बच्चों के बाल और बस्ता नियमों पर बाल अधिकार आयोग के आदेश पर उठे सवाल

बच्चों के बाल और बस्ता नियमों पर बाल अधिकार आयोग के आदेश पर उठे सवाल

बच्चों के बाल और बस्ता नियमों पर बाल अधिकार आयोग के आदेश पर उठे सवाल

केरल बाल अधिकार आयोग के आदेशों में अंतरपहला आदेश (माह पूर्व)नया आदेशछात्रों के बाल बढ़ाने का अधिकामान्यता दी गईनियंत्रण हेतु नियम लागूलैंगिक आधार पर बाल कटवाने पर रआग्रह किया गयानियम लागूमोबाइल फ़ोन पर रोकउल्लेख नहींनियंत्रण हेतु अनुमतिबैग तलाशीउल्लेख नहींहानिकारक वस्तुओं हेतु अनुमतिछात्रों की गरिमासंरक्षण पर बलठेस न पहुँचाने की शर्तनिर्णय प्रक्रियापूर्ण पीठ द्वाराएकल सदस्य द्वारा
केरल बाल अधिकार आयोग के आदेशों में अंतर

✎ बाल अधिकार आयोग के निर्णय भी संवैधानिक मूल्यों (अनुच्छेद 21 और 14) और प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर परखे जाते हैं; विद्यालय अनुशासन और छात्र-गरिमा के बीच संतुलन में प्रक्रियागत न्याय अनिवार्य शर्त है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — राजव्यवस्था (Polity): मौलिक अधिकार, वैधानिक निकाय, न्यायिक समीक्षा  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन (Governance): कमज़ोर वर्गों के लिए संस्थागत तंत्र, बाल अधिकार और शिक्षा
  • Prelims: अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा), अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता और न्यायिक समीक्षा, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 — राष्ट्रीय और राज्य आयोगों की संरचना एवं कार्य, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) बनाम राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) का अंतर, निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 — शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न पर रोक, नालसा बनाम भारत संघ (2014) — ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकार, के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) — निजता का मौलिक अधिकार, प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) — सुनवाई का अवसर (audi alteram partem)
  • Essay: अधिकार और अनुशासन: विद्यालय परिसर में छात्र-गरिमा की सीमाएँ, संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया की वैधता: शक्ति, सहभागिता और न्याय का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: बाल अधिकार आयोग के निर्णय भी संवैधानिक मूल्यों (अनुच्छेद 21 और 14) और प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर परखे जाते हैं; विद्यालय अनुशासन और छात्र-गरिमा के बीच संतुलन में प्रक्रियागत न्याय अनिवार्य शर्त है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल राज्य बाल अधिकार आयोग के एक सदस्य द्वारा जारी नए आदेश ने विद्यालयों को छात्रों के बाल और वेशभूषा को नियंत्रित करने, मोबाइल फ़ोन पर रोक लगाने और हानिकारक वस्तुओं की जाँच के लिए बैग-तलाशी करने की अनुमति दी है, जबकि इसके एक माह पहले इसी आयोग के एक सदस्य द्वारा दिए गए आदेश ने छात्रों के बाल बढ़ाने के अधिकार और व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा पर बल दिया था। नए आदेश में यह शर्त भी जोड़ी गई है कि ऐसे उपाय छात्रों की गरिमा को ठेस न पहुँचाएँ। इसके बावजूद आदेश को लेकर दो मुख्य प्रश्न उठे हैं। पहला, निर्णय एकल सदस्य द्वारा लिया गया, पूर्ण पीठ द्वारा नहीं। दूसरा, प्रभावित याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादी सरकारी विभागों को सुनवाई का अवसर दिए बिना आदेश जारी हुआ। आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष ने इस आदेश से अनभिज्ञता और असहमति जताई है। आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात भी कही गई है।

पृष्ठभूमि

  • पहले के आदेश में छात्रों के बाल बढ़ाने के अधिकार को मान्यता दी गई थी और विद्यालयों से लैंगिक आधार पर अपमान तथा जबरन बाल कटवाने की प्रथा रोकने का आग्रह किया गया था।
  • बाद के आदेश में वर्दी, बाल, मोबाइल फ़ोन और सौंदर्य-प्रसाधन संबंधी नियम लागू करने और हानिकारक वस्तुओं के लिए बैग-तलाशी की अनुमति दी गई, किंतु ऐसा कोई उपाय नहीं जो छात्रों को अपमानित करे, मानसिक पीड़ा पहुँचाए या शिक्षा से वंचित करे।
  • आदेश का आधार तीन उच्च न्यायालय निर्णयों और केरल सेवा नियमों को बताया गया है, जबकि प्रतिवादी विभागों को नोटिस या सुनवाई नहीं मिली, ऐसी रिपोर्टें हैं।
  • ट्रांसजेंडर और लिंग-विविध छात्रों के भेदभाव से संबंधित चिंताएँ इस विवाद का केंद्रीय पक्ष हैं, क्योंकि नालसा निर्णय (2014) में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के समानता और गरिमा के अधिकार को संवैधानिक रूप से मान्य किया गया था।

बाल अधिकार आयोग क्या है?

