03 Nov चक्रवात ‘मुरसु’ का आंध्र तट पर दस्तक: ओडिशा पर प्रभाव
✎ चक्रवात की तैयारी का मूल सिद्धांत है: समय पर पूर्व-चेतावनी (IMD), सुरक्षित निकासी और आश्रय-स्थल, तथा आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत NDMA से लेकर ज़िला प्राधिकरण तक समन्वित संस्थागत ढाँचा।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (Geography): बंगाल की खाड़ी में चक्रवात, उत्तर-पूर्वी मानसून, पूर्वी घाट में भूस्खलन | GS Paper III — आपदा प्रबंधन (Disaster Management): आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत संस्थागत ढाँचा, पूर्व-चेतावनी और निकासी
- Prelims: चक्रवात की श्रेणियाँ (भारत मौसम विज्ञान विभाग, IMD के अनुसार गंभीर चक्रवाती तूफ़ान की पवन-गति सीमा), भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department, IMD) और उसका मंत्रालय (पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय), चक्रवातों के नामकरण की प्रणाली (विश्व मौसम विज्ञान संगठन और ESCAP की पैनल प्रणाली), उत्तर-पूर्वी मानसून (Northeast Monsoon) और उसका तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा ओडिशा तट पर प्रभाव, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority, NDMA), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (National Disaster Response Force, NDRF) और राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का अध्यक्ष (जिलाधिकारी / कलेक्टर), सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction), 2015–2030
- Essay: चक्रवात जैसी आपदाओं में पूर्व-चेतावनी से लेकर पुनर्वास तक: सामुदायिक तैयारी की भूमिका, जलवायु परिवर्तन के दौर में तटीय और पहाड़ी क्षेत्रों की आपदा-सहनशीलता (Disaster Resilience)
त्वरित पुनरावृत्ति: चक्रवात की तैयारी का मूल सिद्धांत है: समय पर पूर्व-चेतावनी (IMD), सुरक्षित निकासी और आश्रय-स्थल, तथा आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत NDMA से लेकर ज़िला प्राधिकरण तक समन्वित संस्थागत ढाँचा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
3 नवंबर 2026 को गंभीर चक्रवाती तूफ़ान मुरासु ने सुबह आंध्र प्रदेश के तट पर भू-स्पर्श किया। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में दिखा, जहाँ बड़ी संख्या में पेड़ उखड़े, बिजली के खंभे क्षतिग्रस्त हुए और मछुआरों की नावें नष्ट हुईं। ओडिशा के दक्षिणी ज़िलों जैसे कोरापुट, मलकानगिरी, कंधमाल और कालाहांडी में हल्की वर्षा दर्ज की गई। राज्य सरकार ने सभी ज़िलाधिकारियों को तैयार रहने का निर्देश दिया और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन को प्रमुख चुनौती बताया। भारत मौसम विज्ञान विभाग के भारी वर्षा और तेज़ हवाओं के पूर्वानुमान के आधार पर राज्य ने 1.60 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया और पाँच दक्षिणी ज़िलों में आपदा मोचन दल तैनात किए। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि पड़ोसी राज्य के तट पर आया चक्रवात भी सीमा-पार प्रभाव डाल सकता है, इसलिए पूर्व-चेतावनी और समन्वित तैयारी आवश्यक होती है।
पृष्ठभूमि
- बंगाल की खाड़ी में अक्टूबर से दिसंबर के बीच उत्तर-पूर्वी मानसून के दौरान चक्रवात अधिक बनते हैं, और इनका सबसे अधिक असर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा ओडिशा के तटों पर पड़ता है।
- इस घटना से पहले चक्रवात अर्नब ने भी इसी क्षेत्र को प्रभावित किया था, जिससे राज्यों में लगातार तैयारी की आवश्यकता बनी रही।
- ओडिशा में वर्ष 1999 के अति-चक्रवात (Super Cyclone) के बाद आपदा प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था और चक्रवात आश्रय-स्थलों के निर्माण पर विशेष ज़ोर दिया गया, जिसे राज्य की तैयारी का आधार माना जाता है।
- भारत में आपदा प्रबंधन का कानूनी आधार आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 है, जिसके तहत राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर प्राधिकरण बनाए गए हैं।
चक्रवात और उनके प्रबंधन से जुड़ी मूल बातें क्या हैं?
