सर्वोच्च न्यायालय ने जनगणना 2027 में ओबीसी जाति ड्रॉप-डाउन मेन्यू की मांग वाली याचिका खारिज की

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सर्वोच्च न्यायालय ने जनगणना 2027 में ओबीसी जाति ड्रॉप-डाउन मेन्यू की मांग वाली याचिका खारिज की

जनगणना 2027 में जाति आँकड़ा संग्रहमाँग (याचिका)महापंजीयक का निर्णयजाति आँकड़ा संग्रह विधिपूर्व-निर्धारित विकल्प-सूचीखुला प्रश्नउद्देश्यनागरिक सुविधानीतिगत निर्णयन्यायालय का दृष्टिकोणयाचिका खारिजस्वतंत्रता दी गईविधिक स्थितिनीतिगत विषयजनगणना अधिनियम, 1948प्रभावस्व-गणना सुविधाआँकड़ा गुणवत्ता
जनगणना 2027 में जाति आँकड़ा संग्रह

✎ जनगणना केंद्रीय सूची की प्रविष्टि 69 का विषय है और उसके प्रश्न-रूप (खुला प्रश्न या पूर्व-निर्धारित विकल्प-सूची) का निर्णय महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के नीतिगत विवेक से होता है, जिसमें न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप से बचते हुए…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन और संविधान (जनगणना की संवैधानिक व वैधानिक स्थिति, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, न्यायिक समीक्षा की सीमा)  |  GS Paper II — सामाजिक न्याय (अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए नीतियाँ और आँकड़ों की भूमिका)  |  GS Paper I — भारतीय समाज (जाति व्यवस्था और सामाजिक गतिशीलता)
  • Prelims: जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948), केंद्रीय सूची की प्रविष्टि 69 (Union List Entry 69 — जनगणना), महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त (Registrar General and Census Commissioner, India — गृह मंत्रालय), अनुच्छेद 338B (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग), 102वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2018, अनुच्छेद 340 (पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग), इंद्रा साहनी मामला, 1992 (क्रीमी लेयर और 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा), खुला प्रश्न बनाम बंद प्रश्न (Open-ended vs Closed-ended Question in Census)
  • Essay: जाति गणना: आँकड़ों की विश्वसनीयता, नीतिगत निर्णय और सामाजिक न्याय का संतुलन, न्यायपालिका और नीति-निर्माण: नीतिगत विषयों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ

त्वरित पुनरावृत्ति: जनगणना केंद्रीय सूची की प्रविष्टि 69 का विषय है और उसके प्रश्न-रूप (खुला प्रश्न या पूर्व-निर्धारित विकल्प-सूची) का निर्णय महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के नीतिगत विवेक से होता है, जिसमें न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप से बचते हुए प्रतिवेदन का मार्ग सुझाता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए उसका निपटारा कर दिया। याचिकाकर्ता ने माँग की थी कि जनगणना 2027 के डिजिटल गणना-उपकरणों में अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों के लिए पूर्व-निर्धारित विकल्प-सूची जोड़ी जाए, ताकि नागरिकों को जाति हाथ से दर्ज न करनी पड़े। न्यायालय ने कहा कि यह विषय नीतिगत निर्णय से जुड़ा है। साथ ही याचिकाकर्ता को महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के समक्ष प्रतिवेदन देने की स्वतंत्रता दी गई। महापंजीयक ने पहले ही जाति के संबंध में पूर्व-निर्धारित विकल्प-सूची के बजाय खुला प्रश्न रखने का निर्णय लिया है। इसलिए यह मामला जनगणना की प्रश्नावली-रूपरेखा, प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा की सीमा, तीनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में जनगणना संघ सूची की प्रविष्टि 69 के अंतर्गत आती है, इसलिए इसका अधिकार केंद्र के पास है। जनगणना का संचालन जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत होता है और इसकी कार्यकारी व्यवस्था गृह मंत्रालय के अधीन महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के पास रहती है।
  • स्वतंत्रता के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की गणना होती रही है, जबकि अन्य जातियों की व्यापक गणना 1931 की जनगणना तक हुई थी। इसी कारण अन्य पिछड़ा वर्ग की सटीक जनसंख्या पर आज भी अलग-अलग अनुमान प्रचलित हैं।
  • मंडल आयोग (1980 में रिपोर्ट प्रस्तुत) की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्रीय सेवाओं और शैक्षिक संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई। इंद्रा साहनी मामला, 1992 में क्रीमी लेयर की अवधारणा और कुल आरक्षण पर सामान्यतः 50 प्रतिशत की सीमा स्वीकार की गई।
  • 102वें संविधान संशोधन, 2018 द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुच्छेद 338B के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा दिया गया। इससे पिछड़ा वर्ग से संबंधित आँकड़ों और सिफारिशों की संस्थागत भूमिका बढ़ी।
  • 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कराई गई थी, जबकि जनगणना 2027 के साथ जनसंख्या गणना के चरण में जाति से संबंधित गणना को शामिल किया गया है। दोनों के उद्देश्य, संस्था और पद्धति भिन्न हैं।
  • डिजिटल जनगणना में गणना-उपकरणों की संरचना, जैसे खुला प्रश्न या पूर्व-निर्धारित विकल्प, सीधे आँकड़ों की गुणवत्ता, स्व-गणना की सुविधा और उत्तरदाता की स्वीकृति को प्रभावित करती है।

