केरल के जनजातीय अध्ययन केंद्रों का संख्या से परे मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?

केरल के जनजातीय अध्ययन केंद्रों का संख्या से परे मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?

केरल के जनजातीय अध्ययन केंद्रों का संख्या से परे मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?

जनजातीय शिक्षा का मूल्यांकनवर्तमान मूल्यांकनसुझाया गया मूल्यांकनआधारभौतिक संसाधन और आँकड़ेसहभागिता और सामाजिक संबंधमापनामांकन, भवन, उत्तीर्णता प्रतिशतसीखने का स्तर, आत्मविश्वासफोकसपहुँच और उपलब्धतावास्तविक उपलब्धि और समावेशन
जनजातीय शिक्षा का मूल्यांकन

✎ पहुँच (Access) केवल नामांकन और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, जबकि वास्तविक शिक्षा के लिए सहभागिता (Participation) और सीखने के परिणामों का गुणात्मक मूल्यांकन आवश्यक है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय (अनुसूचित जनजातियों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ, शिक्षा से संबंधित नीतियाँ और उनका मूल्यांकन)  |  GS Paper I — भारतीय समाज (जनजातीय समुदाय, सामाजिक संरचना और शिक्षा में असमानता)
  • Prelims: अनुच्छेद 21क (Article 21A) — 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 46 (Article 46) — अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की उन्नति का राज्य का दायित्व (नीति-निदेशक तत्व), अनुच्छेद 275(1) (Article 275(1)) — अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु केंद्र से अनुदान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009), समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) — केंद्र प्रायोजित एकीकृत योजना, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (Eklavya Model Residential Schools — EMRS) — जनजातीय विद्यार्थियों के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय की योजना, UDISE+ — विद्यालय शिक्षा का एकीकृत सूचना प्रणाली आँकड़ा तंत्र (नामांकन और अवसंरचना के आँकड़े), ASER (Annual Status of Education Report) — सीखने के परिणामों (Learning Outcomes) का सर्वेक्षण आधारित मापन
  • Essay: पहुँच सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं: सीखने के लिए विद्यार्थी की सहभागिता और सामाजिक परिवेश का महत्व, संख्याओं से परे शिक्षा: नीति-मूल्यांकन में गुणात्मक संकेतकों की आवश्यकता

त्वरित पुनरावृत्ति: पहुँच (Access) केवल नामांकन और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, जबकि वास्तविक शिक्षा के लिए सहभागिता (Participation) और सीखने के परिणामों का गुणात्मक मूल्यांकन आवश्यक है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरलम (Keralam) सरकार की समूह्य पठन मुरी (Samoohya Patana Muri), जिसे सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres — CSC) भी कहा जाता है, वर्ष 2018 से जनजातीय समुदायों के बच्चों की सीखने की आवश्यकताओं को सहारा देने के लिए चलाई जा रही है। उक्त लेख के अनुसार, कसरगोड जिले की एक जनजातीय बस्ती में ये केंद्र कंप्यूटर, अध्ययन सामग्री, विस्तारित समय तक खुले कक्ष और प्रति विद्यार्थी प्रतिदिन ₹20 के हल्के नाश्ते जैसी सुविधाओं के रूप में आसानी से गिने जा सकते हैं। पर लेख का मुख्य तर्क यह है कि जो बात सबसे अधिक मायने रखती है, वह गिनी नहीं जा सकती: क्या परीक्षा में असफल होने वाला जनजातीय विद्यार्थी अगले दिन आत्मविश्वास के साथ सहायता माँगने जा पाता है, या उसे दूर धकेल दिया जाता है। इसलिए ऐसी योजनाओं का मूल्यांकन केवल भौतिक संसाधनों और आँकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि सहभागिता और सामाजिक संबंधों की गुणवत्ता के आधार पर भी होना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • संविधान का अनुच्छेद 21क और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 सभी बच्चों के लिए शिक्षा की विधिक गारंटी देते हैं, किंतु इसमें नामांकन और विद्यालय तक पहुँच पर अधिक बल है, सीखने की वास्तविक उपलब्धि पर नहीं।
  • अनुच्छेद 46 के अंतर्गत राज्य से अनुसूचित जनजातियों सहित कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक हितों की विशेष उन्नति की अपेक्षा की गई है, जिसके लिए राज्य स्तर पर लक्षित हस्तक्षेप आवश्यक हो जाते हैं।
  • सामाजिक-भौगोलिक कारणों से जनजातीय बस्तियों में विद्यालय की दूरी, मातृभाषा और विद्यालय की भाषा में अंतर, घरेलू आर्थिक दबाव और शिक्षकों के साथ संवाद की कमी जैसी बाधाएँ बनी रहती हैं।
  • सरकारी नीतियों में प्रायः UDISE+ जैसे प्रशासनिक आँकड़ों से नामांकन, भवन और उत्तीर्णता प्रतिशत मापे जाते हैं, जबकि ASER जैसे सर्वेक्षण सीखने के स्तर की जाँच करते हैं; दोनों दृष्टियों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान (Foundational Literacy and Numeracy) तथा कम-से-कम कक्षा 5 तक मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा पर बल दिया गया है, जो जनजातीय विद्यार्थियों के लिए प्रासंगिक है।

सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres) क्या है?

  • सामुदायिक अध्ययन केंद्र ऐसे सहायक स्थान हैं जहाँ विद्यालय के समय के बाद भी विद्यार्थी पढ़ सकें और अध्ययन के लिए सहायता प्राप्त कर सकें।
  • केरलम में समूह्य पठन मुरी के अंतर्गत ये केंद्र अनुसूचित जनजाति विकास विभाग (Scheduled Tribes Development Department) द्वारा संचालित किए जाते हैं और वर्ष 2018 से चल रहे हैं।
  • इन केंद्रों में सामान्यतः कंप्यूटर, अध्ययन सामग्री, खुला कक्ष और हल्का नाश्ता उपलब्ध कराया जाता है, जिससे पढ़ाई की भौतिक बाधाएँ कम हों।
  • पहुँच (Access) का अर्थ है विद्यार्थी का विद्यालय या संसाधनों तक पहुँच पाना, जबकि सहभागिता (Participation) का अर्थ है विद्यार्थी का सक्रिय रूप से सीखने की प्रक्रिया में जुड़ना, प्रश्न पूछना और सहायता माँगना।
  • इनपुट-आधारित मूल्यांकन (Input-based Assessment) संसाधनों और नामांकन को मापता है, जबकि परिणाम-आधारित मूल्यांकन (Outcome-based Assessment) सीखने के वास्तविक स्तर और विद्यार्थी के आत्मविश्वास जैसे पहलुओं को परखता है।
  • सामाजिक संबंध, जैसे शिक्षक-विद्यार्थी का विश्वास और परिवार-समुदाय का सहयोग, सहभागिता को प्रभावित करते हैं और इन्हें सामान्य आँकड़ों में पकड़ना कठिन होता है।
  • ऐसे केंद्रों का प्रभावी मूल्यांकन सीखने के परिणाम, उपस्थिति की निरंतरता, विद्यार्थी के प्रतिक्रिया-स्तर और समुदाय की भागीदारी जैसे गुणात्मक संकेतकों को शामिल करके ही संभव है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres – CSC) केरलम (Keralam) सरकार की 2018 से चल रही पहल, जो अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के छात्रों की शैक्षिक आवश्यकताओं को सहारा देती है। इसका संचालन अनुसूचित जनजाति विकास विभाग करता है
संचालन का स्वरूप कंप्यूटर, शिक्षण सामग्री और विद्यालय-समय के बाद भी खुला रहने वाला कक्ष; प्रति छात्र प्रतिदिन ₹20 का हल्का नाश्ता
मूल्यांकन की कठिनाई नामांकन, भवन का क्षेत्रफल और उपकरण आसानी से गिने जा सकते हैं, पर छात्र का आत्मविश्वास और उसकी सहभागिता संख्याओं में नहीं आती
पहुँच (Access) बनाम सहभागिता (Participation) केवल पहुँच सुनिश्चित होने से उपलब्धि नहीं आती; सीखने के लिए छात्र का सक्रिय जुड़ाव आवश्यक है
नीतिगत सुधार का संकेत मूल्यांकन ढाँचे में सहभागिता और सामाजिक संबंधों को भी संकेतक के रूप में शामिल करने की आवश्यकता

महत्व

सामाजिक न्याय

  • अनुसूचित जनजाति समुदाय की शैक्षिक उन्नति राज्य की संवैधानिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है, और केंद्र जैसी पहलें इसी दिशा में कार्य करती हैं
  • विद्यालय में नामांकन के बाद भी यदि छात्र पढ़ाई से दूर रहे, तो सामाजिक समावेशन अधूरा रहता है

