भारत ने बताया UN रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम को ‘भारत-आधारित’ बताना ‘गलत’

भारत ने बताया UN रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम को 'भारत-आधारित' बताना 'गलत'

भारत ने बताया UN रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम को ‘भारत-आधारित’ बताना ‘गलत’

दाऊद इब्राहिम: भारत बनाम संयुक्त राष्ट्रभारत का दृष्टिकोणसंयुक्त राष्ट्र प्रतिवेदक का दृष्टदाऊद इब्राहिम की स्थितिभारत में 1993 मुंबई बम धमाकों में वांछभारत-आधारित बताया गयासुरक्षा परिषद प्रतिबंध2003 में 1267 सूची में शामिल (पहले ही प्रतिबंध सूची का उल्लेख नहींसूचना स्रोतइंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस आधारितविशेष प्रतिवेदक की रिपोर्टप्रतिवेदन की भूमिकागंभीर अशुद्धि, संयुक्त राष्ट्र की साख स्वतंत्र विशेषज्ञ द्वारा तैयार, आधिकारतथ्य-सत्यापन प्रक्रिया1267 समिति के विवरणात्मक सारांश को प्रस्वतंत्र विशेषज्ञ द्वारा प्रस्तुत, अति
दाऊद इब्राहिम: भारत बनाम संयुक्त राष्ट्र

✎ विशेष प्रतिवेदक स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं, पर उनके प्रतिवेदन तथ्यात्मक सटीकता की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए; सुरक्षा परिषद की 1267 सूची में नाम दर्ज होने का आधार विवरणात्मक सारांश है, और रेड कॉर्नर नोटिस गिरफ़्तारी का वारंट नहीं…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएँ, भारत की विदेश नीति और संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (आतंकवाद, संगठित अपराध और वैश्विक आतंकवाद-रोधी ढाँचा)
  • Prelims: विशेष प्रतिवेदक (Special Rapporteur) और विशेष प्रक्रियाएँ (Special Procedures), मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council), सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था (1267 Sanctions Regime), अल-कायदा और संबद्ध व्यक्तियों व संस्थाओं पर प्रतिबंध, डी-कंपनी (D-Company), रेड कॉर्नर नोटिस (Red Corner Notice) और इंटरपोल (Interpol), विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA), संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1373 (2001)
  • Essay: आतंकवाद-रोधी उपाय और मानवाधिकार: सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग की आवश्यकता

त्वरित पुनरावृत्ति: विशेष प्रतिवेदक स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं, पर उनके प्रतिवेदन तथ्यात्मक सटीकता की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए; सुरक्षा परिषद की 1267 सूची में नाम दर्ज होने का आधार विवरणात्मक सारांश है, और रेड कॉर्नर नोटिस गिरफ़्तारी का वारंट नहीं बल्कि सूचना-आधारित अनुरोध है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के एक प्रथम सचिव ने आतंकवाद-रोधी और मानवाधिकार विषयों पर विशेष प्रतिवेदक बेन सॉल (Ben Saul) की जुलाई की रिपोर्ट पर आपत्ति जताई। भारत का कहना है कि रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी दाऊद इब्राहिम को ‘भारत-आधारित’ बताया गया, जबकि वह भारत में 1993 के मुंबई बम धमाकों सहित आतंकी हमलों के सिलसिले में वांछित है और वर्ष 2003 में सुरक्षा परिषद की 1267 सूची में डाले जाने से पहले ही देश से बाहर रह रहा था। भारत ने रिपोर्ट की इस प्रस्तुति को गंभीर अशुद्धि बताते हुए यह भी कहा कि ऐसी त्रुटियाँ संयुक्त राष्ट्र की साख को नुकसान पहुँचाती हैं। मामला इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह प्रश्न सामने आता है कि स्वतंत्र विशेषज्ञों के प्रतिवेदन तथ्यों और सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध-रिकॉर्ड से कैसे जुड़े रहें, और आतंकवाद-रोधी कार्रवाई में मानवाधिकार का ढाँचा किस सीमा तक लागू हो।

