चक्रवात अरनब: भारत के डिजिटल भविष्य के लिए एक बड़ा जलवायु जोखिम

चक्रवात अरनब: भारत के डिजिटल भविष्य के लिए एक बड़ा जलवायु जोखिम

चक्रवात अरनब: भारत के डिजिटल भविष्य के लिए एक बड़ा जलवायु जोखिम

चक्रवात अरनब: प्रभाव और प्रतिक्रियाहिंद महासागर तापनउष्णता बढ़तीचक्रवात तीव्रतातेज़ हवाएँअवसंरचना पर दबावडेटा केंद्र प्रभावितआर्थिक-प्रशासनिक नुकसासेवाएँ बाधितपुनर्निर्माण प्रक्रियाआजीविका बहाली
चक्रवात अरनब: प्रभाव और प्रतिक्रिया

✎ आपदा प्रबंधन में डिजिटल अवसंरचना को अस्पताल, विद्यालय और बिजली संयंत्रों के समान महत्वपूर्ण परिसंपत्ति मानकर उसकी आपदा-सहनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (महासागरीय तापन, उष्णकटिबंधीय चक्रवात और तटीय भेद्यता)  |  GS Paper III — आपदा प्रबंधन; पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन; आंतरिक सुरक्षा (महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (अवसंरचना क्षेत्र और आर्थिक संवृद्धि पर आपदा का प्रभाव)
  • Prelims: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, आपदा-सहनीय अवसंरचना के लिए गठबंधन (CDRI), सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction), राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC), तूफानी उफान (Storm Surge), समुद्री सतह का तापमान (Sea Surface Temperature)
  • Essay: जलवायु परिवर्तन के दौर में आपदा प्रबंधन: चेतावनी से पुनर्निर्माण तक की समग्र रणनीति, क्या डिजिटल अवसंरचना आज की सबसे महत्वपूर्ण आपदा-सहनीय परिसंपत्ति है?

त्वरित पुनरावृत्ति: आपदा प्रबंधन में डिजिटल अवसंरचना को अस्पताल, विद्यालय और बिजली संयंत्रों के समान महत्वपूर्ण परिसंपत्ति मानकर उसकी आपदा-सहनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

चक्रवात अर्नब (Cyclone Arnab) के स्थलीय टकराव ने यह प्रश्न सामने रखा है कि क्या भारत न केवल लोगों, बल्कि बिजली ग्रिड, परिवहन संपर्कों और डिजिटल अवसंरचना की भी आपदा से रक्षा कर सकता है। तूफान का मार्ग भारत के कुछ बड़े डेटा केंद्र (Data Centre) गलियारों के निकट से गुजरा, इसलिए आपदा प्रबंधन को अब आधुनिक आर्थिक जीवन की निर्भर परिसंपत्तियों तक विस्तृत करने की आवश्यकता पर चर्चा हो रही है। साथ ही, 2024 में चरम मौसम की घटनाओं के आँकड़े और हिंद महासागर के तेज़ तापन से चक्रवातों के बदलते स्वरूप को जोड़कर देखा जा रहा है।

पृष्ठभूमि

  • 2024 में चरम मौसम ने भारत में 366 में से 322 दिनों को प्रभावित किया, जैसा कि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के विश्लेषण में दर्ज है। इन घटनाओं में 3,472 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 2,92,000 घर क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए।
  • 2024 में चरम मौसम से प्रभावित फसल क्षेत्र 2.21 मिलियन हेक्टेयर (2023) से बढ़कर 4.07 मिलियन हेक्टेयर (2024) हो गया, जो लगभग 84 प्रतिशत की वृद्धि है।
  • चक्रवात बिपरजॉय (2023) के समय गुजरात में एक लाख से अधिक लोगों को स्थलीय टकराव से पहले निकाला गया; भारत और पाकिस्तान मिलाकर 1.80 लाख से अधिक लोगों को निचले तटीय क्षेत्रों से हटाया गया। इससे पूर्व-तैयारी की व्यवस्था का महत्व स्पष्ट हुआ।
  • हिंद महासागर के उत्तरी भाग का तेज़ तापन वर्षा के स्वरूप और चक्रवातों की तीव्रता को प्रभावित कर रहा है, जिससे चेतावनी के लिए कम समय उपलब्ध होता है।
  • भारत में आपदा प्रबंधन का ढाँचा आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 पर आधारित है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर पर प्राधिकरण गठित किए गए हैं।

आपदा-सहनीय डिजिटल अवसंरचना क्या है?

