महाराष्ट्र में ठेकेदारों की आत्महत्या: लंबित बिल और शासन-प्रशासन

महाराष्ट्र में ठेकेदारों की आत्महत्या: लंबित बिल और शासन-प्रशासन

महाराष्ट्र में ठेकेदारों की आत्महत्या: लंबित बिल और शासन-प्रशासन

ठेकेदारों के बिल लंबित होने का चक्रनिधि से अधिककार्य आदेश जारीकार्य पूर्णदेयक प्रस्तुतभुगतान मेंविलंब/लंबितनकदी संकटठेकेदारों को
ठेकेदारों के बिल लंबित होने का चक्र

✎ सार्वजनिक निर्माण में लंबित देयक मूलतः बजट उपलब्धता, कार्य आदेश प्रबंधन और राजकोषीय अनुशासन का प्रश्न हैं; MSMED Act, 2006 के अनुसार पंजीकृत सूक्ष्म व लघु उद्यमों को 45 दिनों में भुगतान और विलंब पर बैंक दर के तीन गुने ब्याज का…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन व्यवस्था (सार्वजनिक नीतियाँ, पारदर्शिता और जवाबदेही, राज्य सरकारों की भूमिका)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (सार्वजनिक वित्त, राजकोषीय प्रबंधन, MSME क्षेत्र)  |  GS Paper IV — नैतिकता (सार्वजनिक जीवन में संवेदनशीलता, प्रशासनिक नैतिकता)
  • Prelims: लंबित देयक (Pending Bills) और प्रतिबद्ध देयताएँ (Committed Liabilities), सार्वजनिक निर्माण विभाग (Public Works Department — PWD), सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (MSMED Act, 2006) — धारा 15 व 16, उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration), सामान्य वित्तीय नियम, 2017 (General Financial Rules, 2017), ई-निविदा (e-Tendering) और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM), महाराष्ट्र राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम, 2005 (Maharashtra Fiscal Responsibility Act, 2005), भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872)
  • Essay: विकास परियोजनाओं में भुगतान विलंब: आर्थिक दक्षता बनाम सामाजिक संवेदनशीलता, सार्वजनिक धन का प्रबंधन: लोकलुभावन योजनाओं और ठेकेदारों के दावों के बीच संतुलन की चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: सार्वजनिक निर्माण में लंबित देयक मूलतः बजट उपलब्धता, कार्य आदेश प्रबंधन और राजकोषीय अनुशासन का प्रश्न हैं; MSMED Act, 2006 के अनुसार पंजीकृत सूक्ष्म व लघु उद्यमों को 45 दिनों में भुगतान और विलंब पर बैंक दर के तीन गुने ब्याज का अधिकार प्राप्त है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

महाराष्ट्र के कई ठेकेदारों की आत्महत्याओं को उनके परिवारों ने सरकार से प्राप्त होने वाले लंबित देयकों से जोड़ा है। महाराष्ट्र स्टेट कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन (Maharashtra State Contractors Association — MSCA) का दावा है कि पिछले डेढ़ वर्ष में नौ ठेकेदारों की मृत्यु लंबित सरकारी देयकों के कारण हुई है और कुल बकाया लगभग 90,000 करोड़ रुपये है। राज्य सरकार के अनुसार लंबित राशि 17,000 करोड़ रुपये है, जिसमें से 6,200 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि उप-ठेकेदार राज्य के साथ पंजीकृत नहीं होते और भुगतान मुख्य ठेकेदारों को किया जाता है, साथ ही 1 करोड़ रुपये से कम के लंबित देयक वाले छोटे ठेकेदारों के भुगतान को प्राथमिकता दी गई है। ठेकेदार संगठनों ने प्रतीकात्मक विरोध किया, जिससे यह मुद्दा सार्वजनिक वित्त प्रबंधन, कार्य आदेश जारी करने की प्रक्रिया और छोटे आपूर्तिकर्ताओं की वित्तीय सुरक्षा से जुड़े प्रशासनिक प्रश्नों के रूप में सामने आया है।