शैक्षिक

  • पहुँच और उपलब्धि के बीच का अंतर स्पष्ट होता है; केवल संसाधन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है
  • विफलता के बाद पुनः प्रयास करने का आत्मविश्वास सीखने की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है

प्रशासनिक और नीतिगत

  • निविष्टि (Input) आधारित मापन से आगे बढ़कर परिणाम (Outcome) और प्रक्रिया आधारित मूल्यांकन की आवश्यकता रेखांकित होती है
  • गुणात्मक आकलन से नीति-निर्माताओं को यह समझने में सहायता मिलती है कि कौन-सी व्यवस्था छात्रों को वास्तव में जोड़ रही है

राज्य-स्तरीय पहल के रूप में महत्व

  • राज्य सरकार द्वारा स्थानीय स्तर पर शुरू की गई यह पहल सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के अनुरूप नीति-अध्ययन का उपयुक्त विषय है
  • सफल और असफल पहलुओं का विश्लेषण अन्य राज्यों के लिए भी सीखने योग्य हो सकता है

चुनौतियाँ

1. पहुँच बनाम सहभागिता का अंतर

  • भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध होने पर भी छात्र उनका उपयोग नहीं कर पाते
  • नीतियाँ प्रायः पहुँच को प्राथमिकता देती हैं, सहभागिता को कम

2. मात्रात्मक संकेतकों की सीमा

  • नामांकन, उत्तीर्ण प्रतिशत और भवन-क्षेत्रफल जैसे संकेतक गुणवत्ता का पूरा चित्र नहीं देते
  • संख्याओं पर अत्यधिक निर्भरता से वास्तविक सीखने की प्रक्रिया ओझल हो सकती है

3. सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएँ

  • छात्र का सहायता माँगने का साहस सामाजिक संबंधों और विद्यालय के व्यवहार पर निर्भर करता है
  • विफलता के बाद दूर धकेले जाने की अनुभूति छात्र को पुनः सीखने से रोक सकती है

4. संस्थागत विश्वास और शिक्षक-छात्र संबंध

  • छात्र को यह विश्वास होना आवश्यक है कि विद्यालय वास्तव में उसकी प्रगति चाहता है
  • विश्वास का अभाव प्रक्रिया को औपचारिक बना देता है, जिससे सुविधा होते हुए भी लाभ सीमित रहता है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
नामांकन बनाम सीखना नामांकन बढ़ने के बाद भी उपलब्धि में अपेक्षित सुधार दिखाई न देना
सहभागिता का मापन छात्र की भागीदारी और आत्मविश्वास को मानक संकेतकों में दर्ज करने की कठिनाई
सामाजिक बाधाएँ विफलता के बाद छात्र को दूर धकेले जाने से सीखने की निरंतरता टूटना
संस्थागत संवेदनशीलता विद्यालय और केंद्र के कर्मचारियों में छात्र-हितैषी व्यवहार का अभाव होने का जोखिम

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Samoohya Patana Muri – Community Study Centres)

आगे की राह

  • सहभागिता संकेतक (Participation Indicators) को मूल्यांकन ढाँचे में औपचारिक रूप से शामिल किया जाए, जैसे नियमित उपस्थिति, सहायता माँगने की आवृत्ति और विफलता के बाद की निरंतरता
  • गुणात्मक सर्वेक्षण, छात्र-साक्षात्कार और अवलोकन आधारित अध्ययन को नियमित मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जाए
  • केंद्र के कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए ऐसा प्रशिक्षण हो जो छात्रों के साथ सहानुभूतिपूर्ण और संवादात्मक व्यवहार पर केंद्रित हो
  • अभिभावकों और समुदाय के नेतृत्व को केंद्र के संचालन में सक्रिय भागीदार बनाया जाए, ताकि छात्र और विद्यालय के बीच विश्वास बने
  • विफलता को दंड नहीं, बल्कि सीखने के अवसर के रूप में देखने वाली शैक्षिक संस्कृति विकसित की जाए
  • छात्रों की भागीदारी से जुड़े आँकड़े बजट और नीति-समीक्षा में उपयोग किए जाएँ, ताकि संसाधन आवंटन परिणामों से जुड़ा रहे
  • अन्य राज्यों और जनजातीय क्षेत्रों के लिए इस मॉडल के प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पहुँच बनाम भागीदारी (Access versus Participation) · सामुदायिक अध्ययन केंद्र (Community Study Centres) · सक्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach) · अनुच्छेद 21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009) · अनुच्छेद 46 और अनुसूचित जनजातियाँ (Article 46 and Scheduled Tribes) · जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub-Plan) · सांस्कृतिक पूँजी (Cultural Capital) · सामाजिक तथ्य (Social Fact) · सीखने के परिणाम और मूल्यांकन (Learning Outcomes and Assessment) · समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) · राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (National Education Policy, 2020) · गुणवत्ता बनाम मात्रा (Quality versus Quantity in Educational Metrics)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 46 – दुर्बल वर्गों के शैक्षिक हितों का संवर्धन
  • अनुच्छेद 15(4) – अनुसूचित जनजाति की उन्नति हेतु विशेष उपबंध
  • अनुच्छेद 21A – छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा का अधिकार