जनगणना और जाति गणना क्या है?

  • जनगणना एक संवैधानिक एवं वैधानिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से देश की जनसंख्या, उसकी संरचना और सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का व्यवस्थित आँकड़ा तैयार होता है। यह दशकीय रूप से होती है।
  • भारत में जनगणना का विषय केंद्रीय सूची की प्रविष्टि 69 में है, इसलिए इसे केंद्र सरकार संचालित करती है। आँकड़ों की गोपनीयता और प्रयोग की सीमाएँ जनगणना अधिनियम, 1948 से तय होती हैं।
  • जाति गणना का अर्थ है जनगणना में व्यक्तियों की जाति या समुदाय से संबंधित सूचना दर्ज करना। इसका उपयोग सामाजिक न्याय की नीतियों, कल्याण योजनाओं के लक्ष्य-निर्धारण और प्रतिनिधित्व के आकलन में होता है।
  • प्रश्न-रूप का महत्त्व अधिक होता है। खुला प्रश्न उत्तरदाता को अपनी जाति स्वयं लिखने देता है, जबकि पूर्व-निर्धारित विकल्प-सूची सूचीबद्ध उत्तरों तक सीमित कर सकती है। दोनों के अपने लाभ और सीमाएँ हैं, जैसे वर्गीकरण की एकरूपता बनाम वास्तविक स्व-घोषणा।
  • डिजिटल गणना में स्व-गणना, सत्यापन और प्रविष्टि-मानकीकरण के प्रश्न उठते हैं। जाति के नाम, उपजाति और स्थानीय वर्गीकरण की विविधता से तकनीकी व प्रशासनिक चुनौतियाँ बढ़ती हैं।
  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (अनुच्छेद 338B) अन्य पिछड़ा वर्ग की सूचियों और सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन से संबंधित सलाह देता है, जबकि जनगणना का आँकड़ा उसके विश्लेषण का महत्त्वपूर्ण आधार बन सकता है।
  • न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढाँचे और मौलिक अधिकारों की रक्षा तक सीमित रहती है। जब कोई विषय प्रशासनिक या नीतिगत विवेक से जुड़ा हो, तो न्यायालय आम तौर पर सरकार को प्रतिवेदन के माध्यम से निर्णय लेने देता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
जनगणना 2027 में जाति-गणना (Caste Enumeration) जनसंख्या गणना के साथ जाति से संबंधित आँकड़े एकत्र करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। यह भारत में दशकों बाद व्यापक स्तर पर जाति-आँकड़ों के संग्रह की ओर बढ़ा कदम है।
डिजिटल गणना उपकरण (Digital Enumeration Tools) गणना में डिजिटल प्रणाली का प्रयोग हो रहा है, इसलिए जाति-प्रविष्टि का स्वरूप (मैनुअल या सूची-आधारित) सीधे आँकड़ों की गुणवत्ता पर असर डालता है।
ड्रॉप-डाउन मेनू (Drop-down Menu) बनाम खुला प्रश्न (Open-ended Question) याचिका ने पूर्व-निर्धारित ड्रॉप-डाउन सूची की माँग की थी, जबकि महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त (Registrar General and Census Commissioner, India) ने खुला प्रश्न चुना है। दोनों विकल्पों में आँकड़ा-संग्रह और वर्गीकरण की अलग चुनौतियाँ हैं।
अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC) OBC जाति-प्रविष्टि के तरीके से जुड़ा मुद्दा सामाजिक न्याय और लक्षित नीतियों के आँकड़ों से सीधे संबंधित है, इसलिए इसे नीति-विषय के रूप में देखा गया।
न्यायालय का रुख (Judicial Approach) सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि यह नीतिगत निर्णय का विषय है। याचिकाकर्ता को महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की स्वतंत्रता दी गई।