पृष्ठभूमि

  • सार्वजनिक निर्माण कार्यों का भुगतान सामान्यतः कार्य पूर्ण होने और माप-पुस्तिका (Measurement Book) के सत्यापन के बाद होता है। बजट में आवंटित राशि की उपलब्धता ही भुगतान की वास्तविक क्षमता तय करती है। जब कार्य आदेश उपलब्ध धनराशि से अधिक जारी हो जाते हैं, तो देयक लंबित रहने लगते हैं।
  • इस मामले में ठेकेदारों के अनुसार वर्ष 2022-23 और 2023-24 में स्वीकृत परियोजनाओं के देयक अब तक लंबित हैं। यह अवधि राज्य में बड़ी संख्या में कार्य स्वीकृति की अवधि मानी जा रही है।
  • कार्य आदेश जारी करने में अनियमितता और ठेका प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर आरोप लगाए गए हैं। ये आरोप अभी प्रमाणित नहीं हैं और इनकी जाँच का विषय है।
  • ठेकेदारों के आत्मघाती कदम का मामला मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक दबाव के संबंध को भी उजागर करता है। सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए समय पर भुगतान सुनिश्चित करना सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का भी विषय है।

लंबित सरकारी देयक क्या हैं और इनका प्रबंधन कैसे होता है?

  • लंबित देयक वे भुगतान हैं जो सरकार द्वारा किए गए कार्य या आपूर्ति के बदले में देय होते हैं, परंतु बजट उपलब्धता, जाँच या प्रक्रियागत कारणों से अब तक नहीं किए गए हैं। ये राज्य की प्रतिबद्ध देयताओं (Committed Liabilities) का हिस्सा होते हैं।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (MSMED Act, 2006) की धारा 15 के अनुसार खरीदार को स्वीकृति की तिथि से 45 दिनों के भीतर भुगतान करना होता है। धारा 16 के अनुसार विलंब होने पर भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अधिसूचित बैंक दर के तीन गुना ब्याज देय होता है। यह प्रावधान पंजीकृत सूक्ष्म और लघु उद्यमों पर लागू होता है।
  • उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration) MSME की पहचान का आधिकारिक प्रमाण है। जो उप-ठेकेदार इसमें पंजीकृत नहीं होते, उन्हें इस अधिनियम के संरक्षण का दावा करने में कठिनाई हो सकती है।
  • सामान्य वित्तीय नियम, 2017 (General Financial Rules, 2017) केंद्र सरकार के लिए सार्वजनिक खरीद और वित्तीय अनुशासन के मानदंड तय करते हैं। राज्य सरकारें भी प्रायः इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर अपने नियम बनाती हैं।
  • ई-निविदा (e-Tendering) और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) जैसी प्रणालियाँ खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के उपकरण हैं। कार्य आदेश का वास्तविक समय पर डिजिटल रिकॉर्ड रखना आवंटित धन और देयक के मिलान में सहायक होता है।
  • राज्य स्तर पर राजकोषीय उत्तरदायित्व की सीमा महाराष्ट्र राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम, 2005 (Maharashtra Fiscal Responsibility Act, 2005) के अंतर्गत तय होती है। बजट से अधिक कार्य स्वीकृति वित्तीय अनुशासन के सिद्धांत के विपरीत मानी जाती है।
  • ठेकेदार और सरकार के बीच संबंध भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) से नियंत्रित होता है। विवाद की स्थिति में मध्यस्थता और समाधान के लिए मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) का सहारा लिया जा सकता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
लंबित देयक (Pending Bills) स्वीकृत और पूर्ण हो चुके सरकारी कार्यों का भुगतान न होने से ठेकेदारों का नकदी प्रवाह बाधित होता है। इसे इस घटनाक्रम का केंद्रीय आर्थिक कारण माना जा रहा है।
आँकड़ों में अंतर MSCA ने लंबित राशि 90,000 करोड़ रुपये बताई है, जबकि राज्य सरकार ने 17,000 करोड़ रुपये लंबित माने हैं और 6,200 करोड़ रुपये के भुगतान की बात कही है। स्वतंत्र सत्यापन के बिना वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
प्रभावित परियोजनाएँ बकाया मुख्यतः वर्ष 2022-23 और 2023-24 में स्वीकृत परियोजनाओं से जुड़ा बताया गया है। इसका अर्थ है कि भुगतान में कई वित्तीय वर्षों तक की देरी हुई।
भुगतान की श्रृंखला लोक निर्माण विभाग (Public Works Department) मुख्य ठेकेदार (Principal Contractor) को भुगतान करता है। उप-ठेकेदार (Sub-contractor) सरकारी पंजीकरण में नहीं आते, इसलिए उनकी देनदारी सरकारी रिकॉर्ड में दिखाई नहीं देती।
प्रशासनिक स्थिति राज्य सरकार ने कहा है कि छोटे ठेकेदारों के एक करोड़ रुपये से कम के लंबित देयक चुकाए गए हैं, जबकि ठेकेदार संगठनों के अनुसार अभी और काम करना आवश्यक है।
मानवीय आयाम चार मामलों में आत्महत्या की घटनाएँ सामने आईं। परिवारों ने आर्थिक तनाव को कारण बताया है, जिसकी पुष्टि प्रशासनिक या न्यायिक जाँच से ही संभव है।

