालय ने इसे निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को अग्रेषित कर दिया है। इससे इस सीट पर उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। नियमों के अनुसार यह उपचुनाव रिक्ति की तारीख से छह महीने के भीतर, यानी 30 अप्रैल 2027 से पहले, कराना होगा। यह प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि किसी सीट की रिक्ति से लेकर उपचुनाव तक की प्रक्रिया में राज्य प्रशासन, विधानसभा सचिवालय और निर्वाचन आयोग की भूमिकाएँ किस क्रम में आती हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत संसद और राज्य विधानमंडलों के सभी निर्वाचनों के संचालन की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है, और उपचुनाव भी इसी दायरे में आते हैं।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क के अनुसार किसी सीट के रिक्त होने पर उपचुनाव सामान्यतः रिक्ति की तारीख से छह महीने के भीतर कराना अनिवार्य है। यदि सदस्य का शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम हो, तो उपचुनाव कराना आवश्यक नहीं होता।
  • अहिवारा विधानसभा सीट का गठन वर्ष 2008 में परिसीमन के बाद हुआ था। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, जो अनुच्छेद 332 के अंतर्गत राज्य विधानसभाओं में आरक्षण की व्यवस्था का परिणाम है।
  • छत्तीसगढ़ विधानसभा में कुल 90 सीटें हैं। किसी एक सीट के रिक्त रहने से सदन की सदस्य संख्या अस्थायी रूप से कम हो जाती है, जब तक उपचुनाव के बाद नया सदस्य शपथ नहीं ले लेता।
  • राज्य में इससे पहले भी एक विधानसभा सीट उपचुनाव के माध्यम से भरी गई थी। यह उदाहरण बताता है कि उपचुनाव राज्य में सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि अपवाद।

विधानसभा सीट की रिक्ति और उपचुनाव क्या है?

  • जब निर्वाचित सदस्य का निधन हो जाए, वह त्यागपत्र दे, अयोग्य ठहराया जाए, या बिना अनुमति के साठ दिन तक सदन से अनुपस्थित रहे, तो सीट रिक्त मानी जाती है (अनुच्छेद 190)।
  • रिक्ति की सूचना सामान्यतः जिला निर्वाचन अधिकारी से विधानसभा सचिवालय और फिर निर्वाचन आयोग तक पहुँचती है। आयोग इसी सूचना के आधार पर उपचुनाव की अधिसूचना और कार्यक्रम तय करता है।
  • उपचुनाव का उद्देश्य रिक्त सीट को शीघ्र भरकर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधित्व को बहाल करना है। इसे सामान्य आम चुनाव से अलग, केवल एक सीट तक सीमित प्रक्रिया माना जाता है।
  • छह माह की समय-सीमा (धारा 151क) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई क्षेत्र लंबे समय तक बिना प्रतिनिधि के न रहे।
  • उपचुनाव की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में लागू होती है, जिससे प्रशासनिक तथा चुनावी आचरण पर नियंत्रण रहता है।
  • अनुच्छेद 329(ख) के अनुसार चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते। चुनावी विवादों का समाधान निर्वाचन याचिका के माध्यम से किया जाता है।
  • उपचुनाव में निर्वाचन क्षेत्र की आरक्षित प्रकृति (यहाँ अनुसूचित जाति) का पालन करना होता है, अर्थात उम्मीदवार उसी वर्ग से होना चाहिए जिसके लिए सीट आरक्षित है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
रिक्ति की सूचना का मार्ग जिला निर्वाचन अधिकारी एवं कलेक्टर से विधानसभा सचिवालय और वहाँ से भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) तक सूचना का औपचारिक प्रवाह
समय-सीमा रिक्ति होने की तिथि से छह महीने के भीतर उपचुनाव (By-election) कराना अनिवार्य; इस मामले में 30 अप्रैल 2027 से पहले
आरक्षित प्रकृति अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) के लिए आरक्षित विधानसभा सीट, इसलिए उपचुनाव भी इसी आरक्षण के अंतर्गत होगा
सीट का इतिहास वर्ष 2008 के परिसीमन (Delimitation) के बाद गठित; वर्ष 2008, 2013, 2018 और 2023 में चार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं
विधायी कार्यकाल में स्थिति मौजूदा विधानसभा कार्यकाल में यह दूसरा उपचुनाव है, जिससे प्रशासनिक और निर्वाचन तंत्र की तैयारी का अनुभव भी जुड़ता है

