31 Oct जी20 बैठक: जयशंकर और काजा कallas ने यूक्रेन युद्ध और खाड़ी संकट पर चर्चा की
✎ नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री मार्गों की सुरक्षा का विधिक आधार UNCLOS (1982) है; संघर्ष में नागरिक जहाजों पर हमलों का सबसे अधिक भार ग्लोबल साउथ पर पड़ता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और प्रमुख शक्तियों/समूहों के साथ संबंध; बहुपक्षीय मंच; G20) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला की लचीलापन और वैश्विक व्यापार पर प्रभाव) | GS Paper I — भूगोल (समुद्री चोकपॉइंट्स और सामरिक जलमार्ग)
- Prelims: G20 (Group of Twenty) — स्थापना, सदस्यता और अध्यक्षता का क्रम, UNCLOS (संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय) — 1982, भारत द्वारा अनुसमर्थित, नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) और निर्दोष मार्ग (Innocent Passage), अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) — समुद्र तट से 200 समुद्री मील तक, मॉन्ट्रो अभिसमय, 1936 — काला सागर और तुर्की के जलडमरूमध्यों (बोस्पोरस, डार्डानेल्स) से संबंधित, सामरिक जलमार्ग/चोकपॉइंट्स — होर्मुज़ जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब, स्वेज़ नहर, यूरोपीय संघ की विदेश एवं सुरक्षा नीति और उच्च प्रतिनिधि (HRVP) का पद, अंतरराष्ट्रीय समुद्री विधि अधिकरण (ITLOS), हैम्बर्ग
- Essay: समुद्री मार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा: संघर्ष के दौर में नौवहन की सुरक्षा और विकासशील देशों पर उसका असमान भार, संघर्ष में कूटनीति बनाम सैन्य समाधान: बहुपक्षीय मंचों की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय विधि का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री मार्गों की सुरक्षा का विधिक आधार UNCLOS (1982) है; संघर्ष में नागरिक जहाजों पर हमलों का सबसे अधिक भार ग्लोबल साउथ पर पड़ता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
G20 विदेश मंत्रियों की बैठक के अवसर पर अटलांटा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यूरोपीय संघ की उच्च प्रतिनिधि (HRVP) काजा कैलास से मुलाकात हुई, जिसमें यूक्रेन युद्ध और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति पर चर्चा हुई। कैलास ने समुद्री मार्गों पर हुए हमलों, काला सागर में नौवहन की स्वतंत्रता से जुड़े प्रस्तावित व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर शुल्क एवं फीस के विरोध का उल्लेख किया। जयशंकर ने पूर्ण सम्मेलन में कहा कि संघर्षों का समाधान सैन्य उपायों से नहीं, बल्कि कूटनीति से होना चाहिए, तथा नागरिक नौवहन पर हमलों का सबसे अधिक भार ग्लोबल साउथ पर पड़ रहा है, जिससे ईंधन, खाद्यान्न और उर्वरकों की उपलब्धता और लागत प्रभावित हो रही है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विधि, विशेषकर UNCLOS के ढांचे के भीतर, नौवहन की स्वतंत्रता की रक्षा और हमलों की समाप्ति की आवश्यकता पर बल दिया।
पृष्ठभूमि
- G20 की शुरुआत 1999 में वित्त मंत्रियों के मंच के रूप में हुई थी और 2008 से इसमें राष्ट्राध्यक्ष स्तर की शिखर बैठकें होने लगीं; इसमें विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं और यूरोपीय संघ सम्मिलित हैं।
- रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व में जारी तनाव ने ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति तथा समुद्री व्यापार को प्रभावित किया है, जिससे आपूर्ति श्रृंखलाओं की लचीलापन पर वैश्विक चर्चा तेज हुई है।
- काला सागर क्षेत्र यूक्रेन और रूस दोनों के लिए अनाज व ऊर्जा निर्यात का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है, इसलिए वहां नौवहन की सुरक्षा वैश्विक खाद्य सुरक्षा से सीधे जुड़ी है।
- भारत UNCLOS का अनुसमर्थनकर्ता है और समुद्री मार्गों पर अंतरराष्ट्रीय विधि के पालन का पक्षधर रहा है; विकासशील देशों के हितों को बहुपक्षीय मंचों पर उठाना उसकी विदेश नीति का सतत तत्व है।
- इस तरह की बैठकों में ‘ग्लोबल साउथ’ की चिंताएं (ऊर्जा और खाद्य की लागत, ऋण और विकास) को प्रमुखता से उठाया जाता है, जो G20 के एजेंडे का भी हिस्सा है।
नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री विधि क्या है?
