17 Oct एनबीए द्वारा जैव विविधता बोर्डों को 1.19 करोड़ रुपये का वितरण: जानिए मुख्य बिंदु
✎ पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (ABS) के अंतर्गत जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ का न्यायसंगत बंटवारा NBA की अनुमति से होता है, और राज्य जैव विविधता बोर्ड व जैव विविधता प्रबंधन समितियां इसकी संस्थागत कड़ी हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — Environment (जैव विविधता संरक्षण, जैव विविधता अधिनियम, 2002, नागोया प्रोटोकॉल, पारंपरिक ज्ञान और जैविक संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग) | GS Paper II — Polity and Governance (सांविधिक निकाय, केंद्र-राज्य समन्वय, स्थानीय स्वशासन की भूमिका) | GS Paper II — International Relations (जैव विविधता पर अभिसमय और वैश्विक जैव विविधता ढांचा)
- Prelims: जैव विविधता अधिनियम, 2002, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) — मुख्यालय चेन्नई, राज्य जैव विविधता बोर्ड और जैव विविधता प्रबंधन समिति (BMC), पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (ABS) और नागोया प्रोटोकॉल (2010), जैव विविधता पर अभिसमय (CBD), 1992, कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा (2022), कैली फंड (Cali Fund) और डिजिटल अनुक्रम सूचना (DSI), जैव-चोरी (Biopiracy) और हल्दी व नीम पेटेंट विवाद
- Essay: जैव विविधता के आर्थिक उपयोग से प्राप्त लाभ का न्यायसंगत और पारदर्शी बंटवारा: स्थानीय समुदायों की भूमिका, संरक्षण और विकास के बीच संतुलन में सांविधिक निकायों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (ABS) के अंतर्गत जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ का न्यायसंगत बंटवारा NBA की अनुमति से होता है, और राज्य जैव विविधता बोर्ड व जैव विविधता प्रबंधन समितियां इसकी संस्थागत कड़ी हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority – NBA) ने पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (Access and Benefit Sharing – ABS) तंत्र के अंतर्गत 29 राज्य जैव विविधता बोर्डों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जैव विविधता परिषद को कुल 1.19 करोड़ रुपये जारी किए हैं। यह वितरण इस बात को रेखांकित करता है कि जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ का एक भाग राज्य स्तर की संस्थाओं के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों तक पहुंचाने की व्यवस्था कार्यरत है। समाचार में जारी राशि और प्राप्तकर्ता संस्थाओं की संख्या का उल्लेख है, किंतु प्रत्येक इकाई को दी गई राशि के विवरण का उल्लेख नहीं है। परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु यह है कि ABS तंत्र जैव विविधता अधिनियम, 2002 का वैधानिक दायित्व है, और इसकी संस्थागत कड़ी राज्य जैव विविधता बोर्ड हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत ने जैव विविधता पर अभिसमय (Convention on Biological Diversity – CBD), 1992 के अनुरूप जैव विविधता अधिनियम, 2002 पारित किया, जिसके अंतर्गत जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, सतत उपयोग और लाभ-साझाकरण की व्यवस्था की गई।
- नागोया प्रोटोकॉल (2010), जो 2014 से प्रभावी हुआ, आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच और उनके उपयोग से उत्पन्न लाभों के उचित एवं न्यायसंगत बंटवारे के लिए अंतरराष्ट्रीय ढांचा प्रदान करता है। भारत ने इस प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन किया है।
- जैव-चोरी के उदाहरण, जैसे हल्दी पर अमेरिकी पेटेंट (1995) का वर्ष 1997 में निरस्तीकरण और नीम से संबंधित यूरोपीय पेटेंट का वर्ष 2005 में रद्द होना, इस बात के प्रमाण बने कि पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण हेतु वैधानिक तंत्र आवश्यक है।
- कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा (2022) ने लाभ-साझाकरण को अपने लक्ष्यों में सम्मिलित किया है, और कैली फंड (2025) के माध्यम से डिजिटल अनुक्रम सूचना के उपयोग से लाभ-साझाकरण पर वैश्विक चर्चा तेज़ हुई है।
- भारत में जैव विविधता अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर NBA, राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMC) गठित की गई हैं, जो मिलकर त्रि-स्तरीय संरचना बनाती हैं।
पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (ABS) तंत्र क्या है?
- पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (Access and Benefit Sharing – ABS) एक नियामक व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच के लिए पूर्व सूचित सहमति और पारस्परिक रूप से सहमत शर्तें आवश्यक होती हैं।
- इसके दो मुख्य घटक हैं: पहुंच, जो संसाधन प्राप्त करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है, और लाभ-साझाकरण, जो व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त मौद्रिक एवं गैर-मौद्रिक लाभों के न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करता है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग के लिए NBA की पूर्व अनुमति अपेक्षित है, और लाभ-साझाकरण की शर्तें इसी प्रक्रिया से तय होती हैं।
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण राष्ट्रीय स्तर का सांविधिक निकाय है, जो पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है और मुख्यतः अनुमति, नियमन तथा लाभ-साझाकरण से जुड़े निर्णय लेता है।
- राज्य जैव विविधता बोर्ड राज्य सरकारों को जैव विविधता संरक्षण से संबंधित परामर्श देते हैं और स्थानीय स्तर पर संरक्षण गतिविधियों के समन्वय की भूमिका निभाते हैं।
- जैव विविधता प्रबंधन समितियां स्थानीय निकायों, जैसे पंचायतों और नगरपालिकाओं, के स्तर पर गठित होती हैं, जिससे स्थानीय समुदायों और जैविक संसाधनों के बीच सीधा संबंध सुनिश्चित होता है।
- नागोया प्रोटोकॉल के अनुरूप ABS का उद्देश्य जैव-चोरी रोकना, पारंपरिक ज्ञान के धारकों को मान्यता देना और जैव विविधता के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करना है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कुल वितरण | राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने 29 राज्य जैव विविधता बोर्डों और एक केंद्रशासित प्रदेश की जैव विविधता परिषद को कुल 1.19 करोड़ रुपये जारी किए हैं। यह राशि पहुँच एवं लाभ-साझाकरण तंत्र के अंतर्गत है। |
| संस्थागत ढाँचा | जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority) और राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड कार्य करते हैं। स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMC) गठित होती हैं। |
| पहुँच एवं लाभ-साझाकरण (Access and Benefit Sharing) | जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के उपयोग के बदले उससे उत्पन्न लाभ का उचित और न्यायसंगत बँटवारा सुनिश्चित करना इस तंत्र का मूल उद्देश्य है। |
| अंतरराष्ट्रीय आधार | यह व्यवस्था जैव विविधता पर अभिसमय (CBD) के तीसरे उद्देश्य पर आधारित है और इसका विस्तृत प्रावधान नागोया प्रोटोकॉल (Nagoya Protocol) में है, जिसे भारत ने अनुमोदित किया है। |
| राज्य बोर्डों की भूमिका | राज्य जैव विविधता बोर्ड स्थानीय समुदायों से परामर्श, जैव संसाधनों के संरक्षण और लाभ-साझाकरण से जुड़े कार्यों में समन्वय करते हैं। इसलिए उन्हें धन का हस्तांतरण उनकी क्षमता को सुदृढ़ करता है। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए राज्य स्तर पर संस्थागत सक्रियता आवश्यक है, और इस वितरण से राज्य बोर्डों की परिचालन क्षमता बनी रहती है।
- पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय जैविक संसाधनों के संरक्षण को प्रोत्साहन मिलता है।
आर्थिक महत्व
- जैव-संसाधन आधारित उद्योगों (औषधि, आयुर्वेद, कृषि और कॉस्मेटिक्स) में जैविक संसाधनों के वाणिज्यिक उपयोग के लिए एक वैधानिक ढाँचा प्रदान होता है।
- लाभ का न्यायसंगत बँटवारा स्थानीय समुदायों की आय और जैविक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाता है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व
- जनजातीय और ग्रामीण समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को मान्यता मिलती है, जिससे उनके अधिकारों की रक्षा होती है।