महत्व

संवैधानिक एवं संस्थागत महत्व

  • विधानसभा में सीट रिक्त होने पर उसे भरना संवैधानिक प्रतिनिधित्व की निरंतरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • निर्वाचन आयोग को अधिसूचना जारी करने और चुनाव कार्यक्रम तय करने का अधिकार अनुच्छेद 324 के अंतर्गत प्राप्त है, इसलिए सूचना का समय पर पहुँचना प्रक्रिया की पहली कड़ी है।

लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व

  • सीट खाली रहने से क्षेत्र की जनता का विधानसभा में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व कुछ समय के लिए बाधित रहता है।
  • अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर उपचुनाव से सामाजिक प्रतिनिधित्व का संवैधानिक उद्देश्य आगे बढ़ता है।

निर्वाचन प्रशासन

  • उपचुनाव के दौरान मतदाता सूची का अद्यतन, मतदान केंद्रों की व्यवस्था और सुरक्षा बल की तैनाती जिला प्रशासन की प्रमुख जिम्मेदारी होती है।
  • छह महीने की वैधानिक समय-सीमा से प्रशासन को तैयारी के लिए निश्चित अवधि मिलती है, जिससे प्रक्रिया पूर्वानुमेय बनती है।

शासन और विधायी व्यवस्था

  • विधानसभा के सदस्यों की संख्या पूर्ण होने से सदन की कार्यवाही और समितियों में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व बना रहता है।
  • रिक्ति से जुड़ी सूचना प्रक्रिया विधानसभा सचिवालय और निर्वाचन आयोग के बीच समन्वय का उदाहरण है, जो संघीय ढाँचे में संस्थागत सहयोग को दर्शाता है।

चुनौतियाँ

1. समय पर उपचुनाव सुनिश्चित करना

  • छह महीने की समय-सीमा होने के बावजूद प्रशासनिक देरी, मौसम या सुरक्षा कारणों से चुनाव कार्यक्रम टलने की आशंका रहती है।
  • बार-बार उपचुनाव होने से संसाधनों और सरकारी मशीनरी पर दबाव बढ़ता है।

2. सूचना प्रवाह में विलंब

  • रिक्ति की सूचना जिला स्तर से विधानसभा सचिवालय होते हुए आयोग तक पहुँचती है; इस श्रृंखला में हर स्तर पर समय लग सकता है।
  • सूचना प्रवाह में विलंब से उपचुनाव की अधिसूचना और तैयारी का समय घट जाता है।

3. आरक्षित सीट पर सामाजिक प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता

  • आरक्षित सीटों पर प्रतिनिधित्व के वास्तविक प्रभाव को लेकर सामाजिक न्याय के प्रश्न बार-बार उठते हैं।
  • आरक्षण के संवैधानिक उद्देश्य और व्यवहार में उसके परिणामों के बीच अंतर को समझना आवश्यक है।

4. आदर्श आचार संहिता का पालन

  • उपचुनाव की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू हो जाती है, जिससे सरकारी निर्णयों और प्रचार पर सीमाएँ लगती हैं।
  • आचार संहिता की अवधि में विकास कार्यों और प्रशासनिक घोषणाओं के समय को लेकर प्रशासनिक संतुलन बनाना कठिन होता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
सूचना प्रवाह की गति जिला से राज्य और फिर आयोग तक सूचना पहुँचने में विलंब से उपचुनाव की तैयारी का समय घट सकता है
वैधानिक समय-सीमा का पालन छह महीने की अवधि के भीतर चुनाव कराने में प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी बाधाएँ आ सकती हैं
बार-बार उपचुनाव का बोझ एक ही कार्यकाल में बार-बार उपचुनाव से संसाधनों का व्यय और प्रशासनिक तंत्र पर दबाव बढ़ता है
मतदाता भागीदारी उपचुनाव में कम मतदान से निर्वाचित प्रतिनिधि की जन-स्वीकृति पर प्रश्न उठ सकते हैं