  • डिजिटल अवसंरचना में डेटा केंद्र, दूरसंचार टावर, फ़ाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क, भुगतान प्रणालियाँ और सरकारी सूचना प्रणालियाँ शामिल हैं, जिन पर आज वित्तीय, प्रशासनिक और उत्पादन गतिविधियाँ निर्भर हैं।
  • आपदा-सहनीयता का अर्थ है कि ऐसी अवसंरचना आपदा के झटके को झेल सके, सेवाएँ जल्दी बहाल हो सकें और संकट के समय भी आवश्यक सेवाएँ चलती रहें।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70 के अंतर्गत संरक्षित प्रणालियों की व्यवस्था है, और राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC) ऐसी महत्वपूर्ण सूचना प्रणालियों की सुरक्षा पर कार्य करता है।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आपदा शमन (Mitigation) और तैयारी के लिए राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर की योजनाएँ बनाई जाती हैं, जिनमें अवसंरचना-आधारित जोखिम का मूल्यांकन शामिल होना अपेक्षित है।
  • आपदा-सहनीय अवसंरचना के लिए गठबंधन (CDRI) का प्रारंभ भारत ने 2019 में किया था, जिसका उद्देश्य नई और मौजूदा अवसंरचना को जलवायु और आपदा जोखिमों के प्रति सहनीय बनाना है।
  • सेंडाई फ्रेमवर्क (2015–2030) आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए वैश्विक ढाँचा है, जो महत्वपूर्ण अवसंरचना को आपदा-सहनीय बनाने पर बल देता है।
  • चक्रवात के समय तूफानी उफान (Storm Surge) और तेज़ हवाएँ बिजली, संचार और परिवहन संपर्कों को एक साथ बाधित कर सकती हैं, इसलिए अवसंरचना के बहु-क्षेत्रीय समन्वय की आवश्यकता होती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
हिंद महासागर का तापन गर्म समुद्री सतह चक्रवात को अधिक ऊर्जा देती है, जिससे भारी वर्षा, तेज़ हवाओं और तूफानी उछाल (Storm Surge) की संभावना बढ़ती है। उत्तरी हिंद महासागर में तापन तेज़ी से हुआ है।
चक्रवात की तीव्र तीव्रता-वृद्धि तेज़ी से सशक्त होने वाले तूफान में चेतावनी जारी करने, लोगों को आश्रय स्थलों तक पहुँचाने और राहत दलों को तैनात करने का समय घट जाता है।
2024 की चरम मौसमी घटनाएँ CSE के विश्लेषण के अनुसार 366 में से 322 दिन चरम मौसम रहा। इन घटनाओं में 3,472 लोगों की मृत्यु हुई, लगभग 2,92,000 मकान क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए और 40 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि प्रभावित हुई।
बिपरजॉय (2023) का अनुभव गुजरात में 1,00,000 से अधिक लोगों की स्थलभाग से टकराव (Landfall) से पहले निकासी की गई। भारत और पाकिस्तान ने मिलकर 1,80,000 से अधिक लोगों को तटीय निचले क्षेत्रों से हटाया, जिससे मृत्यु-संख्या सीमित रही।
फसल क्षेत्र में तीव्र वृद्धि चरम मौसम से प्रभावित फसल क्षेत्र 2023 में 22.1 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2024 में 40.7 लाख हेक्टेयर हो गया, यानी 84 प्रतिशत की वृद्धि।
डिजिटल अवसंरचना का संकेंद्रण प्रमुख डेटा केंद्र (Data Centre) गलियारे तटीय क्षेत्रों के निकट स्थित हैं। इससे बिजली ग्रिड, परिवहन और संचार अवसंरचना के साथ डिजिटल सेवाएँ भी एक साथ जोखिम में आ जाती हैं।

महत्व

आर्थिक

  • डिजिटल सेवाएँ, बैंकिंग, ई-कॉमर्स और उत्पादन प्रणालियाँ बिजली और संचार पर निर्भर हैं, इसलिए उनके बाधित होने से आर्थिक आघात कई क्षेत्रों तक फैलता है।
  • फसल-हानि, मत्स्य-क्षेत्र की क्षति और छोटे व्यापारियों के स्टॉक का नुकसान ग्रामीण और तटीय आय को सीधे प्रभावित करता है।
  • आपदा-पश्चात पुनर्निर्माण का बोझ स्थानीय निकायों और राज्य वित्त पर पड़ता है, जिससे विकास-व्यय पर दबाव बढ़ता है।

रणनीतिक एवं सुरक्षा

  • आपात स्थिति में संचार और डेटा सेवाओं की निरंतरता राष्ट्रीय आपदा-प्रतिक्रिया का आधार है। महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना का बाधित होना प्रशासनिक नियंत्रण को कमज़ोर कर सकता है।
  • बिजली ग्रिड और परिवहन संपर्क की सुरक्षा ऊर्जा सुरक्षा और रसद-तंत्र की स्थिरता से जुड़ी है।