- चक्रवात निम्न वायुदाब क्षेत्र के चारों ओर तेज़ी से घूमती हुई वायु-प्रणाली है, जो समुद्र की गर्म सतह से नमी और ऊर्जा प्राप्त करती है।
- IMD चक्रवात को उसकी अधिकतम निरंतर पवन-गति के आधार पर वर्गीकृत करता है, जैसे अवदाब (Depression), गहरा अवदाब (Deep Depression), चक्रवाती तूफ़ान (Cyclonic Storm), गंभीर चक्रवाती तूफ़ान (Severe Cyclonic Storm) और उससे ऊपर की श्रेणियाँ।
- उत्तर हिंद महासागर में चक्रवातों के नाम विश्व मौसम विज्ञान संगठन और ESCAP की पैनल द्वारा तय सूची से दिए जाते हैं, जिसमें सदस्य देश नाम प्रस्तावित करते हैं।
- चक्रवात से सबसे बड़ा खतरा तेज़ हवाओं, मूसलाधार वर्षा और समुद्री उफान (Storm Surge) से होता है; ऊपरी पहाड़ी क्षेत्रों में भारी वर्षा से भूस्खलन और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
- भारत में आपदा प्रबंधन की शीर्ष नीति-निर्माण संस्था राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) है, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।
- राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) विशेष प्रशिक्षित बल है, जबकि राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) राज्य स्तर पर राहत-कार्य में सहायता करता है।
- जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का अध्यक्ष सामान्यतः ज़िलाधिकारी (Collector / District Magistrate) होता है, जो निकासी, आश्रय और राहत का स्थानीय समन्वय करता है।
- भारत सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन (2015–2030) का हस्ताक्षरकर्ता है, जो आपदा-जोखिम में कमी पर वैश्विक दिशानिर्देश देता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| घटना का स्वरूप | गंभीर चक्रवाती तूफ़ान मुरासु (Murasu) का आंध्र प्रदेश तट पर भू-स्पर्श, जिसका प्रभाव ओडिशा के दक्षिणी ज़िलों तक हल्की वर्षा के रूप में पहुँचा। |
| प्रभावित क्षेत्र | कोरापुट, मलकानगिरि, कंधमाल और कालाहांडी जैसे ओडिशा के दक्षिणी ज़िले, जहाँ पहाड़ी भू-भाग के कारण भूस्खलन का जोखिम अधिक है। |
| पूर्व-चेतावनी और निकासी | भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department) के भारी वर्षा और तेज़ हवाओं के पूर्वानुमान के आधार पर 1.60 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया। |
| आपदा प्रतिक्रिया | पाँच दक्षिणी ज़िलों में आपदा प्रतिक्रिया दल तैनात किए गए और सभी कलेक्टरों को प्रतिकूल मौसम के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए गए। |
| पिछली घटना से संबंध | आंध्र प्रदेश तट पर मुरासु से पहले आए चक्रवात अर्णब (Cyclone Arnab) ने भी व्यापक क्षति की थी, जो बार-बार आने वाले तटीय चक्रवातों की ओर संकेत करता है। |
महत्व
मानवीय और सुरक्षा महत्त्व
- समय पूर्व निकासी से जीवन-हानि को न्यूनतम रखने में पूर्व-चेतावनी प्रणाली की भूमिका स्पष्ट होती है।
- पहाड़ी इलाकों के लोगों को कुछ समय तक आश्रय-स्थलों में रखना सावधानी के दृष्टिकोण (Precautionary Principle) का व्यावहारिक उदाहरण है।
आर्थिक महत्त्व
- मुरासु से आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में हज़ारों पेड़, बिजली के खंभे और मछली पकड़ने की नौकाएँ क्षतिग्रस्त हुईं, जिससे मत्स्य-आजीविका और बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई।
- बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवात तटीय अर्थव्यवस्था, बंदरगाह गतिविधि और कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव डालते हैं।