पृष्ठभूमि

  • संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रक्रियाएँ (Special Procedures) मानवाधिकार परिषद के अधीन काम करती हैं। विशेष प्रतिवेदक इनके सदस्य होते हैं, जो स्वतंत्र और व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करते हैं। उनके विचार संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक निर्णय नहीं होते, और उन्हें संयुक्त राष्ट्र से सीधे वेतन नहीं मिलता।
  • सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के अंतर्गत अल-कायदा, तालिबान और इनसे जुड़े व्यक्तियों व संस्थाओं की सूची बनाई जाती है। सूची में नाम जोड़ने का आधार ‘विवरणात्मक सारांश’ (Narrative Summary of Reasons) होता है, जिसे प्रतिबंध समिति तैयार करती है।
  • दाऊद इब्राहिम और उसका संगठन डी-कंपनी भारत में आतंकी हमलों के मामलों में वांछित हैं। इसके लिए इंटरपोल द्वारा रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया है, जो विभिन्न देशों की कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को व्यक्ति की पहचान कर उसे गिरफ़्तार करने और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए सूचित करता है।
  • सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1373 (2001) सभी सदस्य देशों से आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकी गतिविधियों को अपराध घोषित करने तथा उनकी रोकथाम के लिए कानूनी उपाय करने की अपेक्षा करता है।
  • भारत में आतंकवाद के विरुद्ध मुख्य विधि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967) है। इसमें व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान भी है।

विशेष प्रतिवेदक और सुरक्षा परिषद की सूची: मूल अवधारणाएँ क्या हैं?

  • विशेष प्रतिवेदक (Special Rapporteur) संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं। वे किसी विशेष विषय या देश पर रिपोर्ट तैयार करते हैं और संबंधित सरकारों से संवाद करते हैं।
  • इनकी स्वतंत्रता इस बात पर निर्भर करती है कि वे किसी सरकार के निर्देश पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करें। इसी स्वतंत्रता के कारण उनके प्रतिवेदनों की तथ्यात्मक सटीकता की जवाबदेही और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
  • सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समितियाँ सदस्य देशों के प्रस्तावों के आधार पर व्यक्तियों और संस्थाओं को सूची में डालती हैं। सूची में जुड़ना सुरक्षा परिषद का निर्णय होता है, और इसके परिणाम में संपत्ति फ़्रीज़ करना, यात्रा-प्रतिबंध और हथियार-प्रतिबंध शामिल हो सकते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद-रोधी ढाँचे में ‘विधि के शासन’ और ‘मानवाधिकार’ दोनों के पालन पर बल दिया जाता है। यह अपेक्षा की जाती है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई मानवाधिकार मानकों के भीतर हो, परंतु मानवाधिकार का तर्क आतंकवादियों को संरक्षण नहीं दे सकता।
  • रेड कॉर्नर नोटिस (Red Corner Notice) गिरफ़्तारी का वारंट नहीं है। यह किसी सदस्य देश के अनुरोध पर जारी किया जाता है, ताकि व्यक्ति का पता लगाकर अस्थायी गिरफ़्तारी और प्रत्यर्पण की कार्यवाही हो सके।
  • इंटरपोल (Interpol) का मुख्यालय ल्यों (फ़्रांस) में है। भारत उसका सदस्य है, और रेड कॉर्नर नोटिस उसकी सबसे प्रचलित सूचना-प्रणालियों में से एक है।
  • संयुक्त राष्ट्र में किसी भी आपत्ति का सामान्य मार्ग यह होता है कि संबंधित सदस्य देश अपना लिखित पक्ष रखे, तथ्यों का खंडन प्रस्तुत करे और संस्था की साख व निष्पक्षता बनाए रखने की माँग करे।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
संस्था और पद विशेष प्रतिवेदक (Special Rapporteur) संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं। वे व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करते हैं और संयुक्त राष्ट्र से सीधे वेतन नहीं पाते।
विवादित रिपोर्ट का विषय जुलाई में प्रस्तुत रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम को ‘भारत-आधारित’ D-Company का नेता बताया गया था। भारत का कहना है कि वह भारत से बाहर रहता है और भारत में आतंकवादी हमलों के लिए वांछित है।
भारत का औपचारिक रुख भारतीय संयुक्त राष्ट्र मिशन के प्रथम सचिव ने रिपोर्ट में तथ्यात्मक त्रुटियों पर आपत्ति दर्ज की और कहा कि रिपोर्ट में भारत की वांछितता का उल्लेख छूटा है।
सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध सूची 1267 प्रतिबंध व्यवस्था (1267 Sanctions Regime) के तहत दाऊद इब्राहिम को 2003 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी के रूप में सूचीबद्ध किया गया। सूची-विवरण में भारत में 1993 के हमलों के संदर्भ में उसकी वांछितता दर्ज है।
इंटरपोल नोटिस और प्रत्यर्पण भारत के अनुरोध पर इंटरपोल (Interpol) ने उसके विरुद्ध रेड कॉर्नर नोटिस (Red Corner Notice) जारी किया है। इसके आधार पर विश्व की कानून-प्रवर्तन एजेंसियां उसकी पहचान और गिरफ़्तारी के लिए सतर्क रहती हैं, ताकि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया शुरू हो सके।

