14 Oct कर्नाटक में स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति होगी मजबूत: मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार
✎ 73वाँ संशोधन (भाग IX, अनुच्छेद 243–243O, 11वीं अनुसूची के 29 विषय) और 74वाँ संशोधन (भाग IXA, अनुच्छेद 243P–243ZG, 12वीं अनुसूची के 18 विषय) स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा देते हैं; राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243I/243Y) हर…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन: स्थानीय स्वशासन, पंचायती राज और नगरपालिकाएँ, 73वाँ व 74वाँ संविधान संशोधन | GS Paper II — संघवाद: केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध, राज्य वित्त आयोग, GST परिषद | GS Paper II — सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप: SVAMITVA योजना, सहभागी योजना निर्माण | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: राजकोषीय संसाधन जुटाना, कर-राजस्व का बँटवारा, संपत्ति कर
- Prelims: अनुच्छेद 243I — राज्य वित्त आयोग, अनुच्छेद 243Y — नगरपालिकाओं के लिए वित्त आयोग, अनुच्छेद 243G और ग्यारहवीं अनुसूची (29 विषय), बारहवीं अनुसूची (18 विषय), अनुच्छेद 243ZD — जिला योजना समिति, अनुच्छेद 243S — वार्ड समितियाँ, ग्राम सभा (अनुच्छेद 243A), अनुच्छेद 279A — GST परिषद, SVAMITVA योजना (ड्रोन सर्वेक्षण, संपत्ति कार्ड), कर्नाटक पंचायत राज अधिनियम, 1993, KIADB (कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड)
- Essay: सशक्त स्थानीय निकाय, सशक्त लोकतंत्र: धन, कार्य और कार्मिक के बिना विकेंद्रीकरण अधूरा, जन-सहभागिता आधारित योजना निर्माण: ग्राम सभा से राज्य बजट तक
त्वरित पुनरावृत्ति: 73वाँ संशोधन (भाग IX, अनुच्छेद 243–243O, 11वीं अनुसूची के 29 विषय) और 74वाँ संशोधन (भाग IXA, अनुच्छेद 243P–243ZG, 12वीं अनुसूची के 18 विषय) स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा देते हैं; राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243I/243Y) हर पाँच वर्ष में उनके वित्त की समीक्षा करता है, और कर्नाटक की ‘जन योजना’ वार्ड/ग्राम सभा से राज्य बजट तक सहभागी योजना निर्माण पर आधारित है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
14 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने बेंगलुरु में कर्नाटक राज्य विकेंद्रीकरण योजना एवं विकास समिति की बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने ग्राम पंचायतों की वित्तीय स्थिति सुधारने और विकेंद्रीकृत शासन को मज़बूत करने की घोषणा की। पाँचवें राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) की सिफ़ारिशों की जाँच के लिए ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री की अध्यक्षता में एक समिति बनेगी। उस आयोग की रिपोर्ट के अंतर्गत ग्राम पंचायतों को ₹1,261 करोड़, तालुक पंचायतों को ₹557 करोड़ और ज़िला पंचायतों को ₹183 करोड़ जारी किए जा चुके हैं। बैठक में शहरी स्थानीय निकायों को 74वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप सुदृढ़ करने, उनकी योजना ग्राम सभा की तर्ज़ पर वार्ड सभाओं के माध्यम से बनाने और संबंधित कानूनों में संशोधन पर राष्ट्रीय विधि विद्यालय विश्वविद्यालय (NLSIU) के विशेषज्ञों से परामर्श लेने की बात कही गई। राज्य बजट में घोषित ‘जन योजना’ (People’s Plan) के दिशानिर्देश बनाने, योजना प्रबंधन इकाइयाँ स्थापित करने, विभागों के दायित्व मानचित्र तैयार करने, स्थानीय निकायों को GST राजस्व में हिस्सा दिलाने का प्रस्ताव GST परिषद को भेजने और KIADB द्वारा कर लगाने की शक्ति लिए जाने से ग्राम पंचायतों को हुई राजस्व हानि जैसे विषयों पर भी निर्देश दिए गए।