- नौवहन की स्वतंत्रता का अर्थ है कि सभी देशों के जहाज अंतरराष्ट्रीय जल में बिना बाधा के आवागमन कर सकें; यह समुद्री विधि का मूल सिद्धांत है।
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS), 1982 समुद्री क्षेत्रों का विधिक ढांचा निर्धारित करता है; यह 1994 में लागू हुआ।
- आंतरिक जल, प्रादेशिक समुद्र (तट से 12 समुद्री मील तक), सन्निहित क्षेत्र और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ, 200 समुद्री मील तक) UNCLOS के अंतर्गत परिभाषित हैं।
- निर्दोष मार्ग (Innocent Passage) के अंतर्गत विदेशी जहाज तटीय राज्य के प्रादेशिक समुद्र से होकर शांतिपूर्ण ढंग से गुजर सकते हैं, पर उन्हें तटीय राज्य की शांति और सुरक्षा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
- अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों में पारगमन मार्ग (Transit Passage) का अधिकार लागू होता है, जो सामान्य व्यापार के लिए आवश्यक है।
- मॉन्ट्रो अभिसमय, 1936 काला सागर से जुड़े जलडमरूमध्यों के नौवहन को नियंत्रित करता है, इसलिए काला सागर से संबंधित कोई भी व्यवस्था इस ढांचे से भी जुड़ी होती है।
- अंतरराष्ट्रीय समुद्री विधि अधिकरण (ITLOS), हैम्बर्ग में स्थित है और UNCLOS से संबंधित विवादों का निपटारा करता है।
- ऊर्जा व व्यापार के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब और स्वेज़ नहर जैसे सामरिक चोकपॉइंट्स अत्यंत संवेदनशील हैं, क्योंकि इनमें बाधा पूरे विश्व की आपूर्ति को प्रभावित करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बैठक का स्वरूप | जी20 (G20) विदेश मंत्रियों की बैठक, अटलांटा में। भारत के विदेश मंत्री (External Affairs Minister) एस. जयशंकर और यूरोपीय संघ की उच्च प्रतिनिधि (EU HRVP) काया कल्लास के बीच बैठक के इतर द्विपक्षीय चर्चा हुई। |
| चर्चा के विषय | रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति। दोनों पक्षों ने वैश्विक संघर्षों से उत्पन्न आर्थिक और सामरिक जोखिमों पर विचार किया। |
| समुद्री मार्गों पर चिंता | जहाज़ों और नाविकों पर हमलों से मुक्त नौवहन (freedom of navigation) खतरे में है। कल्लास ने काला सागर (Black Sea) क्षेत्र के लिए मुक्त नौवहन व्यवस्था का आह्वान किया। |
| शुल्क और टोल पर रुख | यूरोपीय संघ ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर टोल और शुल्क के विरोध को दोहराया। इससे समुद्री मार्गों की निःशुल्क पहुँच का सिद्धांत रेखांकित हुआ। |
| भारत का दृष्टिकोण | सैन्य समाधान से वैश्विक चुनौतियाँ हल नहीं होंगी, इसलिए कूटनीति को अवसर देना आवश्यक है। हमलों की समाप्ति अंतरराष्ट्रीय विधि, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS) के ढाँचे में होनी चाहिए। |
| वैश्विक दक्षिण पर प्रभाव | समुद्री हमलों का खामियाजा विकासशील देश अधिक उठा रहे हैं। ईंधन, खाद्यान्न और उर्वरक की उपलब्धता तथा उनकी लागत पर सीधा असर पड़ रहा है। |
महत्व
कूटनीतिक (Diplomatic)
- जी20 जैसे बहुपक्षीय मंच पर संकट-प्रबंधन के लिए सीधा संवाद संभव होता है।
- बैठक के इतर द्विपक्षीय चर्चा से बहुस्तरीय कूटनीति (multi-track diplomacy) का व्यावहारिक स्वरूप दिखता है।
- भारत का रुख संवाद और अंतरराष्ट्रीय विधि पर आधारित समाधान की ओर है, जो उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की परंपरा से मेल खाता है।
आर्थिक (Economic)
- कल्लास के अनुसार ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला का लचीलापन वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक है।
- समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा हैं, इसलिए उनमें व्यवधान से व्यापार लागत और मुद्रास्फीति (Inflation) पर दबाव बढ़ता है।
सामुद्रिक (Maritime)
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS) 1982 में अपनाया गया और 1994 से लागू है। भारत इसका पक्षकार है।
- मुक्त नौवहन और निर्बाध समुद्री पहुँच के लिए UNCLOS का पालन आधारभूत शर्त है।
मानवीय और विकासात्मक (Humanitarian and Developmental)
- ईंधन, खाद्यान्न और उर्वरक की ऊँची लागत से विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है।
- भारत द्वारा वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को उठाना उसके नेतृत्वकारी प्रयासों को रेखांकित करता है।
चुनौतियाँ
1. समुद्री मार्गों की सुरक्षा और मुक्त नौवहन पर खतरा
- जहाज़ों और नाविकों पर हमलों से समुद्री व्यापार असुरक्षित हो रहा है।
- संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ती है।