महत्व

प्रशासनिक और नीतिगत महत्व

  • जाति-आँकड़े सामाजिक-आर्थिक नीतियों के लिए आधार तैयार करते हैं, विशेषकर उन समुदायों के लिए जिनकी वर्तमान स्थिति पर विश्वसनीय आँकड़े सीमित हैं।
  • गणना में प्रविष्टि का तरीका तय होना यह दर्शाता है कि आँकड़ा-संग्रह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक नीति का भी विषय है।

संवैधानिक और विधिक महत्व

  • जनगणना केंद्र का विषय है और इसका विधिक ढाँचा जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) में निहित है।
  • न्यायालय द्वारा याचिका का निस्तारण यह स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक नीति के चुनाव में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ हैं, जबकि प्रभावित पक्ष के पास प्रतिनिधित्व का वैधानिक मार्ग खुला रहता है।

सामाजिक न्याय और समावेशन

  • आरक्षण और कल्याण नीतियों के लिए सटीक आँकड़े नीति-निर्माण की वैधता और लक्ष्य-निर्धारण में सहायक होते हैं।
  • सही आँकड़े न मिलने पर लाभ-वितरण में असमानता या विवाद की संभावना बढ़ती है।

सांख्यिकीय और तकनीकी महत्व

  • डिजिटल गणना में खुले प्रश्न से विभिन्न जाति-नामों की विविधता दर्ज होती है, जबकि सूची-आधारित प्रविष्टि से वर्गीकरण एकरूप होता है। दोनों का सांख्यिकीय प्रभाव अलग है।

चुनौतियाँ

1. वर्गीकरण की एकरूपता

  • खुले प्रश्न में एक ही जाति के अनेक नाम, वर्तनी-भेद और उप-जातियाँ दर्ज हो सकती हैं, जिससे आँकड़ों का मिलान और वर्गीकरण कठिन होता है।
  • ड्रॉप-डाउन सूची बनाने के लिए जातियों की मानकीकृत और अद्यतन सूची चाहिए, जो राज्यवार भिन्न हो सकती है।

2. आँकड़ों की विश्वसनीयता और डेटा गुणवत्ता

  • डिजिटल उपकरणों में त्रुटि, अधूरी प्रविष्टि या गलत वर्गीकरण से गणना की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
  • स्वयं-घोषणा (Self-declaration) पर आधारित आँकड़ों में गणक और उत्तरदाता के बीच व्याख्या का अंतर भी आ सकता है।

3. नीति-निर्णय और न्यायिक समीक्षा की सीमा

  • न्यायालय ने कहा कि प्रविष्टि-प्रारूप नीतिगत विषय है, इसलिए कार्यपालिका का विवेकाधिकार प्रमुख है।
  • न्यायिक समीक्षा तब प्रभावी होती है जब नीति मनमानी, असंवैधानिक या विधिक प्रक्रिया के विपरीत हो। इस मामले में ऐसा आधार प्रस्तुत नहीं हुआ।

4. गोपनीयता और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा

  • जाति जैसी संवेदनशील सूचना के डिजिटल संग्रह में डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के प्रश्न उठते हैं।
  • सूचना के दुरुपयोग की आशंका को कम करने के लिए स्पष्ट डेटा-संरक्षण ढाँचा आवश्यक है।

5. केंद्र-राज्य समन्वय

  • जनगणना केंद्र का विषय है, परंतु राज्य और स्थानीय प्रशासन के सहयोग के बिना गणना का व्यावहारिक क्रियान्वयन संभव नहीं।
  • जाति-सूचियों में राज्यवार भिन्नता होने से राष्ट्रीय स्तर पर एकरूप वर्गीकरण बनाना चुनौतीपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
वर्गीकरण खुले प्रश्न से विविध प्रविष्टियाँ आने पर मिलान और सारणीकरण में कठिनाई।
डेटा गुणवत्ता डिजिटल त्रुटि और अधूरी प्रविष्टि से आँकड़ों की विश्वसनीयता पर असर।
नीति बनाम न्यायिक हस्तक्षेप प्रविष्टि-प्रारूप को नीतिगत विषय मानने से न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा स्पष्ट।
गोपनीयता संवेदनशील जाति-डेटा के संग्रह और भंडारण में सुरक्षा जोखिम।
केंद्र-राज्य समन्वय राज्यवार जाति-सूचियों में भिन्नता से राष्ट्रीय एकरूपता में बाधा।

