भारत का UNFCCC COP31 में समाधान-उन्मुख जलवायु कार्रवाई पर जोर

भारत का UNFCCC COP31 में समाधान-उन्मुख जलवायु कार्रवाई पर जोर

भारत का UNFCCC COP31 में समाधान-उन्मुख जलवायु कार्रवाई पर जोर

भारत की जलवायु कार्रवाईUNFCCC1992 में अपनाया गयाCOPवार्षिक निर्णयपेरिस समझौतातापमान लक्ष्यNDCदेशों के योगदानपंचामृतभारत की प्रतिबद्धताएँ
भारत की जलवायु कार्रवाई

✎ समाधान-उन्मुख एवं समतामूलक जलवायु कार्रवाई का अर्थ है ऐसे ठोस उपाय जो साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR-RC) के सिद्धांत पर आधारित हों, और जिनमें वित्त, प्रौद्योगिकी व अनुकूलन की उपलब्धता सुनिश्चित हो।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (बहुपक्षीय संस्थाएँ और पर्यावरणीय समझौते)  |  GS Paper III — पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा और शमन-अनुकूलन)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (हरित वित्त और सतत विकास)
  • Prelims: UNFCCC (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय), COP (पक्षकारों का सम्मेलन) और COP31 का स्थल: अंतल्या, तुर्कियर्, पेरिस समझौता (Paris Agreement) और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC), साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) सिद्धांत, नई सामूहिक परिमाणात्मक लक्ष्य (NCQG) और 2035 तक 300 अरब डॉलर प्रति वर्ष का वित्त-लक्ष्य, हानि और क्षति (Loss and Damage) कोष, पंचामृत प्रतिबद्धताएँ (COP26, ग्लासगो), मिशन LiFE (Lifestyle for Environment), वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake), ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के अंतर्गत कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना
  • Essay: जलवायु न्याय: विकासशील देशों की विकास आकांक्षाएँ और जलवायु दायित्वों का संतुलन, वैश्विक जलवायु शासन में सहमति-निर्माण: समाधान-आधारित कूटनीति की चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: समाधान-उन्मुख एवं समतामूलक जलवायु कार्रवाई का अर्थ है ऐसे ठोस उपाय जो साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR-RC) के सिद्धांत पर आधारित हों, और जिनमें वित्त, प्रौद्योगिकी व अनुकूलन की उपलब्धता सुनिश्चित हो।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत के केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने घोषणा की है कि भारत तुर्किये के अंतल्या में होने वाले UNFCCC के COP31 सम्मेलन में समाधान-उन्मुख और समतामूलक जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाएगा। यह वक्तव्य किसी विशिष्ट विवाद से जुड़ा नहीं है, बल्कि सम्मेलन से पहले भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने का संकेत है। इसका केंद्रीय विचार यह है कि जलवायु कार्रवाई व्यावहारिक समाधानों, यानी ऊर्जा संक्रमण, अनुकूलन और वित्त व प्रौद्योगिकी की उपलब्धता पर केंद्रित हो, और उसमें विकसित तथा विकासशील देशों की भिन्न परिस्थितियों व दायित्वों की समानता का ध्यान रखा जाए। UPSC की दृष्टि से यह प्रसंग बहुपक्षीय जलवायु शासन में भारत की भूमिका, समानता के सिद्धांत और विकास व पर्यावरण के बीच संतुलन को समझने का अवसर देता है।