पृष्ठभूमि
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243O) जोड़कर पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया। 74वें संशोधन ने भाग IXA (अनुच्छेद 243P से 243ZG) के द्वारा नगरपालिकाओं को यह दर्जा दिया। ये संशोधन 1993 में लागू हुए।
- संशोधनों में स्थानीय निकायों को ‘स्वशासन की संस्था’ माना गया है। इसके लिए ग्यारहवीं अनुसूची (29 विषय) और बारहवीं अनुसूची (18 विषय) में कार्य दर्ज हैं। शक्तियों और संसाधनों का वास्तविक हस्तांतरण राज्य विधानमंडल के कानून पर निर्भर है, इसलिए राज्यों में विकेंद्रीकरण की गहराई अलग-अलग है।
- कर्नाटक विकेंद्रीकरण में अग्रणी राज्य रहा है। यहाँ कर्नाटक ज़िला परिषद, तालुक पंचायत समिति, मंडल पंचायत और न्याय पंचायत अधिनियम, 1983 के अंतर्गत त्रिस्तरीय व्यवस्था शुरू हुई। वर्तमान व्यवस्था कर्नाटक पंचायत राज अधिनियम, 1993 पर आधारित है, जिसमें ग्राम, तालुक और ज़िला स्तर हैं।
- स्थानीय निकायों की बड़ी समस्या ‘वित्त, कार्य और कार्मिक’ (Funds, Functions, Functionaries) की असमानता है। उनके स्वयं के राजस्व स्रोत सीमित हैं और वे राज्य व केंद्रीय अनुदानों पर निर्भर रहते हैं। GST लागू होने पर चुंगी और प्रवेश कर जैसे कई स्थानीय कर समाहित हुए। इससे स्थानीय निकायों के कर-आधार पर भी असर पड़ा।
- राज्य वित्त आयोग संविधान के अनुच्छेद 243I और 243Y के तहत स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है। अनुच्छेद 243I के अनुसार इसका गठन हर पाँच वर्ष में होता है। केंद्रीय वित्त आयोग भी राज्य वित्त आयोगों की सिफ़ारिशों के आधार पर राज्य की संचित निधि बढ़ाने के उपाय सुझाता है (अनुच्छेद 280(3)(bb) और (c))।
- सहभागी योजना निर्माण का एक चर्चित उदाहरण केरल का ‘जन योजना अभियान’ (1996) है, जिसमें योजना-निधि का बड़ा भाग स्थानीय निकायों को दिया गया और ग्राम सभा आधारित योजना बनी। कर्नाटक की ‘जन योजना’ भी योजना को निचले स्तर से जोड़ने का प्रयास है।
विकेंद्रीकृत योजना निर्माण और स्थानीय निकायों का वित्त क्या है?
- **विकेंद्रीकरण (Decentralisation):** सत्ता, कार्य और संसाधन ऊपरी सरकार से निकटतम स्तर तक सौंपना। इसका आधार ‘सहायकता का सिद्धांत’ है, यानी जो काम स्थानीय स्तर पर हो सकता है, वह वहीं हो।
- **स्थानीय निकायों के वित्त के स्रोत:** (क) स्वयं का कर व गैर-कर राजस्व, जैसे संपत्ति कर, शुल्क, उपयोगकर्ता प्रभार; (ख) राज्य सरकार से राज्य वित्त आयोग के अनुसार हस्तांतरण; (ग) केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान; (घ) केंद्र और राज्य की योजनाओं की निधि। अनुच्छेद 243H राज्य विधानमंडल को पंचायतों को कर लगाने और उनका संग्रह करने के लिए अधिकृत करने की अनुमति देता है।
- **राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243I, 243Y):** यह राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों के शुद्ध आगम के बँटवारे, निकायों को सौंपे जाने वाले करों-शुल्कों और राज्य की संचित निधि से सहायता अनुदान के सिद्धांत सुझाता है। राज्यपाल इसकी रिपोर्ट विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं। इसकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, इसलिए राज्य की इच्छाशक्ति निर्णायक होती है। कर्नाटक में पाँचवें आयोग की सिफ़ारिशों पर गठित समिति यही जाँचेगी कि कौन-सी लागू हो सकती हैं।
- **योजना निर्माण की संवैधानिक व्यवस्था:** अनुच्छेद 243G पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएँ बनाने का दायित्व देता है। अनुच्छेद 243ZD प्रत्येक ज़िले में ज़िला योजना समिति का प्रावधान करता है, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की योजनाओं को समेकित कर ज़िले की ड्राफ़्ट विकास योजना बनाती है। कर्नाटक में ज़िला, तालुक और गाँव स्तर की योजना समितियाँ गठित हैं और उन्हें हर तीन माह में बैठक कर प्रतिवेदन देने को कहा गया है।