सामाजिक एवं मानवीय

  • समय पर चेतावनी, आश्रय-स्थल और निकासी मार्गों से हजारों जीवन बचाए जा सकते हैं, जैसा बिपरजॉय के अनुभव से स्पष्ट है।
  • ग्रामीण परिवारों की वर्षों की बचत एक ही बाढ़ या चक्रवात में समाप्त हो सकती है, जिससे गरीबी और असुरक्षा बढ़ती है।

शासन एवं प्रशासन

  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (National Disaster Response Force) जैसी संस्थाओं की तैनाती और पूर्व-चेतावनी तंत्र नीति-निर्माण के केंद्र में हैं।
  • आपदा-तैयारी की परिधि अब केवल जीवन-रक्षा से आगे बढ़कर अवसंरचना-संरक्षण तक पहुँचनी चाहिए।

चुनौतियाँ

1. डिजिटल अवसंरचना की आपदा-रोधिता

  • डेटा केंद्र, दूरसंचार टावर और बिजली उपकेंद्र तटीय तूफान की चपेट में आ सकते हैं, और उनकी सुरक्षा के मानक अस्पतालों या विद्यालयों के समान नहीं माने जाते।
  • अवसंरचना की निर्माण-संहिता में बाढ़-स्तर, पवन-भार और बिजली-आपूर्ति के बैकअप का स्पष्ट समावेश आवश्यक है।

2. तीव्र तीव्रता और पूर्व-चेतावनी का समय

  • तेज़ी से सशक्त होने वाले चक्रवात में पूर्वानुमान की सटीकता और चेतावनी के प्रसार की गति निर्णायक हो जाती है।
  • निकासी के लिए कम समय होने पर सबसे अधिक जोखिम में वे लोग होते हैं जिनके पास परिवहन या सूचना के साधन सीमित हैं।

3. पुनर्निर्माण और आजीविका का संकट

  • आपदा का प्रभाव तूफान के बाद महीनों और वर्षों तक चलता है, जबकि आपदा-प्रबंधन प्रायः प्रारंभिक दिनों पर केंद्रित रहता है।
  • फसल-हानि, मत्स्य-नौकाओं की क्षति और छोटे व्यापारियों की पूँजी का नुकसान ग्रामीण आजीविका को लंबे समय तक कमज़ोर रखता है।

4. चरम मौसम का संचयी प्रभाव

  • चक्रवात, बाढ़, लू और सूखा प्रायः एक ही वर्ष में एक-दूसरे पर आते हैं, जिससे क्षति संचयी और जटिल हो जाती है।
  • एक आपदा से उबरने से पहले दूसरी आपदा आने पर राहत-संसाधनों और स्थानीय क्षमता पर दोहरा दबाव पड़ता है।

5. केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर का समन्वय

  • आपदा-प्रबंधन में केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की भूमिकाएँ परस्पर जुड़ी हैं, और डिजिटल अवसंरचना के स्वामित्व में निजी क्षेत्र भी शामिल है।
  • बड़े जल-क्षेत्रों और तटीय पट्टियों में अंतर्राज्यीय तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
डेटा केंद्रों की सुरक्षा तटीय तूफान में बिजली और शीतलन प्रणालियाँ बाधित होने से डिजिटल सेवाएँ ठप हो सकती हैं।
पूर्वानुमान की गति तेज़ी से तीव्र होने वाले चक्रवात में निकासी के लिए समय कम पड़ता है।
आजीविका की क्षति फसल, नौकाओं और छोटे व्यापार की हानि से ग्रामीण परिवारों की बचत समाप्त हो सकती है।
संचयी आपदाएँ एक ही वर्ष में कई आपदाएँ आने से राहत-संसाधन और स्थानीय क्षमता बार-बार दबाव में आती है।
पुनर्निर्माण का वित्तीय बोझ स्थानीय निकायों पर मरम्मत और पुनर्निर्माण का व्यय बढ़ता है, जिससे विकास-कार्य प्रभावित होते हैं।
निर्माण मानकों का अंतर अवसंरचना के लिए आपदा-रोधी निर्माण-संहिता का सार्वभौमिक प्रयोग अभी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं है।