पृष्ठभूमि

  • UNFCCC को 1992 में रियो पृथ्वी सम्मेलन में अपनाया गया था और यह 1994 में प्रभावी हुआ। इसके अंतर्गत पक्षकारों का सम्मेलन (COP) प्रतिवर्ष आयोजित होता है, जिसमें वार्षिक निर्णय लिए जाते हैं।
  • पेरिस समझौता (2015) ने पूर्व-औद्योगिक स्तर से वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 °C से काफी नीचे रखने तथा 1.5 °C की दिशा में प्रयास करने का लक्ष्य रखा। इसमें प्रत्येक देश अपने NDC प्रस्तुत करता है, जिन्हें समय-समय पर संशोधित किया जाता है।
  • COP29 (बाकू) में नई सामूहिक परिमाणात्मक लक्ष्य (NCQG) अपनाया गया, जिसके अंतर्गत विकसित देशों से विकासशील देशों के लिए 2035 तक प्रति वर्ष कम से कम 300 अरब डॉलर के वित्त का लक्ष्य रखा गया। इसी प्रसंग में वित्त की पर्याप्तता और पहुँच पर बहस जारी है।
  • COP28 (दुबई) में हानि और क्षति कोष को परिचालन में लाने का निर्णय हुआ, जो जलवायु-जनित आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई से संबंधित है।
  • भारत ने COP26 (ग्लासगो) में पंचामृत प्रतिबद्धताएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन, 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता और उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी (2005 के स्तर की तुलना में) शामिल हैं।

COP31 में समाधान-उन्मुख एवं समतामूलक जलवायु कार्रवाई क्या है?

  • यह ऐसा दृष्टिकोण है जिसमें जलवायु वार्ता का लक्ष्य केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि ठोस कार्यान्वयन योग्य उपाय हों, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार, ऊर्जा दक्षता, अनुकूलन परियोजनाएँ और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण।
  • समतामूलक कार्रवाई का मूल आधार साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) सिद्धांत है, जिसके अनुसार ऐतिहासिक उत्सर्जन और विकास-स्तर के अनुरूप दायित्वों का निर्धारण होता है।
  • विकासशील देशों के लिए इसका अर्थ है कि गरीबी उन्मूलन और आर्थिक संवृद्धि की आवश्यकता को जलवायु लक्ष्यों के साथ संतुलित किया जाए।
  • वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता-निर्माण का समर्थन विकसित देशों से अपेक्षित माना जाता है, और इसी पर NCQG व हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund) जैसे तंत्रों की भूमिका केंद्रित है।
  • वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake) प्रत्येक पाँच वर्ष में सामूहिक प्रगति का मूल्यांकन करता है, ताकि अगले NDC चक्र की महत्वाकांक्षा तय की जा सके।
  • भारत में इस दृष्टिकोण के घरेलू उपकरण मिशन LiFE (Lifestyle for Environment) और ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के अंतर्गत कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना हैं, जो उपभोग-आधारित और बाज़ार-आधारित समाधानों को दर्शाते हैं।
  • अंतल्या में आयोजित होने वाला COP31 UNFCCC प्रक्रिया का अगला वार्षिक सम्मेलन है, जिसमें पेरिस समझौते के कार्यान्वयन की समीक्षा और आगे की नीतिगत सहमति पर चर्चा होगी।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
सम्मेलन और मेज़बान तुर्किये (Türkiye) के अंतल्या में आयोजित होने वाला COP31, UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) के पक्षकारों का वार्षिक सम्मेलन है। यह जलवायु शासन की सर्वोच्च वार्षिक बैठक है।
समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण भारत का जोर ऐसी कार्रवाई पर है जो तकनीक, वित्त और नीति के ठोस उपायों से उत्सर्जन घटाए और अनुकूलन को व्यावहारिक बनाए। इसका उद्देश्य केवल घोषणाओं और लक्ष्यों तक सीमित रहना नहीं है।
समतामूलक जलवायु कार्रवाई समान किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ (Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities – CBDR-RC) के सिद्धांत के अनुसार विकसित और विकासशील देशों की जिम्मेदारी अलग है। विकासशील देशों की विकास-आवश्यकताओं को न्यायपूर्ण ढंग से स्थान देना इसका केंद्रीय तत्व है।
पेरिस समझौते का क्रियान्वयन पेरिस समझौता (Paris Agreement, 2015) के अंतर्गत राष्ट्रनिर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDC) और वैश्विक समीक्षा (Global Stocktake) की प्रक्रिया आती है। सम्मेलन में इन्हीं प्रतिबद्धताओं की प्रगति और अंतराल पर चर्चा होती है।
वित्त और प्रौद्योगिकी का प्रश्न न्यूनीकरण और अनुकूलन के लिए जलवायु वित्त (Climate Finance) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण आवश्यक हैं। विकासशील देशों के लिए ये समझौते की सफलता की व्यावहारिक कसौटी हैं।