आगे की राह

  • रिक्ति की सूचना को जिला स्तर से आयोग तक समयबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत भेजने के लिए स्पष्ट मानक प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए।
  • निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन तंत्र के बीच पूर्व-तैयारी के लिए नियमित समन्वय बैठकें आयोजित हों।
  • मतदाता सूची का समय पर संशोधन और सत्यापन सुनिश्चित किया जाए ताकि उपचुनाव की प्रक्रिया त्रुटिरहित रहे।
  • मतदान केंद्रों, सुरक्षा बलों और मतदान कर्मियों की व्यवस्था को छह महीने की समय-सीमा के भीतर चरणबद्ध ढंग से पूरा किया जाए।
  • आदर्श आचार संहिता के प्रभाव को कम करने के लिए प्रशासनिक निर्णयों की समय-सारणी पहले से तय की जाए।
  • मतदाता जागरूकता अभियान के माध्यम से उपचुनाव में भागीदारी बढ़ाने के उपाय किए जाएँ।
  • आरक्षित सीटों पर प्रतिनिधित्व के संवैधानिक उद्देश्य की समझ बढ़ाने के लिए नागरिक शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

रिक्ति (Vacancy) और उपचुनाव (Bye-election) · लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) · अनुच्छेद 324 (Article 324) और निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) · अनुच्छेद 190 (Article 190): सदस्य के स्थान का रिक्त होना · आकस्मिक रिक्ति (Casual Vacancy) · अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट (Reserved Constituency) · परिसीमन (Delimitation) और विधानसभा सीटों का निर्धारण · आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) · प्रतिनिधिक लोकतंत्र (Representative Democracy) · संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) और प्रशासनिक सहयोग

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 170: विधानसभा की संरचना और सीटों का निर्धारण
  • अनुच्छेद 190: विधानसभा सीट रिक्त होने का ढाँचा
  • अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग का अधीक्षण और नियंत्रण
  • अनुच्छेद 332: अनुसूचित जाति के लिए विधानसभा में आरक्षण

अवधारणा प्रवाह

विधायक के निधन से विधानसभा सीट रिक्त होती है।  →  जिला निर्वाचन अधिकारी और कलेक्टर यह सूचना विधानसभा सचिवालय को भेजते हैं।  →  विधानसभा सचिवालय रिक्ति की सूचना भारत निर्वाचन आयोग को अग्रेषित करता है।  →  आयोग संवैधानिक और वैधानिक समय-सीमा के भीतर उपचुनाव की प्रक्रिया आरंभ करता है।  →  आयोग उपचुनाव की तिथि घोषित करता है और आदर्श आचार संहिता लागू होती है।  →  निर्धारित समय-सीमा के भीतर उपचुनाव संपन्न होने पर सीट पर नया प्रतिनिधि निर्वाचित होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी राज्य विधानसभा की सीट रिक्त होने पर उपचुनाव कराने का कार्य भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के अधीन है, जो अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी है।
2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार राज्य विधानसभा की आकस्मिक रिक्ति को, जहाँ कानूनन अपेक्षित हो, रिक्ति की तिथि से छह महीने के भीतर भरा जाना चाहिए।
3. राज्यपाल किसी भी स्थिति में निर्वाचन आयोग की अधिसूचना के बिना स्वयं उपचुनाव का आदेश दे सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है, और उपचुनाव इसी के अंतर्गत आते हैं। कथन 2 सही है: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 147 और 151A में रिक्ति के छह माह के भीतर उपचुनाव का प्रावधान है, जिसमें कुछ अपवाद (जैसे शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम होने पर) भी हैं। कथन 3 गलत है: राज्यपाल उपचुनाव की अधिसूचना जारी नहीं करता; यह कार्य निर्वाचन आयोग का है।

Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक प्रकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है। सही उत्तर चुनिए:

प्रकथन (A): राज्य विधानसभा की रिक्त सीट पर उपचुनाव कराने का दायित्व भारत निर्वाचन आयोग का है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को संसद और राज्य विधानमंडलों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है।

विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

  1. (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — प्रकथन (A) सही है: उपचुनाव का संचालन निर्वाचन आयोग करता है, और विधानसभा सचिवालय या जिला निर्वाचन अधिकारी की सूचना के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ती है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि अनुच्छेद 324 आयोग को निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की व्यापक शक्ति देता है। (R) ही (A) का संवैधानिक आधार है, इसलिए (a) सही विकल्प है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के निधन या अन्य कारण से विधानसभा सीट रिक्त होने पर उपचुनाव कराना प्रतिनिधिक लोकतंत्र की निरंतरता के लिए अनिवार्य है। संवैधानिक उपबंधों और वैधानिक ढाँचे के आधार पर इस रिक्ति के भरे जाने की प्रक्रिया की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि छह माह की समय-सीमा का पालन न होने पर संवैधानिक और वैधानिक स्थिति क्या होती है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (Model-answer skeleton):

