27 Oct राज्यसभा अध्यक्ष ने रूसी संसदीय प्रतिनिधिमंडल से की बैठक, जानिए मुख्य बिंदु
✎ संसदीय कूटनीति विधायिकाओं के बीच संस्थागत संवाद है, जो कार्यपालिका की विदेश नीति का पूरक है; राज्यसभा का सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है (अनुच्छेद 64)।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजनीति (Polity): संसद की संरचना, द्विसदनीय व्यवस्था, राज्यसभा के सभापति की भूमिका (अनुच्छेद 64, 89) | GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations): भारत-रूस द्विपक्षीय संबंध, संसदीय कूटनीति, बहुपक्षीय मंच
- Prelims: राज्यसभा के सभापति (Chairman of Rajya Sabha) और उपराष्ट्रपति का पद, अनुच्छेद 64 एवं अनुच्छेद 89, राज्य ड्यूमा (State Duma) और संघीय परिषद (Federation Council), रूस की संघीय सभा (Federal Assembly of Russia), अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union), ब्रिक्स संसदीय मंच (BRICS Parliamentary Forum), भारत-रूस विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी (Special and Privileged Strategic Partnership)
- Essay: संसदीय कूटनीति: लोकतांत्रिक देशों के बीच विश्वास और संवाद का सशक्त माध्यम, विधायिकाओं के बीच सहयोग से वैश्विक शासन और द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूती
त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय कूटनीति विधायिकाओं के बीच संस्थागत संवाद है, जो कार्यपालिका की विदेश नीति का पूरक है; राज्यसभा का सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है (अनुच्छेद 64)।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत के संसद के उच्च सदन, राज्यसभा के सभापति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने रूस की संसद के निचले सदन, राज्य ड्यूमा के सभापति के नेतृत्व में आए रूसी संसदीय प्रतिनिधिमंडल से भेंट की। ऐसी द्विपक्षीय संसदीय बैठकें दोनों देशों की विधायिकाओं के बीच संस्थागत संवाद को बनाए रखने का प्रमुख माध्यम होती हैं। इसे कार्यपालिका की विदेश नीति से अलग, किंतु उसकी पूरक, संसदीय कूटनीति के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। यह समाचार इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह भारत की संसदीय व्यवस्था और रूस की संघीय संसदीय संरचना के बीच तुलना तथा सहयोग के अवसर सामने लाता है।
पृष्ठभूमि
- भारत और रूस के बीच 2000 में सामरिक साझेदारी (Strategic Partnership) की घोषणा हुई, जिसे 2010 में विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया।
- संसदीय कूटनीति द्विपक्षीय संबंधों का वह आयाम है जिसमें दो देशों के निर्वाचित प्रतिनिधि सीधे संवाद करते हैं। यह कार्यपालिका के औपचारिक राजनयिक चैनलों के समानांतर काम करती है।
- भारत में संसद के दोनों सदनों के सभापति/अध्यक्ष अंतर-संसदीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, जैसे अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union) और ब्रिक्स संसदीय मंच।
- ब्रिक्स संसदीय मंच ब्रिक्स देशों की विधायिकाओं का वार्षिक सहयोग-मंच है, जिसकी 12वीं बैठक नई दिल्ली में आयोजित हुई, जैसा कि लोक सभा सचिवालय की विज्ञप्ति से स्पष्ट है।
- रूस की संघीय सभा (Federal Assembly) दो सदनों से बनी है: निचला सदन राज्य ड्यूमा और उच्च सदन संघीय परिषद।
संसदीय कूटनीति क्या है?
- संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) से आशय उन औपचारिक और अनौपचारिक संपर्कों से है जिनमें विधायिकाएँ एक-दूसरे के साथ संवाद, समझ और सहयोग विकसित करती हैं।
- इसके प्रमुख उपकरण हैं: द्विपक्षीय संसदीय मैत्री समूह, प्रतिनिधिमंडलों का आदान-प्रदान, अंतर-संसदीय संघ जैसे बहुपक्षीय मंच तथा सभापति/अध्यक्ष स्तर की भेंट।
- राज्यसभा संविधान के अनुच्छेद 80 के अंतर्गत संघीय ढाँचे का प्रतिनिधित्व करने वाला उच्च सदन है। इसके सदस्य राज्यों की विधान सभाओं द्वारा एकल संक्रमणीय मत पद्धति से निर्वाचित होते हैं।
- राज्यसभा का सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है (अनुच्छेद 64)। वह सदन की कार्यवाही का संचालन करता है और उच्च सदन की गरिमा तथा संसदीय परंपराओं का संरक्षक होता है।
- राज्यसभा एक स्थायी सदन है; इसके सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष होता है और हर दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य निवृत्त होते हैं।
- रूस की राज्य ड्यूमा निचला सदन है, जिसके सदस्य प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते हैं; संघीय परिषद उच्च सदन है जिसमें रूस के प्रत्येक घटक इकाई से प्रतिनिधि होते हैं। दोनों सदनों की शक्तियाँ और संरचना भारत से भिन्न हैं, इसलिए तुलनात्मक अध्ययन में यह अंतर स्पष्ट रखें।
- भारत-रूस संबंधों में संसदीय संवाद का महत्व इस कारण है कि यह दीर्घकालिक, दलगत परिवर्तनों से अपेक्षाकृत स्वतंत्र, संस्थागत विश्वास का निर्माण करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| भेंट का स्वरूप (Nature of Meeting) | राज्यसभा के सभापति श्री सी. पी. राधाकृष्णन और रूसी संघ की राज्य ड्यूमा (State Duma) के सभापति के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई यह भेंट संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) का उदाहरण है। इसमें सरकारों के बजाय विधायी संस्थाएँ सीधे संवाद करती हैं। |
| संवैधानिक पद की भूमिका | राज्यसभा के सभापति के रूप में वे उच्च सदन की ओर से संवाद करते हैं। इसलिए यह भेंट उच्च सदन के अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की संस्थागत परंपरा को दर्शाती है। |
| राज्य ड्यूमा की स्थिति | राज्य ड्यूमा रूस की संघीय सभा (Federal Assembly) का निम्न सदन है, जबकि फ़ेडरेशन काउंसिल (Federation Council) उच्च सदन है। इस संरचना की तुलना से भारतीय द्विसदनीय संसद के साथ तुलनात्मक अध्ययन का अवसर मिलता है। |
| द्विपक्षीय संबंधों का आयाम | भारत-रूस संबंध बहुआयामी हैं। संसदीय स्तर का संवाद कार्यपालिका-स्तरीय संबंधों को पूरक बनाता है और विधायी सहयोग के नए मार्ग खोलता है। |
| बहुपक्षीय मंचों से जुड़ाव | संसदीय संवाद अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union) जैसे बहुपक्षीय मंचों और BRICS संसदीय मंच जैसी पहलों की भावना से जुड़ा है, जिसकी चर्चा हाल के स्रोतों में भी हुई है। |
महत्व
कूटनीतिक महत्व
- संसदीय कूटनीति उन स्तरों पर संवाद खोलती है जहाँ कार्यपालिका के स्तर पर औपचारिक वार्ता सीमित रहती है।
- विधायी प्रतिनिधिमंडलों की आपसी समझ से द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास और निरंतरता बनी रहती है।
- भारत की विदेश नीति में संसद की भागीदारी से नीति-निर्माण में लोकतांत्रिक वैधता और पारदर्शिता बढ़ती है।
संस्थागत महत्व
- राज्यसभा सचिवालय के माध्यम से ऐसी भेंटों का आयोजन संसद की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को संस्थागत रूप देता है।