महत्व

आर्थिक (Economic)

  • ठेकेदार क्षेत्र सार्वजनिक अवसंरचना के निर्माण का मुख्य वाहक है। नकदी संकट से निर्माण की गति, रोजगार और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र प्रभावित होते हैं।
  • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) की दृष्टि से भुगतान टालने पर व्यय की देनदारी आगे के वर्षों में चली जाती है। इससे बजट की वास्तविक स्थिति कम दिखाई दे सकती है।
  • लंबित देयक बढ़ने से ठेकेदारों की ऋण लागत बढ़ती है, जिससे भविष्य की निविदाओं में भागीदारी और परियोजनाओं की लागत पर असर पड़ता है।

प्रशासनिक और शासन-संबंधी (Governance)

  • कार्य आदेश जारी करने से पहले उपलब्ध निधि का मिलान होना चाहिए। निधि से अधिक कार्य आदेश जारी होने का आरोप सार्वजनिक वित्त प्रबंधन की कमजोरी की ओर संकेत करता है।
  • सरकारी व्यय की प्राथमिकता तय करने में पूँजीगत परियोजनाओं के देयक और अन्य योजनाओं के खर्च के बीच संतुलन बनाना एक प्रशासनिक चुनौती है।
  • निविदा से भुगतान तक की प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता न हो तो जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है।

विधिक (Legal)

  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (Micro, Small and Medium Enterprises Development Act, 2006) की धारा 15 के अंतर्गत आपूर्तिकर्ता को सहमत अवधि में और अधिकतम 45 दिन के भीतर भुगतान का प्रावधान है। धारा 16 में विलंब पर ब्याज का उल्लेख है।
  • अनुबंध के अंतर्गत देय राशि पर ठेकेदार का दावा विधिक रूप से प्रवर्तनीय है। इसलिए विवाद का समाधान अनुबंध-कानून और उपलब्ध विवाद निवारण तंत्र से जुड़ा है।

सामाजिक और मानवीय (Social)

  • आर्थिक तनाव से उत्पन्न मानसिक दबाव और आत्महत्या जैसी घटनाएँ सार्वजनिक नीति में मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न खड़े करती हैं।
  • परिवारों पर पड़ने वाला प्रभाव, विशेषकर आजीविका के एकमात्र स्रोत के खो जाने का प्रभाव, सामाजिक कल्याण तंत्र की पहुँच पर ध्यान आकृष्ट करता है।

चुनौतियाँ

1. लंबित देयकों के आकार पर आँकड़ों का विवाद

  • MSCA का दावा 90,000 करोड़ रुपये है, जबकि राज्य सरकार 17,000 करोड़ रुपये लंबित मानती है। दोनों पक्षों की गणना का आधार अलग है।
  • स्वतंत्र और सार्वजनिक सत्यापन के अभाव में नीति-निर्णय और संसाधन आवंटन दोनों प्रभावित होते हैं।