महत्व

कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय

  • संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रक्रियाओं में तथ्य-सत्यापन की भूमिका पर प्रश्न उठा है। इससे स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्टों की विश्वसनीयता का विषय सामने आया है।
  • भारत ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति दर्ज कर यह संकेत दिया है कि आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ों में सटीकता आवश्यक है।

कानूनी और संस्थागत

  • सुरक्षा परिषद की 1267 समिति द्वारा सूचीबद्ध व्यक्ति के संदर्भ में सूची-विवरण (narrative summary of reasons) को प्रमाणिक दस्तावेज़ माना जाता है। इसलिए उसके उद्धरण में सावधानी आवश्यक है।
  • इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस स्वयं गिरफ़्तारी का वारंट नहीं है। यह सदस्य देशों को सूचना और सतर्कता के लिए जारी होता है, जबकि गिरफ़्तारी और प्रत्यर्पण संबंधित देश की विधि और संधि-व्यवस्था पर निर्भर करते हैं।

आतंकवाद-निरोध नीति

  • यह प्रकरण दिखाता है कि आतंकवाद-निरोध में अंतरराष्ट्रीय सूचियां, इंटरपोल तंत्र और घरेलू अभियोजन एक साथ कार्य करते हैं।
  • सूचीबद्ध व्यक्ति के निवास और वांछितता के तथ्य अलग-अलग दस्तावेज़ों में होते हैं। इसलिए नीति-विश्लेषण में दोनों को संदर्भ सहित समझना आवश्यक है।

चुनौतियाँ

1. तथ्य-सत्यापन और रिपोर्टिंग की सटीकता

  • एक ही व्यक्ति के संदर्भ में अलग-अलग सूचियों और दस्तावेज़ों में भिन्न विवरण मिल सकते हैं। ऐसे में केवल एक पंक्ति को संदर्भ से अलग पढ़ने से गलत छवि बन सकती है।
  • विशेष प्रतिवेदकों की रिपोर्टों में स्रोत और सत्यापन की प्रक्रिया पर स्पष्टता न होने से संबंधित देशों की आपत्तियां बढ़ती हैं।

2. आतंकवाद-निरोध और मानवाधिकार का संतुलन

  • मानवाधिकार ढांचे का उपयोग आतंकवाद के आरोपियों के बचाव के लिए नहीं होना चाहिए, जबकि विधि के समक्ष समानता और निष्पक्ष प्रक्रिया भी बनी रहनी चाहिए।
  • आतंकवाद के औचित्य को अस्वीकार करते हुए भी मानवाधिकार-मानकों का पालन करना एक नैतिक और विधिक चुनौती है।

3. विशेष प्रतिवेदकों की स्वतंत्रता और जवाबदेही

  • विशेष प्रतिवेदक स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं, इसलिए उनके वित्तपोषण स्रोतों और हितों के खुलासे की मांग उठती रहती है।
  • स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाना संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।