- **ग्राम सभा, वार्ड सभा और वार्ड समिति:** अनुच्छेद 243A के अंतर्गत ग्राम सभा गाँव की मतदाता सूची में दर्ज सभी लोगों की सभा है और जमीनी भागीदारी का आधार है। 74वें संशोधन में 3 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं के लिए वार्ड समितियों का प्रावधान (अनुच्छेद 243S) है। नगरों में ग्राम सभा जैसी जन-सभा पर वैधानिक एकरूपता नहीं है, इसलिए कर्नाटक का वार्ड सभा के ज़रिये योजना बनाने का प्रस्ताव कानूनी ढाँचे पर निर्भर करेगा। इसी कारण NLSIU के विशेषज्ञों से परामर्श की बात आई है।
- **दायित्व मानचित्र (Responsibility Map) और कार्मिक:** कार्य-विभाजन स्पष्ट करने के लिए सभी विभागों से ग्राम, तालुक और ज़िला पंचायतों से जुड़े कार्यक्रमों में अपनी भूमिका परिभाषित करने को कहा गया है। इससे कार्य-हस्तांतरण की अस्पष्टता घटती है। पंचायतों के लिए प्रशिक्षित कार्मिक देने हेतु ‘कर्नाटक पंचायत प्रशासनिक सेवा’ का प्रस्ताव भी रखा गया है।
- **GST में हिस्सेदारी का प्रश्न:** GST परिषद (अनुच्छेद 279A) केंद्र और राज्यों का संयुक्त निकाय है और उसमें स्थानीय निकायों का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व नहीं है। इसलिए राज्य को अपने GST राजस्व से स्थानीय निकायों का हिस्सा तय करने के साथ GST परिषद को प्रस्ताव भेजना होगा। इस बिंदु पर कानूनी व्यवहार्यता अभी स्पष्ट नहीं है और परिषद की सहमति अनिवार्य होगी।
- **SVAMITVA और ग्रामीण भू-अभिलेख:** SVAMITVA (Survey of Villages Abadi and Mapping with Improvised Technology in Village Areas) पंचायती राज मंत्रालय की केंद्रीय योजना है, जो 24 अप्रैल 2020 को शुरू हुई। इसमें ड्रोन से गाँव की आबादी भूमि का मानचित्रण कर मालिकों को संपत्ति कार्ड दिए जाते हैं। इससे बने आँकड़े ग्राम ठाणा (गाँव की आबादी) सीमा के निर्धारण और संपत्ति कर संग्रह में मदद कर सकते हैं। KIADB द्वारा कर लगाने की शक्ति लिए जाने से ग्राम पंचायतों को राजस्व हानि हुई है, जबकि कानून में वसूले गए संपत्ति कर का 30% पंचायतों से साझा करने का प्रावधान है। यह उदाहरण दिखाता है कि विशेष प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों के बीच राजस्व-बँटवारे के नियम स्पष्ट होने चाहिए।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) की पाँचवीं रिपोर्ट के अंतर्गत निधि का अंतरण: ग्राम पंचायतों को ₹1,261 करोड़, तालुक पंचायतों को ₹557 करोड़ और जिला पंचायतों को ₹183 करोड़ जारी किए गए | अनुच्छेद 243-I के अंतर्गत राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें स्थानीय निकायों के वित्त का मुख्य आधार हैं। तीनों स्तरों पर निधि जारी होने से त्रि-स्तरीय पंचायती राज ढाँचे में वित्तीय हिस्सेदारी का पता चलता है। |
| मंत्री-स्तरीय समिति द्वारा सिफारिशों की जाँच | ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री की अध्यक्षता वाली समिति तय करेगी कि कौन-सी सिफारिशें लागू हो सकती हैं। इससे सिफारिश और क्रियान्वयन के बीच की दूरी घटाने का प्रयास दिखता है। |
| ‘जन योजना’ (People’s Plan) के लिए दिशा-निर्देश और वार्ड सभा | शहरी स्थानीय निकाय ग्राम सभा की तर्ज पर वार्ड सभाओं के माध्यम से योजना बनाएँगे। इससे ज़मीनी ज़रूरतें राज्य बजट तक पहुँचेंगी और ‘नीचे से ऊपर’ की योजना-प्रक्रिया बनेगी। |
| योजना प्रबंधन इकाइयाँ और सॉफ्टवेयर | जिला और तालुक स्तर पर इकाइयाँ तथा डिजिटल प्रणाली बनाने से योजना की तकनीकी क्षमता बढ़ेगी। जिला, तालुक और ग्राम स्तरीय योजना समितियों को हर तीन माह में बैठक करनी है। |