2. उप-ठेकेदारों की प्रशासनिक अदृश्यता

  • सरकार सीधे मुख्य ठेकेदार को भुगतान करती है, जबकि उप-ठेकेदार पंजीकृत नहीं होते। इससे उनकी देनदारी का सही आकलन नहीं हो पाता।
  • मुख्य ठेकेदार से उप-ठेकेदार तक भुगतान न पहुँचने पर विवाद निजी अनुबंधों के स्तर पर फँस जाता है।

3. निधि से अधिक कार्य आदेश का आरोप

  • कथित रूप से चुनाव-पूर्व वर्ष में निधि की उपलब्धता से अधिक कार्य आदेश जारी हुए। यह आरोप अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है।
  • यदि ऐसा हुआ तो बजट अनुशासन, प्रतिबद्ध व्यय (Committed Expenditure) के प्रबंधन और अनुपूरक माँगों की भूमिका पर प्रश्न उठते हैं।

4. MSME भुगतान दायित्व का प्रवर्तन

  • MSMED अधिनियम, 2006 की धारा 15 और 16 सरकारी खरीद पर भी लागू होते हैं, परंतु व्यवहार में विलंब की स्थिति बनी रहती है।
  • ठेकेदारों के लिए विधिक उपाय और समय पर न्याय सुनिश्चित करना प्रवर्तन की क्षमता पर निर्भर है।

5. आत्महत्या, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा

  • आर्थिक संकट से उत्पन्न मानसिक दबाव की पहचान और समय पर सहायता के तंत्र अभी सीमित हैं।
  • परिवारों को आजीविका और आर्थिक सहायता तक पहुँच में कठिनाई होती है।

6. आरोपों की जाँच और जवाबदेही

  • कमीशन लेने और भेदभावपूर्ण भुगतान के आरोप सामने आए हैं। ये आरोप अभी जाँच के विषय हैं, निष्कर्ष नहीं।
  • जाँच की स्पष्ट प्रक्रिया, समय-सीमा और परिणामों का सार्वजनिक होना जनविश्वास के लिए आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
आँकड़ों में अंतर 90,000 करोड़ और 17,000 करोड़ रुपये के दावों के कारण नीति-निर्णय के लिए विश्वसनीय आधार नहीं मिल पाता।
उप-ठेकेदारों की पहचान पंजीकरण न होने से सबसे कमजोर ठेकेदार भुगतान और विधिक उपायों दोनों से वंचित रह सकते हैं।
बजट अनुशासन निधि से अधिक कार्य आदेश जारी होने का आरोप राजकोषीय प्रबंधन की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
MSMED अधिनियम का प्रवर्तन 45 दिन की सीमा और विलंब-ब्याज प्रावधान होने के बावजूद व्यवहार में भुगतान में देरी बनी रहती है।
मानसिक स्वास्थ्य सहायता आर्थिक संकट में फँसे ठेकेदारों के लिए समय पर परामर्श और सहायता की पहुँच सीमित है।
जवाबदेही और पारदर्शिता कमीशन और भेदभाव के आरोपों की स्वतंत्र जाँच की स्पष्ट व्यवस्था न होने से अविश्वास बढ़ता है।

आगे की राह

  • लंबित देयकों का कार्यवार और वर्षवार सत्यापित विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि राज्य सरकार और ठेकेदार संगठनों के आँकड़ों का मिलान हो सके।
  • निधि की उपलब्धता का प्रमाणन कार्य आदेश जारी करने से पहले अनिवार्य किया जाए, जिससे भविष्य में प्रतिबद्ध व्यय का अनियंत्रित संचय न हो।
  • उप-ठेकेदारों के पंजीकरण या उनके लिए प्रत्यक्ष भुगतान व्यवस्था पर विचार किया जाए, ताकि भुगतान श्रृंखला की पारदर्शिता बढ़े।
  • MSMED अधिनियम, 2006 की धारा 15 और 16 के अनुपालन की नियमित समीक्षा हो और विलंब की स्थिति में ब्याज भुगतान का प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाए।
  • भुगतान की स्थिति की ट्रैकिंग के लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली विकसित की जाए, जिससे ठेकेदार अपने देयक की स्थिति वास्तविक समय में देख सकें।
  • कमीशन और भेदभाव के आरोपों की स्वतंत्र जाँच के लिए स्पष्ट प्रक्रिया, समय-सीमा और परिणामों के सार्वजनिक प्रकाशन की व्यवस्था हो।
  • ठेकेदारों के लिए शिकायत निवारण तंत्र और आर्थिक संकट में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श तक पहुँच सुनिश्चित की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सरकारी ठेकेदारों के बकाये · वित्तीय तनाव · आत्महत्या · सार्वजनिक खरीद · राजकोषीय प्रबंधन · सुशासन · जवाबदेही · पारदर्शिता · ठेका विवाद समाधान · आर्थिक संवृद्धि · राज्य वित्त · बुनियादी ढांचा परियोजनाएँ