- सभापति का पद संविधान द्वारा परिभाषित है, इसलिए उनकी विदेशी प्रतिनिधिमंडलों से भेंट संवैधानिक दायित्वों के सहज विस्तार के रूप में देखी जा सकती है।
- द्विसदनीय विधायी संरचनाओं के बीच अनुभव-साझाकरण से विधायी प्रक्रियाओं और संसदीय नियमों के सुधार में सहायता मिलती है।
रणनीतिक और आर्थिक महत्व
- भारत-रूस संबंधों में ऊर्जा, प्रतिरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। संसदीय संवाद इन विषयों पर विधायी समझ को व्यापक बना सकता है।
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संसदीय मंच अलग-अलग देशों के बीच समन्वय के लिए वैकल्पिक चैनल प्रदान करते हैं।
चुनौतियाँ
1. संसदीय कूटनीति की सीमाएँ
- संसदीय भेंटों के निर्णय बाध्यकारी नहीं होते। उनका प्रभाव प्रायः सद्भावना और संवाद तक सीमित रहता है।
- विदेश नीति का अंतिम अधिकार कार्यपालिका के पास है, इसलिए संसदीय संवाद को औपचारिक नीति-परिणामों से जोड़ना कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के हित में विदेश नीति; संसद और राज्य विधानमंडल की भूमिका
2. बहुपक्षीय संतुलन की चुनौती
- एक साथ कई देशों और समूहों से संबंध बनाए रखने में संतुलन साधना आवश्यक होता है।
- किसी एक देश के साथ घनिष्ठ संसदीय संबंध अन्य साझेदारों की धारणाओं को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए संतुलित संवाद आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के पड़ोसी देश और प्रमुख शक्तियों से संबंध; भारत की गुटनिरपेक्ष से बहु-संरेखण नीति
3. संसदीय विमर्श की पारदर्शिता
- विदेशी प्रतिनिधिमंडलों से भेंट के एजेंडा और परिणामों का सार्वजनिक विवरण सीमित होता है, जिससे नागरिक-स्तर पर समझ कम बनती है।
- संसदीय समितियों की विदेश संबंधी भूमिका अभी अपेक्षाकृत सीमित है, जिससे दीर्घकालिक नीति-विमर्श में कमी रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही; संसदीय समितियों की भूमिका
4. प्रतिनिधिमंडलों के समन्वय की व्यावहारिक समस्या
- विभिन्न देशों की विधायी प्रणालियाँ, प्रक्रियाएँ और शब्दावली भिन्न होती हैं, जिससे संवाद का स्तर सीमित हो सकता है।
- बहुपक्षीय मंचों पर प्रस्तावों की भाषा और अनुवाद की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और भारत की भूमिका; GS-2: शासन के संस्थागत पक्ष
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| संसदीय संवाद की बाध्यता | भेंटों के परिणाम प्रायः सैद्धांतिक सहमति तक सीमित रहते हैं और उन्हें ठोस नीति-कार्यान्वयन से जोड़ना कठिन होता है। |
| कार्यपालिका और विधायिका का समन्वय | विदेश नीति में कार्यपालिका की प्रधानता के कारण संसदीय पहल और सरकारी नीति के बीच तालमेल बनाना चुनौतीपूर्ण रहता है। |
| बहुपक्षीय संतुलन | अनेक शक्ति-केंद्रों से संबंध बनाए रखते समय रणनीतिक स्वायत्तता और साझेदारी के बीच संतुलन आवश्यक है। |
| सार्वजनिक जानकारी का अभाव | भेंटों के एजेंडा और निष्कर्षों की व्यापक जानकारी न होने से नागरिक विमर्श और शोध-आधारित समझ सीमित रहती है। |
| प्रक्रियागत अंतर | दो देशों की संसदीय प्रक्रियाओं, नियमों और समिति-तंत्र में अंतर के कारण व्यावहारिक सहयोग धीमा हो सकता है। |
आगे की राह
- संसदीय भेंटों के बाद संक्षिप्त और सार्वजनिक विवरण जारी किया जाए, ताकि विमर्श और शोध के लिए तथ्य उपलब्ध हों।
- द्विपक्षीय संसदीय मित्रता समूहों की नियमित बैठकों और विषय-आधारित कार्यशालाओं को संस्थागत रूप दिया जाए।
- अंतर-संसदीय संघ जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारतीय संसद की सक्रिय भागीदारी और समन्वित प्रस्ताव-निर्माण को बढ़ाया जाए।