आगे की राह

  • डेटा केंद्रों, दूरसंचार और बिजली अवसंरचना को अस्पताल और विद्यालय के समान महत्वपूर्ण श्रेणी में रखकर उनके लिए आपदा-रोधी निर्माण-मानक तय किए जाएँ।
  • तटीय क्षेत्रों में नई डिजिटल और औद्योगिक परियोजनाओं के स्थान-चयन में जलवायु-जोखिम मानचित्रण को अनिवार्य आधार बनाया जाए।
  • तेज़ी से तीव्र होने वाले चक्रवातों के लिए पूर्वानुमान-क्षमता और बहु-माध्यम चेतावनी प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए, ताकि अंतिम व्यक्ति तक समय पर सूचना पहुँचे।
  • आपदा-तैयारी को प्रारंभिक राहत से आगे बढ़ाकर पुनर्वास, आजीविका-पुनर्स्थापन और फसल-बीमा के साथ एकीकृत किया जाए।
  • केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच आपदा-पूर्व योजना और संसाधन-साझेदारी के लिए स्पष्ट समन्वय-तंत्र बनाया जाए।
  • बिजली और संचार सेवाओं के लिए बैकअप ऊर्जा और वैकल्पिक नेटवर्क की व्यवस्था की जाए, ताकि आपात स्थिति में सेवाएँ निरंतर चलती रहें।
  • जल-क्षेत्रों और तटीय पट्टियों में अंतर्राज्यीय सहयोग को संस्थागत रूप दिया जाए, जैसा बाढ़-प्रबंधन में आवश्यक माना गया है।
  • जलवायु-अनुकूलन को अवसंरचना-नियोजन, शहरी विकास और आपदा-वित्त के मुख्य अंग के रूप में शामिल किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

आपदा प्रबंधन · चक्रवात · डिजिटल अवसंरचना (Digital Infrastructure) · आपदा-सहनीय अवसंरचना (Disaster Resilient Infrastructure) · आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) · राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) · राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) · सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) · हिंद महासागर का तापन · प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) · महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना (Critical Information Infrastructure) · राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: आपदा में जीवन और सुरक्षा का संरक्षण
  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(छ): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का नागरिक कर्तव्य

अवधारणा प्रवाह

हिंद महासागर का तापन बढ़ता है  →  समुद्री सतह से अधिक ऊष्मा और नमी चक्रवात को ऊर्जा देती है  →  चक्रवात तेज़ी से तीव्र होकर अधिक वर्षा, तेज़ हवाएँ और तूफानी उछाल लाता है  →  बिजली ग्रिड, परिवहन और डेटा केंद्र जैसी महत्वपूर्ण अवसंरचना पर सीधा दबाव पड़ता है  →  सेवा-बाधा से आर्थिक, प्रशासनिक और सामाजिक नुकसान फैलता है  →  आपदा के बाद पुनर्निर्माण और आजीविका-पुनर्स्थापन की लंबी प्रक्रिया शुरू होती है  →  आपदा-रोधी डिजाइन और एकीकृत नीति से भविष्य के जोखिम को कम किया जाता है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उष्ण समुद्री सतह चक्रवातों को अधिक ऊर्जा प्रदान कर सकती है, जिससे भारी वर्षा और तेज़ हवाओं की संभावना बढ़ती है।
2. तेज़ी से तीव्र होने वाले चक्रवात चेतावनी जारी करने और लोगों को निकालने के लिए कम समय छोड़ते हैं।
3. आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई फ्रेमवर्क (2015–2030) एक बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. इनमें से कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है, क्योंकि गर्म समुद्री सतह से चक्रवातों को ऊर्जा मिलती है। कथन 2 सही है, क्योंकि तीव्र होते चक्रवात पूर्वानुमान और निकासी के लिए कम समय देते हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि सेंडाई फ्रेमवर्क मार्च 2015 में जापान के सेंडाई में अपनाया गया स्वैच्छिक एवं गैर-बाध्यकारी ढाँचा है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में किए गए प्रावधान के अंतर्गत हुआ है।
कारण (R): NDRF पूर्णतः राज्य पुलिस के अधीन कार्य करता है और उसका नियंत्रण राज्य सरकारों के पास है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A सही है, किंतु R गलत है — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि NDRF का प्रावधान आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में है। कारण (R) गलत है, क्योंकि NDRF एक केंद्रीय विशेषज्ञ बल है जो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत कार्य करता है, न कि राज्य पुलिस के अधीन।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:
सूची I (संस्था/ढाँचा): A. राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC) B. सेंडाई फ्रेमवर्क C. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) D. आपदा-सहनीय अवसंरचना के लिए गठबंधन (CDRI)
सूची II (आधार): 1. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70 के अंतर्गत स्थापित 2. संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाया गया वैश्विक आपदा जोखिम न्यूनीकरण ढाँचा (2015–2030) 3. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत गठित बल 4. भारत की पहल पर वर्ष 2019 में शुरू किया गया अंतरराष्ट्रीय गठबंधन