आगे की राह

  • जाति-प्रविष्टि के प्रारूप पर निर्णय के कारणों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए, ताकि नीति में पारदर्शिता बनी रहे।
  • खुले प्रश्न के उत्तरों के वर्गीकरण के लिए मानकीकृत जाति-कोड और स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार किए जाएँ।
  • गणकों को जाति-प्रविष्टि और विविध उत्तरों के वर्गीकरण पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
  • डिजिटल उपकरणों की परीक्षण-प्रक्रिया में त्रुटि-जाँच और गुणवत्ता-निरीक्षण को शामिल किया जाए।
  • व्यक्तिगत जाति-डेटा के संग्रह, भंडारण और उपयोग के लिए स्पष्ट डेटा-संरक्षण मानक लागू किए जाएँ।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय तंत्र मजबूत किया जाए, ताकि राज्यवार जाति-सूचियों में सामंजस्य बने।
  • याचिकाकर्ता जैसे हितधारकों के लिए प्रतिनिधित्व और सुझाव-प्रक्रिया को सुलभ और समयबद्ध बनाया जाए।
  • गणना-आँकड़ों के उपयोग से पहले स्वतंत्र सांख्यिकीय समीक्षा की व्यवस्था की जाए, ताकि नीति-निर्माण में विश्वसनीयता बनी रहे।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जनगणना 2027 (Census 2027) · जाति-गणना (Caste Enumeration) · अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC) · खुला प्रश्न बनाम पूर्व-भरित चयन सूची (Open-ended Question vs Pre-loaded Options) · डिजिटल गणना उपकरण (Digital Enumeration Tools) · भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त (Registrar General and Census Commissioner, India) · जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) · अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) (Articles 15(4), 15(5), 16(4)) · न्यायिक समीक्षा और नीतिगत निर्णय (Judicial Review and Policy Decisions) · सामाजिक न्याय और आँकड़ों की विश्वसनीयता (Social Justice and Data Reliability) · इंद्रा साहनी मामला, 1992 (Indra Sawhney Case, 1992) · राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes – NCBC)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची की संघ सूची: जनगणना केंद्र का विषय है।
  • अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4): पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान हेतु आँकड़ों का महत्व।
  • अनुच्छेद 340: पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग का संवैधानिक आधार।
  • अनुच्छेद 32: याचिका द्वारा न्यायालय में मौलिक अधिकार-आधारित मार्ग का प्रयोग।

अवधारणा प्रवाह

जनगणना 2027 में जाति-प्रविष्टि हेतु डिजिटल गणना उपकरणों का प्रयोग।  →  OBC संगठन द्वारा ड्रॉप-डाउन मेनू की माँग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका।  →  न्यायालय द्वारा इसे नीतिगत विषय मानते हुए याचिका का निस्तारण।  →  याचिकाकर्ता को महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के समक्ष प्रतिनिधित्व का अवसर।  →  महापंजीयक द्वारा ड्रॉप-डाउन के स्थान पर खुला प्रश्न अपनाने का निर्णय।  →  खुले प्रश्न से प्राप्त विविध उत्तरों का वर्गीकरण और जाति-आँकड़ों का सांख्यिकीय उपयोग।  →  प्राप्त आँकड़ों का नीति-निर्माण में प्रयोग, जिसकी विश्वसनीयता गणना-प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जनगणना अधिनियम, 1948 जनगणना के संचालन के लिए विधिक ढाँचा प्रदान करता है।
2. भारत में अब तक की अंतिम दशकीय जनगणना थी जिसमें सभी जातियों की जनसंख्या का जाति-वार आँकड़ा संकलित किया गया था, और वह वर्ष 1931 था।
3. अनुच्छेद 340 के अंतर्गत राज्यपाल सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग नियुक्त करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. इनमें से कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: जनगणना अधिनियम, 1948 जनगणना का विधिक आधार है। कथन 2 सही है: 1931 की जनगणना में जाति-वार आँकड़े संकलित किए गए थे, जबकि 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना एक अलग अभ्यास था। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 340 के अंतर्गत आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, राज्यपाल नहीं।

