ब्रिक्स संसदीय मंच का 12वाँ सत्र कल शुरू होगा: प्रमुख बिंदु

ब्रिक्स संसदीय मंच का 12वाँ सत्र कल शुरू होगा: प्रमुख बिंदु

ब्रिक्स संसदीय मंच का 12वाँ सत्र कल शुरू होगा: प्रमुख बिंदु

✎ BRICS संसदीय मंच सदस्य देशों के विधायकों का गैर-बाध्यकारी संवाद मंच है, जो सरकारी BRICS ढांचे का पूरक है और संसदीय कूटनीति का माध्यम है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत के हित में क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; BRICS की भूमिका)  |  GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था (संसद की संरचना, विधायिका के कार्य और पीठासीन अधिकारियों की भूमिका)
  • Prelims: BRICS: ब्रिक्स के सदस्य देश (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका) और इसके विस्तारित सदस्य, संसदीय मंच बनाम सरकारी शिखर सम्मेलन: दोनों का अलग कार्यक्षेत्र, अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union, IPU) और इसकी स्थापना, संसद भवन परिसर (नया संसद भवन, 2023 में उद्घाटित), अनुच्छेद 79 (संघीय संसद की संरचना), अनुच्छेद 93 (लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव), न्यू डेवलपमेंट बैंक (New Development Bank, NDB) का मुख्यालय शंघाई में होना, आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement, CRA)
  • Essay: बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संसदीय कूटनीति की बढ़ती भूमिका, अंतरराष्ट्रीय सहयोग में विधायिकाएँ: घोषणाओं से कार्यान्वयन तक की चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: BRICS संसदीय मंच सदस्य देशों के विधायकों का गैर-बाध्यकारी संवाद मंच है, जो सरकारी BRICS ढांचे का पूरक है और संसदीय कूटनीति का माध्यम है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की विज्ञप्ति के अनुसार 12वाँ BRICS संसदीय मंच संसद भवन परिसर में अगले दिन उद्घाटित होने वाला है। यह समाचार इस बात की सूचना देता है कि BRICS सदस्य देशों के संसदीय प्रतिनिधि एक मंच पर एकत्र होकर आपसी संवाद और सहयोग पर चर्चा करेंगे। विज्ञप्ति में कार्यक्रम के विषय, एजेंडा और प्रतिभागी देशों जैसे विवरण नहीं दिए गए हैं, इसलिए परीक्षा की दृष्टि से इस समाचार को मंच के आयोजन और संसदीय कूटनीति की संस्थागत भूमिका के संदर्भ में समझना उपयोगी है।

पृष्ठभूमि

  • BRICS की उत्पत्ति: ‘BRIC’ शब्द का प्रयोग 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह के लिए किया था। इस समूह ने 2009 में पहले औपचारिक शिखर सम्मेलन के साथ राजनयिक स्वरूप लिया और 2010 में दक्षिण अफ़्रीका के जुड़ने से इसका वर्तमान नाम BRICS हुआ।
  • BRICS की संस्थागत संरचना: न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना 2014 में हुई, जिसका मुख्यालय शंघाई में है। आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (CRA) 2015 में सहमत हुई, जो भुगतान संतुलन संकट की स्थिति में तरलता सहायता का प्रावधान करती है।
  • संसदीय आयाम: BRICS के भीतर सरकारी स्तर के शिखर सम्मेलनों और मंत्रिस्तरीय बैठकों के समानांतर संसदीय मंच भी कार्य करते हैं, जहाँ विधायक एक-दूसरे के अनुभव और नीतिगत दृष्टिकोण साझा करते हैं।
  • भारतीय संसद की संरचना: संसद में राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा सम्मिलित हैं (अनुच्छेद 79)। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति जैसे पीठासीन अधिकारी ऐसे अंतरसंसदीय आयोजनों में भारतीय संसद का प्रतिनिधित्व करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • नया संसद भवन: संसद का नया भवन 28 मई 2023 को उद्घाटित हुआ, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के सम्मेलनों की व्यवस्था है।

BRICS संसदीय मंच क्या है?