4. भगोड़े अपराधियों के प्रत्यर्पण की सीमाएं

  • जो व्यक्ति किसी ऐसे देश में रहता है जिसके साथ प्रत्यर्पण संधि नहीं है या जहां सहयोग सीमित है, उसे वापस लाना कठिन होता है।
  • इंटरपोल नोटिस के बावजूद गिरफ़्तारी का निर्णय संबंधित देश की संप्रभुता और घरेलू विधि पर निर्भर करता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
तथ्यात्मक सटीकता संदर्भ से अलग उद्धृत पंक्ति से गलत निष्कर्ष निकल सकता है, जिससे संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ों की साख पर असर पड़ता है।
विशेष प्रतिवेदकों की जवाबदेही स्वतंत्रता के साथ पारदर्शी वित्तपोषण और आचार-मानकों की व्यवस्था न होने पर आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति बनती है।
आतंकवाद-निरोध बनाम मानवाधिकार मानवाधिकार-तर्कों का दुरुपयोग आतंकवादी नेटवर्क के संरक्षण के लिए नहीं होना चाहिए।
प्रत्यर्पण में बाधाएं सीमित संधि-संबंध और राजनयिक जटिलताएं भगोड़ों की वापसी में देरी करती हैं।
सूची-आधारित कार्रवाई की सीमाएं सुरक्षा परिषद की सूची में नाम होने से स्वतः गिरफ़्तारी नहीं होती। कार्यान्वयन घरेलू और द्विपक्षीय तंत्र पर निर्भर है।

आगे की राह

  • संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में संदर्भ-सहित तथ्य-सत्यापन की प्रक्रिया को सुदृढ़ किया जाए, ताकि सूची-विवरण का अधूरा उद्धरण न हो।
  • सुरक्षा परिषद की 1267 समिति के समक्ष सूचीबद्ध व्यक्तियों से संबंधित विवरणों पर औपचारिक और समयबद्ध स्पष्टीकरण का तंत्र विकसित हो।
  • विशेष प्रतिवेदकों के लिए आचार-संहिता, वित्तपोषण के खुलासे और निष्पक्षता के मानकों पर मानवाधिकार परिषद में संवाद बढ़े।
  • आतंकवाद की परिभाषा और उसके विरुद्ध सहयोग पर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (Comprehensive Convention on International Terrorism) पर सहमति के प्रयास तेज़ हों।
  • प्रत्यर्पण संधियों का विस्तार और मौजूदा संधियों के प्रभावी क्रियान्वयन पर द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाया जाए।
  • इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस के बाद की कानूनी प्रक्रिया, जैसे प्रत्यर्पण अनुरोध और साक्ष्य-प्रस्तुति, के लिए समन्वित घरेलू तंत्र सुदृढ़ हो।
  • आतंकवाद-निरोध में मानवाधिकार-मानकों और विधि के शासन का पालन सुनिश्चित करते हुए, सुरक्षा और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संयुक्त राष्ट्र विशेष प्रक्रियाएँ (UN Special Procedures) · विशेष प्रतिवेदक (Special Rapporteur) · आतंकवाद-रोधी और मानवाधिकार (Counter-Terrorism and Human Rights) · संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् प्रस्ताव 1267 (UNSC Resolution 1267) · प्रतिबंध समिति (Sanctions Committee) · रेड कॉर्नर नोटिस (Red Corner Notice) · अंतरराष्ट्रीय आपराधिक पुलिस संगठन (Interpol) · प्रत्यर्पण (Extradition) · गैर-कानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम, 1967 (Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967) · अनुच्छेद 253 (Article 253) · राज्य की संप्रभुता (State Sovereignty) · मानवाधिकार परिषद् की आचार संहिता (Code of Conduct for Mandate Holders)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और संधि-दायित्वों का सम्मान
  • अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधियों और निर्णयों को लागू करने की संसदीय शक्ति

