उत्तराखंड PSC में नियुक्त सेवानिवृत्त कर्मचारियों के वेतन से पेंशन कटौती का SC का निर्णय

उत्तराखंड PSC में नियुक्त सेवानिवृत्त कर्मचारियों के वेतन से पेंशन कटौती का SC का निर्णय

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पेंशन कटौती का न्यायिक चक्र

✎ सेवानिवृत्ति के बाद लोक सेवा आयोग में नियुक्ति से जुड़े विवादों में अनुच्छेद 319 (पद-त्याग के बाद निषेध), अनुच्छेद 309 (सेवा-शर्तें) और अनुच्छेद 300A (पेंशन का संपत्ति-संरक्षण) को एक साथ समझें, क्योंकि न्यायालय ऐसे नियमों की…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): संविधान के अनुच्छेद 315-323 के अंतर्गत लोक सेवा आयोग, सेवा-शर्तें और न्यायिक समीक्षा  |  GS Paper II — शासन (Governance): सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति, सार्वजनिक निधि का उपयोग और संस्थागत स्वतंत्रता
  • Prelims: अनुच्छेद 315 (संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग), अनुच्छेद 316 (आयोग के सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल), अनुच्छेद 319 (आयोग के सदस्यों के पद-त्याग के बाद रोजगार पर निषेध), अनुच्छेद 309 (सेवा-शर्तों का विनियमन), अनुच्छेद 300A (संपत्ति का संवैधानिक अधिकार; पेंशन का न्यायिक दर्जा), उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (Uttarakhand Public Service Commission), पुनर्नियुक्त पेंशनभोगी (Re-employed Pensioners) और पेंशन कटौती के नियम, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
  • Essay: संस्थाओं की स्वतंत्रता और सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियाँ: क्या संवैधानिक निष्पक्षता और सार्वजनिक हित में संतुलन संभव है?, पेंशन: सामाजिक सुरक्षा का साधन या सेवा-प्रतिफल? राज्य की वित्तीय जिम्मेदारी और कर्मचारी के अधिकार के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: सेवानिवृत्ति के बाद लोक सेवा आयोग में नियुक्ति से जुड़े विवादों में अनुच्छेद 319 (पद-त्याग के बाद निषेध), अनुच्छेद 309 (सेवा-शर्तें) और अनुच्छेद 300A (पेंशन का संपत्ति-संरक्षण) को एक साथ समझें, क्योंकि न्यायालय ऐसे नियमों की वैधता इन्हीं संवैधानिक कसौटियों पर परखता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने उस नियम को सही ठहराया है, जिसके अंतर्गत सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों की उत्तराखंड लोक सेवा आयोग में नियुक्ति की स्थिति में उनके वेतन से पेंशन की कटौती की जाती है। यह निर्णय इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसमें पेंशन के वित्तीय स्वरूप, पुनर्नियुक्ति की शर्तों और संवैधानिक संस्थाओं के सदस्यों की नियुक्ति से जुड़े प्रश्न एक साथ आते हैं। स्रोत-समाचार में निर्णय के सभी तर्कों और नियम के सटीक प्रावधानों का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं है, इसलिए परीक्षा के उत्तर में निर्णय-पाठ (Judgment) से तथ्यों की पुष्टि अवश्य करें।

पृष्ठभूमि

  • लोक सेवा आयोग संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323 के अंतर्गत स्थापित संस्थाएँ हैं। संघ के लिए संघ लोक सेवा आयोग और राज्यों के लिए राज्य लोक सेवा आयोग का प्रावधान है।
  • आयोग के सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और पद-त्याग के बाद की स्थिति का उल्लेख अनुच्छेद 316 और 319 में है। अनुच्छेद 319 सदस्यों के पद-त्याग के बाद कुछ पदों पर रोजगार पर निषेध लगाता है, जिससे आयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।
  • पेंशन का आधार सेवा-शर्तें हैं, जिन्हें अनुच्छेद 309 के अंतर्गत बने नियम और विनियम निर्धारित करते हैं। केंद्र सरकार के लिए CCS (Pension) Rules, 1972 का उदाहरण प्रसिद्ध है, जबकि राज्यों के अपने नियम होते हैं।
  • डी. एस. नकारा बनाम भारत संघ (1983) में सर्वोच्च न्यायालय ने पेंशन को मात्र अनुग्रह नहीं, बल्कि कर्मचारी के वेतन का आस्थगित भाग माना। इसी से पेंशन को अनुच्छेद 300A के संदर्भ में संपत्ति के संवैधानिक अधिकार से जोड़ा गया।
  • पुनर्नियुक्ति में यह प्रश्न उठता है कि सरकारी पद पर दोहरा लाभ (पेंशन और वेतन) किस सीमा तक उचित है। इसी कारण राज्य और केंद्र के नियमों में पुनर्नियुक्त पेंशनभोगियों के लिए कटौती या निलंबन के प्रावधान रखे जाते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत ऐसे नियमों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करता है। यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के उसी सिद्धांत का एक उदाहरण है, जिसमें नियम की वैधता की पुष्टि की गई।

पेंशन कटौती का नियम क्या है?

  • पेंशन सेवानिवृत्त कर्मचारी को मिलने वाला नियमित भुगतान है, जो सेवा के बदले में राज्य द्वारा दिया जाने वाला प्रतिफल माना जाता है।
  • पुनर्नियुक्ति (Re-employment) का अर्थ है सेवानिवृत्ति के बाद उसी या किसी अन्य सरकारी पद पर फिर से नियुक्ति। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक निधि से दोहरा भुगतान नियंत्रित करने के लिए नियम बनाए जाते हैं।
  • पेंशन कटौती का उद्देश्य वित्तीय अनुशासन, समान अवसर और सार्वजनिक धन के सदुपयोग को सुनिश्चित करना है।
  • संवैधानिक संस्थाओं के सदस्यों के लिए अनुच्छेद 319 जैसे प्रावधान पद-त्याग के बाद की नियुक्ति पर सीमाएँ लगाते हैं, ताकि आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे।
  • पेंशन पर अनुच्छेद 300A का संरक्षण है, इसलिए कोई भी कटौती विधि-सम्मत प्रक्रिया और उचित आधार पर ही हो सकती है।
  • नियम की वैधता का परीक्षण सामान्यतः इन बिंदुओं पर होता है: क्या नियम सक्षम विधायी या कार्यकारी प्राधिकारी द्वारा बना है, क्या वह मनमाना है, और क्या वह अनुच्छेद 14 के समानता सिद्धांत के अनुरूप है।
  • सेवा-शर्तों के नियम राज्य सरकार की वित्तीय नीति और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर बदल सकते हैं, इसलिए राज्य-विशेष के नियम और केंद्रीय नियम अलग हो सकते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
निर्णय का स्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने उस नियम को वैध ठहराया है जिसके अंतर्गत सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति पर उसकी पेंशन की राशि वेतन में से घटाई जाती है। यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का एक उदाहरण है, जिसमें नियम की संवैधानिकता परखी गई।
संदर्भ संस्था उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (Uttarakhand Public Service Commission) से जुड़ा मामला है। राज्य लोक सेवा आयोग संविधान के अनुच्छेद 315 के अंतर्गत स्थापित संवैधानिक संस्था है, इसलिए इसके सदस्यों या कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े नियम सार्वजनिक महत्व रखते हैं।
विवाद का मूल प्रश्न पेंशन और वेतन दोनों एक साथ मिलने पर सार्वजनिक धन के दोहरे भुगतान की आशंका रहती है। दूसरी ओर पुनर्नियुक्त कर्मचारी को उसकी सेवा का प्रतिफल भी मिलना चाहिए। न्यायालय को इन दोनों हितों के बीच संतुलन देखना होता है।
नीतिगत महत्व सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति (Re-employment) की नीति से यह तय होता है कि अनुभवी जनशक्ति का उपयोग किस सीमा तक हो और सार्वजनिक व्यय पर कितना नियंत्रण रहे। इसका प्रभाव राज्य सरकारों की वित्तीय नीति पर भी पड़ता है।
स्रोत की सीमा दिए गए समाचार अंश में निर्णय के तर्क, नियम की ठीक धाराएँ और तिथि पूरी नहीं हैं। परीक्षा की दृष्टि से मूल निर्णय या विश्वसनीय विधि-रिपोर्ट से नियम का सटीक प्रावधान अवश्य सत्यापित करें।

महत्व

संवैधानिक और प्रशासनिक

  • सेवा-शर्तों से संबंधित नियम बनाने की शक्ति अनुच्छेद 309 के अंतर्गत विधानमंडल और कार्यपालिका को प्राप्त है। ऐसे नियमों की वैधता पर न्यायालय का निर्णय इस शक्ति की सीमाएँ स्पष्ट करता है।
  • लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया की पवित्रता और स्वतंत्रता बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि अनुच्छेद 320 के अंतर्गत आयोग की भूमिका नियुक्ति और अनुशासन से जुड़ी सलाह तक फैली है।

वित्तीय

  • पेंशन और वेतन के समायोजन से सार्वजनिक व्यय पर सीधा प्रभाव पड़ता है। दोहरे भुगतान से बचाव राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) का एक घटक है।
  • राज्य की पेंशन देनदारी लंबी अवधि में बजट पर दबाव डालती है, इसलिए पुनर्नियुक्ति के नियम वित्तीय विवेक से जुड़े होते हैं।

सामाजिक-न्यायिक

  • समान परिस्थिति के कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार अनुच्छेद 14 की समता की भावना से जुड़ा है। नियम का वर्गीकरण उचित और तर्कसंगत होना चाहिए।
  • सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अधिकार और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन न्यायिक विवेचना का महत्वपूर्ण विषय बनता है।

चुनौतियाँ

1. पेंशन और वेतन का समायोजन

  • एक ही पद पर पेंशन और पूरा वेतन दोनों देने से सार्वजनिक धन का दोहरा उपयोग हो सकता है।
  • पेंशन की राशि घटाने से पुनर्नियुक्त कर्मचारी की आय पर असर पड़ता है, जिससे स्वीकार्यता और न्यायोचित व्यवहार के प्रश्न उठते हैं।

2. समता और वर्गीकरण का प्रश्न

  • सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बीच किया गया कोई भी वर्गीकरण तर्कसंगत आधार पर होना चाहिए, अन्यथा वह अनुच्छेद 14 की कसौटी पर विफल हो सकता है।
  • पुनर्नियुक्ति के अलग-अलग पदों और संस्थाओं के लिए अलग नियम बनने से एकरूपता का अभाव उत्पन्न हो सकता है।

3. नियम-निर्माण में पारदर्शिता

  • पुनर्नियुक्ति के नियम यदि स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न हों तो मनमानी की आशंका बढ़ती है।
  • नियमों का प्रभाव प्रभावित कर्मचारियों तक समय पर पहुँचना आवश्यक है, ताकि वे अपनी योजना बना सकें।

4. वित्तीय दबाव और सेवा-अनुभव का संतुलन

  • राज्यों के पेंशन व्यय में वृद्धि से राजकोषीय संतुलन पर दबाव बढ़ता है।
  • अनुभवी विशेषज्ञों को सेवा में बनाए रखना भी आवश्यक है, इसलिए नियम ऐसा होना चाहिए जो दोनों हितों को साधे।

5. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

  • नीतिगत प्रावधानों में न्यायालय सामान्यतः तभी हस्तक्षेप करता है जब नियम संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करे।
  • न्यायिक समीक्षा और कार्यपालिका के नीति-क्षेत्र के बीच की सीमा हर मामले में ध्यान से तय करनी होती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
दोहरा भुगतान पेंशन और वेतन एक साथ मिलने से सार्वजनिक धन का अनुचित उपयोग हो सकता है।
कर्मचारियों की आय पेंशन घटने से पुनर्नियुक्त कर्मचारियों की वास्तविक आय पर असर पड़ता है।
नियमों में एकरूपता अलग-अलग संस्थाओं में भिन्न नियम होने से भ्रम और असमानता की स्थिति बनती है।
राजकोषीय दबाव पेंशन देनदारी बढ़ने से राज्य के बजट पर दीर्घकालिक भार पड़ता है।

आगे की राह

  • पुनर्नियुक्ति से संबंधित सभी नियमों को एक स्पष्ट और सुलभ दस्तावेज़ में संकलित किया जाए, ताकि वेतन और पेंशन के समायोजन की प्रक्रिया सबके लिए समान रहे।
  • पेंशन और वेतन के समायोजन का सूत्र पहले से घोषित हो, जिससे प्रभावित कर्मचारी अपनी आय का अनुमान लगा सकें।
  • पुनर्नियुक्ति की आवश्यकता, अवधि और पद की प्रकृति का स्पष्ट मानदंड तय हो, ताकि नियुक्ति का आधार तर्कसंगत रहे।
  • राज्य सरकारें पेंशन देनदारी का दीर्घकालिक आकलन करें और उसे बजट-नीति में समेकित करें।
  • लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखी जाए।
  • नियम-निर्माण में प्रभावित कर्मचारियों और विशेषज्ञ समितियों से परामर्श की प्रक्रिया अपनाई जाए, जिससे नीति अधिक संतुलित बने।
  • न्यायालय के निर्णय के बाद संबंधित विभाग नियम की व्याख्या और लागू होने की प्रक्रिया पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पेंशन (Pension) · पुनर्नियुक्ति (Re-employment) · लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) · राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission) · अनुच्छेद 315 (Article 315) · अनुच्छेद 316 (Article 316) · संचित निधि (Consolidated Fund) · संपत्ति का अधिकार (Right to Property) · अनुच्छेद 300A (Article 300A) · समता का अधिकार (Right to Equality) · संस्थागत स्वतंत्रता (Institutional Independence) · वित्तीय औचित्य (Fiscal Propriety) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · आनुपातिकता (Proportionality)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 315: राज्य लोक सेवा आयोग की स्थापना से संबंध
  • अनुच्छेद 309: सेवा-शर्तों के नियम बनाने की शक्ति
  • अनुच्छेद 14: समता और वर्गीकरण की तर्कसंगतता का प्रश्न

अवधारणा प्रवाह

सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की राज्य लोक सेवा आयोग जैसी संस्था में पुनर्नियुक्ति की जाती है।  →  पुनर्नियुक्ति से जुड़े नियम के अंतर्गत पेंशन की राशि वेतन में से घटाई जाती है, ताकि एक ही पद पर दोहरा भुगतान न हो।  →  प्रभावित कर्मचारियों या अन्य पक्षों द्वारा इस नियम को संवैधानिक आधार पर चुनौती दी जाती है।  →  न्यायालय नियम की वैधता को अनुच्छेद 14 और सेवा-शर्तों से संबंधित संवैधानिक ढाँचे की कसौटी पर परखता है।  →  सर्वोच्च न्यायालय नियम को वैध ठहराता है, जिससे राज्य में उसका लागू रहना सुनिश्चित होता है।  →  इस निर्णय से राजकोषीय अनुशासन, सेवा-शर्तों की एकरूपता और पुनर्नियुक्ति नीति की भावी दिशा पर प्रभाव पड़ता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 315 संघ और प्रत्येक राज्य के लिए लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था करता है।
2. राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है।
3. अनुच्छेद 320 के अंतर्गत अनुशासनिक मामलों में लोक सेवा आयोग से परामर्श अपेक्षित है।
4. राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य 65 वर्ष की आयु तक पद पर बने रह सकते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 315 में संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों का प्रावधान है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 316 के अनुसार राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 320 के अंतर्गत अनुशासनिक मामलों में आयोग से परामर्श आवश्यक है। कथन 4 गलत है: राज्य आयोग के सदस्य अधिकतम 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं, 65 वर्ष की सीमा संघ लोक सेवा आयोग के लिए है।

Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक अभिकथन (A) और एक तर्क (R) दिया गया है।
अभिकथन (A): सेवानिवृत्त कर्मचारी की पेंशन को केवल सरकारी कृपा नहीं, बल्कि अर्जित अधिकार माना जाता है।
तर्क (R): उच्चतम न्यायालय ने डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (1983) में पेंशन को स्थगित वेतन (Deferred Salary) का रूप माना।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, परंतु R गलत है
  4. A गलत है, परंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — डी.एस. नकारा मामले (1983) में न्यायालय ने पेंशन को अर्जित वेतन का स्थगित भाग माना, इसलिए इसे अर्जित अधिकार कहा गया। इस प्रकार तर्क अभिकथन की सीधी व्याख्या देता है। पेंशन पर संपत्ति के अधिकार का दावा भी इसी न्यायिक दृष्टिकोण से जुड़ा है।

Q3. भारतीय संविधान में संपत्ति के अधिकार के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

  1. संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 19 में वर्णित मौलिक अधिकार है
  2. अनुच्छेद 300A के अंतर्गत किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता
  3. यह अधिकार 44वें संशोधन द्वारा मूल संविधान के भाग III में जोड़ा गया था
  4. यह अधिकार केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त है

उत्तर: अनुच्छेद 300A के अंतर्गत किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता — 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों की सूची से हटाया गया और अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार के रूप में रखा गया। यह विधिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं। यह अधिकार विदेशी व्यक्तियों पर भी लागू होता है, इसलिए विकल्प 4 गलत है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति के दौरान पेंशन की कटौती का नियम राज्य के वित्तीय हितों और कर्मचारी के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न उठाता है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग में ऐसी नियुक्तियों से संबंधित नियम को उच्चतम न्यायालय द्वारा वैध ठहराए जाने के संदर्भ में इस नियम का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या पेंशन को संपत्ति का अधिकार मानने वाले न्यायिक दृष्टिकोण के आधार पर ऐसी कटौती को अनुच्छेद 14 की कसौटी पर उचित ठहराया जा सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर कंकाल (Model Answer Skeleton):
(1) भूमिका: पुनर्नियुक्ति पर पेंशन कटौती का सार, सरकारी कर्मचारी बनाम पेंशनभोगी का अधिकार, और उच्चतम न्यायालय के निर्णय का समाचार-संदर्भ। विद्यार्थी को निर्णय का पूर्ण पाठ देखकर तर्क की पुष्टि करनी चाहिए, क्योंकि समाचार में निर्णय का तर्क पूरा उपलब्ध नहीं है।
(2) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 315 (संघ और राज्य लोक सेवा आयोग), अनुच्छेद 316 (नियुक्ति और कार्यकाल, राज्य आयोग के सदस्यों के लिए 62 वर्ष की सीमा), अनुच्छेद 319 (सेवानिवृत्ति के बाद पात्रता की सीमाएँ), अनुच्छेद 320 (आयोग के कार्य और परामर्श), और अनुच्छेद 309 (सेवा-शर्तों के लिए विधि या नियम)।
(3) पेंशन का विधिक स्वरूप: डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (1983) में पेंशन को स्थगित वेतन और संपत्ति का रूप माना गया; अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संपत्ति से वंचित करने के लिए विधि का प्राधिकार आवश्यक है।
(4) समता का परीक्षण: अनुच्छेद 14 के अंतर्गत युक्तियुक्त वर्गीकरण (Reasonable Classification) की कसौटी; पुनर्नियुक्त और नए नियुक्त कर्मचारियों के बीच अंतर का तर्कसंगत आधार क्या है। आनुपातिकता (Proportionality) की कसौटी पर मोदर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) का संदर्भ दें।
(5) वित्तीय पक्ष: पेंशन का व्यय संचित निधि (अनुच्छेद 266) से होता है; सार्वजनिक धन की रक्षा, दोहरे भुगतान से बचाव और सेवानिवृत्ति के बाद के पदों पर अधिक व्यय रोकने का वैध राज्य-हित।
(6) संस्थागत पक्ष: लोक सेवा आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता; सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति से प्रशासनिक निरंतरता और अनुभव बनाम पद-लाभ की धारणा। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की शासन में नैतिकता संबंधी सिफारिशों का उल्लेख।
(7) संतुलित दृष्टिकोण: न्यायिक समीक्षा का सीमित दायरा; नीति-निर्माण में विधायी और कार्यपालिका की विवेकाधीन शक्ति, किंतु मनमानी के विरुद्ध संरक्षण।
(8) निष्कर्ष: कटौती का नियम तभी उचित है जब वह स्पष्ट, युक्तियुक्त और पूर्वानुमेय हो तथा अधिकार का मूल सार न छीने; स्वतंत्र एवं नैतिक नियुक्ति व्यवस्था के लिए सुधार सुझाएँ।

स्रोत: LiveLaw


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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