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 300A: अनुबंधिक देय राशि पर संपत्ति-आधारित दावा
  • अनुच्छेद 14: भुगतान में कथित भेदभाव की समानता कसौटी

अवधारणा प्रवाह

निधि की उपलब्धता से अधिक कार्य आदेश जारी होने का आरोप (कथित)  →  कार्य पूरा होने के बाद देयक प्रस्तुत, जाँच और स्वीकृति में विलंब  →  सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकताओं के बीच लंबित देयकों का संचय  →  मुख्य ठेकेदार और उप-ठेकेदारों की नकदी प्रवाह बाधित, ऋण और दायित्व बढ़ना  →  आर्थिक तनाव से मानसिक दबाव और व्यक्तिगत संकट की स्थिति  →  सामूहिक विरोध, स्वतंत्र जाँच और भुगतान-प्रणाली सुधार की माँग  →  विधिक प्रवर्तन, पारदर्शिता और समयबद्ध भुगतान तंत्र द्वारा समाधान की दिशा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 266 के अनुसार, सभी सरकारी प्राप्तियाँ भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा की जाती हैं।
2. राज्य सरकारों द्वारा किए गए सार्वजनिक कार्यों के लिए ठेकेदारों को भुगतान राज्य की संचित निधि से किया जाता है।
3. भारत में सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं है, बल्कि विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के अपने नियम हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 266 में भारत की संचित निधि और राज्यों की संचित निधि का प्रावधान है, लेकिन सभी सरकारी प्राप्तियाँ इसमें जमा नहीं होतीं। सार्वजनिक खाते (Public Account) और आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) भी हैं। कथन 2 सही है। राज्य सरकारों के व्यय, जिनमें ठेकेदारों को भुगतान भी शामिल है, राज्य की संचित निधि से किए जाते हैं, जिसके लिए विधानमंडल की स्वीकृति आवश्यक होती है। कथन 3 गलत है। भारत में सार्वजनिक खरीद के लिए केंद्रीय कानून है, जैसे ‘सरकारी खरीद विधेयक, 2012’ (Government Procurement Bill, 2012) जिसे पेश किया गया था, हालांकि यह अभी तक अधिनियमित नहीं हुआ है। विभिन्न मंत्रालयों के नियम भी हैं, लेकिन एक व्यापक ढांचा मौजूद है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन ‘राजकोषीय घाटे’ (Fiscal Deficit) का सबसे अच्छा वर्णन करता/करते है/हैं?
1. यह सरकार के कुल व्यय और उसकी कुल प्राप्तियों (उधार को छोड़कर) के बीच का अंतर है।
2. यह सरकार की बाजार से उधार लेने की आवश्यकता को दर्शाता है।
3. उच्च राजकोषीय घाटा अक्सर मुद्रास्फीति (Inflation) और ब्याज दरों में वृद्धि से जुड़ा होता है।
सही विकल्प चुनिए:

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 गलत है। राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उसकी कुल गैर-ऋण प्राप्तियों (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ) के बीच का अंतर है। इसमें उधार शामिल नहीं होता। कथन 2 सही है। राजकोषीय घाटा सरकार की कुल उधार आवश्यकताओं को इंगित करता है, जिसे वह बाजार से या अन्य स्रोतों से पूरा करती है। कथन 3 सही है। उच्च राजकोषीय घाटा अक्सर सरकार को अधिक उधार लेने के लिए मजबूर करता है, जिससे बाजार में तरलता (liquidity) बढ़ती है और मुद्रास्फीति का दबाव पैदा हो सकता है। साथ ही, सरकार की उधार लेने की मांग बढ़ने से ब्याज दरें भी बढ़ सकती हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ महाराष्ट्र में सरकारी ठेकेदारों द्वारा कथित आत्महत्याओं की हालिया घटनाओं ने सार्वजनिक खरीद प्रक्रियाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी के गंभीर मुद्दों को उजागर किया है। इस संदर्भ में, भारत में सार्वजनिक खरीद के सिद्धांतों और चुनौतियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: महाराष्ट्र में ठेकेदारों की आत्महत्याओं का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए सार्वजनिक खरीद में जवाबदेही और पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करें।
2. सार्वजनिक खरीद के सिद्धांत: भारत में सार्वजनिक खरीद को नियंत्रित करने वाले प्रमुख सिद्धांतों का उल्लेख करें – जैसे दक्षता, मितव्ययिता, निष्पक्षता, गैर-भेदभाव, पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रतिस्पर्धा। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) जैसे उपायों का उल्लेख करें।
3. सार्वजनिक खरीद में चुनौतियाँ:
क. भुगतान में देरी: ठेकेदारों को समय पर भुगतान न होना, जिससे वित्तीय संकट और परियोजनाओं में देरी होती है।
ख. भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी: निविदा प्रक्रिया में अनियमितताएँ, रिश्वतखोरी और कमीशन की मांग।
ग. निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी: अपारदर्शी मूल्यांकन मानदंड और पक्षपातपूर्ण निर्णय।
घ. क्षमता निर्माण का अभाव: छोटे और मध्यम ठेकेदारों की तकनीकी और वित्तीय क्षमता में कमी।
ङ. विवाद समाधान तंत्र: ठेका विवादों को सुलझाने के लिए प्रभावी और त्वरित तंत्र का अभाव।
च. राजनीतिक हस्तक्षेप: परियोजनाओं के आवंटन और भुगतान में राजनीतिक दबाव।
छ. राजकोषीय दबाव: राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ और बजटीय आवंटन की कमी।
4. समाधान और सुधार के उपाय:
क. ‘सरकारी खरीद विधेयक’ (Government Procurement Bill) जैसे कानूनों को अधिनियमित करना।
ख. ई-प्रोक्योरमेंट (e-Procurement) और GeM जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यापक उपयोग।
ग. भुगतान प्रक्रियाओं का मानकीकरण और समयबद्धता सुनिश्चित करना।
घ. स्वतंत्र निगरानी और लेखापरीक्षा (Audit) तंत्र को मजबूत करना।
ङ. विवाद समाधान के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों या मध्यस्थता (Arbitration) तंत्र की स्थापना।
च. व्हिसलब्लोअर संरक्षण (Whistleblower Protection) को बढ़ावा देना।
छ. ठेकेदारों के लिए शिकायत निवारण तंत्र को सुदृढ़ करना।
5. निष्कर्ष: सुशासन और आर्थिक संवृद्धि के लिए एक कुशल, पारदर्शी और जवाबदेह सार्वजनिक खरीद प्रणाली के महत्व पर बल दें।

स्रोत: The Indian Express

Maharashtra PCS (MPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: महाराष्ट्र में ठेकेदारों द्वारा कथित आत्महत्याओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

1. महाराष्ट्र में ठेकेदारों की आत्महत्याओं का मुख्य कारण उनके लंबित सरकारी बिलों का भुगतान न होना बताया गया है।
2. ठेकेदारों के एक संघ ने इस मुद्दे पर सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: 1 और 2 दोनों — दोनों कथन सही हैं क्योंकि महाराष्ट्र में ठेकेदारों की आत्महत्याओं को लंबित बिलों से जोड़ा गया है और उनके संघ ने कार्रवाई की मांग की है।

Mains: महाराष्ट्र में ठेकेदारों द्वारा कथित आत्महत्याओं को लंबित सरकारी बिलों से जोड़ने वाले हालिया घटनाक्रमों के आलोक में, राज्य सरकार के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण करें और इस समस्या के समाधान हेतु संभावित उपायों पर चर्चा करें।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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