महत्व

कूटनीतिक एवं वैश्विक शासन

  • बहुपक्षीय जलवायु व्यवस्था में भारत अपनी न्यायसंगत और व्यावहारिक स्थिति स्पष्ट करता है, जिससे विकासशील देशों के हितों को समर्थन मिलता है।
  • UNFCCC जैसे बहुपक्षीय मंच पर सहमति-निर्माण के लिए भारत की भूमिका वैश्विक दक्षिण के साथ समन्वय से जुड़ी है।

आर्थिक एवं विकास

  • समतामूलक जलवायु कार्रवाई का अर्थ है कि उत्सर्जन घटाने की लागत विकास की आवश्यकताओं के साथ संतुलित हो, ताकि गरीबी उन्मूलन और आर्थिक संवृद्धि बाधित न हों।
  • जलवायु वित्त और स्वच्छ प्रौद्योगिकी तक पहुँच नवीकरणीय ऊर्जा और हरित निवेश के अवसर खोलती है।

पर्यावरणीय एवं सामाजिक न्याय

  • अनुकूलन पर केंद्रित समाधान कृषि, जल और तटीय क्षेत्रों पर पड़ते जलवायु प्रभावों से संवेदनशील समुदायों की रक्षा करते हैं।
  • समतामूलक दृष्टिकोण में ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी और वर्तमान विकास-आवश्यकताओं दोनों का ध्यान रखा जाता है।

चुनौतियाँ

1. विकसित देशों से वित्तीय प्रतिबद्धताओं का अंतराल

  • जलवायु वित्त के वादों और वास्तविक प्रवाह के बीच अंतर विकासशील देशों की सबसे बड़ी शिकायत रहा है।
  • अनुकूलन के लिए दिए जाने वाले संसाधन न्यूनीकरण की तुलना में प्रायः कम रहते हैं।

2. समानता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन

  • विकसित और विकासशील देशों के बीच उत्सर्जन-उत्तरदायित्व पर मतभेद बने रहते हैं।
  • सभी देशों से एक समान लक्ष्य माँगना विकासशील देशों की विकास-आवश्यकताओं की अनदेखी कर सकता है।

3. विकास और उत्सर्जन न्यूनीकरण का द्वंद्व

  • ऊर्जा की बढ़ती माँग, कोयला-आधारित विद्युत उत्पादन और औद्योगिकीकरण के बीच संक्रमण व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
  • न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण के लिए रोजगार, क्षेत्रीय असमानता और ऊर्जा सुरक्षा का ध्यान रखना आवश्यक है।

4. समाधानों के क्रियान्वयन की क्षमता

  • तकनीक और वित्त की उपलब्धता के बावजूद राज्य और स्थानीय स्तर पर संस्थागत क्षमता कमजोर हो सकती है।
  • नीतिगत घोषणाओं को परियोजना-स्तर पर लागू करने में समय और प्रशासनिक समन्वय की कमी बाधा बनती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
वित्तीय अंतराल जलवायु वित्त के वादे और वास्तविक प्रवाह में अंतर, विशेषकर अनुकूलन के लिए
न्यायसंगतता का प्रश्न समान लक्ष्य बनाम विभेदित उत्तरदायित्व पर वार्ता में गतिरोध
ऊर्जा संक्रमण की लागत विकास, रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा के साथ उत्सर्जन घटाने का संतुलन
कार्यान्वयन की कमी नीतिगत घोषणाओं का जमीनी स्तर पर धीमा क्रियान्वयन

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change – NAPCC)