पर्यावरणीय और भौगोलिक महत्त्व
- चक्रवात की तीव्रता बढ़ने में समुद्र के गर्म सतही तापमान की भूमिका होती है, जिससे जलवायु परिवर्तन और चक्रवात की प्रवृत्ति का संबंध जुड़ता है।
- पूर्वी तटीय क्षेत्र के भू-भाग और वर्षा-प्रणालियों का आपसी संबंध दक्षिणी ओडिशा में भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाता है।
चुनौतियाँ
1. भूस्खलन का जोखिम
- ओडिशा के दक्षिणी पहाड़ी ज़िलों में भारी वर्षा के दौरान ढलानों की अस्थिरता से भूस्खलन की आशंका सबसे बड़ी चुनौती बनती है।
- ढीली मिट्टी और वनस्पति-क्षरण से ढलानों की स्थिरता घटती है, जिससे सड़क और बस्तियाँ दोनों संकट में आती हैं।
यूपीएससी लिंक: भूगोल: भारत में भू-स्खलन और पर्वतीय आपदाएँ
2. बहु-आपदा जोखिम प्रबंधन
- एक ही मौसम-प्रणाली से वर्षा, तेज़ हवा, तूफ़ानी लहर और भूस्खलन एक साथ उत्पन्न हो सकते हैं, जिससे अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय कठिन होता है।
- मौसम पूर्वानुमान की अनिश्चितता के कारण अनावश्यक निकासी या देर से निकासी, दोनों का जोखिम बना रहता है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन: बहु-आपदा दृष्टिकोण और समन्वय
3. आश्रय-स्थलों और पुनर्वास की व्यवस्था
- 1.60 लाख से अधिक लोगों की निकासी के बाद आश्रय-स्थलों में भोजन, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य सेवा और सुरक्षा की व्यवस्था बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।
- निकासी के बाद घरों और आजीविका की बहाली में विलंब होने पर सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है।
यूपीएससी लिंक: शासन: आपदा राहत और पुनर्वास की प्रशासनिक व्यवस्था
4. तटीय आजीविका की सुरक्षा
- मछुआरे और तटीय समुदाय नौकाओं और जालों के नुकसान से सीधे प्रभावित होते हैं, जिससे उनकी आय अस्थिर हो जाती है।
- बार-बार चक्रवात आने से तटीय समुदायों की दीर्घकालिक आजीविका-सुरक्षा और बीमा-कवरेज पर दबाव बढ़ता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था और सामाजिक क्षेत्र: तटीय समुदाय और आजीविका
5. अंतर-राज्यीय समन्वय
- चक्रवात का भू-स्पर्श एक राज्य में और प्रभाव दूसरे राज्य में होने से सूचना-साझाकरण और संसाधन-समन्वय की आवश्यकता होती है।
- एक राज्य के आपदा-संसाधन दूसरे राज्य के उपयोग में आने पर समन्वय-तंत्र की स्पष्टता आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद: आपदा प्रबंधन में केंद्र-राज्य और अंतर-राज्य समन्वय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| भूस्खलन | पहाड़ी ज़िलों में भारी वर्षा से ढलान अस्थिर होने पर बस्तियों और सड़कों को सीधा खतरा। |
| पूर्वानुमान की अनिश्चितता | चक्रवात के मार्ग और तीव्रता में बदलाव से निकासी के समय और पैमाने का सटीक निर्णय कठिन। |
| आश्रय-स्थलों की गुणवत्ता | बड़ी संख्या में लोगों के लिए पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था पर दबाव। |
| तटीय आजीविका | मछली पकड़ने की नौकाओं और जालों के नुकसान से मछुआरा परिवारों की आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव। |
| बुनियादी ढाँचे की क्षति | बिजली के खंभों और पेड़ों के गिरने से बिजली और संचार सेवाएँ बाधित होने का जोखिम। |
| अंतर-राज्यीय समन्वय | एक राज्य में भू-स्पर्श और दूसरे राज्य में प्रभाव होने से सूचना और संसाधनों के आदान-प्रदान की चुनौती। |
आगे की राह