  • संसदीय मंच BRICS सदस्य देशों के विधायकों का एक ऐसा मंच है जहाँ वे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं। यह सरकारी कूटनीति का पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं।
  • संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) का अर्थ है विधायिकाओं के माध्यम से देशों के बीच संवाद, विश्वास-निर्माण और जन-प्रतिनिधियों के स्तर पर सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अंतर-संसदीय संघ (IPU) जैसे वैश्विक मंच भी संसदीय कूटनीति के इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं, जिनकी स्थापना 1889 में हुई थी।
  • संसदीय मंच की घोषणाएँ और प्रस्ताव सामान्यतः गैर-बाध्यकारी होते हैं। इनका प्रभाव नीति-निर्माण पर परोक्ष रूप से पड़ता है।
  • अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों और निर्णयों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। परंतु संसदीय मंच की सामान्य बैठकें ऐसी बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ उत्पन्न नहीं करतीं।
  • भारत के लिए ऐसे मंच बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपनी स्थिति रखने, विकास सहयोग की चर्चा करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अनुभव साझा करने का अवसर प्रदान करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
आयोजन का स्वरूप ब्रिक्स (BRICS) सदस्य देशों के विधायी निकायों के प्रतिनिधियों का संसदीय स्तर का संवाद मंच है। यह शासनाध्यक्षों और मंत्रिस्तरीय बैठकों से अलग, विधायी आयाम का मंच है।
आयोजन स्थल संसद भवन परिसर (Parliament House Complex), नई दिल्ली में आयोजन से विधायी संस्था की मेज़बानी और उसका प्रतीकात्मक महत्व स्पष्ट होता है।
क्रम संख्या 12वाँ संस्करण मंच की निरंतरता और संस्थागत विकास का संकेत देता है। ऐसे मंच नियमित अंतराल पर बैठकों से परिपक्व होते हैं।
संसदीय कूटनीति विधायी प्रतिनिधियों के बीच सीधा संवाद कार्यपालिका-स्तरीय कूटनीति का पूरक है। इससे विश्वास-निर्माण और नीतिगत समझ बढ़ती है।
कानूनी प्रकृति इस मंच के निर्णय सामान्यतः सलाहकारी और सहयोगात्मक होते हैं। ये किसी अंतरराष्ट्रीय संधि की तरह सदस्य देशों पर बाध्यकारी नहीं होते।

महत्व

कूटनीतिक एवं सामरिक

  • बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स के भीतर विधायी स्तर पर संवाद से सदस्य देशों के बीच विश्वास और समझ बढ़ती है।
  • भारत की विदेश नीति में बहुपक्षवाद और संसदीय कूटनीति के उपकरण की भूमिका स्पष्ट होती है।
  • विधायी प्रतिनिधियों के स्तर पर संवाद कार्यपालिका की वार्ताओं के लिए अनौपचारिक आधार तैयार कर सकता है।

संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक

  • संसद का विदेश नीति से जुड़े विमर्श में सक्रिय सहभागी होना संसदीय लोकतंत्र की व्यापक भूमिका को दर्शाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय विधायी मंचों पर भागीदारी से सांसदों को विभिन्न शासन-प्रणालियों के अनुभव समझने का अवसर मिलता है।

आर्थिक एवं विकासात्मक (अप्रत्यक्ष)

  • विधायी स्तर पर आर्थिक सहयोग, विकास और सतत विकास से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श नीति-निर्माण की समझ को समृद्ध कर सकता है।
  • ब्रिक्स के आर्थिक सहयोग ढाँचों के लिए विधायी समर्थन और घरेलू अनुमोदन की प्रक्रिया को समझने में यह मंच सहायक है।

चुनौतियाँ

1. बाध्यकारी शक्ति का अभाव

  • मंच की घोषणाएँ और प्रस्ताव सामान्यतः सलाहकारी होते हैं, इसलिए उनके क्रियान्वयन की कोई स्वचालित व्यवस्था नहीं होती।
  • परिणामों को ठोस नीतिगत कदमों में बदलने के लिए घरेलू विधायी और कार्यपालिका स्तर पर अलग प्रक्रिया आवश्यक होती है।

2. सदस्य देशों के शासन-ढाँचों में भिन्नता

  • ब्रिक्स के सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएँ, विधायी प्रक्रियाएँ और संसदीय परंपराएँ अलग-अलग हैं।
  • इस विविधता के कारण साझा विषयों पर सहमति बनाना और संवाद की भाषा तय करना जटिल हो जाता है।

3. सदस्यता विस्तार से सहमति-निर्माण की जटिलता

  • ब्रिक्स की सदस्यता के विस्तार से हितों की विविधता बढ़ी है, जिससे साझा रुख तय करना कठिन हुआ है।
  • आर्थिक विकास के स्तर और प्राथमिकताओं में अंतर संवाद के एजेंडा को प्रभावित करता है।

4. प्रतीकात्मकता बनाम ठोस परिणाम

  • ऐसे मंचों पर होने वाली चर्चा का मूल्यांकन अक्सर भागीदारी और घोषणाओं के आधार पर होता है, न कि मापने योग्य परिणामों के आधार पर।
  • परिणाम-आधारित सहयोग और निगरानी तंत्र के अभाव में मंच की दीर्घकालिक उपयोगिता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
बाध्यकारी शक्ति का अभाव घोषणाएँ सलाहकारी होने से उनके क्रियान्वयन की गारंटी नहीं होती।
शासन-प्रणालियों में भिन्नता विधायी परंपराओं और प्रक्रियाओं के अंतर से साझा सहमति कठिन होती है।
सदस्यता विस्तार बढ़े हुए हितों और प्राथमिकताओं से एजेंडा तय करना जटिल हो जाता है।
परिणामों की माप भागीदारी और घोषणाओं के आधार पर मूल्यांकन होने से ठोस उपलब्धि का आकलन सीमित रहता है।