| विभागीय उत्तरदायित्व मानचित्र (Responsibility Maps) | हर विभाग को पंचायतों से जुड़े कार्यक्रमों में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी। इससे ‘कार्य, निधि और कार्यकर्ता’ (3F) के हस्तांतरण की अस्पष्टता घटेगी। |
| GST राजस्व में हिस्सा और KIADB से कर-हानि का मुद्दा | स्थानीय निकायों के लिए GST परिषद् को प्रस्ताव भेजा जाएगा। औद्योगिक क्षेत्रों में कर लगाने की शक्ति KIADB के पास जाने से हुई राजस्व-हानि का भी संज्ञान लिया गया है। इनसे स्थानीय निकायों की अपनी राजस्व क्षमता का प्रश्न सामने आता है। |
महत्व
राजकोषीय / आर्थिक
- अधिकांश स्थानीय निकाय अनुदान पर निर्भर हैं। निधि का नियमित और अनुमानित प्रवाह उन्हें स्थानीय सेवाओं (जलापूर्ति, स्वच्छता, सड़क) की बेहतर योजना बनाने में समर्थ करता है।
- अपने स्रोतों से राजस्व (संपत्ति कर, उपकर, शुल्क) बढ़ने पर राज्य के अंतरण पर निर्भरता घटती है और राजकोषीय स्वायत्तता बढ़ती है।
- GST के कारण चुंगी (Octroi), प्रवेश कर जैसे स्थानीय करों का समाहित होना स्थानीय निकायों के लिए राजस्व-हानि रहा है। हिस्सेदारी की माँग इसी की क्षतिपूर्ति का प्रयास है।
संवैधानिक / संघीय
- 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद स्थानीय निकाय ‘स्वशासन की संस्थाएँ’ हैं। उन्हें वित्त और कार्य उपलब्ध कराना संविधान की भावना का पालन है।
- यह कदम संघवाद के तीसरे स्तर को सशक्त करता है, जहाँ केंद्र-राज्य संबंधों के साथ राज्य-स्थानीय निकाय संबंध भी महत्त्वपूर्ण हैं।
- राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई से अनुच्छेद 243-I और 243-Y की व्यावहारिक सार्थकता बनती है।
प्रशासनिक / शासन
- जिला, तालुक और ग्राम स्तर की योजना समितियों की नियमित बैठकें बहुस्तरीय योजना (Multi-level Planning) को संस्थागत बनाती हैं।
- उत्तरदायित्व मानचित्र से विभागों के बीच दोहराव और जवाबदेही की अस्पष्टता घटती है।
- पंचायत प्रशासनिक सेवा का प्रस्ताव पंचायतों में प्रशिक्षित और स्थायी मानव संसाधन की कमी दूर करने का प्रयास है।
- SVAMITVA के आँकड़ों से ग्राम ठाणा (आबादी क्षेत्र) की सीमा तय होने पर संपत्ति का अभिलेख स्पष्ट होता है और कर-निर्धारण सुगम होता है।
सामाजिक / सहभागी लोकतंत्र
- ग्राम सभा और वार्ड सभा नागरिकों को प्राथमिकता तय करने में सीधी भागीदारी देती हैं। इससे योजनाएँ ज़रूरतों के अनुरूप बनती हैं।
- ‘जन योजना’ की प्रक्रिया बजट-निर्माण को अधिक पारदर्शी और सहभागी बना सकती है।
- शहरी निकायों में नागरिक भागीदारी बढ़ने से 74वें संशोधन की वार्ड समिति संबंधी भावना को बल मिलता है।
चुनौतियाँ
1. सीमित राजस्व आधार और अनुदान-निर्भरता
- स्थानीय निकायों का अपने कर और गैर-कर स्रोतों से राजस्व कम रहता है, इसलिए वे राज्य और केंद्र के अनुदान पर निर्भर रहते हैं।
- संपत्ति कर का आकलन और वसूली अक्सर पुराने अभिलेखों, कमजोर प्रशासन और राजनीतिक हिचक के कारण कमजोर रहती है।
- अनुदान प्रायः निर्दिष्ट (Tied) होते हैं, जिससे निकायों को खर्च की स्थानीय प्राथमिकता तय करने की लचीलापन कम मिलता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: स्थानीय शासन; GS-3: राजकोषीय संघवाद
2. GST राजस्व में सीधा हिस्सा: संवैधानिक और संस्थागत बाधा
- GST परिषद् (अनुच्छेद 279-A) केंद्र और राज्यों का मंच है। स्थानीय निकाय इसके सदस्य नहीं हैं, इसलिए राज्य को ही प्रस्ताव रखना होगा।
- GST का बँटवारा केंद्र और राज्यों के बीच होता है। स्थानीय निकायों को हिस्सा देने के लिए राज्य के हिस्से से हस्तांतरण या परिषद् की सहमति की आवश्यकता होगी।
- अन्य राज्यों की सहमति और राजस्व-तटस्थता के प्रश्न प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2/3: GST परिषद्, राजकोषीय संघवाद