- जैव विविधता प्रबंधन समितियों के माध्यम से स्थानीय शासन में जन-भागीदारी बढ़ती है।
संघीय एवं प्रशासनिक महत्व
- राष्ट्रीय प्राधिकरण और राज्य बोर्डों के बीच वित्तीय समन्वय से सहकारी संघवाद की व्यावहारिक भावना दिखती है।
- केंद्रशासित प्रदेश की परिषद को भी इसमें शामिल करना क्षेत्रीय स्तर पर इस व्यवस्था की समावेशिता दर्शाता है।
चुनौतियाँ
1. लाभ-साझाकरण की प्रभावी प्रक्रिया
- जैविक संसाधनों के उपयोगकर्ता और स्थानीय समुदायों के बीच लाभ के वास्तविक हस्तांतरण की निगरानी कठिन है।
- अनुमति और शुल्क की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरणीय शासन (GS-3)
2. पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण और दस्तावेज़ीकरण
- कई समुदायों का पारंपरिक ज्ञान मौखिक है, इसलिए उसका दस्तावेज़ीकरण अपूर्ण रहता है।
- बिना उचित दस्तावेज़ीकरण के जैव-चोरी (Biopiracy) का जोखिम बना रहता है।
यूपीएससी लिंक: बौद्धिक संपदा अधिकार और स्वदेशी ज्ञान (GS-2/GS-3)
3. राज्य बोर्डों की क्षमता और संसाधन
- कई राज्य बोर्डों में प्रशिक्षित कर्मचारियों और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी रहती है।
- धन का समय पर उपयोग और लेखा-परीक्षा सुनिश्चित करना प्रशासनिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य समन्वय और संस्थागत क्षमता (GS-2)
4. स्थानीय समुदायों की भागीदारी
- जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन और सक्रियता सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं है।
- समुदायों को अपने अधिकारों और प्रक्रियाओं की जानकारी देना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: पंचायती स्तर पर सहभागी शासन और जनजातीय अधिकार (GS-2)
5. विकास परियोजनाओं के साथ संतुलन
- खनन, अवसंरचना और कृषि विस्तार से जैव विविधता पर दबाव बढ़ता है।
- संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना नीति-निर्माण की जटिल चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सतत विकास और पर्यावरण-अर्थव्यवस्था संतुलन (GS-3)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| लाभ का वास्तविक वितरण | शुल्क और लाभ का स्थानीय समुदायों तक पहुँचना सुनिश्चित नहीं होता। |
| जैव-चोरी का जोखिम | पारंपरिक ज्ञान का बिना अनुमति वाणिज्यिक उपयोग संभव है। |
| राज्य बोर्डों की क्षमता | तकनीकी कर्मचारियों और प्रशिक्षण की कमी से कार्य प्रभावित होता है। |
| समुदाय-स्तरीय भागीदारी | जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ सभी क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय नहीं हैं। |
| विकास बनाम संरक्षण | औद्योगिक और अवसंरचना परियोजनाओं से आवासों पर दबाव बढ़ता है। |
आगे की राह
- राज्य जैव विविधता बोर्डों के लिए वित्तीय उपयोग का समयबद्ध और सार्वजनिक लेखा-परीक्षा ढाँचा विकसित किया जाए।
- जैव विविधता प्रबंधन समितियों का सशक्तीकरण किया जाए और उन्हें प्रशिक्षण व तकनीकी सहायता दी जाए।
- पारंपरिक ज्ञान के डिजिटल दस्तावेज़ीकरण को व्यापक बनाया जाए, ताकि जैव-चोरी के मामलों को रोका जा सके।
- लाभ-साझाकरण से जुड़े शुल्क और लाभ के हस्तांतरण की ऑनलाइन निगरानी प्रणाली लागू की जाए।
- राज्य बोर्डों और राष्ट्रीय प्राधिकरण के बीच नियमित समन्वय बैठकों के माध्यम से नीति-क्रियान्वयन को एकरूप बनाया जाए।
- स्थानीय समुदायों को उनके अधिकारों और ABS प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में अभियान चलाए जाएँ।
- विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में जैव विविधता पहलू को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जैव विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002) · राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority) · राज्य जैव विविधता बोर्ड (State Biodiversity Board) · जैव विविधता प्रबंधन समिति (Biodiversity Management Committee) · लाभ-साझाकरण (Benefit Sharing) · पहुँच एवं लाभ-साझाकरण (Access and Benefit Sharing) · नागोया प्रोटोकॉल (Nagoya Protocol) · जैविक विविधता पर अभिसमय (Convention on Biological Diversity) · लोक जैव विविधता पंजी (People’s Biodiversity Register) · पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (Traditional Knowledge Digital Library) · बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) · सतत विकास (Sustainable Development)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण, वन और वन्य जीवों की रक्षा का राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार का मौलिक कर्तव्य
- अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु संसदीय विधान की शक्ति
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: वन और वन्य जीव संरक्षण संबंधी प्रविष्टियाँ (17A, 17B)
अवधारणा प्रवाह
जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का व्यावसायिक या शोध-आधारित उपयोग होता है। → जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत अनुमति और शुल्क की व्यवस्था से लाभ-साझाकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। → राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण इस लाभ से जुड़े धन का प्रबंधन करता है। → प्राधिकरण द्वारा 29 राज्य जैव विविधता बोर्डों और एक केंद्रशासित प्रदेश की परिषद को 1.19 करोड़ रुपये जारी किए जाते हैं। → राज्य बोर्ड यह राशि जैव विविधता प्रबंधन समितियों और स्थानीय संरक्षण गतिविधियों पर व्यय करते हैं। → इससे स्थानीय समुदायों को लाभ और जैव संसाधनों के सतत संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
2. अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक राज्य सरकार के लिए राज्य जैव विविधता बोर्ड का गठन अनिवार्य (mandatory) है।
3. जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन स्थानीय निकायों द्वारा उनके क्षेत्राधिकार में किया जाता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित वैधानिक निकाय है और इसका मुख्यालय चेन्नई में है। कथन 2 गलत है, क्योंकि अधिनियम की धारा 22 में राज्य सरकार को बोर्ड गठित करने का विवेकाधिकार (‘may’) दिया गया है, अनिवार्यता नहीं। कथन 3 सही है: जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन स्थानीय निकाय करते हैं (धारा 41)।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत नागोया प्रोटोकॉल का पक्षकार है।
कारण (R): नागोया प्रोटोकॉल आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न लाभों के न्यायसंगत एवं समान साझाकरण के लिए एक ढाँचा प्रदान करता है।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:
- (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- (b) A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- (c) A सही है, परन्तु R गलत है
- (d) A गलत है, परन्तु R सही है
उत्तर: (b) A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है — A सही है: भारत ने वर्ष 2012 में नागोया प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन किया। R भी सही है, क्योंकि यही प्रोटोकॉल का मूल उद्देश्य है। परन्तु R यह नहीं बताता कि भारत पक्षकार क्यों बना, इसलिए R, A की व्याख्या नहीं करता।
Q3. निम्नलिखित सूचियों का सुमेलन कीजिए:
सूची-I (संधि/अधिनियम)
A. नागोया प्रोटोकॉल
B. जैविक विविधता पर अभिसमय
C. जैव विविधता अधिनियम, 2002
सूची-II (विशेषता)
1. आनुवंशिक संसाधनों के लाभ-साझाकरण हेतु अंतरराष्ट्रीय ढाँचा, जिसे वर्ष 2010 में अपनाया गया