आगे की राह

  • मंच की घोषणाओं के लिए स्पष्ट फॉलो-अप तंत्र बने, ताकि सहमत बिंदुओं की प्रगति की नियमित समीक्षा हो सके।
  • विषयगत समितियों के माध्यम से व्यापार, विकास और सतत विकास जैसे विषयों पर तकनीकी स्तर का विधायी विमर्श हो।
  • सदस्य देशों की विधायी शोध सेवाओं के बीच सूचना और अनुभवों के आदान-प्रदान की व्यवस्था विकसित की जाए।
  • द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संसदीय समूहों के बीच नियमित बैठकों का कैलेंडर तय हो, ताकि संवाद में निरंतरता बनी रहे।
  • परिणाम-आधारित मूल्यांकन के लिए सहयोग के क्षेत्रों और संकेतकों की पहचान की जाए।
  • युवा सांसदों और महिला सांसदों की भागीदारी बढ़ाकर मंच को व्यापक प्रतिनिधित्व वाला बनाया जाए।
  • नीति-निर्माण में संसदीय कूटनीति के उपकरणों को कार्यपालिका की विदेश नीति के साथ समन्वित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) · ब्रिक्स (BRICS) · बहुपक्षीयता (Multilateralism) · दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) · अनुच्छेद 51 (Article 51) · अनुच्छेद 253 (Article 253) · संघ सूची की प्रविष्टि 14 (Entry 14 of the Union List) · अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union) · नरम शक्ति (Soft Power) · संधि और करार (Treaties and Agreements) · विदेश नीति में विधायी भूमिका (Legislative Role in Foreign Policy) · नई विकास बैंक (New Development Bank)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 79: संसद की संरचना; मेज़बान विधायी संस्था

अवधारणा प्रवाह

ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच बहुपक्षीय सहयोग का विस्तार होता है।  →  सहयोग के विधायी आयाम के रूप में संसदीय स्तर का मंच आवश्यक होता है।  →  12वें संस्करण का आयोजन संसद भवन परिसर में होता है, जिससे संस्थागत निरंतरता दिखती है।  →  विधायी प्रतिनिधियों के बीच संवाद से विश्वास-निर्माण और नीतिगत समझ बनती है।  →  संवाद के परिणाम सलाहकारी घोषणाओं के रूप में सामने आते हैं।  →  घोषणाओं को ठोस नीति में बदलने के लिए घरेलू विधायी और कार्यपालिका प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं।  →  परिणामों की समीक्षा से मंच की दीर्घकालिक उपयोगिता तय होती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ब्रिक्स के पाँच मूल सदस्य देश ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं।
2. नई विकास बैंक (New Development Bank) का मुख्यालय शंघाई में स्थित है।
3. भारत के संविधान का अनुच्छेद 253 संसद को किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या निर्णय के क्रियान्वयन के लिए विधि बनाने की शक्ति देता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं, क्योंकि कोई भी कथन सही नहीं है

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन (BRIC) के साथ दक्षिण अफ्रीका 2010 में जुड़ा और समूह ब्रिक्स बना। कथन 2 सही है: नई विकास बैंक का मुख्यालय शंघाई में है और इसकी स्थापना ब्रिक्स देशों के समझौते से हुई। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय समझौतों के क्रियान्वयन हेतु विधि बनाने की शक्ति देता है। अतः विकल्प ‘तीनों’ सही है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए।

अभिकथन (A): संसदीय मंचों, जैसे ब्रिक्स संसदीय मंच, द्वारा जारी घोषणाएँ सरकारों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी दायित्व उत्पन्न नहीं करतीं।

कारण (R): ऐसी घोषणाएँ अंतरराष्ट्रीय संधि का स्वरूप नहीं रखतीं और प्रतिनिधिमंडलों की सर्वसम्मति से अपनाई जाती हैं।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — संसदीय मंचों के निष्कर्ष प्रायः घोषणाओं या प्रस्तावों के रूप में होते हैं, जो विधिक रूप से बाध्यकारी संधि नहीं होते। इनका गैर-बाध्यकारी स्वरूप इसलिए है क्योंकि ये विधायकों के प्रतिनिधि मंडलों की सहमति से अपनाए जाते हैं और इनमें कोई अंतरराष्ट्रीय विधिक दायित्व नहीं बनता। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:

सूची I (संस्था/व्यवस्था)
1. नई विकास बैंक
2. आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement)
3. अंतर-संसदीय संघ
4. अनुच्छेद 253