- भूस्खलन-प्रवण ढलानों की मानचित्रण और जोखिम-मानचित्र तैयार कर पहाड़ी बस्तियों की सूची अद्यतन की जाए।
- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान को ज़िला-स्तर तक स्थानीय भाषा में पहुँचाने के लिए सामुदायिक संचार-तंत्र सुदृढ़ किया जाए।
- आपदा-पूर्व तैयारी में आश्रय-स्थलों का पूर्व-निरीक्षण, भोजन-पानी और चिकित्सा भंडार की नियमित जाँच की जाए।
- तटीय मछुआरा समुदाय के लिए चेतावनी-आधारित मत्स्यन-प्रतिबंध और नौका-सुरक्षा के उपाय लागू किए जाएँ।
- भूस्खलन, तूफ़ानी लहर और तेज़ हवा जैसे विभिन्न जोखिमों के लिए बहु-आपदा आपातकालीन योजना बनाई जाए।
- राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और पड़ोसी राज्यों के बीच सूचना-साझाकरण का स्थायी प्रोटोकॉल बनाया जाए।
- आपदा के बाद बिजली, संचार और सड़क बहाली के लिए प्राथमिकता-सूची और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए।
- चक्रवात से हुई क्षति का वैज्ञानिक आकलन कर भविष्य की तटीय और पर्वतीय नियोजन-नीति में उसका उपयोग किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) · राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) · राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) · पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) · सचेत (SACHET) अलर्ट प्लेटफ़ॉर्म · बहु-संकट जोखिम (Multi-hazard Risk) · सेंदाई आपदा जोखिम न्यूनीकरण रूपरेखा (Sendai Framework) · राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) · राज्य आपदा मोचन निधि (SDRF) · चक्रवात-पूर्व निष्कासन और चक्रवात आश्रय स्थल · पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन · जलवायु परिवर्तन और तीव्र चक्रवात
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: निकासी और जीवन-रक्षा से जुड़ा जीवन का अधिकार
- अनुच्छेद 355: राज्यों को आपदा से बचाने का केंद्र का दायित्व
अवधारणा प्रवाह
बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब प्रणाली तीव्र होकर गंभीर चक्रवाती तूफ़ान में बदलती है। → मुरासु का आंध्र प्रदेश तट पर भू-स्पर्श होता है और तेज़ हवाओं व भारी वर्षा से क्षति होती है। → भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का पूर्वानुमान राज्य प्रशासन तक पहुँचता है और आपदा प्रतिक्रिया दल सक्रिय होते हैं। → पहाड़ी और तटीय ज़िलों से 1.60 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जाता है। → ओडिशा के दक्षिणी ज़िलों में हल्की वर्षा होती है, परंतु भूस्खलन का जोखिम बना रहता है। → राहत, पुनर्वास और अगली आपदा के लिए तैयारी से जोखिम-प्रबंधन का चक्र पूरा होता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है।
2. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) का अध्यक्ष राज्य का मुख्यमंत्री होता है।
3. जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) का अध्यक्ष ज़िले का पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) होता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NDMA की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं (धारा 3)। कथन 2 सही है: SDMA की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं (धारा 14)। कथन 3 गलत है: DDMA की अध्यक्षता ज़िले के निर्वाचित प्रतिनिधि (Chairperson) करते हैं, जबकि ज़िला कलेक्टर/ज़िला मजिस्ट्रेट इसका सह-अध्यक्ष या कार्यकारी प्रमुख होता है (धारा 25)। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक कथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।