  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य स्तर पर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) गठित किए जाते हैं।
  • इन आयोगों का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करना, संबंधित प्राधिकारियों को सिफ़ारिश करना और बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
  • आयोग को कुछ मामलों में सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे गवाहों को बुलाना और दस्तावेज़ मँगवाना, परंतु यह स्वयं न्यायालय नहीं है।
  • आयोग के आदेशों से असंतुष्ट व्यक्ति संवैधानिक उपचार के रूप में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में अपील या रिट याचिका दायर कर सकता है।
  • निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 के अंतर्गत बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न से संरक्षण दिया गया है।
  • प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत माँग करता है कि प्रभावित पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिले और निर्णय निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा, विधिसम्मत प्रक्रिया से लिया जाए।
  • संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, जिसे पुट्टस्वामी निर्णय (2017) में निजता के अधिकार से भी जोड़ा गया है; यही आधार छात्र-तलाशी के प्रश्न से जुड़ता है।
  • आयोग की संरचना, सदस्यों की संख्या और निर्णय-प्रक्रिया राज्य के अधिनियम और नियमों द्वारा तय होती है, इसलिए किसी भी आदेश की वैधता उन्हीं प्रावधानों की कसौटी पर परखी जाती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता (Feature) महत्व (Significance)
आदेश का स्वरूप केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (State Commission for Protection of Child Rights) द्वारा जारी यह आदेश स्कूलों को बाल एवं वेशभूषा, मोबाइल फोन, सौंदर्य प्रसाधन और बैग जाँच से जुड़े नियम लागू करने की अनुमति देता है।
पूर्ववर्ती आदेश से अंतर एक महीने पहले के आदेश में बच्चों के अपने बाल बढ़ाने के अधिकार को मान्यता दी गई थी और जबरन बाल कटवाने को रोकने की बात कही गई थी। नया आदेश इससे भिन्न दिशा में दिखता है, जिससे नीतिगत स्पष्टता पर प्रश्न उठते हैं।
सशर्त अनुमति बैग जाँच केवल नशीले पदार्थ जैसी हानिकारक वस्तुओं तक सीमित रखी गई है, और यह शर्त है कि छात्रों की गरिमा और आत्म-सम्मान सुरक्षित रहे।
निषिद्ध उपाय अपमानजनक, मानसिक पीड़ा देने वाले या छात्रों को शिक्षा से वंचित करने वाले अनुशासनात्मक उपाय वर्जित हैं। यह बाल अधिकार ढाँचे की मूल भावना को दर्शाता है।
निर्णय प्रक्रिया आदेश एक ही सदस्य ने पारित किया, पूर्ण पीठ (Full Bench) ने नहीं। प्रतिवादी अधिकारियों और याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दिए बिना निर्णय लिया गया, जो प्रक्रियागत न्याय का प्रश्न है।

महत्व

सामाजिक एवं बाल अधिकार

  • बच्चों की गरिमा, व्यक्तिगत पसंद और लैंगिक पहचान की सुरक्षा का प्रश्न सीधे इस आदेश से जुड़ता है।
  • स्कूल परिसर में अनुशासन और बच्चों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की आवश्यकता को यह मामला स्पष्ट करता है।
  • लिंग-विविध (Gender-nonconforming) छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव से सामाजिक समावेशन की चुनौती उजागर होती है।

संवैधानिक एवं विधिक

  • प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का सिद्धांत बताता है कि प्रभावित पक्ष को सुने बिना निर्णय नहीं होना चाहिए। यहाँ यही प्रश्न उठा है।
  • आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, जो संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का मार्ग है।
  • बाल अधिकार आयोग के आदेशों की वैधता की जाँच से वैधानिक निकायों की शक्ति और उनकी सीमाओं की समझ विकसित होती है।

