14 Oct उत्तर प्रदेश: हाईकोर्ट ने तीन महीने में कराने को कहा पंचायत चुनाव, सरकार करेगी अपील

✎ अनुच्छेद 243E में 5 वर्ष की अवधि और 243K में राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अनिवार्यता है; OBC आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट (समर्पित आयोग, अनुपात निर्धारण, कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से कम) आवश्यक है, और इसी रिपोर्ट के लंबित रहने…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: 73वाँ संविधान संशोधन, पंचायती राज संस्थाएँ, स्थानीय स्वशासन | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका: न्यायिक समीक्षा, रिट अधिकारिता, राज्य सरकार बनाम न्यायालय | GS Paper II — संघवाद और राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका; आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधान | GS Paper II — कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी तंत्र और सामाजिक न्याय
- Prelims: 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 (भाग IX), अनुच्छेद 243E — पंचायत की अवधि (5 वर्ष), अनुच्छेद 243K — राज्य निर्वाचन आयोग, अनुच्छेद 243D — पंचायतों में आरक्षण, अनुच्छेद 243O — चुनावी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक, ट्रिपल टेस्ट (तिहरी जाँच) और समर्पित आयोग, के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ (2010), विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021), अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, प्रशासक की नियुक्ति और 6 माह की सीमा
- Essay: स्थानीय स्वशासन के बिना लोकतंत्र अधूरा: समय पर पंचायत चुनाव और जमीनी लोकतंत्र की मजबूती, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक व्यवहार्यता के बीच संतुलन: आरक्षण-आधारित चुनावी प्रक्रिया की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 243E में 5 वर्ष की अवधि और 243K में राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अनिवार्यता है; OBC आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट (समर्पित आयोग, अनुपात निर्धारण, कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से कम) आवश्यक है, और इसी रिपोर्ट के लंबित रहने से उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव पर उच्च न्यायालय बनाम सरकार का प्रश्न खड़ा हुआ है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ (न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद) ने 14 अक्टूबर 2026 को प्रयागराज के इम्तियाज हुसैन और अन्य की याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को तीन महीने के भीतर ग्राम पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया। आदेश के अनुसार नए चुनाव संपन्न होने तक निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में कार्य करते रहेंगे। समाचार रिपोर्टों के अनुसार चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट आवश्यक है, जो अभी प्रस्तुत नहीं हुई है। इसी कारण सरकार के लिए इतने कम समय में चुनाव कराना कानूनी और प्रशासनिक दृष्टि से कठिन माना जा रहा है। संभावना है कि सरकार इस आदेश के विरुद्ध अपील करेगी। इसी विषय पर लखनऊ खंडपीठ में अलग से सुनवाई भी चल रही है। यह मामला समय पर चुनाव के संवैधानिक दायित्व और आरक्षण से जुड़ी अनिवार्य प्रक्रिया के बीच के तनाव को सामने लाता है।
पृष्ठभूमि
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने संविधान में भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243-O) जोड़ा। इससे पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला और त्रि-स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर) की व्यवस्था हुई। यह संशोधन 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ।
- अनुच्छेद 243E के अनुसार पंचायत का कार्यकाल पहली बैठक की तिथि से 5 वर्ष होता है। अवधि पूरी होने से पहले चुनाव कराना अनिवार्य है। समय से पहले विघटन की स्थिति में चुनाव विघटन की तिथि से 6 माह के भीतर कराना होता है।
- अनुच्छेद 243K के तहत पंचायत चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण का दायित्व राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) का है। राज्य सरकार आयोग को आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है। आरक्षण और सीमांकन का निर्धारण सामान्यतः सरकार के स्तर पर होता है, जिसका असर चुनाव कार्यक्रम पर पड़ता है।
- अनुच्छेद 243D(6) राज्य को पंचायतों में पिछड़े वर्गों के पक्ष में आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने के. कृष्णमूर्ति (2010) और विकास किशनराव गवली (2021) मामलों में स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ अनिवार्य किया। इसमें पहली शर्त समर्पित आयोग द्वारा अनुभवजन्य अध्ययन है।
- उत्तर प्रदेश में इससे पहले भी इसी प्रश्न पर न्यायिक हस्तक्षेप हो चुका है। दिसंबर 2022 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शहरी निकाय चुनावों के लिए जारी OBC आरक्षण की प्रारूप अधिसूचना को ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी न होने के आधार पर रद्द कर दिया था।
- उत्तर प्रदेश में पंचायतों का संचालन उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम, 1961 के अंतर्गत होता है। वर्तमान ग्राम पंचायतें वर्ष 2021 के चुनावों में निर्वाचित हुई थीं और उनका पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुका है।
पंचायत चुनाव, आरक्षण की ‘ट्रिपल टेस्ट’ शर्त और समय पर चुनाव का संवैधानिक दायित्व क्या है?