अवधारणा प्रवाह

जुलाई में विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम को ‘भारत-आधारित’ बताया गया।  →  भारत ने संयुक्त राष्ट्र मिशन के माध्यम से तथ्यात्मक त्रुटियों पर आपत्ति दर्ज की।  →  सुरक्षा परिषद की 1267 सूची और उसके सूची-विवरण में भारत में वांछितता का उल्लेख होने का तर्क रखा गया।  →  इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस और प्रत्यर्पण का प्रयास अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से जारी रहता है।  →  आतंकवाद-निरोध और मानवाधिकार के संतुलन पर संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न उभरता है।  →  तथ्य-सत्यापन, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के सुदृढ़ीकरण से ऐसी विसंगतियों की संभावना घटती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् द्वारा विशेष प्रतिवेदक (Special Rapporteur) जैसे विशेष प्रक्रियाओं के धारक नियुक्त किए जाते हैं।
2. वे व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करते हैं और संयुक्त राष्ट्र से प्रत्यक्ष वेतन नहीं पाते।
3. वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रति सीधे उत्तरदायी होते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: विशेष प्रक्रियाओं के धारकों की नियुक्ति मानवाधिकार परिषद् द्वारा होती है। कथन 2 सही है: वे स्वतंत्र विशेषज्ञ के रूप में व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करते हैं और संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते। कथन 3 गलत है: उनकी जवाबदेही मानवाधिकार परिषद् और आचरण संहिता के प्रति है, न कि सुरक्षा परिषद् के प्रति।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस एक ऐसा अनुरोध है जिसके आधार पर किसी वांछित व्यक्ति का पता लगाकर उसे प्रत्यर्पण से पहले अस्थायी रूप से गिरफ्तार करने का आग्रह किया जाता है।
कारण (R): रेड कॉर्नर नोटिस इंटरपोल द्वारा जारी एक बाध्यकारी गिरफ्तारी वारंट है, जो सभी सदस्य देशों के न्यायालयों पर सीधे लागू होता है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:

  1. (a) A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. (b) A और R दोनों सत्य हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (c) A सत्य है, परंतु R असत्य है।
  4. (d) A असत्य है, परंतु R सत्य है।

उत्तर: (c) A सत्य है, परंतु R असत्य है। — कथन (A) सही है: रेड कॉर्नर नोटिस प्रत्यर्पण लंबित रहने तक अस्थायी गिरफ्तारी का अनुरोध होता है। कारण (R) गलत है: यह बाध्यकारी गिरफ्तारी वारंट नहीं है, बल्कि सदस्य देशों के लिए अनुरोध या सूचना है। राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत गिरफ्तारी का वास्तविक आधार देश का अपना कानून और न्यायिक प्रक्रिया ही होती है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलन कीजिए:
स्तंभ I
1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् प्रस्ताव 1267 की समिति
2. मानवाधिकार परिषद् की आचार संहिता (2007)
3. गैर-कानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम, 1967
4. अनुच्छेद 253

स्तंभ II
a. संयुक्त राष्ट्र विशेष प्रक्रियाओं के धारकों के लिए स्वतंत्रता, निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा के मानक
b. अल-कायदा और उससे संबद्ध व्यक्तियों व संस्थाओं पर प्रतिबंध व्यवस्था की निगरानी
c. अंतरराष्ट्रीय संधियों और निर्णयों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधि-निर्माण शक्ति
d. भारत में व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने का विधिक ढाँचा

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-b, 2-a, 3-d, 4-c
  2. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  3. 1-b, 2-c, 3-a, 4-d
  4. 1-d, 2-a, 3-b, 4-c

उत्तर: 1-b, 2-a, 3-d, 4-c — 1-b: प्रस्ताव 1267 की समिति अल-कायदा से संबद्ध व्यक्तियों पर प्रतिबंध व्यवस्था देखती है। 2-a: 2007 की आचार संहिता विशेष प्रक्रियाओं के धारकों के आचरण के मानक तय करती है। 3-d: UAPA, 1967 के अंतर्गत व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान है। 4-c: अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए विधि बनाने की शक्ति देता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रक्रियाओं के धारक स्वतंत्र विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते हैं, फिर भी उनके प्रतिवेदन आतंकवाद-रोधी व्यवस्थाओं की विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रभावित कर सकते हैं। इस कथन की विवेचनात्मक समीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि जब किसी प्रतिवेदन में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हों, तो संबंधित राज्य के पास कौन-से उपाय उपलब्ध हैं और वे कितने प्रभावी हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (कुल लगभग 250 शब्द):