शासन एवं संस्थागत

  • एकल सदस्य द्वारा निर्णय लेने और पूर्ण पीठ की आवश्यकता पर प्रश्न, संस्थागत सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का महत्त्व रेखांकित करता है।
  • कार्यकारी प्रमुख (Acting Chairperson) की जानकारी के बिना आदेश जारी होना आंतरिक समन्वय की कमी का संकेत है।
  • सार्वजनिक संचार की औपचारिक प्रक्रिया बाईपास होने से संस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।

सुरक्षा एवं मादक पदार्थ नियंत्रण

  • स्कूल परिसर में नशीले पदार्थों की उपस्थिति को रोकना एक वैध सार्वजनिक सुरक्षा हित है।
  • यह हित बच्चों की गरिमा के अधिकार के साथ संतुलित होना चाहिए, इसलिए जाँच की प्रक्रिया पारदर्शी और सीमित होनी चाहिए।

चुनौतियाँ

1. लिंग पहचान और भेदभाव का प्रश्न

  • बाल रखने और वेशभूषा से जुड़े नियम ट्रांसजेंडर और लिंग-विविध छात्रों के लिए भेदभावपूर्ण हो सकते हैं।
  • स्रोत में उल्लेखित एक ट्रांसजेंडर बच्चे का स्कूल छोड़ना इस जोखिम का वास्तविक उदाहरण बताया गया है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का NALSA निर्णय (2014) लैंगिक पहचान के आत्मनिर्धारण के अधिकार को मान्यता देता है, इसलिए इन नियमों की संवैधानिक जाँच आवश्यक है।

2. शिक्षा के अधिकार और अनुशासन में संतुलन

  • स्कूल को अनुशासन बनाए रखने का वैध अधिकार है, परंतु यह अधिकार शिक्षा के अधिकार को बाधित नहीं कर सकता।
  • आदेश में यह शर्त है कि ऐसे उपाय छात्रों को शिक्षा से वंचित न करें, फिर भी व्यवहार में इसकी निगरानी कठिन हो सकती है।
  • शिक्षकों और बच्चों के हितों के बीच संतुलन बनाना आयोग की मूल भूमिका है।

3. प्रक्रियागत न्याय और प्राकृतिक न्याय

  • प्रतिवादी अधिकारियों और याचिकाकर्ताओं को सुने बिना आदेश जारी होना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध माना जा सकता है।
  • आयोग के सदस्य का तर्क कि पूर्व उच्च न्यायालय निर्णय और केरल सेवा नियमों पर आधार लिया गया, प्रक्रिया की अनिवार्यता को पूरी तरह नहीं हटाता।
  • एकल सदस्य द्वारा सामूहिक प्रभाव वाले निर्णय लेने की वैधता पर प्रश्न उठे हैं।

4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और निजता

  • बैग और शरीर की जाँच से छात्रों की निजता और गरिमा प्रभावित हो सकती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के पुट्टस्वामी निर्णय (2017) ने निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना है।
  • जाँच का उद्देश्य वैध होने पर भी उसकी विधि सम्मत और आनुपातिक (Proportionate) होना आवश्यक है।

5. संस्थागत समन्वय और सार्वजनिक संचार

  • कार्यकारी प्रमुख को आदेश की जानकारी न होना और उनकी सहमति न लेना आंतरिक प्रक्रिया की कमी दर्शाता है।
  • जनसंपर्क अधिकारी को बाईपास कर आदेश मीडिया और शिक्षक संघों तक पहुँचना संस्थागत अनुशासन पर प्रश्न उठाता है।
  • ऐसी स्थिति से वैधानिक निकाय की स्वायत्तता और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा (Issue) चिंता (Concern)
परस्पर विरोधी आदेश पिछले और नए आदेश में विरोधाभास से स्कूलों और छात्रों के बीच भ्रम की स्थिति बनती है।
निर्णय लेने का अधिकार एकल सदस्य द्वारा राज्यव्यापी प्रभाव वाला आदेश जारी करने की वैधता संदिग्ध मानी जा रही है।
सुनवाई का अभाव प्रतिवादियों को नोटिस और सुनवाई न मिलने से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन होने का आरोप है।
लिंग-विविध छात्रों पर प्रभाव बाल और वेशभूषा के नियम भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का कारण बन सकते हैं।
बैग जाँच की सीमा नशीले पदार्थों की रोकथाम और छात्रों की निजता व गरिमा के बीच संतुलन बनाना कठिन है।
संस्थागत पारदर्शिता कार्यकारी प्रमुख की जानकारी के बिना आदेश जारी होने से आयोग की विश्वसनीयता घट सकती है।