सूची II (विशेषता)
A. जेनेवा स्थित अंतरराष्ट्रीय संगठन, जो संसदों का वैश्विक संगठन है
B. संसद को अंतरराष्ट्रीय समझौतों के क्रियान्वयन हेतु विधि बनाने की शक्ति देने वाला संवैधानिक उपबंध
C. शंघाई में मुख्यालय वाला बहुपक्षीय विकास बैंक
D. ब्रिक्स देशों की भुगतान-संतुलन संबंधी संकट में सहायता के लिए बनाई गई आपातकालीन तरलता व्यवस्था

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-B, 2-D, 3-A, 4-C
  2. 1-C, 2-D, 3-A, 4-B
  3. 1-C, 2-A, 3-D, 4-B
  4. 1-A, 2-B, 3-C, 4-D

उत्तर: 1-C, 2-D, 3-A, 4-B — नई विकास बैंक (1) का मुख्यालय शंघाई में है, इसलिए 1-C। आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (2) ब्रिक्स देशों की तरलता सहायता व्यवस्था है, इसलिए 2-D। अंतर-संसदीय संघ (3) जेनेवा स्थित है, इसलिए 3-A। अनुच्छेद 253 (4) संसद की विधायी शक्ति से जुड़ा उपबंध है, इसलिए 4-B।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) को विदेश नीति के औपचारिक तंत्र का पूरक माना जाता है, किंतु इसकी संवैधानिक सीमाएँ भी स्पष्ट हैं। ब्रिक्स संसदीय मंच जैसे बहुपक्षीय विधायी मंचों की भूमिका की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। इसके साथ यह भी बताइए कि इन मंचों के निष्कर्षों के गैर-बाध्यकारी स्वरूप से सरकारों की विदेश नीति संबंधी स्वायत्तता और संसदीय उत्तरदायित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON: (1) भूमिका: ब्रिक्स (BRICS) की स्थापना और सदस्यता का विस्तार; 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का भारत के संसद भवन परिसर में आयोजन; संसदीय कूटनीति की अवधारणा और अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union, 1889, जेनेवा) का उल्लेख। (2) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 51 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय शांति और सम्मानपूर्ण संबंधों का राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व के रूप में उपबंध; संघ सूची की प्रविष्टि 14 (संधियाँ और करार) के अंतर्गत संघीय कार्यपालिका की प्रमुख भूमिका; अनुच्छेद 253 के अंतर्गत संसद की विधायी शक्ति जो अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु कानून बनाने की अनुमति देती है; अनुच्छेद 246 के अंतर्गत विधायी विषयों का बँटवारा। (3) संरचनात्मक तथ्य: संसदीय मंचों के निष्कर्ष प्रायः घोषणा-पत्र के रूप में होते हैं, जो सरकारों पर विधिक दायित्व नहीं डालते; नई विकास बैंक और आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था जैसे ब्रिक्स वित्तीय तंत्र कार्यकारी स्तर पर संचालित होते हैं। (4) पक्ष में तर्क: नरम शक्ति (Soft Power) की अवधारणा (जोसेफ नाई) के अनुसार विधायकों के बीच संवाद से जनमत, पारदर्शिता और आपसी विश्वास बढ़ता है; दक्षिण-दक्षिण सहयोग में लोकतांत्रिक वैधता का संवर्धन; विधायी स्तर पर नीति-समन्वय और सदस्य देशों के कानूनों के तुलनात्मक अध्ययन की संभावना। (5) विपक्ष में तर्क और सीमाएँ: गैर-बाध्यकारी स्वरूप से जवाबदेही का अभाव; कार्यपालिका के एकाधिकार वाले विदेश नीति क्षेत्र में विधायी हस्तक्षेप की सीमित संवैधानिक गुंजाइश; कार्यकारी शिखर सम्मेलनों के समानांतर मंचों के बीच दोहराव और संसाधनों का व्यय; सदस्य देशों के लोकतांत्रिक स्तर में भिन्नता से संवाद की गुणवत्ता पर असर। (6) विश्लेषण: संसदीय मंच कार्यपालिका की विदेश नीति को प्रतिस्थापित नहीं करते, बल्कि उसके पूरक हैं; अनुच्छेद 253 के अंतर्गत बने कानून से पहले कार्यपालिका की संधि-प्रक्रिया और संसदीय पुष्टि का अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है। (7) निष्कर्ष: संस्थागत सचिवालय, निष्कर्षों के अनुवर्ती तंत्र और संसदीय समितियों की भागीदारी से इन मंचों की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सकती है; संतुलित और सुनिश्चित भूमिका के साथ ही ये बहुपक्षीय कूटनीति को लोकतांत्रिक आधार दे सकते हैं।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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