2. पृथ्वी शिखर सम्मेलन (रियो, 1992) में अपनाया गया अभिसमय
3. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान करने वाला भारतीय विधान
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-1, C-3
- A-1, B-3, C-2
- A-3, B-1, C-2
उत्तर: A-1, B-2, C-3 — नागोया प्रोटोकॉल वर्ष 2010 में नागोया में अपनाया गया और लाभ-साझाकरण का अंतरराष्ट्रीय ढाँचा है (A-1)। जैविक विविधता पर अभिसमय 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में खुला हुआ (B-2)। जैव विविधता अधिनियम, 2002 राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण का प्रावधान करता है (C-3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जैव विविधता अधिनियम, 2002 ने जैविक संसाधनों की पहुँच और उनसे होने वाले लाभ के साझाकरण की व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया है। इस व्यवस्था के ढाँचे की समीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि राज्य जैव विविधता बोर्डों और जैव विविधता प्रबंधन समितियों की सीमित क्षमता से लाभ-साझाकरण के उद्देश्य किस प्रकार प्रभावित होते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना इस प्रकार हो:
1. भूमिका: जैविक विविधता पर अभिसमय (CBD, 1992, रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन) और नागोया प्रोटोकॉल (2010; भारत का अनुसमर्थन 2012) का संदर्भ; अनुच्छेद 51क(छ) और अनुच्छेद 48क के अंतर्गत पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण का संवैधानिक आधार।
2. संस्थागत ढाँचा (जैव विविधता अधिनियम, 2002 और जैव विविधता नियम, 2004): राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (2003 में स्थापित, चेन्नई) की भूमिका; धारा 3 (विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध); धारा 6 (जैविक संसाधन पर आधारित बौद्धिक संपदा अधिकार हेतु प्राधिकरण की पूर्व अनुमति); धारा 40 (लाभ-साझाकरण की शर्तें और शुल्क/रॉयल्टी का निर्धारण); राज्य जैव विविधता बोर्ड (धारा 22 से आगे) और जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (धारा 41) का स्थानीय स्तर पर कार्य।
3. लाभ-साझाकरण के व्यावहारिक उपकरण: लोक जैव विविधता पंजी (PBR) द्वारा स्थानीय ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण; पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL, CSIR) द्वारा जैव-चोरी (biopiracy) रोकने का प्रयास; नीम पेटेंट का यूरोपीय पेटेंट कार्यालय द्वारा निरस्त होना (2005) एक उदाहरण के रूप में।
4. क्षमता की सीमाएँ: राज्य बोर्डों में तकनीकी और वित्तीय संसाधनों की कमी; जैव विविधता प्रबंधन समितियों का असमान गठन और सूचना-अभाव; लाभ-साझाकरण कोष में धनराशि का अपेक्षाकृत सीमित होना (जैसे हालिया वितरण, जिसमें 29 राज्य जैव विविधता बोर्डों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जैव विविधता परिषद को कुल 1.19 करोड़ रुपये जारी किए गए); वनाधिकार अधिनियम, 2006 और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के साथ समन्वय की चुनौती।
5. संतुलित दृष्टिकोण: शोध, नवाचार और औषधि-कृषि उद्योग के लिए पहुँच की सुगमता बनाम स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा; ‘अनुमति-आधारित’ नियंत्रण से उत्पन्न विलंब का तर्क बनाम जैव-चोरी रोकने के लिए कठोर अनुपालन का तर्क। विधिक दृष्टि से अनुपालन न होने पर दंडात्मक प्रावधानों की प्रभावशीलता पर विचार।
6. निष्कर्ष एवं सुधार: क्षमता निर्माण, डिजिटल रिकॉर्ड और पारदर्शी लाभ-वितरण तंत्र; समुदाय-केंद्रित शासन के माध्यम से सतत विकास के लक्ष्य (SDG 15 के संदर्भ में) की ओर बढ़ना।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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