कथन (A): बंगाल की खाड़ी में चक्रवात अक्सर मानसून के बाद के महीनों (अक्टूबर-दिसंबर) में अधिक तीव्र रूप से बनते हैं।
कारण (R): मानसून की वापसी के बाद समुद्री सतह का तापमान ऊँचा बना रहता है और ऊपरी वायुमंडल में ऊर्ध्वाधर पवन कतरन (vertical wind shear) अपेक्षाकृत कम होती है, जो चक्रवात-निर्माण के अनुकूल है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए।
- (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — बंगाल की खाड़ी में चक्रवात दो मौसमी काल, अप्रैल-मई और अक्टूबर-दिसंबर, में अधिक आते हैं। मानसून के बाद समुद्री सतह का तापमान ऊँचा रहता है और पवन कतरन कम होती है, इसलिए यह कारण कथन की सही व्याख्या है। अतः विकल्प (a) सही है।
Q3. निम्नलिखित सूची-I (भारत मौसम विज्ञान विभाग, IMD द्वारा चक्रवात की श्रेणी) को सूची-II (3-मिनट के औसत सतही पवन वेग की सीमा) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I
1. चक्रवाती तूफ़ान (Cyclonic Storm)
2. गंभीर चक्रवाती तूफ़ान (Severe Cyclonic Storm)
3. अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान (Very Severe Cyclonic Storm)
4. सुपर चक्रवाती तूफ़ान (Super Cyclonic Storm)
सूची-II
A. 118 से 166 किमी प्रति घंटा
B. 62 से 88 किमी प्रति घंटा
C. 221 किमी प्रति घंटा से अधिक
D. 89 से 117 किमी प्रति घंटा
- 1-B, 2-D, 3-A, 4-C
- 1-A, 2-B, 3-D, 4-C
- 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
- 1-D, 2-B, 3-C, 4-A
उत्तर: 1-B, 2-D, 3-A, 4-C — IMD के वर्गीकरण के अनुसार चक्रवाती तूफ़ान 62-88 किमी/घंटा, गंभीर चक्रवाती तूफ़ान 89-117 किमी/घंटा, अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान 118-166 किमी/घंटा और सुपर चक्रवाती तूफ़ान 221 किमी/घंटा से अधिक वेग वाला होता है। अतः सही सुमेल 1-B, 2-D, 3-A, 4-C है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ओडिशा जैसे राज्यों में चक्रवात-पूर्व निष्कासन से जान-माल की हानि घटी है, किंतु पहाड़ी ज़िलों में भूस्खलन और वृक्षपात जैसे द्वितीयक संकट बने रहते हैं। भारत के आपदा प्रबंधन ढाँचे के संस्थागत प्रावधानों के संदर्भ में बहु-संकट (multi-hazard) तैयारी का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि पूर्व-चेतावनी और राज्य की आपदा-मोचन क्षमता में किन सुधारों की आवश्यकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (कुल लगभग 250 शब्द):
1. भूमिका: चक्रवात मुरासु का आंध्र प्रदेश तट पर स्थलपात और ओडिशा के दक्षिणी ज़िलों (कोरापुट, मलकानगिरि, कंधमाल, कालाहांडी) में हल्की वर्षा; 1.60 लाख से अधिक लोगों का सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरण; IMD के भारी वर्षा और तेज़ हवाओं के पूर्वानुमान का उल्लेख; पहले आए चक्रवात अर्नब का संदर्भ। उत्तर में यह भी स्पष्ट करें कि चक्रवात की तीव्रता का वर्गीकरण IMD करता है।
2. संस्थागत ढाँचा (आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005): NDMA की अध्यक्षता प्रधानमंत्री (धारा 3) करते हैं; SDMA मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में (धारा 14); DDMA ज़िला स्तर पर (धारा 25); NDRF का गठन धारा 44 के अंतर्गत। राज्य स्तर पर राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) और ओडिशा आपदा त्वरित कार्य बल (ODRAF) की भूमिका। ‘केंद्र-राज्य’ साझा उत्तरदायित्व और संघवाद का प्रश्न।