अवधारणा प्रवाह

अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए विद्यालय-समय के बाद सहायता देने हेतु सामुदायिक अध्ययन केंद्र की स्थापना  →  केंद्र पर कंप्यूटर, शिक्षण सामग्री और कक्ष की उपलब्धता से पहुँच (Access) सुनिश्चित होना  →  पहुँच के बावजूद छात्र की सक्रिय सहभागिता पर निर्भर रहना, जो सामाजिक संबंधों और विश्वास से प्रभावित होती है  →  विफलता के बाद छात्र का पुनः सहायता माँगना या दूर रहना, जो सीखने की निरंतरता तय करता है  →  मात्रात्मक संकेतकों से यह अंतर न दिखने के कारण मूल्यांकन का अपर्याप्त होना  →  सहभागिता को भी मूल्यांकन का आधार बनाने पर नीति के वास्तविक शैक्षिक परिणामों तक पहुँचने की संभावना बढ़ना

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जनजातियों सहित दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करने का निदेश देता है।
2. अनुच्छेद 15(4) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, जिनमें अनुसूचित जनजातियाँ भी सम्मिलित हैं, की उन्नति के लिए विशेष उपबंध बनाने की शक्ति देता है।
3. 86वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 21A छह से चौदह वर्ष के बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मूल अधिकार बनाता है।
4. संविधान की छठी अनुसूची केरल राज्य के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 46 राज्य नीति का निदेशक तत्व है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और दुर्बल वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से उन्नति का निर्देश देता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 15(4) विशेष उपबंध की शक्ति देता है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 21A के अंतर्गत छह से चौदह वर्ष के बालकों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मूल अधिकार है। कथन 4 गलत है: छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है, केरल पर नहीं; केरल के जनजातीय क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची के दायरे में आते हैं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): किसी जनजातीय बालक का विद्यालय में नामांकन और बुनियादी शैक्षिक संसाधनों की उपलब्धता अपने-आप में उसके अधिगम परिणामों की गारंटी नहीं देती।
कारण (R): अधिगम परिणाम तभी प्राप्त होते हैं जब शिक्षार्थी सक्रिय रूप से भागीदारी करे, और यह भागीदारी विश्वास, संबंधों तथा सामाजिक परिवेश से निर्धारित होती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन सही है: पहुँच (Access) और उपलब्धि के बीच का अंतर अमर्त्य सेन के सक्षमता दृष्टिकोण में स्पष्ट है, जहाँ अवसर उपलब्ध होना और उसका वास्तविक उपयोग कर पाना अलग माने जाते हैं। कारण भी सही है और अभिकथन की व्याख्या करता है, क्योंकि भागीदारी के बिना संसाधन निष्क्रिय रहते हैं। इसलिए विकल्प (a) सही है।

Q3. सूची-I (अवधारणा) को सूची-II (विचारक/ढाँचा) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I
A. सांस्कृतिक पूँजी (Cultural Capital)
B. सक्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach)
C. सामाजिक तथ्य (Social Fact)
D. आदर्श प्रारूप (Ideal Type)

सूची-II
1. अमर्त्य सेन (Amartya Sen)
2. पियरे बौर्डियो (Pierre Bourdieu)
3. एमील दुर्खाइम (Émile Durkheim)
4. मैक्स वेबर (Max Weber)

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-3, D-4
  3. A-2, B-1, C-4, D-3
  4. A-3, B-1, C-2, D-4

उत्तर: A-2, B-1, C-3, D-4 — सांस्कृतिक पूँजी की अवधारणा पियरे बौर्डियो से जुड़ी है, जो बताती है कि परिवार और समाज से मिली भाषा, व्यवहार और आत्मविश्वास की पूँजी शैक्षिक सफलता को प्रभावित करती है। सक्षमता दृष्टिकोण अमर्त्य सेन का है। सामाजिक तथ्य दुर्खाइम की अवधारणा है, जो व्यक्ति के बाहर स्थित और उस पर बाध्यकारी सामाजिक व्यवहारों को दर्शाती है। आदर्श प्रारूप मैक्स वेबर का विश्लेषणात्मक उपकरण है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ शिक्षा नीतियाँ प्रायः विद्यालयों में नामांकन, भवनों, उपकरणों और उत्तीर्णता प्रतिशत जैसे संख्यात्मक संकेतकों के आधार पर मूल्यांकित होती हैं। जनजातीय छात्रों के लिए सामुदायिक अध्ययन केंद्रों के संदर्भ में इस दृष्टिकोण की सीमाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि पहुँच (Access) से भागीदारी (Participation) की ओर मूल्यांकन को किन संस्थागत और सामाजिक उपायों से ले जाया जा सकता है, और इसके लिए संवैधानिक तथा विधिक ढाँचे की भूमिका क्या है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की संरचना इस प्रकार होनी चाहिए:
(1) भूमिका: समाचार का केंद्रीय तर्क कि नामांकन और संसाधन उपलब्ध होने पर भी अधिगम तभी होता है जब छात्र सक्रिय भागीदारी कर सके। अमर्त्य सेन के सक्षमता दृष्टिकोण से वस्तुओं की उपलब्धता (Commodities) और उनका उपयोग कर पाने की क्षमता (Functionings) के अंतर को समझाइए।
(2) संवैधानिक और विधिक आधार: अनुच्छेद 46 (राज्य नीति का निदेशक तत्व, अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक हितों की उन्नति); अनुच्छेद 15(4) (विशेष उपबंध); अनुच्छेद 21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (छह से चौदह वर्ष के बालकों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा); अनुच्छेद 275(1) (राज्यों को अनुदान); पाँचवीं अनुसूची (अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन)। उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993) में शिक्षा के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मानने का निर्णय, और 86वें संशोधन से अनुच्छेद 21A के सृजन तक के विकास का उल्लेख कीजिए।
(3) संख्यात्मक मूल्यांकन की सीमाएँ: भवनों का वर्ग फुट और उत्तीर्णता प्रतिशत छात्र के आत्मविश्वास, सहायता माँगने की क्षमता और विद्यालय-परिवेश में अपनापन नहीं मापते। पियरे बौर्डियो की सांस्कृतिक पूँजी की अवधारणा से स्पष्ट कीजिए कि घरेलू भाषा और सामाजिक अनुभव की असमानता कैसे शैक्षिक असफलता में बदलती है। एमील दुर्खाइम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा से दिखाइए कि विफलता के बाद आगे बढ़ने का विश्वास सामाजिक संबंधों से ही उत्पन्न या दमित होता है।
(4) सुधार के उपाय: जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub-Plan) के अंतर्गत संसाधन आवंटन में परिणाम-आधारित संकेतक जोड़ना; सामुदायिक अध्ययन केंद्रों में स्थानीय भाषा में शिक्षण, स्थानीय शिक्षकों और समुदाय की भागीदारी; समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) के अंतर्गत निगरानी; राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान पर बल तथा अधिगम-आधारित मूल्यांकन; राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (National Achievement Survey) जैसे साधनों में गुणात्मक अवलोकन जोड़ना।
(5) संतुलित दृष्टिकोण: जवाबदेही के लिए संख्यात्मक आँकड़े आवश्यक हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह त्यागना उचित नहीं। तर्क यह है कि संख्याएँ प्रवेश-द्वार का मापन करती हैं, जबकि उपलब्धि का मापन गुणात्मक अवलोकन, समुदाय की प्रतिक्रिया और छात्र के सीखने के अनुभव से होता है। उदाहरण सहित संतुलित मूल्यांकन ढाँचे का सुझाव दीजिए।
(6) निष्कर्ष: समावेशी शिक्षा तभी सार्थक है जब नामांकन से आगे बढ़कर सक्रिय सहभागिता और अधिगम परिणाम सुनिश्चित हों।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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