- मुक्त नौवहन के सिद्धांत को व्यवहार में लागू करने के लिए प्रभावी निगरानी और सहयोग आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-II अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS-III समुद्री सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा के बाह्य आयाम
2. ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति शृंखला में व्यवधान
- ऊर्जा और उर्वरक के आयात पर निर्भर देशों की लागत और उपलब्धता अनिश्चित हो जाती है।
- आपूर्ति शृंखला में झटकों से खाद्य कीमतें बढ़ती हैं और गरीब वर्ग सर्वाधिक प्रभावित होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-III खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन
3. वैश्विक दक्षिण पर असमान बोझ
- संघर्ष का आर्थिक खामियाजा उन देशों पर अधिक पड़ता है जिनके पास वित्तीय और सैन्य संसाधन सीमित हैं।
- विकसित और विकासशील देशों के बीच जोखिम-वितरण में असंतुलन बढ़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-II भारत और विकासशील देशों के संबंध; भारत की विदेश नीति में वैश्विक दक्षिण नेतृत्व
4. बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता
- संघर्षों के समाधान में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की सीमाएँ सामने आती हैं।
- G20 जैसे मंचों पर सर्वसम्मति बनाना कठिन होता है, जिससे ठोस परिणाम सीमित रह जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-II अंतरराष्ट्रीय संगठन, उनकी भूमिका और सुधार की आवश्यकता
5. टोल-शुल्क और मुक्त नौवहन के सिद्धांत में तनाव
- कुछ देशों द्वारा समुद्री मार्गों पर शुल्क लगाने की प्रवृत्ति मुक्त नौवहन के सिद्धांत को चुनौती देती है।
- UNCLOS में मार्ग-पारगमन के अधिकार और तटीय राष्ट्रों के हितों के बीच संतुलन बनाना जटिल है।
यूपीएससी लिंक: GS-II अंतरराष्ट्रीय विधि; UNCLOS के प्रावधान और समुद्री शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| समुद्री हमले | नाविकों की सुरक्षा और जहाज़ों की आवाजाही पर सीधा खतरा |
| ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति | आयात पर निर्भर देशों में लागत वृद्धि और आपूर्ति में अनिश्चितता |
| खाद्य मूल्य | खाद्यान्न कीमतों में वृद्धि से गरीब उपभोक्ताओं पर बोझ |
| टोल और शुल्क का विवाद | मुक्त नौवहन के सिद्धांत और व्यापार की निःशुल्क पहुँच पर प्रश्नचिह्न |
| संस्थागत सीमाएँ | बहुपक्षीय मंचों पर सर्वसम्मति के अभाव से ठोस समाधान में विलंब |
आगे की राह
- UNCLOS और अंतरराष्ट्रीय विधि के ढाँचे में हमलों की समाप्ति और मुक्त नौवहन की पुनर्पुष्टि के लिए बहुपक्षीय संवाद को गति दी जाए।
- समुद्री क्षेत्र में सूचना साझाकरण और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ किया जाए, ताकि जहाज़ों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
- ऊर्जा आयात के स्रोतों और मार्गों में विविधता लाई जाए तथा रणनीतिक भंडार की क्षमता बढ़ाई जाए।
- उर्वरक और खाद्यान्न की आपूर्ति के लिए वैकल्पिक व्यापार मार्गों और दीर्घकालिक अनुबंधों पर विचार किया जाए।
- विकासशील देशों की चिंताओं को जी20 और अन्य मंचों पर औपचारिक रूप से शामिल किया जाए।
- संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक पहल और मानवीय सहायता को प्राथमिकता दी जाए।
- यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख भागीदारों के साथ ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा पर नियमित परामर्श तंत्र बनाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
G20 समूह · वैश्विक संघर्ष · यूक्रेन संघर्ष · खाड़ी क्षेत्र की स्थिति · ऊर्जा सुरक्षा · खाद्य आपूर्ति · व्यापार मार्ग · नौवहन की स्वतंत्रता · अंतर्राष्ट्रीय कानून · UNCLOS · कूटनीति का महत्व · ग्लोबल साउथ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति, विधि और संधि-दायित्वों के प्रति सम्मान
अवधारणा प्रवाह
क्षेत्रीय संघर्ष (रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति) का विस्तार → समुद्री मार्गों और जहाज़ों पर हमले, जिससे मुक्त नौवहन बाधित होता है → ऊर्जा, खाद्यान्न और उर्वरक की आपूर्ति तथा लागत पर दबाव → विकासशील देशों (वैश्विक दक्षिण) पर असमान आर्थिक और मानवीय बोझ → जी20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कूटनीतिक परामर्श → संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS) और अंतरराष्ट्रीय विधि के ढाँचे में समाधान की माँग
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. G20 समूह विश्व की प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाता है।
2. G20 का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।