- संवैधानिक दायित्व: अनुच्छेद 243E(3) के अनुसार पंचायत की अवधि पूरी होने से पहले चुनाव पूरे होने चाहिए। अनुच्छेद 243K राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने का अधिकार देता है। इस प्रकार समय पर चुनाव संविधान का आदेश है, कार्यपालिका का विवेक नहीं।
- प्रशासक की व्यवस्था: कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासक की नियुक्ति अस्थायी व्यवस्था है। इसे चुने हुए प्रतिनिधियों का स्थायी विकल्प नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे स्थानीय स्वशासन की लोकतांत्रिक भावना कमजोर होती है। न्यायालय ने निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने को कहा है।
- ट्रिपल टेस्ट की पहली शर्त: राज्य को स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभाव की समकालिक अनुभवजन्य जाँच के लिए एक समर्पित आयोग (Dedicated Commission) गठित करना होता है। इसी आयोग की रिपोर्ट इस मामले में लंबित बताई गई है।
- ट्रिपल टेस्ट की दूसरी और तीसरी शर्त: आयोग की सिफारिशों के आधार पर प्रत्येक स्थानीय निकाय में OBC आरक्षण का अनुपात तय किया जाता है। साथ ही SC, ST और OBC का कुल आरक्षण कुल सीटों के 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
- अनुच्छेद 243D की व्यवस्था: पंचायतों की सीटों और अध्यक्ष पदों में SC और ST के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण अनिवार्य है। कुल सीटों में कम-से-कम एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान राज्य के विवेक पर है, पर वह ट्रिपल टेस्ट से बँधा है।
- न्यायिक भूमिका: उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत चुनाव में अनुचित विलंब के विरुद्ध परमादेश जैसे निर्देश दे सकता है। अनुच्छेद 243O सीमांकन और सीट-आवंटन संबंधी कानूनों की वैधता तथा चुनाव को केवल चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती देने की व्यवस्था करता है। चुनाव में विलंब का प्रश्न इस रोक के दायरे से अलग माना जाता है।
- विधि-व्यवस्था की चुनौती: यदि आरक्षण की प्रक्रिया बिना ट्रिपल टेस्ट पूरी किए चलती है तो पूरी चुनाव प्रक्रिया के निरस्त होने का जोखिम रहता है। इसलिए सरकार को समय-सीमा का पालन और संवैधानिक अनुपालन, दोनों के बीच संतुलन साधना पड़ता है।
- संघीय दृष्टि: पंचायतें राज्य सूची का विषय (प्रविष्टि 5) हैं, पर उनका संवैधानिक ढाँचा केंद्र द्वारा निर्धारित है। न्यायालय के निर्देश और राज्य की प्रशासनिक तैयारी में टकराव की स्थिति में अंतिम समाधान अपील और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों से निकलता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ (न्यायमूर्ति अजीत कुमार व गरिमा प्रसाद) का निर्देश: 3 माह में ग्राम पंचायत चुनाव | समय पर चुनाव कराना संवैधानिक दायित्व है। यह आदेश इस दायित्व को न्यायिक रूप से लागू करने का प्रयास है। याचिका प्रयागराज के इम्तियाज हुसैन व अन्य ने दायर की थी। |
| चुनाव संपन्न होने तक निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में कार्य करेंगे | अंतरिम व्यवस्था से स्थानीय शासन में रिक्तता नहीं रहती। परंतु निर्वाचित निकाय का कार्यकाल बीतने के बाद उसी व्यक्ति का नामनिर्देशित प्रशासक के रूप में बने रहना लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रश्न उठाता है। |
| पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट अब तक प्रस्तुत नहीं हुई | पिछड़े वर्गों के आरक्षण के निर्धारण से पहले आयोग की अनुभवजन्य रिपोर्ट आवश्यक मानी गई है। इसके बिना आरक्षण तय करने पर पूरी चुनाव प्रक्रिया के न्यायिक चुनौती में आने का जोखिम रहता है। |
| लखनऊ खंडपीठ में इसी विषय पर अलग सुनवाई जारी | एक ही विषय पर दो पीठों की कार्यवाही से परस्पर विरोधी निर्देशों की आशंका रहती है। इससे राज्य की अपील की रणनीति भी प्रभावित होती है। |
| राज्य सरकार द्वारा खंडपीठ के निर्णय के विरुद्ध अपील की संभावना | खंडपीठ के आदेश के विरुद्ध अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका संभव है। यह कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच चुनाव-समय-सारणी के अधिकार का प्रश्न है। |
| विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम से टकराव का प्रश्न | समाचार के अनुसार प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकता विधानसभा चुनाव है। यह स्थानीय निकाय चुनाव और राज्य स्तरीय चुनाव के बीच प्रशासनिक क्षमता के बंटवारे का प्रश्न है। |
महत्व
संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक महत्त्व
- 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों को ‘स्वशासन की संस्थाएँ’ बनाया। समय पर चुनाव इस संघीय-लोकतांत्रिक ढाँचे की आधारशिला है।
- अनुच्छेद 243E के अनुसार पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष है और कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव पूरा होना चाहिए। विघटन की स्थिति में 6 माह के भीतर चुनाव अनिवार्य है।
- न्यायालय का हस्तक्षेप यह संदेश देता है कि चुनाव टालना कार्यपालिका का विवेकाधिकार नहीं, संवैधानिक बाध्यता है।
सामाजिक न्याय संबंधी महत्त्व
- पिछड़े वर्गों का आरक्षण वैज्ञानिक और आँकड़ों पर आधारित हो, इससे वास्तविक पिछड़े समूहों को प्रतिनिधित्व मिलता है।
- आयोग की रिपोर्ट की अपेक्षा ‘त्रि-स्तरीय परीक्षण’ (Triple Test) के सिद्धांत से उपजी है। यह आरक्षण को अनुमान के बजाय साक्ष्य पर टिकाता है।
- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के आरक्षण का स्वरूप अनुच्छेद 243D में निर्धारित है। पिछड़े वर्गों का आरक्षण राज्य के विवेक पर निर्भर है, इसलिए उसके लिए प्रक्रियात्मक अनुशासन आवश्यक है।
प्रशासनिक एवं शासन संबंधी महत्त्व
- निर्वाचित प्रतिनिधियों के अभाव में प्रशासक के हाथ में निर्णय-शक्ति रहती है। इससे ग्राम सभा की भागीदारी और योजनाओं के सामाजिक अंकेक्षण की प्रभावशीलता घटती है।
- निर्वाचित निकाय न होने पर केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान और अन्य हस्तांतरण प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि ये प्रायः गठित स्थानीय निकायों को दिए जाते हैं।
- स्थानीय स्तर पर सेवा-प्रदाय (स्वच्छता, पेयजल, ग्रामीण सड़कें, लाभार्थी चयन) की निरंतरता चुनाव के समय पर निर्भर है।
न्यायिक एवं संस्थागत महत्त्व
- यह मामला न्यायपालिका की भूमिका की परीक्षा है: संवैधानिक दायित्व का प्रवर्तन बनाम चुनाव-प्रक्रिया में हस्तक्षेप की सीमा (अनुच्छेद 243-O)।
- यह राज्य निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और राज्य सरकार की भूमिका के संतुलन को भी रेखांकित करता है।
चुनौतियाँ
1. संवैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन
- कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित निकाय के स्थान पर प्रशासक की व्यवस्था लंबे समय तक चलना अनुच्छेद 243E की भावना के विपरीत है।
- प्रशासक की नियुक्ति आपवादिक उपाय होनी चाहिए, नियमित व्यवस्था नहीं। इसके लंबा खिंचने से स्वशासन की संस्था केवल प्रशासनिक इकाई बन जाती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: पंचायती राज, 73वाँ संशोधन, अनुच्छेद 243E
2. समर्पित आयोग की रिपोर्ट और आरक्षण का निर्धारण
- के. कृष्ण मूर्ति (2010) और विकास किशनराव गवली (2021) के निर्णयों के अनुसार पिछड़े वर्गों का आरक्षण तभी वैध है जब समर्पित आयोग स्थानीय निकायवार अनुभवजन्य जाँच करे।
- आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार आरक्षण का अनुपात तय हो और SC/ST/OBC का कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक न हो।
- रिपोर्ट में विलंब से चुनाव में देरी होती है, जबकि रिपोर्ट के बिना चुनाव कराने पर आरक्षण रद्द होने का जोखिम रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: आरक्षण, अनुच्छेद 243D(6), न्यायिक निर्णय
3. कार्यपालिका–न्यायपालिका संतुलन
- न्यायालय का 3 माह की समय-सीमा तय करना प्रशासनिक यथार्थ (मतदाता सूची, परिसीमन, आरक्षण, कर्मचारियों की उपलब्धता) से टकरा सकता है।
- अनुच्छेद 243-O चुनाव संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप को सीमित करता है, परंतु समय पर चुनाव कराने का निर्देश देने की शक्ति को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत स्वीकार किया गया है।
- दो पीठों के समानांतर विचार से निर्णयों में विरोधाभास की आशंका है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका की भूमिका, शक्तियों का पृथक्करण, अनुच्छेद 226 व 243-O
4. विधानसभा चुनाव और पंचायत चुनाव के बीच प्राथमिकता का टकराव
- एक ही राज्य-तंत्र (कर्मचारी, सुरक्षा बल, निर्वाचन मशीनरी) दोनों चुनावों का संचालन करता है। इससे समय-निर्धारण में खींचतान होती है।
- स्थानीय निकाय चुनाव को गौण समझने की प्रवृत्ति त्रिस्तरीय लोकतंत्र की भावना को कमज़ोर करती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: चुनाव सुधार, राज्य निर्वाचन आयोग, संघवाद
5. स्थानीय शासन में जवाबदेही का अभाव
- प्रशासक के रूप में निवर्तमान प्रधान या नामनिर्देशित अधिकारी के पास निर्वाचित जनादेश नहीं होता, जिससे ग्राम सभा के प्रति जवाबदेही कमज़ोर पड़ती है।
- विकास निधि के उपयोग, लाभार्थी चयन और अनुबंधों में पारदर्शिता का जोखिम बढ़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सुशासन, जवाबदेही, विकेंद्रीकरण
6. वित्तीय हस्तांतरण पर प्रभाव
- वित्त आयोग के अनुदान निर्वाचित स्थानीय निकायों के लिए निर्धारित होते हैं। चुनाव में देरी से इनके रुकने या घटने का खतरा रहता है।
- इससे गाँव स्तर पर बुनियादी सेवाओं का वित्तपोषण प्रभावित होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2/3: राजकोषीय संघवाद, वित्त आयोग, स्थानीय निकायों का वित्त
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| चुनाव में विलंब | कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित निकाय का अभाव, अनुच्छेद 243E की भावना का उल्लंघन |
| पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट लंबित | आरक्षण का वैज्ञानिक आधार नहीं, पूरी चुनाव प्रक्रिया पर कानूनी चुनौती का जोखिम |
| प्रशासक व्यवस्था | लोकतांत्रिक वैधता और जवाबदेही का अभाव, विकास कार्यों में अपारदर्शिता |
| न्यायिक निर्देश बनाम प्रशासनिक तैयारी | 3 माह की सीमा में मतदाता सूची, आरक्षण-निर्धारण और कर्मचारियों की उपलब्धता कठिन |
| दो पीठों में समानांतर सुनवाई | परस्पर विरोधी आदेशों की आशंका, अपील-स्तर पर अनिश्चितता |
| वित्तीय अनुदान | निर्वाचित निकाय के बिना अनुदानों के रुकने की आशंका |
आगे की राह
- समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को निश्चित समय-सीमा में अनुभवजन्य अध्ययन पूरा करने के लिए संसाधन देना और रिपोर्ट सार्वजनिक करना।
- आयोग की रिपोर्ट आने पर त्रि-स्तरीय परीक्षण के तीनों चरणों का पालन कर आरक्षण निर्धारित करना, जिसमें कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर रहे।
- राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची और परिसीमन का कार्य पहले से पूरा रखने के लिए सशक्त करना ताकि आरक्षण निर्धारित होते ही चुनाव हो सके।
- पंचायत और विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम का समन्वय करना और कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव की समय-सारणी घोषित करने की वैधानिक बाध्यता बनाना।
- न्यायालय के निर्देश के विरुद्ध अपील करनी हो तो उच्चतम न्यायालय के समक्ष यथार्थवादी समय-सारणी और रिपोर्ट की स्थिति स्पष्ट रूप से रखना।
- प्रशासक की अवधि सीमित करने और उनकी शक्तियों को नियमित प्रशासन तक सीमित रखने के लिए स्पष्ट नियम बनाना।
- राज्य वित्त आयोग और निर्वाचन आयोग के बीच तालमेल से यह सुनिश्चित करना कि चुनाव-विलंब के कारण स्थानीय निकायों के अनुदान न रुकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
73वाँ संविधान संशोधन और पंचायती राज संस्थाएँ · अनुच्छेद 243E – पंचायत का 5 वर्ष का कार्यकाल और समय पर चुनाव · अनुच्छेद 243K – राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) की स्वायत्तता · अनुच्छेद 243D(6) – पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण · त्रि-स्तरीय परीक्षण (Triple Test) और समर्पित आयोग (Dedicated Commission) · राजनीतिक पिछड़ापन बनाम सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ापन · 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा · प्रशासक की नियुक्ति और लोकतांत्रिक शून्य · अनुच्छेद 243-O – निर्वाचन मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप का वर्जन · न्यायिक समीक्षा बनाम कार्यपालिका की व्यावहारिक कठिनाई · स्थानीय स्वशासन और सहकारी संघवाद · अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 136 के अंतर्गत न्यायिक उपचार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243E — पंचायत का 5 वर्ष कार्यकाल, समय पर चुनाव
- अनुच्छेद 243K — राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायत चुनाव संचालन
- अनुच्छेद 243D — SC/ST/महिला आरक्षण; खंड (6) से पिछड़े वर्ग आरक्षण
- अनुच्छेद 243-O — पंचायत चुनाव में न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
- अनुच्छेद 136 — उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका
अवधारणा प्रवाह
ग्राम पंचायतों का 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के निकट या समाप्त होना → नए चुनाव के लिए पिछड़े वर्गों के आरक्षण के निर्धारण हेतु समर्पित आयोग की रिपोर्ट आवश्यक → रिपोर्ट के लंबित रहने से आरक्षण तय नहीं होता और चुनाव की समय-सारणी रुकती है → प्रशासक की अंतरिम व्यवस्था लंबी चलने पर चुनाव की माँग को लेकर याचिका दायर → इलाहाबाद उच्च न्यायालय का 3 माह में चुनाव कराने और निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक रखने का निर्देश → राज्य सरकार द्वारा प्रशासनिक व कानूनी कठिनाइयों के आधार पर अपील की संभावना → उच्चतम न्यायालय/लखनऊ खंडपीठ के निर्णय से तय होगा कि संवैधानिक समय-सीमा और आरक्षण-प्रक्रिया में संतुलन कैसे बने
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. पंचायती राज संस्थाओं से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 243E के अनुसार पंचायत का कार्यकाल, यदि पहले विघटित न हो, अपनी पहली बैठक की तिथि से 5 वर्ष होता है।
2. पंचायत के विघटन की स्थिति में नई पंचायत के गठन का चुनाव विघटन की तिथि से 6 माह के भीतर पूरा कराना आवश्यक है।
3. राज्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
4. अनुच्छेद 243-O के अनुसार पंचायत के किसी भी चुनाव को रिट याचिका द्वारा सीधे चुनौती दी जा सकती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी चारों
उत्तर: केवल तीन — कथन 1, 2 और 3 सही हैं: अनुच्छेद 243E(1) में 5 वर्ष का कार्यकाल और 243E(3) में 6 माह की सीमा दी गई है, तथा अनुच्छेद 243K(2) में राज्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की रीति उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी है। कथन 4 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 243-O के अनुसार चुनाव को केवल चुनाव याचिका से चुनौती दी जा सकती है।
Q2. अभिकथन (A): स्थानीय निकायों में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण देने से पहले राज्य को समर्पित आयोग द्वारा अनुभवजन्य अध्ययन कराना होता है।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ (2010) में कहा कि स्थानीय निकायों का आरक्षण राजनीतिक पिछड़ेपन पर आधारित होता है, जो अनुच्छेद 15(4)/16(4) के अंतर्गत सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन से भिन्न है।
सही विकल्प चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — राजनीतिक पिछड़ापन शिक्षा और नौकरियों के पिछड़ेपन से भिन्न है, इसलिए उसे प्रमाणित करने हेतु अनुभवजन्य आँकड़े आवश्यक हैं। विकास किशनराव गवली (2021) में इसी आधार पर त्रि-स्तरीय परीक्षण लागू किया गया। अतः R, A की सही व्याख्या है।
Q3. सूची-I (अनुच्छेद) को सूची-II (विषय) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I: A. अनुच्छेद 243D B. अनुच्छेद 243E C. अनुच्छेद 243K D. अनुच्छेद 243-O
सूची-II: 1. पंचायतों की अवधि 2. निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन 3. स्थानों का आरक्षण 4. निर्वाचनों का अधीक्षण (राज्य निर्वाचन आयोग)
- A-3, B-1, C-4, D-2
- A-1, B-3, C-4, D-2
- A-3, B-1, C-2, D-4
- A-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर: A-3, B-1, C-4, D-2 — अनुच्छेद 243D पंचायतों में स्थानों के आरक्षण से, 243E पंचायतों की अवधि से, 243K राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण से, तथा 243-O निर्वाचन मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप के वर्जन से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संविधान का अनुच्छेद 243E पंचायतों के समय पर चुनाव को अनिवार्य बनाता है, जबकि पिछड़ा वर्ग के आरक्षण हेतु त्रि-स्तरीय परीक्षण की शर्त पूरी करना भी आवश्यक है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को तीन माह में पंचायत चुनाव कराने के निर्देश के संदर्भ में इन दोनों अपेक्षाओं के बीच के तनाव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि चुनाव में लंबे विलंब की स्थिति में निर्वाचित निकायों के स्थान पर प्रशासकों की नियुक्ति के क्या संवैधानिक और लोकतांत्रिक परिणाम होते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: 73वें संशोधन से पंचायतें संवैधानिक संस्थाएँ बनीं; घटनाक्रम संक्षेप में — उच्च न्यायालय ने 3 माह में चुनाव कराने का निर्देश दिया, निवर्तमान प्रधान तब तक प्रशासक के रूप में कार्य करेंगे, पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट लंबित है और सरकार अपील पर विचार कर रही है।
भाग 1 – समय पर चुनाव की अनिवार्यता: अनुच्छेद 243E(1) में 5 वर्ष का कार्यकाल और 243E(3) में विघटन के 6 माह के भीतर चुनाव; अनुच्छेद 243K में राज्य निर्वाचन आयोग का अधीक्षण; किशन सिंह तोमर बनाम अहमदाबाद नगर निगम (2006) में चुनाव का समय पर होना संवैधानिक दायित्व माना गया; अनुच्छेद 243-O के कारण निर्वाचन प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित है, परंतु समय पर चुनाव का निर्देश देने में बाधा नहीं।
भाग 2 – आरक्षण की शर्त: अनुच्छेद 243D(6); के. कृष्णमूर्ति (2010) — राजनीतिक पिछड़ापन भिन्न है; विकास किशनराव गवली (2021) और सुरेश महाजन (2021/22) — समर्पित आयोग, आयोग-वार अनुपात का निर्धारण, और SC/ST/OBC को मिलाकर 50 प्रतिशत की सीमा। उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों के 2022-23 के प्रकरण का उल्लेख, जिसमें अधिसूचना पर न्यायिक आपत्ति हुई और आयोग गठित हुआ।
तनाव का विश्लेषण: आयोग की रिपोर्ट के बिना OBC आरक्षण असंवैधानिक होने का जोखिम, और आरक्षण के बिना चुनाव कराने से प्रतिनिधित्व पर प्रश्न; प्रशासनिक कारण (परिसीमन, मतदाता सूची, आरक्षण-चक्र, अन्य चुनावों की प्राथमिकता) वैध हो सकते हैं, परंतु इन्हें अनिश्चित विलंब का आधार नहीं बनाया जा सकता। समाधान: आयोग को निश्चित समय-सीमा, पूर्व-नियोजित आँकड़े-संग्रह, तथा अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील की स्थिति में भी समयबद्ध कार्यक्रम।
भाग 3 – प्रशासक: संवैधानिक रूप से निर्वाचित निकाय के स्थान पर नामित प्रशासक अस्थायी व्यवस्था ही हो सकती है; लंबे समय तक चलने पर अनुच्छेद 243E की भावना, उत्तरदायित्व, ग्राम सभा की भागीदारी, तथा 15वें वित्त आयोग के अनुदानों जैसे निधि-हस्तांतरण पर प्रभाव (निर्वाचित निकायों को अनुदान से जोड़ा गया है)। राज्य निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और राज्य वित्त आयोग की भूमिका।
संतुलित निष्कर्ष: न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिकाओं का संतुलन; समय पर चुनाव और सामाजिक न्याय परस्पर विरोधी नहीं, पूरक बनाए जा सकते हैं; सुझाव — स्थायी समर्पित आयोग, चुनाव कैलेंडर का पूर्व-निर्धारण, और निर्वाचन आयोग की प्रशासनिक स्वतंत्रता।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Best economics services coaching
- Anthropology VS PSIR
- Best PSIR optional coaching
- Best PSIR optional coaching online

No Comments