आगे की राह

  • जलवायु वित्त के लिए स्पष्ट, मापने योग्य और समयबद्ध प्रतिबद्धताएँ तय की जाएँ, जिनमें अनुकूलन को उचित हिस्सा मिले।
  • राष्ट्रनिर्धारित योगदान (NDC) के लक्ष्यों को राज्य-स्तरीय कार्य योजनाओं से जोड़कर संघीय समन्वय मजबूत किया जाए।
  • स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता में निवेश के साथ कौशल-विकास और क्षेत्रीय पुनर्वास योजनाएँ लागू की जाएँ।
  • अनुकूलन को कृषि, जल संसाधन और तटीय प्रबंधन की स्थानीय योजनाओं में मुख्यधारा में लाया जाए।
  • स्वच्छ प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और स्थानीय विनिर्माण क्षमता के लिए अनुसंधान एवं विकास में सार्वजनिक-निजी सहयोग बढ़ाया जाए।
  • विकासशील देशों के साथ दक्षिण-दक्षिण सहयोग से साझा समाधान और क्षमता-निर्माण को बढ़ावा दिया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व तथा संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) · जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) · पेरिस समझौता (Paris Agreement) · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) · नई सामूहिक परिमाणात्मक लक्ष्य (NCQG) · जलवायु वित्त (Climate Finance) · हानि एवं क्षति निधि (Loss and Damage Fund) · न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई (Equitable Climate Action) · वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake) · अनुकूलन और शमन (Adaptation and Mitigation) · पक्षकारों का सम्मेलन (COP) · बाकू (Baku) सम्मेलन और उसके निर्णय

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण का राज्य का नीति-निर्देश
  • अनुच्छेद 51A(छ): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
  • अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन हेतु संसद की विधायी शक्ति

अवधारणा प्रवाह

जलवायु परिवर्तन से वैश्विक तापमान और चरम मौसम घटनाओं में वृद्धि  →  UNFCCC के तहत COP में राष्ट्रों की वार्ता और पेरिस समझौते की समीक्षा  →  समान किंतु विभेदित उत्तरदायित्व के आधार पर न्यूनीकरण और अनुकूलन लक्ष्यों पर सहमति  →  राष्ट्रनिर्धारित योगदान (NDC) के माध्यम से देशों द्वारा घरेलू नीतियों में बदलाव  →  जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से क्रियान्वयन की क्षमता में वृद्धि  →  समाधान-उन्मुख और समतामूलक कार्रवाई से दीर्घकालिक सतत विकास

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) को वर्ष 1992 में रियो डी जनेरो में आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अपनाया गया था।
2. पेरिस समझौते का दीर्घकालिक लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना तथा 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के प्रयास जारी रखना है।
3. पेरिस समझौते के अंतर्गत प्रत्येक देश के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के लक्ष्य कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन-कटौती दायित्व हैं, और उन्हें पूरा न करने पर अनिवार्य दंड का प्रावधान है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी तीन

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: UNFCCC वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अपनाया गया। कथन 2 सही है: यह पेरिस समझौते के अनुच्छेद 2 का दीर्घकालिक तापमान लक्ष्य है। कथन 3 गलत है: NDC राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान हैं, उनके लक्ष्य पर दंडात्मक बाध्यता नहीं है; पारदर्शिता ढाँचे के तहत केवल नियमित सूचना और समीक्षा अनिवार्य है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में विकसित और विकासशील देशों के लिए विभेदित दायित्वों पर लगातार बल दिया है।
कारण (R): UNFCCC के अंतर्गत समता और साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व तथा संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) का सिद्धांत ऐतिहासिक उत्सर्जन में विकसित देशों की बड़ी भूमिका को मान्यता देता है।

उपर्युक्त के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, परंतु R गलत है
  4. A गलत है, परंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — CBDR-RC सिद्धांत रियो घोषणा (1992) के सिद्धांत 7 से निकला है और UNFCCC के अनुच्छेद 3.1 में समता के साथ शामिल है। इसी कारण विकसित देशों पर ऐतिहासिक उत्सर्जन के आधार पर अधिक दायित्व माने जाते हैं, और भारत विभेदित दायित्वों की मांग करता है। अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सुमेलन कीजिए:
सूची-I (संस्था/व्यवस्था)
A. वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake)
B. हानि एवं क्षति निधि (Loss and Damage Fund)
C. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance)
D. मिशन LiFE

सूची-II (विशेषता)
1. पेरिस समझौते के अंतर्गत सामूहिक प्रगति का आवधिक मूल्यांकन
2. जलवायु आपदाओं से अत्यधिक प्रभावित विकासशील देशों के लिए निधि, जो COP28 में परिचालन में आई
3. सौर संसाधन-समृद्ध देशों का गठबंधन, जिसका मुख्यालय गुरुग्राम में है
4. जीवनशैली आधारित पर्यावरण-अनुकूल आचरण की पहल, जो COP26 में आरंभ की गई