- विदेश संबंधी विषयों पर संसदीय समितियों की भूमिका को सुदृढ़ किया जाए, ताकि दीर्घकालिक नीति-विमर्श में विधायी दृष्टिकोण शामिल हो सके।
- विधायी प्रक्रियाओं, समिति-प्रणालियों और डिजिटल संसदीय सेवाओं के अनुभव-आदान-प्रदान के लिए तकनीकी स्तर के संवाद को बढ़ाया जाए।
- भेंटों के परिणामों को कार्यपालिका की नीति-प्रक्रिया से जोड़ने हेतु संसद और विदेश मंत्रालय के बीच नियमित समन्वय तंत्र विकसित किया जाए।
- आपसी सम्मान और संप्रभु समानता के सिद्धांतों के आधार पर संवाद को बनाए रखा जाए, ताकि द्विपक्षीय विश्वास दीर्घकालिक हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) · राज्यसभा (Rajya Sabha) · अनुच्छेद 80 (Article 80) · अनुच्छेद 105 (Article 105) · अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union) · संसदीय मैत्री समूह (Parliamentary Friendship Groups) · ब्रिक्स संसदीय मंच (BRICS Parliamentary Forum) · रणनीतिक साझेदारी (Strategic Partnership) · संघ सूची की प्रविष्टि 14 (Union List Entry 14) · अनुच्छेद 253 (Article 253) · ट्रैक-II कूटनीति (Track II Diplomacy) · विदेश नीति में सर्वसम्मति (Bipartisan Consensus in Foreign Policy)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा देने का राज्य का निदेश
अवधारणा प्रवाह
रूसी संघ की राज्य ड्यूमा के सभापति के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भारत आता है। → राज्यसभा के सभापति संसदीय कूटनीति के तहत प्रतिनिधिमंडल से भेंट करते हैं। → भेंट में द्विपक्षीय संसदीय संबंधों और सहयोग के क्षेत्रों पर विचार-विमर्श होता है। → विधायी स्तर का संवाद कार्यपालिका-स्तरीय द्विपक्षीय संबंधों को पूरक बनाता है। → सहमति और अनुभव-साझाकरण से संसदीय सहयोग और बहुपक्षीय मंचों पर समन्वय सुदृढ़ होता है। → अंततः यह विदेश नीति में लोकतांत्रिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को मजबूत करता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
2. अनुच्छेद 64 के अनुसार भारत का उपराष्ट्रपति पदेन राज्यसभा का सभापति होता है।
3. राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे कभी भंग नहीं किया जा सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 80 में राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के प्रतिनिधियों सहित अधिकतम 250 सदस्य हैं, जिनमें 12 मनोनीत होते हैं। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। कथन 3 गलत है: राज्यसभा स्थायी सदन है, अर्थात इसे भंग नहीं किया जा सकता, पर इसके एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं (अनुच्छेद 83(1))।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन (A) और उसका कारण (R) दिया गया है। दोनों का मूल्यांकन कीजिए:
कथन (A): राज्यसभा को ‘राज्यों की परिषद’ कहा जाता है।
कारण (R): राज्यसभा के सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा निर्वाचित होते हैं और इसमें राज्यों को संघीय आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया है।
सही विकल्प चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — (A) सही है: संसद का ऊपरी सदन राज्यसभा संघीय ढांचे में राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। (R) भी सही है: राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) पद्धति से चुने जाते हैं, और यही राज्यों के प्रतिनिधित्व का आधार है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:
सूची I (संविधान का अनुच्छेद)
1. अनुच्छेद 80
2. अनुच्छेद 83
3. अनुच्छेद 89
4. अनुच्छेद 105
सूची II (विषय)
a. संसद के सदस्यों की विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ
b. राज्यसभा की संरचना
c. संसद के सदनों की अवधि
d. राज्यसभा के सभापति और उपसभापति
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-c, 2-b, 3-d, 4-a
- 1-b, 2-d, 3-c, 4-a
- 1-b, 2-c, 3-d, 4-a
- 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
उत्तर: 1-b, 2-c, 3-d, 4-a — अनुच्छेद 80 राज्यसभा की संरचना (1-b) से संबंधित है। अनुच्छेद 83 सदनों की अवधि (2-c) से संबंधित है। अनुच्छेद 89 राज्यसभा के सभापति और उपसभापति (3-d) से संबंधित है। अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार (4-a) से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संसदीय कूटनीति (Parliamentary Diplomacy) को प्रायः कार्यपालिका द्वारा संचालित विदेश नीति का पूरक माना जाता है। भारत के संसदीय मंचों के माध्यम से होने वाले द्विपक्षीय संवाद के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि क्या विधायी प्रतिनिधिमंडलों की नियमित बैठकें संवैधानिक रूप से बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं का स्थान ले सकती हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
1. भूमिका: संसदीय कूटनीति की परिभाषा; अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union, 1889 में स्थापित) की पृष्ठभूमि; भारत में राज्यसभा सभापति द्वारा विदेशी संसदीय प्रतिनिधिमंडलों से भेंट को संस्थागत संवाद के उदाहरण के रूप में रखना।
2. संवैधानिक ढांचा: (क) संघ सूची की प्रविष्टि 10 (विदेश कार्य) और प्रविष्टि 14 (संधियों और करारों में प्रवेश) के अंतर्गत विदेश नीति का कार्यकारी अधिकार; (ख) अनुच्छेद 51 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-दायित्वों के सम्मान का निदेशक सिद्धांत; (ग) अनुच्छेद 253 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु संसद की विधायी शक्ति; (घ) अनुच्छेद 80 के अंतर्गत राज्यसभा की संघीय प्रकृति; (ङ) अनुच्छेद 105 के अंतर्गत संसद के सदस्यों की विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ।
3. संसदीय कूटनीति के उपकरण: संसदीय मैत्री समूह (Parliamentary Friendship Groups), द्विपक्षीय संसदीय मंच, ब्रिक्स संसदीय मंच (BRICS Parliamentary Forum) जैसे बहुपक्षीय मंच, और अंतर-संसदीय संघ की बैठकें। इनके माध्यम से विश्वास-निर्माण, नीतिगत निरंतरता और जनमत के साथ संवाद संभव होता है।
4. समालोचनात्मक पक्ष: (क) ये संवाद बाध्यकारी नहीं होते, इनके निष्कर्ष सरकार पर कानूनी दायित्व नहीं डालते; (ख) संधि-निर्माण की शक्ति कार्यपालिका के पास रहती है, संसद की भूमिका अधिकतर अनुसमर्थन-पश्चात विधायी क्रियान्वयन तक सीमित है; (ग) दलीय विचारधाराओं का प्रभाव विदेश नीति की निरंतरता पर पड़ सकता है, अतः सर्वसम्मति (Bipartisan Consensus) का महत्व बढ़ता है।
5. संतुलित दृष्टिकोण: कार्यपालिका-प्रधान विचार बनाम संसदीय सहभागिता का तर्क; ट्रैक-II कूटनीति के साथ तुलना; ‘जन-कूटनीति’ और ‘सॉफ्ट पावर’ की भूमिका।
6. निष्कर्ष: संसदीय कूटनीति पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं; इसकी प्रभावशीलता संस्थागत निरंतरता, पारदर्शी सूचना-साझाकरण और नीति-निर्माण में संसदीय समितियों की सहभागिता पर निर्भर है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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