आगे की राह

  • आयोग के आदेश जारी करने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया बनाई जाए, जिसमें पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय और प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर अनिवार्य हो।
  • लिंग-विविध और ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए स्कूल स्तर पर भेदभाव-रोधी दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से लागू किए जाएँ।
  • बैग जाँच की प्रक्रिया के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure) बने, जिसमें जाँच का दायरा, अधिकारी की योग्यता और छात्रों की गरिमा की रक्षा के उपाय तय हों।
  • स्कूल अनुशासन नियमों की समीक्षा शिक्षकों, अभिभावकों, छात्रों और बाल अधिकार विशेषज्ञों की भागीदारी से की जाए।
  • परस्पर विरोधी आदेशों की स्थिति में आयोग के भीतर वैधानिक व्याख्या और अंतिम मत स्पष्ट करने की व्यवस्था हो।
  • आयोग के आंतरिक संचार में कार्यकारी प्रमुख और जनसंपर्क अधिकारी की भूमिका सुनिश्चित की जाए।
  • नशा-विरोधी जागरूकता और परामर्श कार्यक्रमों को बैग जाँच जैसे कठोर उपायों के विकल्प के रूप में भी विकसित किया जाए।
  • उच्च न्यायालय में विवाद का निपटारा होने तक न्यायिक समीक्षा के माध्यम से आदेश की वैधता की जाँच होने दी जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राज्य बाल अधिकार आयोग (State Commission for Protection of Child Rights) · प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) · गरिमा का अधिकार (Right to Dignity under Article 21) · निजता का अधिकार (Right to Privacy) · लैंगिक पहचान (Gender Identity) · ट्रांसजेंडर बच्चे (Transgender Children) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · अनुच्छेद 226 (Article 226) · शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009) · मनमानापन और समानता (Arbitrariness and Article 14) · आनुपातिकता परीक्षण (Proportionality Test) · विद्यालय में अनुशासन बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता (School Discipline vs Individual Liberty)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14: मनमानी से बचाव और प्राकृतिक न्याय
  • अनुच्छेद 15: लिंग आधारित भेदभाव का निषेध
  • अनुच्छेद 21: गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
  • अनुच्छेद 21A: शिक्षा का मौलिक अधिकार
  • अनुच्छेद 39(f): बच्चों के स्वस्थ विकास और गरिमा की सुरक्षा
  • अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय में आदेश की चुनौती

अवधारणा प्रवाह

राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का एक सदस्य स्कूलों में बाल, मोबाइल, वेशभूषा और बैग जाँच से जुड़ा आदेश जारी करता है।  →  आदेश पिछले महीने के उस आदेश से भिन्न है जिसमें बच्चों के बाल बढ़ाने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।  →  प्रतिवादी अधिकारियों और याचिकाकर्ताओं को सुने बिना तथा पूर्ण पीठ के बिना निर्णय होने से प्रक्रियागत प्रश्न उठते हैं।  →  आयोग के कार्यकारी प्रमुख और जनसंपर्क अधिकारी को जानकारी न होने से संस्थागत समन्वय पर सवाल उठते हैं।  →  लिंग-विविध और ट्रांसजेंडर छात्रों के भेदभाव की आशंका से बाल अधिकार और समानता के प्रश्न सामने आते हैं।  →  आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, जहाँ न्यायिक समीक्षा के माध्यम से इसकी वैधता तय होगी।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत राज्य स्तर पर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के गठन का प्रावधान है।
2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 में बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न से संरक्षण देने का प्रावधान है।
3. संविधान का अनुच्छेद 21क छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है।
4. अनुच्छेद 21क राज्य नीति के निदेशक तत्वों का भाग है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1, 2 और 3 सही हैं: बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 राज्य आयोगों के गठन का प्रावधान करता है, शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 17 शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न पर रोक लगाती है, और अनुच्छेद 21क (86वाँ संशोधन, 2002) शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है। कथन 4 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 21क मौलिक अधिकारों के भाग III में है, भाग IV में नहीं।

Q2. अभिकथन (A): किसी राज्य बाल अधिकार आयोग का ऐसा आदेश, जो बिना सुनवाई के पारित हुआ हो, उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 के अंतर्गत निरस्त किया जा सकता है।
कारण (R): अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता केवल विधायी अधिनियमों की वैधता तक सीमित है, प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेशों तक नहीं।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) सही है और (R) सही है तथा (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) सही है और (R) सही है, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) सही है, किंतु (R) गलत है — अभिकथन सही है, क्योंकि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश अनुच्छेद 226 के अंतर्गत चुनौती योग्य हैं। कारण गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 226 की अधिकारिता केवल विधायी अधिनियमों तक सीमित नहीं है; यह प्रशासनिक और सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्थाओं के आदेशों तक विस्तृत है। अतः कारण असत्य होने से विकल्प (C) सही है।

Q3. निम्नलिखित में से किस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की स्व-पहचानित लैंगिक पहचान को संविधान के अंतर्गत मान्यता दी और उन्हें तीसरे लिंग के रूप में मान्यता देने का निर्देश दिया?