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-4, D-3
  3. A-1, B-3, C-2, D-4
  4. A-3, B-1, C-2, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — वैश्विक स्टॉकटेक पेरिस समझौते की सामूहिक प्रगति की आवधिक समीक्षा है (1)। हानि एवं क्षति निधि को COP27 में स्थापित और COP28 में परिचालन में लाया गया (2)। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा) में है (3)। मिशन LiFE भारत द्वारा COP26 में प्रस्तुत जीवनशैली-आधारित जलवायु पहल है (4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत ने जलवायु वार्ताओं में समाधान-उन्मुख और न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई पर बल दिया है। साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व तथा संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) का सिद्धांत पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत की वार्ता-स्थिति को किस प्रकार आकार देता है, इसका समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही विवेचना कीजिए कि बाकू में पक्षकारों के सम्मेलन (COP29) में अपनाया गया नई सामूहिक परिमाणात्मक लक्ष्य (NCQG) विकासशील देशों की वित्तीय आवश्यकताओं को किस सीमा तक संबोधित करता है। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: रियो घोषणा (1992) के सिद्धांत 7 से CBDR का उद्भव; UNFCCC (1992) के अनुच्छेद 3.1 में समता और CBDR-RC का समावेश; पेरिस समझौते (2015) के अनुच्छेद 2.2 में इसे ‘विभिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में’ पुनर्परिभाषित करना, जिससे अनुबंध-I/गैर-अनुबंध-I का द्विभाजन कुछ हद तक कमज़ोर हुआ।

भाग 1 (CBDR-RC और भारत की स्थिति): (क) ऐतिहासिक उत्सर्जन में विकसित देशों की भूमिका और भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विश्व औसत से कम होना; (ख) भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) का ढाँचा: वर्ष 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य, गैर-जीवाश्म स्रोतों से संस्थापित विद्युत क्षमता में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी का लक्ष्य, तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net Zero) का संकल्प; (ग) पंचामृत (COP26, ग्लासगो) और मिशन LiFE; (घ) समता बनाम आत्म-विभेदन: पेरिस में ‘स्व-चयनित विभेदन’ के विरुद्ध विकासशील देशों की आपत्तियाँ और चीन, भारत जैसे उभरते देशों की स्थिति।

भाग 2 (NCQG का मूल्यांकन): (क) COP29 (बाकू, 2024) में विकसित देशों के नेतृत्व में वर्ष 2035 तक प्रति वर्ष 300 अरब डॉलर का लक्ष्य और सभी स्रोतों से 1.3 ट्रिलियन डॉलर की आकांक्षा; (ख) पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9 (विकसित देशों की वित्त-प्रतिबद्धता) से संबंध और 100 अरब डॉलर वाले पूर्व लक्ष्य की तुलना; (ग) अनुकूलन वित्त, हानि एवं क्षति निधि (COP28 में परिचालन) और रियायती वित्त की अपर्याप्तता; (घ) आलोचना: ‘परिमाण’ बनाम ‘गुणवत्ता’, निजी वित्त और बहुपक्षीय विकास बैंकों के मिश्रण पर निर्भरता।

भाग 3 (संतुलित दृष्टिकोण और निष्कर्ष): (क) विकसित देशों का तर्क कि नई आर्थिक शक्तियों को भी योगदान देना चाहिए बनाम विकासशील देशों का तर्क कि ऐतिहासिक दायित्व अपरिवर्तित है; (ख) अंतरराष्ट्रीय न्याय संबंधी परामर्शी राय (ICJ, जुलाई 2025) जिसमें राज्यों के जलवायु दायित्वों को अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत रेखांकित किया गया; (ग) स्रोत: Agarwal और Narain (1991) की ‘Global Warming in an Unequal World’ का समता-आधारित तर्क; (घ) निष्कर्ष में संतुलित स्थिति लें: समाधान-उन्मुख कार्रवाई के लिए समता और वित्तीय प्रतिबद्धता में पारदर्शिता तथा तकनीकी हस्तांतरण को सुनिश्चित करना आवश्यक है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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