3. कार्य, निधि और कार्यकर्ता का अधूरा हस्तांतरण
- संविधान की ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची के विषयों का हस्तांतरण राज्य के विवेक पर है। इस कारण अलग-अलग राज्यों में स्थिति असमान है।
- समानांतर संस्थाएँ (विकास प्राधिकरण, बोर्ड) निर्वाचित निकायों की भूमिका सिकोड़ देती हैं। KIADB द्वारा कर लगाने की शक्ति लेना इसका उदाहरण है।
- विभागीय अधिकारी अक्सर निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति नहीं, बल्कि अपने विभाग के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: विकेंद्रीकरण, 73वाँ/74वाँ संशोधन
4. मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता की कमी
- पंचायतों में प्रशिक्षित लेखाकार, इंजीनियर और योजनाकारों की कमी रहती है, जिससे योजना और निधि-उपयोग की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- सॉफ्टवेयर और योजना प्रबंधन इकाइयाँ तभी उपयोगी होंगी जब उन्हें चलाने वाला प्रशिक्षित स्टाफ और विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध हों।
- ऑडिट और लेखा-प्रणाली कमज़ोर होने पर निधि के दुरुपयोग का जोखिम रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में क्षमता निर्माण
5. सहभागी योजना की औपचारिकता में बदलने का जोखिम
- ग्राम सभा की बैठकों में कम उपस्थिति और प्रभावशाली वर्गों के प्रभुत्व से योजना प्रक्रिया औपचारिक रह सकती है।
- शहरों में ऊँची जनसंख्या, प्रवासी आबादी और नागरिक उदासीनता के कारण वार्ड सभाओं का गठन और संचालन कठिन है।
- संविधान में शहरी निकायों के लिए ग्राम सभा जैसी संस्था नहीं है। अनुच्छेद 243-S में वार्ड समितियों का प्रावधान है, इसलिए वार्ड सभा के लिए कानूनी आधार बनाना होगा।
यूपीएससी लिंक: GS-2: नागरिक भागीदारी, 74वाँ संशोधन
6. शहरी स्थानीय निकायों की कमज़ोर कानूनी और संस्थागत स्थिति
- राज्य नगरपालिका कानूनों में स्थानीय निकायों के बजाय राज्य सरकार को अधिक अधिकार रहते हैं (जैसे बजट, कर-दरें, कर्मचारियों पर नियंत्रण)।
- महानगर और जिला योजना समितियाँ प्रायः निष्क्रिय रहती हैं, जिससे ग्रामीण-शहरी योजनाओं में तालमेल नहीं बन पाता।
- कानूनों में सुधार के लिए विशेषज्ञ परामर्श सही दिशा है, किंतु इसे विधायी रूप देना राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शहरी शासन, नगरपालिका सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें | सिफारिशें राज्य पर बाध्यकारी नहीं हैं। उनके स्वीकार और क्रियान्वयन में देरी से स्थानीय निकायों के वित्त की अनिश्चितता बनी रहती है। |
| GST हिस्सेदारी | स्थानीय निकाय GST परिषद् के सदस्य नहीं हैं और बँटवारा केंद्र-राज्य के बीच होता है। इसलिए राज्यों की सहमति के बिना व्यवस्था असंभव है। |
| कर-शक्ति का अधिग्रहण | KIADB जैसी संस्थाओं को कर लगाने की शक्ति मिलने से ग्राम पंचायतों की स्वयं की आय घटती है। 30% संपत्ति कर साझा करने का प्रावधान पूरी भरपाई नहीं कर पाता। |
| वार्ड सभा | शहरों में वार्ड सभा का स्पष्ट संवैधानिक आधार नहीं है। भागीदारी की गुणवत्ता संगठित प्रयास और जागरूकता पर निर्भर है। |
| योजना समितियाँ | जिला, तालुक और ग्राम स्तर पर समितियाँ बनने के बावजूद तीन माह में बैठक और रिपोर्ट के नियम का पालन निगरानी की माँग करता है। |
| प्रशासनिक क्षमता | पंचायत प्रशासनिक सेवा, प्रशिक्षण और डिजिटल अवसंरचना के बिना विकेंद्रीकरण केवल कागज़ पर रह सकता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- SVAMITVA योजना (Survey of Villages Abadi and Mapping with Improvised Technology in Village Areas): पंचायती राज मंत्रालय की योजना (2020), जिसमें ड्रोन से गाँवों की आबादी का मानचित्रण कर संपत्ति कार्ड दिए जाते हैं। कर्नाटक इसके आँकड़ों से ग्राम ठाणा की सीमा तय करेगा।