3. वित्तीय आयाम: राज्य आपदा मोचन निधि (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि; वित्त आयोग की अनुशंसाओं की भूमिका; पुनर्निर्माण और शमन (mitigation) के बीच संतुलन।
4. अंतरराष्ट्रीय ढाँचा: सेंदाई आपदा जोखिम न्यूनीकरण रूपरेखा 2015-2030 की चार प्राथमिकताएँ (जोखिम समझ, शासन, निवेश में शमन, तैयारी व ‘बेहतर पुनर्निर्माण’)। भारत की नीतिगत प्रतिबद्धता।
5. पूर्व-चेतावनी प्रणाली: IMD के पूर्वानुमान, INCOIS की तटीय सलाह और सचेत (SACHET) प्लेटफ़ॉर्म की भूमिका; अंतिम मील तक संचार; स्थानीय भाषाओं में चेतावनी।
6. द्वितीयक संकट (पहाड़ी क्षेत्र): पूर्वी घाट में भूस्खलन, वृक्षपात से बिजली-संचार बाधा; भूमि-उपयोग और वनीकरण की भूमिका; पहाड़ी आबादी का अस्थायी आश्रय।
7. जलवायु परिवर्तन का आयाम: समुद्री सतह तापमान में वृद्धि और तीव्र चक्रवातों की प्रवृत्ति; राष्ट्रीय चक्रवात जोखिम न्यूनीकरण परियोजना (NCRMP) जैसे निवेश; चक्रवात आश्रय स्थलों का रखरखाव।
8. समालोचनात्मक मूल्यांकन: उपलब्धियाँ (1999 के सुपर चक्रवात के बाद ओडिशा का सुधार, निष्कासन में कमी से मृत्यु-दर में गिरावट) और कमियाँ (ज़िला-स्तरीय क्षमता, सामुदायिक भागीदारी का अभाव, बहु-संकट योजनाओं का सीमित एकीकरण, आपदा-पूर्व विकास-योजना में आपदा-जोखिम का मुख्यधारा में न होना)।
9. सुधार: बहु-संकट आकस्मिक योजनाएँ; पहाड़ी ज़िलों के लिए भूस्खलन-संवेदनशीलता मानचित्रण; स्थानीय स्वयंसेवी और पंचायत-स्तरीय आपदा समितियाँ; आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना के लिए बजटीय प्रावधान; केंद्र-राज्य समन्वय के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल।
10. निष्कर्ष: संस्थागत ढाँचा मज़बूत है, पर उसका प्रभाव ज़िला और समुदाय-स्तर की क्षमता पर निर्भर है; निवारक (preventive) दृष्टि से समग्र आपदा शासन आवश्यक है।
स्रोत: orissapost.com
Odisha PCS (OPSC (OAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: चक्रवात ‘मुरसु’ के आंध्र प्रदेश में दस्तक देने के कारण ओडिशा में हल्की बारिश हुई। इस संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन ओडिशा के तटीय क्षेत्रों में चक्रवातों के प्रभाव के बारे में सबसे सटीक है?
- ओडिशा में चक्रवातों का प्रभाव हमेशा प्रत्यक्ष और गंभीर होता है, जिससे व्यापक क्षति होती है।
- ओडिशा में चक्रवातों का प्रभाव केवल तभी होता है जब वे सीधे राज्य के तट से टकराते हैं।
- पड़ोसी राज्यों में चक्रवातों के दस्तक देने पर भी ओडिशा में अप्रत्यक्ष प्रभाव, जैसे हल्की बारिश, का अनुभव हो सकता है।
- ओडिशा का भौगोलिक स्थान इसे बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होने वाले चक्रवातों से पूरी तरह सुरक्षित रखता है।
उत्तर: पड़ोसी राज्यों में चक्रवातों के दस्तक देने पर भी ओडिशा में अप्रत्यक्ष प्रभाव, जैसे हल्की बारिश, का अनुभव हो सकता है। — चक्रवात ‘मुरसु’ के आंध्र प्रदेश में दस्तक देने के बावजूद ओडिशा में हल्की बारिश का अनुभव हुआ, जो पड़ोसी राज्यों में चक्रवातों के अप्रत्यक्ष प्रभाव को दर्शाता है।
Mains: चक्रवात ‘मुरसु’ के आंध्र प्रदेश में दस्तक देने के कारण ओडिशा में हुई हल्की बारिश की घटना को ध्यान में रखते हुए, ओडिशा राज्य के लिए चक्रवात तैयारी और शमन रणनीतियों के महत्व पर चर्चा करें, विशेष रूप से जब पड़ोसी राज्यों में ऐसी घटनाएँ होती हैं। (लगभग 150 शब्द)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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