1. भूमिका: समाचार का संदर्भ। भारत के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने आतंकवाद-रोधी और मानवाधिकार पर विशेष प्रतिवेदक बेन सॉल (Ben Saul) के जुलाई के प्रतिवेदन में दाऊद इब्राहिम को ‘भारत-आधारित’ बताने पर आपत्ति जताई। आपत्ति का आधार यह था कि वह 1993 के आतंकी हमलों के संदर्भ में भारत में वांछित है, उसके विरुद्ध इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस है, और उसे 2003 में सुरक्षा परिषद् की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था में सूचीबद्ध किया गया था (समाचार के अनुसार)।

2. विशेष प्रक्रियाओं की संरचना और स्वतंत्रता:
– उत्पत्ति: संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद् (ECOSOC) का 1967 का प्रस्ताव 1235 विषयगत प्रक्रियाओं की नींव माना जाता है।
– मानवाधिकार परिषद् का संस्थागत ढाँचा (2006, प्रस्ताव 5/1) और आचरण संहिता (2007, प्रस्ताव 5/2): स्वतंत्रता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और विशेषज्ञता के मानक।
– वेतन और कार्यप्रणाली: वे संयुक्त राष्ट्र के सदस्य या कर्मचारी नहीं होते; व्यक्तिगत क्षमता में कार्य करते हैं; संचार (communications), देश-दौरे और वार्षिक प्रतिवेदन उनके प्रमुख साधन हैं।

3. तनाव का विश्लेषण:
– मानवाधिकार बनाम आतंकवाद-रोधी: ICCPR (1966; भारत द्वारा 1979 में अनुसमर्थित) के अनुच्छेद 9 (स्वतंत्रता) और आतंकवाद-रोधी उपायों के बीच संतुलन का प्रश्न।
– सुरक्षा परिषद् की प्रतिबंध व्यवस्था बनाम मानवाधिकार प्रतिवेदन: एक ही व्यक्ति पर दो भिन्न संस्थागत दृष्टिकोण; 1267 सूची में विवरण (narrative summary of reasons) की स्पष्टता का महत्व।
– तथ्यात्मक सटीकता: ‘भारत-आधारित’ जैसे शब्द-प्रयोग का अर्थ और प्रभाव; यह प्रश्न कि किसी संदर्भ के बिना प्रस्तुत तथ्य कैसे भ्रम उत्पन्न करते हैं।

4. उपलब्ध उपाय और उनकी प्रभावशीलता:
– प्रतिवाद (right of reply) और मानवाधिकार परिषद् के सत्रों में राज्य का हस्तक्षेप।
– सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) की प्रक्रिया द्वारा संवाद।
– संयुक्त राष्ट्र के भीतर औपचारिक संवाद व कूटनीतिक आपत्ति; प्रतिबंध सूची के संबंध में सुरक्षा परिषद् के समक्ष प्रक्रियात्मक राहत (जैसे प्रस्ताव 1904, 2009 द्वारा 1267 व्यवस्था में ओम्बड्समैन कार्यालय, जो सूची-हटाने के आवेदनों से संबंधित है)।
– सीमाएँ: विशेषज्ञ के प्रतिवेदन को बाध्यकारी रूप से वापस लेने या संशोधित करने का कोई सीधा तंत्र नहीं है; प्रभाव मुख्यतः नैतिक और कूटनीतिक है।

5. राष्ट्रीय संदर्भ: भारत में गैर-कानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम, 1967 के अंतर्गत आतंकवादी घोषणा; अनुच्छेद 253 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के कार्यान्वयन हेतु संसद की शक्ति; अनुच्छेद 51 (ग) के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति सम्मान का राज्य-नीति निर्देशक सिद्धांत।

6. संतुलित निष्कर्ष: विशेष प्रक्रियाओं की स्वतंत्रता अनिवार्य है, पर स्वतंत्रता के साथ तथ्यात्मक सत्यनिष्ठा और संदर्भ-आधारित प्रस्तुति भी उतनी ही आवश्यक है। सुधार हेतु संवाद, साक्ष्य-आधारित पुनरीक्षण और पारदर्शी आपत्ति-प्रक्रिया उपयोगी हो सकती है।

स्रोत: orissapost.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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