1. भूमिका: विधायक का निधन (उदाहरण: छत्तीसगढ़ की अहिवारा विधानसभा सीट, दुर्ग जिला) होने पर विधानसभा सचिवालय द्वारा सूचना भारत निर्वाचन आयोग को भेजी जाती है। प्रतिनिधिक लोकतंत्र में सीट का रिक्त रहना जनप्रतिनिधित्व के सिद्धांत को प्रभावित करता है।

2. संवैधानिक ढाँचा:
– अनुच्छेद 170: राज्य विधानसभा की संरचना (अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 सदस्य; छत्तीसगढ़ में 90 सीटें)।
– अनुच्छेद 190: सदस्य के स्थान का रिक्त होना (दोहरी सदस्यता, त्यागपत्र, अनुपस्थिति, अयोग्यता); मृत्यु प्राकृतिक रिक्ति मानी जाती है।
– अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण।
– अनुच्छेद 327 और 328: संसद और राज्य विधानमंडल को निर्वाचन संबंधी विधि बनाने की शक्ति।
– अनुच्छेद 329(ख): निर्वाचन विषयों में न्यायालयीन हस्तक्षेप पर सीमा।
– अनुच्छेद 332: अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटें (अहिवारा जैसी SC-आरक्षित सीट पर केवल आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार)।

3. वैधानिक ढाँचा: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 147 (आकस्मिक रिक्ति) और धारा 151A (उपचुनाव की समय-सीमा; शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम होने पर अपवाद)। आदर्श आचार संहिता का लागू होना।

4. न्यायिक दृष्टिकोण:
– मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978): अनुच्छेद 324 के अंतर्गत आयोग की व्यापक किंतु सीमित शक्तियाँ, जो विधि के अभाव में ही प्रयुक्त हो सकती हैं।
– पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (1952): निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान न्यायालयीन हस्तक्षेप पर सीमा।

5. समालोचनात्मक विश्लेषण:
– पक्ष: छह माह की समय-सीमा से प्रतिनिधित्व की निरंतरता, मतदाताओं का अधिकार, और प्रशासनिक नियोजन की स्पष्टता।
– विपक्ष/चुनौतियाँ: आयोग की प्रशासनिक व्यस्तता, सुरक्षा और मौसम जैसी व्यावहारिक बाधाएँ, शेष कार्यकाल कम होने पर बिना उपचुनाव के सीट का रिक्त रहना, तथा संसाधनों का व्यय।
– सुधार सुझाव: विधि आयोग और चुनाव सुधार समितियों (जैसे इंद्रजीत गुप्त समिति, 1998) की संगत सिफारिशों का उल्लेख।

6. परिणाम वाला भाग: यदि छह माह में उपचुनाव न हो, तो यह विधिक रूप से वैधानिक दायित्व का उल्लंघन है; इसके लिए आयोग के समक्ष अभ्यावेदन या न्यायिक समीक्षा का सैद्धांतिक मार्ग खुला है, परंतु अनुच्छेद 329(ख) के कारण निर्वाचन प्रक्रिया के बीच हस्तक्षेप सीमित है। यदि शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम हो, तो धारा 151A के प्रावधान के अनुसार उपचुनाव आवश्यक नहीं होता।

7. निष्कर्ष: प्रतिनिधिक लोकतंत्र में समय पर उपचुनाव संवैधानिक नैतिकता और जनादेश की निरंतरता दोनों के लिए आवश्यक है; संस्थागत क्षमता और पारदर्शी समय-सारणी इसकी कुंजी है।

स्रोत: amarujala.com

Chhattisgarh PCS (CGPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: छत्तीसगढ़ राज्य में, अहिवारा विधानसभा सीट के रिक्त होने के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

1. अहिवारा सीट दुर्ग जिले में स्थित है।
2. सीट रिक्त होने की सूचना भारत के निर्वाचन आयोग को भेजी गई है।
3. यह सीट किसी विधायक के निधन के कारण रिक्त हुई है।

उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — दिए गए विषय के अनुसार, अहिवारा विधानसभा सीट रिक्त हुई है और इसकी सूचना निर्वाचन आयोग को भेजी गई है। यह सीट दुर्ग जिले में स्थित है। विधायक के निधन का उल्लेख विषय में नहीं है।

Mains: छत्तीसगढ़ में किसी विधानसभा सीट के रिक्त होने की प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन कीजिए और अहिवारा सीट के संदर्भ में इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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