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-3, D-4
  3. A-3, B-2, C-1, D-4
  4. A-1, B-4, C-3, D-2

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — NCIIPC सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70 के अंतर्गत महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना की सुरक्षा के लिए स्थापित है (A-1)। सेंडाई फ्रेमवर्क 2015–2030 का वैश्विक ढाँचा है (B-2)। NDRF आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत गठित है (C-3)। CDRI भारत की पहल पर 2019 में शुरू हुआ (D-4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में आपदा प्रबंधन का ढाँचा मुख्यतः जीवन-रक्षा पर केंद्रित रहा है, जबकि चक्रवात और बाढ़ जैसी घटनाएँ अब बिजली, परिवहन और डिजिटल अवसंरचना को भी प्रभावित कर रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के ढाँचे की सीमाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना को आपदा-सहनीय अवसंरचना की नीति में शामिल किया जाना चाहिए? अपने तर्क दीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना: (1) परिचय: चक्रवात आपदा (2024 के आँकड़े: CSE के विश्लेषण के अनुसार अत्यधिक मौसम की घटनाएँ 366 में से 322 दिन, 3,472 मृत्यु, लगभग 2,92,000 मकान क्षतिग्रस्त/नष्ट, 4 मिलियन हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र प्रभावित; फसल क्षेत्र 2.21 मिलियन हेक्टेयर (2023) से 4.07 मिलियन हेक्टेयर (2024), लगभग 84 प्रतिशत वृद्धि)। (2) कारण-विश्लेषण: हिंद महासागर के तापन से चक्रवातों की तीव्रता और तीव्र-गहनता (rapid intensification) में वृद्धि, जिससे चेतावनी का समय घटता है। (3) आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की संस्थागत व्यवस्था: धारा 3 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का अध्यक्ष प्रधानमंत्री; धारा 44 के अंतर्गत NDRF; राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA); राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP), 2019 का आपदा-पूर्व, आपदा-दौरान और आपदा-पश्चात चक्र। सीमाएँ: ढाँचा मुख्यतः जीवन-रक्षा और राहत पर केंद्रित, पुनर्निर्माण-वित्त तथा महत्वपूर्ण सेवाओं की निरंतरता पर अपेक्षाकृत कम बल। (4) बिपरजॉय (2023) का उदाहरण: गुजरात में 1,00,000 से अधिक लोगों की निकासी और भारत-पाकिस्तान द्वारा 1,80,000 से अधिक लोगों को निचले तटीय क्षेत्रों से हटाना; प्रशंसनीय तैयारी, किंतु यह केवल आपदा के प्रथम दिनों का प्रबंधन है। (5) अंतरराष्ट्रीय ढाँचा: सेंडाई फ्रेमवर्क (2015–2030) का लक्ष्य-घ, जो महत्वपूर्ण अवसंरचना की क्षति और मूलभूत सेवाओं में व्यवधान घटाने पर केंद्रित है; CDRI (2019, भारत की पहल) का उद्देश्य आपदा-सहनीय अवसंरचना। (6) डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा के संस्थागत उपाय: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70 के अंतर्गत NCIIPC; दूरसंचार और विद्युत ग्रिड के साथ परस्पर-निर्भरता (interdependence) का प्रश्न। (7) पक्ष में तर्क: डेटा केंद्र, दूरसंचार और भुगतान प्रणालियाँ आपातकालीन संचार, चेतावनी वितरण और राहत-समन्वय की रीढ़ हैं; एक कड़ी टूटने से बहु-क्षेत्रीय संकट। (8) विपक्ष/सावधानियाँ: अधिकांश डिजिटल संपत्ति निजी स्वामित्व में होने से उत्तरदायित्व का निर्धारण जटिल; राज्यों की वित्तीय क्षमता और आपदा-निधियों (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि, राज्य आपदा प्रतिक्रिया निधि) की सीमित गुंजाइश; अति-केंद्रीकृत सुरक्षा बनाम स्थानीय लचीलापन। (9) संतुलित निष्कर्ष: जोखिम-आधारित मानचित्रण, बहु-मार्गीय संचार (redundancy), विद्युत-दूरसंचार-डिजिटल सेवाओं का समन्वित नियोजन, सार्वजनिक-निजी साझेदारी में अवसंरचना-मानक, तथा स्थानीय स्तर पर क्षमता-निर्माण; सतत और वित्तपोषित पुनर्निर्माण की व्यवस्था।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment