05 Nov चिदंबरम मंदिर: सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई
✎ उच्चतम न्यायालय ने प्रश्न उठाया है कि संरक्षकीय अधिकारिता (Parens Patriae) केवल सार्वजनिक मंदिरों तक सीमित है या अन्य उपासना-स्थलों तक भी विस्तृत है, और इस बीच मद्रास उच्च न्यायालय का प्रबंध बोर्ड गठन का आदेश स्थगित है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (संविधान के मौलिक अधिकार, उच्च न्यायालयों की अधिकारिता, धार्मिक संस्थाओं का प्रशासन) | GS Paper I — भारतीय विरासत एवं संस्कृति (दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य, मंदिरों का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व)
- Prelims: संरक्षकीय अधिकारिता (Parens Patriae) का सिद्धांत, अनुच्छेद 26 — धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 25 — धार्मिक आचरण और धार्मिक संस्थाओं तक पहुँच, अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता, अनुच्छेद 136 — उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति याचिका, विधिक व्यक्ति (Juristic Person) के रूप में देवता की मान्यता, तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959 और HR&CE विभाग, पंचभूत स्थल: चिदंबरम नटराज मंदिर (आकाश स्थल), राज्य सूची की प्रविष्टि 28 — धार्मिक विन्यास और धार्मिक संस्थाएँ
- Essay: राज्य का संरक्षक रूप और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता: संवैधानिक संतुलन, ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण बनाम धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन: प्रशासनिक चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्चतम न्यायालय ने प्रश्न उठाया है कि संरक्षकीय अधिकारिता (Parens Patriae) केवल सार्वजनिक मंदिरों तक सीमित है या अन्य उपासना-स्थलों तक भी विस्तृत है, और इस बीच मद्रास उच्च न्यायालय का प्रबंध बोर्ड गठन का आदेश स्थगित है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 4 नवंबर 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय के 30 अक्टूबर 2026 के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें चिदंबरम के सबनायगर (नटराज) मंदिर के प्रबंधन के लिए प्रबंध बोर्ड (Board of Management) गठित किया गया था। उच्च न्यायालय ने पोदु दीक्षितर समुदाय पर कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए मंदिर की परिसंपत्तियों से अनधिकृत निर्माण हटाने और अतिक्रमित संपत्ति वापस लेने का निर्देश दिया था। पीठ ने प्रश्न उठाया कि क्या राज्य उच्च न्यायालयों की संरक्षकीय अधिकारिता केवल सार्वजनिक मंदिरों तक सीमित है, अन्य उपासना-स्थलों तक नहीं। पीठ ने तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया है। इस प्रकरण में मंदिर की धरोहर-सुरक्षा, विन्यास के वित्तीय हिसाब और धार्मिक स्वायत्तता के संवैधानिक प्रश्न एक साथ उठे हैं, इसलिए यह मामला परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- चिदंबरम का नटराज मंदिर पंचभूत स्थलों में आकाश तत्त्व से जुड़ा है और इसका प्रबंधन दीर्घकाल से पोदु दीक्षितर समुदाय के हाथों में रहा है। दीक्षितर वंशानुगत पुजारी समुदाय है।
- तमिलनाडु में हिंदू मंदिरों का प्रशासन हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ विन्यास अधिनियम, 1959 के अंतर्गत HR&CE विभाग के माध्यम से होता है। इसी अधिनियम के तहत राज्य सार्वजनिक मंदिरों के हितों की रक्षा का दावा करता रहा है।
- उच्चतम न्यायालय के 2014 के आदेशों के बाद मंदिर का संचालन पोदु दीक्षितर समुदाय को सौंपा गया था, और इसी व्यवस्था की समीक्षा का प्रश्न अब सामने है।
- राज्य की ओर से यह तर्क रखा गया कि पिछले 12 वर्षों की आय का पूरा हिसाब नहीं दिया गया और मंदिर परिसर में अनधिकृत निर्माण से ऐतिहासिक संरचना को क्षति पहुँची है।
- उच्च न्यायालय ने रिटायर्ड न्यायाधीशों वी. भारतीदासन और आर. सुरेश कुमार को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया था तथा तमिलनाडु हेरिटेज कमीशन के परामर्श से कार्य करने का निर्देश दिया था।
संरक्षकीय अधिकारिता (Parens Patriae) क्या है?
- संरक्षकीय अधिकारिता (Parens Patriae) लैटिन सूत्र है, जिसका अर्थ है राज्य को उन व्यक्तियों का संरक्षक मानना जो स्वयं अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ हैं, जैसे अवयस्क, मानसिक रूप से अक्षम या धर्मार्थ संस्थाएँ।
- भारतीय विधि में इस सिद्धांत का प्रयोग उच्च न्यायालयों द्वारा धर्मार्थ न्यासों और धार्मिक विन्यासों पर निगरानी रखने में होता रहा है।
- भारतीय विधि के अंतर्गत मंदिर का देवता विधिक व्यक्ति (Juristic Person) माना गया है। उच्चतम न्यायालय ने यतींद्रनाथ नस्कर बनाम आयकर आयुक्त (1969) में यह सिद्धांत स्थापित किया था, जिससे देवता संपत्ति धारण कर सकता है और उसके हितों की रक्षा के लिए संरक्षक की आवश्यकता होती है।
- अनुच्छेद 26 के अंतर्गत प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार है, किंतु यह अधिकार विधि के अधीन है। राज्य विधि द्वारा धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति और प्रशासन का नियमन कर सकता है।
- अनुच्छेद 25(2)(ख) राज्य को हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए खोलने का अधिकार देता है। इसलिए राज्य का हस्तक्षेप सामाजिक सुधार और सार्वजनिक हित से भी जुड़ा रहा है।
- राज्य सूची की प्रविष्टि 28 के अंतर्गत धार्मिक विन्यास और धार्मिक संस्थाएँ राज्य का विषय हैं, इसलिए संबंधित अधिनियम राज्यों द्वारा बनाए जाते हैं।
- प्रश्न का मूल यह है कि क्या यह सिद्धांत केवल हिंदू सार्वजनिक मंदिरों पर लागू होता है या अन्य उपासना-स्थलों पर भी, और क्या इसका प्रयोग समानता के सिद्धांत (अनुच्छेद 14) की कसौटी पर खरा उतरता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| विवादित आदेश | मद्रास उच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 के आदेश से प्रबंधन मंडल (Board of Management) गठित कर मंदिर के प्रशासन को व्यवस्थित करने का निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने इस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाई और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। |
| पैरेन पैट्रिए (Parens Patriae) सिद्धांत | राज्य का संरक्षक (guardian) के रूप में दायित्व। विधि में देवता को विधिक व्यक्ति (Juristic Person) माना जाता है, इसलिए उसके हितों की रक्षा के लिए न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। यही इस मामले का केंद्रीय विधिक प्रश्न है। |
| पोदु दीक्षितर (Podhu Dikshidar) | वंशानुगत पुजारी समुदाय। उच्चतम न्यायालय के 2014 के आदेशों से मंदिर के संचालन का दायित्व इन्हें सौंपा गया था। उच्च न्यायालय ने इसी व्यवस्था के कुप्रबंधन की जाँच की। |
| प्रबंधन मंडल की संरचना | सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष, सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी सदस्य, तथा पोदु दीक्षितर संघ के सचिव और HR&CE विभाग के सचिव पदेन सदस्य। |
| संरक्षण और अतिक्रमण हटाने का आदेश | तमिलनाडु विरासत आयोग (Tamil Nadu Heritage Commission) के परामर्श से अनधिकृत निर्माण हटाने और जिला प्रशासन की सहायता से अतिक्रमित मंदिर संपत्ति वापस लेने के निर्देश। |
| राज्य सरकार के तथ्य | राज्य की ओर से न्यायालय में कहा गया कि संरचना को क्षति पहुँची है और पिछले 12 वर्षों की मंदिर आय का पूरा लेखा प्रस्तुत नहीं किया गया। ये तथ्य न्यायालय में विचाराधीन हैं। |
महत्व
संवैधानिक और विधिक
- पैरेन पैट्रिए क्षेत्राधिकार का दायरा तय होना न्यायिक समीक्षा और उच्च न्यायालय की अधिकार-सीमा से जुड़ा मूल प्रश्न है।
- उच्चतम न्यायालय का यह प्रश्न कि क्या यह सिद्धांत केवल सार्वजनिक मंदिरों पर लागू होता है, विधि में समान व्यवहार के सिद्धांत की कसौटी है।
- अंतिम निर्णय से पूजा-स्थलों से जुड़े भविष्य के मामलों के लिए विधिक एकरूपता स्थापित होगी।
धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासन
- अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार है, परंतु यह अधिकार राज्य के विधिक नियमन के अधीन है।
- हिंदू धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन के लिए तमिलनाडु में HR&CE विभाग और उसका विधिक ढाँचा कार्यरत है। इस मामले में राज्य की भूमिका और वंशानुगत अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न है।
सांस्कृतिक विरासत
- नटराज मंदिर प्राचीन स्थापत्य का उदाहरण है, इसलिए अनधिकृत निर्माण हटाने का प्रश्न विरासत संरक्षण से जुड़ता है।
- राज्य स्तरीय विरासत आयोग की परामर्शी भूमिका संरक्षण नीति में समन्वय का उदाहरण है।
संघीय ढाँचा
- धार्मिक बंदोबस्ती (Religious Endowments) सातवीं अनुसूची की राज्य सूची का विषय है, इसलिए राज्य सरकार की विधिक भूमिका प्रमुख है।
- राज्य और उच्च न्यायालय की शक्तियों के बीच का संबंध संघीय व्यवस्था में शासन-संरचना की समझ देता है।
चुनौतियाँ
1. पैरेन पैट्रिए क्षेत्राधिकार की सीमा
- यह सिद्धांत मूलतः संरक्षण की अवधारणा से विकसित हुआ है। इसे किन संस्थाओं पर लागू किया जाए, यह स्पष्ट न होने से विवाद उत्पन्न होता है।
- सार्वजनिक मंदिर और निजी पूजा-स्थल में भेद का आधार विधिक रूप से स्पष्ट करना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका की भूमिका; संविधान की व्याख्या
2. समान व्यवहार का प्रश्न
- यदि यह सिद्धांत केवल कुछ धार्मिक संस्थाओं पर लागू हो, तो समानता के अधिकार पर प्रश्न उठते हैं।
- धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के नियमन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: धर्मनिरपेक्षता; अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 25-28
3. वंशानुगत प्रबंधन बनाम जवाबदेही
- वंशानुगत अधिकार परंपरा से जुड़े हैं, किंतु सार्वजनिक संपत्ति और आय के प्रबंधन में पारदर्शिता अनिवार्य है।
- आय-व्यय का पूरा लेखा न देने का मुद्दा जवाबदेही और लेखा-परीक्षा व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही
4. अतिक्रमण हटाना और विरासत संरक्षण
- अनधिकृत निर्माण हटाने की प्रक्रिया में प्रभावित पक्षों के अधिकार और विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
- ऐतिहासिक संरचनाओं के संरक्षण और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय की चुनौती बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-1: भारतीय विरासत और संस्कृति; GS-2: प्रशासनिक समन्वय
5. अंतरिम आदेश और न्यायिक प्रक्रिया
- उच्चतम न्यायालय ने आदेश पर रोक लगाकर अंतिम सुनवाई तक स्थिति को स्थिर रखा है। इससे प्रशासनिक निर्णयों में अनिश्चितता बनती है।
- राज्य और उच्च न्यायालय के आदेशों के बीच प्रक्रियात्मक विवाद केंद्र-राज्य और न्यायिक ढाँचे की समझ की माँग करते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायपालिका; राज्य और उच्च न्यायालय की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| क्षेत्राधिकार की अस्पष्टता | पैरेन पैट्रिए सिद्धांत का दायरा स्पष्ट न होने से भविष्य के मामलों में असमानता और मुकदमेबाजी बढ़ सकती है। |
| प्रशासनिक पारदर्शिता | 12 वर्षों के आय-व्यय का अपूर्ण लेखा प्रबंधन की जवाबदेही पर प्रश्न उठाता है। |
| संपत्ति और अतिक्रमण | अनधिकृत निर्माण हटाने की प्रक्रिया में विधिक प्रक्रिया और सामाजिक संवेदनशीलता का संतुलन आवश्यक है। |
| धार्मिक स्वायत्तता बनाम राज्य नियमन | अनुच्छेद 26 के अधिकार और राज्य के नियामक हस्तक्षेप के बीच सीमा तय करना कठिन है। |
आगे की राह
- उच्चतम न्यायालय द्वारा पैरेन पैट्रिए सिद्धांत पर स्पष्ट विधिक व्याख्या से भविष्य के मामलों में एकरूपता आएगी।
- HR&CE विधि और मंदिर-विशिष्ट प्रावधानों की भूमिका और सीमाएँ स्पष्ट रूप से परिभाषित की जाएँ।
- मंदिरों की आय-व्यय के लिए नियमित स्वतंत्र लेखा-परीक्षा और डिजिटल अभिलेख प्रणाली अपनाई जाए।
- अतिक्रमण हटाने से पहले प्रभावित पक्षों को सूचना और सुनवाई का अवसर देने की प्रक्रिया सुनिश्चित हो।
- तमिलनाडु विरासत आयोग, जिला प्रशासन और मंदिर प्रबंधन के बीच स्पष्ट समन्वय तंत्र बनाया जाए।
- वंशानुगत अधिकारों और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन हेतु पारदर्शी नियुक्ति और प्रबंधन मानक तय किए जाएँ।
- अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक संप्रदायों की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए विधिक नियमन की सीमा निर्धारित हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पैरेंस पैट्रिये अधिकार-क्षेत्र (Parens Patriae Jurisdiction) · विधिक व्यक्ति (Juristic Person) और देव-विग्रह · अनुच्छेद 26 (Article 26): धार्मिक संप्रदाय का अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार · अनुच्छेद 25(2)(ख) (Article 25(2)(b)): हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए खोलना · राज्य सूची की प्रविष्टि 28 (State List Entry 28): धार्मिक बंदोबस्ती और धर्मार्थ संस्थाएँ · तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (Tamil Nadu Hindu Religious and Charitable Endowments Act, 1959) · आवश्यक धार्मिक आचरण का सिद्धांत (Essential Religious Practices Doctrine) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और उच्च न्यायालय की अंतरिम रोक (Interim Stay) · सार्वजनिक बनाम निजी धार्मिक स्थल (Public vs Private Places of Worship) · धार्मिक संपत्ति का अतिक्रमण और विरासत संरक्षण (Heritage Conservation) · प्रबंधन बोर्ड (Board of Management) और वैधानिक निगरानी · अनुच्छेद 14 (Article 14): समानता और धर्मनिरपेक्षता के बीच संतुलन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार
- अनुच्छेद 25(2)(ख): हिंदू धार्मिक संस्थाओं का राज्य विनियमन
- अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट शक्ति
- अनुच्छेद 136: उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति
- सातवीं अनुसूची (राज्य सूची, प्रविष्टि 28): धार्मिक बंदोबस्ती राज्य विषय
अवधारणा प्रवाह
2014 में उच्चतम न्यायालय के आदेश से मंदिर का संचालन पोदु दीक्षितर को सौंपा गया। → राज्य सरकार ने कुप्रबंधन, अतिक्रमण और अपूर्ण आय-लेखा से संबंधित तथ्य न्यायालय के समक्ष रखे। → 30 अक्टूबर 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय ने प्रबंधन मंडल गठित किया और अनधिकृत निर्माण हटाने के निर्देश दिए। → इस आदेश का आधार पैरेन पैट्रिए क्षेत्राधिकार था, जिसका दायरा केवल सार्वजनिक मंदिरों तक सीमित है या नहीं, यह प्रश्न बना। → 4 नवंबर 2026 को उच्चतम न्यायालय ने यह प्रश्न उठाया, राज्य को नोटिस जारी किया और आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाई। → अंतिम सुनवाई तक मंदिर प्रशासन की स्थिति और प्रबंधन मंडल की भूमिका अनिश्चित बनी रहेगी।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है, परंतु यह अधिकार लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
2. अनुच्छेद 25(2)(ख) राज्य को यह शक्ति देता है कि वह हिंदुओं की सार्वजनिक चरित्र वाली धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों और अनुभागों के लिए खोलने हेतु विधि बना सके।
3. धार्मिक बंदोबस्ती और धर्मार्थ संस्थाएँ संघ सूची (Union List) में आती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है, जो लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 25(2)(ख) के अंतर्गत राज्य हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए खोलने हेतु कानून बना सकता है। कथन 3 गलत है: धार्मिक बंदोबस्ती और धर्मार्थ संस्थाएँ राज्य सूची की प्रविष्टि 28 में आती हैं, इसलिए राज्य विधानमंडल इन पर कानून बनाते हैं।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): हिंदू देव-विग्रह को विधिक व्यक्ति (Juristic Person) के रूप में मान्यता दी गई है और वह संपत्ति धारण कर सकता है।
कारण (R): न्यायालय का पैरेंस पैट्रिये अधिकार-क्षेत्र इसलिए लागू होता है क्योंकि देवता स्वयं अपनी संपत्ति की रक्षा करने में असमर्थ माना जाता है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — पramatha Nath Mullick बनाम Pradyumna Kumar Mullick (1925) में प्रिवी काउंसिल ने देव-विग्रह को विधिक व्यक्ति माना, जो संपत्ति धारण कर सकता है। पैरेंस पैट्रिये का सिद्धांत उन व्यक्तियों या संपत्तियों की रक्षा के लिए है जो स्वयं रक्षा नहीं कर सकते, जैसे नाबालिग, विकृतचित्त व्यक्ति और धर्मार्थ संपत्ति। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन पर विचार कीजिए:
सूची I (वाद / सिद्धांत)
1. Pramatha Nath Mullick बनाम Pradyumna Kumar Mullick (1925)
2. Commissioner, HR&CE, Madras बनाम Sri Lakshmindra Thirtha Swamiar (1954)
सूची II (विषय)
A. देव-विग्रह का विधिक व्यक्तित्व
B. आवश्यक धार्मिक आचरण का सिद्धांत (Essential Religious Practices)
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-A, 2-B
- 1-B, 2-A
- 1-A, 2-A
- 1-B, 2-B
उत्तर: 1-A, 2-B — Pramatha Nath Mullick (1925) देव-विग्रह को विधिक व्यक्ति मानने का प्रमुख निर्णय है। Shirur Mutt या Lakshmindra Thirtha Swamiar वाद (1954) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 26 के अंतर्गत ‘आवश्यक धार्मिक आचरण’ की अवधारणा विकसित की और राज्य द्वारा धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन पर सीमाएँ तय कीं। अतः 1-A और 2-B सही है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य का पैरेंस पैट्रिये अधिकार-क्षेत्र केवल सार्वजनिक मंदिरों तक सीमित है या अन्य धार्मिक स्थलों तक भी विस्तृत हो सकता है, इस प्रश्न का परीक्षण कीजिए। अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक संप्रदायों के प्रबंधन के अधिकार और देव-विग्रह को विधिक व्यक्ति मानने की अवधारणा के संदर्भ में विवेचना कीजिए। साथ ही बताइए कि यदि किसी धार्मिक संस्था में प्रबंधन में गंभीर कुप्रबंध सिद्ध हो, तो न्यायालय और राज्य सरकार के पास कौन-से वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर-संरचना:
1. भूमिका: चिदंबरम नटराज मंदिर से संबंधित हालिया घटना (4 नवंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के 30 अक्टूबर के आदेश पर रोक, और प्रश्न उठाना कि पैरेंस पैट्रिये केवल सार्वजनिक मंदिरों पर लागू होता है या नहीं) का संक्षिप्त उल्लेख।
2. पैरेंस पैट्रिये की अवधारणा: ब्रिटिश चांसरी न्यायालय से उत्पत्ति; भारत में नाबालिगों, विकृतचित्त व्यक्तियों और धर्मार्थ न्यासों व बंदोबस्ती पर लागू; राज्य का संरक्षक-कर्तव्य।
3. देव-विग्रह का विधिक व्यक्तित्व: Pramatha Nath Mullick बनाम Pradyumna Kumar Mullick (1925), प्रिवी काउंसिल; संपत्ति धारण करने की क्षमता; देव-विग्रह स्वयं प्रबंधन नहीं कर सकता, इसलिए पुजारी/सेवायत का दायित्व।
4. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (संप्रदाय का प्रबंधन अधिकार, जो लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य के अधीन), अनुच्छेद 25(2)(ख) (सार्वजनिक हिंदू संस्थाएँ सभी वर्गों के लिए खोलना), राज्य सूची की प्रविष्टि 28 (धार्मिक बंदोबस्ती)।
5. वैधानिक ढाँचा: तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 और HR&CE विभाग की भूमिका; सार्वजनिक बनाम निजी (संप्रदाय-आधारित) धार्मिक स्थलों का अंतर; अन्य धर्मों के पूजा-स्थलों पर समान सिद्धांत लागू करने की संवैधानिक चुनौती।
6. न्यायिक दृष्टांत: Commissioner, HR&CE, Madras बनाम Sri Lakshmindra Thirtha Swamiar (1954) में आवश्यक धार्मिक आचरण और प्रबंधन पर राज्य के नियंत्रण की सीमा; Sabarimala निर्णय (2018, Indian Young Lawyers Association) में आवश्यक धार्मिक आचरण पर पुनर्विचार; Kashi Vishwanath मामला (1997) में विशेष कानून के अंतर्गत प्रबंधन की वैधता।
7. संतुलित दृष्टिकोण: (क) राज्य-हस्तक्षेप के पक्ष में तर्क: संपत्ति की रक्षा, अतिक्रमण हटाना, विरासत संरक्षण, वित्तीय पारदर्शिता, अनुच्छेद 14 के अंतर्गत मनमानी से बचाव; (ख) स्वायत्तता के पक्ष में तर्क: अनुच्छेद 26 का संप्रदाय-अधिकार, धार्मिक आस्था में दखल की आशंका, अनुच्छेद 25 का मूल चरित्र।
8. परिणाम-प्रश्न: गंभीर कुप्रबंध में न्यायालय द्वारा प्रबंधन बोर्ड गठित करना, अंतरिम रोक, अतिक्रमण हटाने हेतु जिला प्रशासन की सहायता, और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी कर अंतिम निर्णय तक प्रक्रिया पर रोक।
9. निष्कर्ष: धर्मनिरपेक्षता और समान व्यवहार के आधार पर पैरेंस पैट्रिये का विस्तार सावधानीपूर्वक, प्रक्रियागत और न्यायिक-संतुलन के साथ ही संभव; विधायी स्पष्टता की आवश्यकता।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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