  1. के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)
  2. नालसा बनाम भारत संघ (2014)
  3. नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018)
  4. शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017)

उत्तर: नालसा बनाम भारत संघ (2014) — नालसा बनाम भारत संघ (2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी और स्व-पहचान के अधिकार को गरिमा और समानता से जोड़ा। पुट्टस्वामी (2017) निजता को मौलिक अधिकार घोषित करता है, नवतेज सिंह जौहर (2018) धारा 377 के एक भाग को निरस्त करता है, और शायरा बानो (2017) तीन तलाक से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ विद्यालयों में केश-विन्यास, वेशभूषा और बैग-जाँच जैसे नियमों को राज्य बाल अधिकार आयोग के आदेश द्वारा विनियमित करने की प्रवृत्ति बाल गरिमा, निजता और समानता के संवैधानिक मूल्यों के साथ कहाँ तक संगत है? इसके प्रक्रियात्मक पक्षों का परीक्षण करते हुए critically examine कीजिए। साथ ही बताइए कि ऐसे आदेश की न्यायिक समीक्षा किन आधारों पर संभव है और विद्यालय प्रशासन के लिए कौन-से संतुलित उपाय अपेक्षित हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना: (1) भूमिका: राज्य बाल अधिकार आयोग के दो परस्पर भिन्न आदेशों का तथ्यात्मक उल्लेख, जिनमें एक बालों की स्वतंत्रता को मान्यता देता है और दूसरा विद्यालय को नियमन व बैग-जाँच की शक्ति देता है। (2) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा और निजता का अधिकार, के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में निजता को मौलिक अधिकार घोषित करना, और आनुपातिकता परीक्षण (वैधता, आवश्यकता, आनुपातिकता); अनुच्छेद 15 में लिंग के आधार पर भेदभाव निषेध और नालसा बनाम भारत संघ (2014) में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-पहचान अधिकार; अनुच्छेद 21क और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17, जो मानसिक उत्पीड़न पर रोक लगाती है; अनुच्छेद 39(च) के अंतर्गत बच्चों के स्वस्थ विकास का निदेशक तत्व। (3) विद्यालय का पक्ष: ‘इन लोको पेरेंटिस’ (in loco parentis) सिद्धांत के अंतर्गत विद्यालय की अनुशासन-शक्ति, नशीले पदार्थों (ganja and drugs) से सुरक्षा का वैध लोकहित, और वर्दी व केश-नियमों के पीछे शैक्षिक तर्क। (4) प्रक्रियात्मक प्रश्न: प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (audi alteram partem), प्रत्यर्थियों को नोटिस और सुनवाई का अभाव, मामले का एकल सदस्य द्वारा निर्णय न कि पूर्ण पीठ द्वारा, और अनुच्छेद 14 के अंतर्गत मनमानेपन के विरुद्ध ई. पी. रॉयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) का सिद्धांत; मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में ‘उचित, निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रक्रिया’ का सिद्धांत। (5) दोनों पक्षों का संतुलन: बाल संरक्षण और सुरक्षा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता; नियम का उद्देश्य वैध हो सकता है, किंतु उसका क्रियान्वयन दंडात्मक या भेदभावपूर्ण नहीं होना चाहिए। (6) न्यायिक समीक्षा: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में चुनौती के आधार, जैसे प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, अधिकार-क्षेत्र से बाहर निर्णय और अनुचित कारण। (7) व्यावहारिक सुझाव: बैग-जाँच हेतु लिखित और पारदर्शी प्रोटोकॉल, एक ही लिंग के कर्मचारी द्वारा, गवाह की उपस्थिति; लैंगिक-तटस्थ और गैर-भेदभावपूर्ण केश-नियम; शिकायत निवारण तंत्र; पूर्व सूचना और कारण-सहित आदेश। (8) निष्कर्ष: संवैधानिक मूल्यों के भीतर संतुलित नीति, जिसमें सुरक्षा और गरिमा दोनों सुरक्षित हों।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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