3. भारत G20 का संस्थापक सदस्य है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। G20 में 19 देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं, जो वैश्विक GDP का लगभग 85%, वैश्विक व्यापार का 75% से अधिक और विश्व की दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कथन 2 सही है। G20 की स्थापना 1999 में एशियाई वित्तीय संकट के बाद हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देना था।
कथन 3 सही है। भारत G20 के संस्थापक सदस्यों में से एक है।
Q2. समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS) के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- यह समुद्री गतिविधियों के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- यह तटीय राज्यों के लिए प्रादेशिक जल, सन्निहित क्षेत्र और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) को परिभाषित करता है।
- यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा प्रशासित है।
- यह नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री संसाधनों के उपयोग के सिद्धांतों को स्थापित करता है।
उत्तर: यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा प्रशासित है। — UNCLOS समुद्री गतिविधियों के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है और तटीय राज्यों के लिए विभिन्न समुद्री क्षेत्रों को परिभाषित करता है, साथ ही नौवहन की स्वतंत्रता जैसे सिद्धांतों को स्थापित करता है। हालाँकि, यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा प्रशासित नहीं है; IMO समुद्री सुरक्षा और जहाजों से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए जिम्मेदार संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है, जबकि UNCLOS स्वयं एक संधि है और इसका कोई विशिष्ट प्रशासनिक निकाय नहीं है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वर्तमान वैश्विक संघर्षों के संदर्भ में, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में G20 जैसे बहुपक्षीय मंचों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** वैश्विक संघर्षों (जैसे यूक्रेन और खाड़ी क्षेत्र) के कारण ऊर्जा, खाद्य और नौवहन पर पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख। G20 जैसे बहुपक्षीय मंचों की प्रासंगिकता।
2. **G20 की भूमिका:**
* **आर्थिक समन्वय:** वैश्विक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में G20 की क्षमता।
* **नीतिगत संवाद:** सदस्य देशों के बीच नीतिगत समन्वय और आम सहमति बनाने का मंच।
* **संकट प्रबंधन:** ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित होने से बचाने के लिए सामूहिक प्रतिक्रियाएँ।
* **नौवहन की स्वतंत्रता:** अंतर्राष्ट्रीय कानून (विशेषकर UNCLOS) के तहत नौवहन मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राजनयिक प्रयास।
* **ग्लोबल साउथ पर प्रभाव:** विकासशील देशों पर संघर्षों के असमान प्रभाव को कम करने के लिए G20 की जिम्मेदारी।
3. **समालोचनात्मक विश्लेषण:**
* **सीमित बाध्यकारी शक्ति:** G20 के निर्णय गैर-बाध्यकारी होते हैं, जिससे उनके कार्यान्वयन में चुनौतियाँ आती हैं।
* **सदस्य देशों के हित:** सदस्य देशों के विविध और कभी-कभी विरोधाभासी राष्ट्रीय हित आम सहमति तक पहुँचने में बाधा डालते हैं।
* **भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण:** वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में सर्वसम्मति बनाना कठिन।
* **कार्यान्वयन की चुनौतियाँ:** घोषित नीतियों और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच का अंतर।
4. **आगे की राह/सुझाव:**
* अधिक समावेशी और प्रभावी संवाद की आवश्यकता।
* अंतर्राष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करना।
* विकासशील देशों की चिंताओं को प्राथमिकता देना।
* कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधानों पर जोर।
5. **निष्कर्ष:** G20 जैसे मंचों की सीमाओं के बावजूद, वैश्विक चुनौतियों का सामना करने और सामूहिक समाधान खोजने में उनकी अपरिहार्य भूमिका पर बल।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Anthropology VS PSIR
- Best PSIR optional coaching
- Best PSIR optional coaching online
- Best PSIR optional teacher
- जी20 बैठक: जयशंकर और काजा कallas ने यूक्रेन युद्ध और खाड़ी संकट पर चर्चा की - October 31, 2026
- Government Extends Cotton Import Duty Exemption Till 2026: UPSC Economy Analysis - October 31, 2026
- उड़ीसा में चक्रवात अरनब के बाद बचाव अभियान तेज, जानिए नवीनतम स्थिति - October 31, 2026

No Comments