- ग्राम पंचायत विकास योजना (Gram Panchayat Development Plan): पंचायतें ग्राम सभा की भागीदारी से योजना बनाती हैं। ‘जन योजना’ इसी प्रकार की जमीनी योजना-प्रक्रिया को राज्य बजट से जोड़ने का प्रयास है।
- केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान: संविधान के अनुच्छेद 280(3) के अनुसार वित्त आयोग राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य की संचित निधि बढ़ाने के उपाय सुझाता है। इसके अनुदान स्थानीय निकायों के वित्त का दूसरा बड़ा स्रोत हैं।
आगे की राह
- राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट निर्धारित अवधि में विधानमंडल के समक्ष रखी जाए, ताकि जवाबदेही बने।
- संपत्ति कर के सुधार के लिए GIS मैपिंग, SVAMITVA के आँकड़ों और डिजिटल कर-संग्रह का उपयोग किया जाए, ताकि स्थानीय निकायों की अपनी आय बढ़े।
- KIADB जैसी संस्थाओं से मिलने वाले संपत्ति कर के हिस्से को बढ़ाया जाए या कर-शक्ति को निकायों के पास लौटाने पर विचार हो।
- GST के हिस्से के प्रस्ताव पर अन्य राज्यों से संवाद हो। विकल्प के रूप में राज्य अपने कर-राजस्व का तय अनुपात (विभाज्य पूल) स्थानीय निकायों को दे सकता है।
- विधि संस्थानों और विशेषज्ञों के परामर्श से नगरपालिका कानूनों में संशोधन कर वार्ड सभा/वार्ड समिति को स्पष्ट कानूनी आधार और कार्य दिए जाएँ।
- पंचायत प्रशासनिक सेवा, लेखाकारों और इंजीनियरों के प्रशिक्षण से तकनीकी क्षमता मजबूत की जाए तथा योजना प्रबंधन इकाइयों को स्थायी कर्मचारी दिए जाएँ।
- उत्तरदायित्व मानचित्र को सार्वजनिक किया जाए और उसके पालन की निगरानी सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) तथा ऑडिट से की जाए।
- जिला योजना समितियों और महानगर योजना समितियों को सक्रिय कर ग्रामीण-शहरी योजनाओं का समेकित (Consolidated) विकास योजना-प्रारूप बनाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन · राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243-I और 243-Y) · राजकोषीय विकेंद्रीकरण · कार्य, कोष और कार्यकर्ता (3F) · जिला योजना समिति (अनुच्छेद 243ZD) · ग्राम सभा और वार्ड सभा · सहभागी योजना (जन योजना) · GST परिषद और स्थानीय निकायों की हिस्सेदारी · स्वामित्व योजना और संपत्ति कर आधार · अंतर-सरकारी राजकोषीय अंतरण · उत्तरदायित्व मानचित्र (Responsibility Mapping) · सहायकता का सिद्धांत (Subsidiarity)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243-A: ग्राम सभा की शक्तियाँ और कार्य
- अनुच्छेद 243-G: पंचायतों को शक्तियाँ और उत्तरदायित्व
- अनुच्छेद 243-H: पंचायतों की कर-शक्ति और अनुदान
- अनुच्छेद 243-I: पंचायतों के लिए राज्य वित्त आयोग
- अनुच्छेद 243-W: नगरपालिकाओं की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व
- अनुच्छेद 243-X: नगरपालिकाओं की कर-शक्ति और अनुदान
- अनुच्छेद 243-Y: नगरपालिकाओं के लिए वित्त आयोग
- अनुच्छेद 243-S: वार्ड समितियों का गठन और संरचना
- अनुच्छेद 243-ZD: जिला योजना समिति का गठन
- अनुच्छेद 279-A: GST परिषद् की रचना और कार्य
- अनुच्छेद 280(3)(bb)/(c): वित्त आयोग द्वारा स्थानीय निकायों के संसाधन-संवर्धन के उपाय
- ग्यारहवीं अनुसूची: पंचायतों के 29 विषय
- बारहवीं अनुसूची: नगरपालिकाओं के 18 विषय
अवधारणा प्रवाह
73वें-74वें संशोधन ने स्थानीय निकायों को स्वशासन की संवैधानिक संस्था बनाया → राज्य वित्त आयोग निधि-बँटवारे और कर-अंतरण की सिफारिशें देता है → सिफारिशों की समीक्षा के लिए मंत्री-स्तरीय समिति बनती है और निधि जारी होती है → जिला, तालुक, ग्राम और वार्ड स्तर पर योजना बनती है और ‘जन योजना’ राज्य बजट से जुड़ती है → विभागीय उत्तरदायित्व मानचित्र और योजना प्रबंधन इकाइयाँ कार्यान्वयन को स्पष्ट करती हैं → संपत्ति कर, KIADB से हिस्सा और GST हिस्सेदारी से निकायों की स्वयं की आय बढ़ती है → सशक्त वित्त, क्षमता और जवाबदेही से स्थानीय सेवाओं की गुणवत्ता और स्थानीय स्वशासन में सुधार होता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. स्थानीय स्वशासन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य का राज्यपाल प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन करता है।
2. अनुच्छेद 243ZD के अंतर्गत प्रत्येक जिले में जिला योजना समिति का गठन होता है, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की योजनाओं को समेकित कर जिले की प्रारूप विकास योजना तैयार करती है।
3. अनुच्छेद 243S के अंतर्गत वार्ड समितियों का गठन जनसंख्या का आकार देखे बिना सभी नगरपालिकाओं में अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 243-I (पंचायत) और 243-Y (नगरपालिका) के अंतर्गत राज्यपाल प्रत्येक पाँच वर्ष पर राज्य वित्त आयोग गठित करता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 243ZD जिला योजना समिति का प्रावधान करता है। कथन 3 गलत है: वार्ड समितियाँ केवल 3 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं में अनिवार्य हैं।
Q2. अभिकथन (A): ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों को GST परिषद की सदस्यता प्राप्त नहीं है।
कारण (R): अनुच्छेद 279A के अनुसार GST परिषद में केवल केंद्रीय वित्त मंत्री, राजस्व या वित्त के प्रभारी केंद्रीय राज्य मंत्री तथा प्रत्येक राज्य द्वारा नामित वित्त या कराधान के प्रभारी मंत्री होते हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, परंतु R गलत है
- A गलत है, परंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — अनुच्छेद 279A में परिषद की संरचना केवल केंद्र और राज्यों के मंत्रियों तक सीमित है, इसलिए स्थानीय निकाय सदस्य नहीं हैं। स्थानीय निकायों को GST राजस्व में हिस्सा देने के लिए राज्य परिषद के समक्ष प्रस्ताव रख सकता है या राज्य वित्त आयोग के माध्यम से राज्य के कर राजस्व में उनका अंश तय कर सकता है।
Q3. स्तंभ-I (संविधान का अनुच्छेद) को स्तंभ-II (विषय) से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ-I: A. अनुच्छेद 243A; B. अनुच्छेद 243-I; C. अनुच्छेद 243ZD; D. अनुच्छेद 243ZE
स्तंभ-II: 1. महानगर योजना समिति; 2. ग्राम सभा; 3. जिला योजना समिति; 4. पंचायतों के लिए राज्य वित्त आयोग
- A-2, B-4, C-3, D-1
- A-4, B-2, C-3, D-1
- A-2, B-4, C-1, D-3
- A-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर: A-2, B-4, C-3, D-1 — अनुच्छेद 243A ग्राम सभा से, 243-I पंचायतों के राज्य वित्त आयोग से, 243ZD जिला योजना समिति से तथा 243ZE महानगर योजना समिति से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिले तीन दशक से अधिक हो चुके हैं, फिर भी राजकोषीय विकेंद्रीकरण उनकी सबसे कमज़ोर कड़ी बना हुआ है। राज्य वित्त आयोग, GST राजस्व में हिस्सेदारी और सहभागी योजना निर्माण (जन योजना) जैसे हालिया कर्नाटक के प्रयासों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने के उपाय सुझाइए। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: 73वें और 74वें संशोधन ने स्थानीय निकायों को स्वशासन की संस्था का दर्जा दिया (भाग IX और IXA, 11वीं अनुसूची के 29 और 12वीं अनुसूची के 18 विषय)। ‘कार्य, कोष और कार्यकर्ता’ (3F) में कोष सबसे कमज़ोर है। कर्नाटक का संदर्भ: पाँचवें राज्य वित्त आयोग के अंतर्गत ग्राम पंचायतों को ₹1,261 करोड़, तालुक पंचायतों को ₹557 करोड़ और ज़िला पंचायतों को ₹183 करोड़ जारी हुए; सिफारिशों की जाँच के लिए मंत्री-स्तरीय समिति बनी; जन योजना के दिशानिर्देश, वार्ड सभाएँ, योजना प्रबंधन इकाइयाँ, उत्तरदायित्व मानचित्र और KIADB द्वारा कर लगाने की शक्ति लेने पर ग्राम पंचायतों को हुई राजस्व हानि (संपत्ति कर का 30% साझा करने का प्रावधान)।