Q2. कथन (A): भारत में जनगणना के संचालन की पद्धति, जिसमें प्रश्नों का स्वरूप और उत्तर-विकल्प शामिल हैं, केंद्र सरकार द्वारा तय की जाती है।
कारण (R): जनगणना संघ सूची (Union List) की प्रविष्टि 69 में आती है, इसलिए इसका विषय संघ के अधिकार-क्षेत्र में है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — जनगणना संघ सूची की प्रविष्टि 69 में है, इसलिए इसका संचालन संघ सरकार करती है और संबंधित पद्धति का निर्णय केंद्र के हाथ में होता है। यही कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलन (Match) कीजिए:
सूची-I (आयोग/संस्था)
1. काका कालेलकर आयोग
2. मंडल आयोग
3. न्यायमूर्ति जी. रोहिणी आयोग
4. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)

सूची-II (विशेषता)
a. अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण का अध्ययन
b. संविधान के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा (102वाँ संशोधन, 2018)
c. पिछड़े वर्गों की पहचान हेतु प्रथम आयोग (1953-55)
d. केंद्रीय सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-c, 2-d, 3-a, 4-b
  2. 1-d, 2-c, 3-b, 4-a
  3. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  4. 1-c, 2-a, 3-d, 4-b

उत्तर: 1-c, 2-d, 3-a, 4-b — काका कालेलकर आयोग पहला पिछड़ा वर्ग आयोग था (c)। मंडल आयोग ने केंद्रीय सेवाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की (d)। न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग के उप-वर्गीकरण पर कार्य किया (a)। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को 102वें संशोधन द्वारा संवैधानिक दर्जा मिला (b)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ जनगणना 2027 में अन्य पिछड़ा वर्ग की जाति दर्ज करने के लिए खुले प्रश्न को अपनाने और पूर्व-भरित चयन सूची को अस्वीकार करने के निर्णय को नीति का विषय माना गया है। सामाजिक न्याय के लिए जाति-आँकड़ों की विश्वसनीयता पर इस पद्धति के प्रभाव की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि ऐसे नीतिगत निर्णयों में न्यायालय किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (कुल ~250 शब्द): (1) भूमिका: जनगणना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत जनगणना संघ का विषय (संघ सूची, प्रविष्टि 69); 2025 में जाति-गणना को जनगणना के साथ शामिल करने का केंद्रीय निर्णय; 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) एक पृथक अभ्यास था; अंतिम व्यापक जाति-वार जनगणना 1931 में हुई थी। (2) परीक्षा का पहला भाग, पद्धति और आँकड़ों की विश्वसनीयता: खुले प्रश्न में उत्तरदाता अपनी स्वयं-घोषित जाति लिखता है, इसलिए उपजाति, स्थानीय नामों और वर्तनी-भिन्नता से वर्गीकरण की जटिलता बढ़ती है और गणक के स्तर पर कोडिंग-त्रुटि का खतरा रहता है; पूर्व-भरित सूची से एकरूपता और तुलनीयता बढ़ती है, परंतु सूची में छूटी हुई जातियों की सीमा और उत्तरदाता पर सूची थोपे जाने का प्रश्न उठता है। दोनों पक्षों के तर्क संतुलित रूप से रखें। (3) सामाजिक न्याय से संबंध: अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) के अंतर्गत विशेष प्रावधान तभी प्रभावी होते हैं जब पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व के विश्वसनीय आँकड़े हों; इंद्रा साहनी मामला (1992) ने पिछड़ेपन की पहचान, क्रीमी लेयर और 50 प्रतिशत की सीमा स्थापित की; के. कृष्ण मूर्ति मामला (2010) का त्रि-परीक्षण (Triple Test) स्थानीय निकायों के आरक्षण में अनुभवजन्य आँकड़ों की अनिवार्यता दर्शाता है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (अनुच्छेद 338B) की भूमिका भी इसी संदर्भ में रखें। (4) न्यायिक दृष्टिकोण: उच्चतम न्यायालय नीतिगत निर्णयों में सामान्यतः अपीलीय भूमिका नहीं निभाता; हस्तक्षेप तभी उचित है जब निर्णय मनमाना हो या अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करे। आज का प्रकरण दिखाता है कि याचिका का निपटारा कर प्रतिवेदन महापंजीयक और जनगणना आयुक्त के समक्ष रखने का मार्ग खुला रखा गया। (5) निष्कर्ष: नीति-निर्माण की स्वायत्तता, डेटा-गुणवत्ता और सामाजिक न्याय के संतुलन की व्याख्या करते हुए सुझाव दें, जैसे पायलट परीक्षण, गणकों का प्रशिक्षण, और आँकड़ों के सार्वजनिक सत्यापन की व्यवस्था।

स्रोत: orissapost.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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