मुख्य तर्क (कथन के पक्ष में): (1) अनुच्छेद 243H और 243X केवल कर लगाने की ‘अनुमति’ देते हैं, बाध्यता नहीं; कर आधार संकीर्ण है और संपत्ति कर का संग्रह कम है। (2) राज्य वित्त आयोग का गठन देर से होता है और उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई रिपोर्ट विधानमंडल में नहीं रखी जाती; आयोग सलाहकारी है। (3) अंतरण मुख्यतः अनुदान-आधारित और शर्तों से बँधे हैं। (4) GST ने स्थानीय निकायों के चुंगी, प्रवेश कर जैसे स्रोत समाहित कर दिए; स्थानीय निकाय GST परिषद (अनुच्छेद 279A) के सदस्य नहीं हैं। (5) शहरी स्थानीय निकायों का राजस्व GDP के 1% से कम है (RBI और अन्य अध्ययन)। (6) समानांतर संस्थाओं (विकास प्राधिकरण, औद्योगिक क्षेत्र बोर्ड) द्वारा कार्य छीनना।
संतुलन: अनुच्छेद 280(3)(bb) और (c) के अंतर्गत केंद्रीय वित्त आयोग राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य की संचित निधि बढ़ाने के उपाय सुझाता है; 15वें वित्त आयोग (अध्यक्ष: एन.के. सिंह) ने 2021-26 के लिए स्थानीय निकायों को लगभग ₹4.36 लाख करोड़ के अनुदान की सिफारिश की। केरल का 1996 का जन योजना अभियान, स्वामित्व योजना (2020) के संपत्ति कार्ड से संपत्ति कर आधार का विस्तार, और जिला योजना समितियाँ (अनुच्छेद 243ZD) सकारात्मक पहलें हैं।
GST हिस्सेदारी का आकलन: यह संघीय ढाँचे में जटिल है; स्थानीय निकाय राज्य का विषय हैं, इसलिए सीधे परिषद की सदस्यता के बजाय राज्य के कर राजस्व में सूत्र-आधारित अंश (राज्य वित्त आयोग के माध्यम से) अधिक व्यावहारिक है।
सुझाव: राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन और कार्रवाई रिपोर्ट अनिवार्य करना; संपत्ति कर का नियमित पुनर्मूल्यांकन और डिजिटल कर रिकॉर्ड; 2रे प्रशासनिक सुधार आयोग (स्थानीय शासन पर 6वीं रिपोर्ट) के अनुसार सहायकता का सिद्धांत और कार्यों का स्पष्ट हस्तांतरण; अलग पंचायत/नगर सेवा संवर्ग; बकाया हिस्सेदारी का स्वचालित अंतरण; लेखा परीक्षा और सामाजिक अंकेक्षण से जवाबदेही। निष्कर्ष: वित्तीय स्वायत्तता के बिना विकेंद्रीकरण केवल प्रशासनिक रहेगा; कोष को कार्य और कार्यकर्ता के अनुरूप बनाना आवश्यक है।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार द्वारा प्रस्तावित ‘स्थानीय निकायों के वित्तीय सुदृढ़ीकरण’ के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कदम राज्य सरकार द्वारा उठाया जा सकता है?
- राज्य सरकार द्वारा स्थानीय निकायों को अतिरिक्त कराधान अधिकार प्रदान करना
- स्थानीय निकायों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) स्थापित करना
- राज्य सरकार द्वारा स्थानीय निकायों के बजट में कटौती करना
- स्थानीय निकायों को केंद्र सरकार से ऋण लेने से प्रतिबंधित करना
उत्तर: राज्य सरकार द्वारा स्थानीय निकायों को अतिरिक्त कराधान अधिकार प्रदान करना — राज्य सरकार स्थानीय निकायों को अतिरिक्त कराधान अधिकार प्रदान कर उनके वित्तीय स्रोतों को मजबूत कर सकती है, जिससे उन्हें स्वायत्तता और संसाधनों में वृद्धि होगी।
Mains: कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘स्थानीय निकायों के वित्तीय सुदृढ़ीकरण’ की रणनीति के प्रमुख घटकों का विश्लेषण करते हुए, राज्य में शहरी एवं ग्रामीण स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति पर इसके संभावित प्रभावों पर चर्चा कीजिए।
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