05 Nov संस्कृति मंत्रालय और गूगल आर्ट्स एंड कल्चर के बीच समझौता ज्ञापन
✎ सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण संरक्षण का पूरक उपाय है, विकल्प नहीं; भौतिक संरक्षण कानूनों (1958 और 1972 के अधिनियम) के साथ डिजिटल अभिलेखन से ही विरासत की सुरक्षा और सुलभता दोनों सुनिश्चित होती हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति (कला, स्थापत्य, पांडुलिपियाँ, संग्रहालय) | GS Paper II — शासन (सरकार और निजी संस्थाओं के बीच सहभागिता, सांस्कृतिक नीति) | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (डिजिटलीकरण, मेटाडेटा और डिजिटल संरक्षण)
- Prelims: संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) और उसके अधीन भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI), प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्त्वीय स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958, प्राचीन कला निधि अधिनियम, 1972 (Antiquities and Art Treasures Act, 1972), राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (National Mission on Manuscripts), विश्व धरोहर संरक्षण सम्मेलन, 1972 और भारत द्वारा इसका अनुसमर्थन (1977), अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण सम्मेलन, 2003 (भारत ने 2005 में अनुसमर्थन किया), मेटाडेटा और डिजिटल अभिलेखन की अवधारणा, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के स्वरूप
- Essay: डिजिटल युग में सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और उसकी सुलभता, सरकार और तकनीकी कंपनियों के बीच सहभागिता: अवसर और चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण संरक्षण का पूरक उपाय है, विकल्प नहीं; भौतिक संरक्षण कानूनों (1958 और 1972 के अधिनियम) के साथ डिजिटल अभिलेखन से ही विरासत की सुरक्षा और सुलभता दोनों सुनिश्चित होती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संस्कृति मंत्रालय ने गूगल आर्ट्स एंड कल्चर (Google Arts & Culture) के साथ सहमति ज्ञापन (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी सामग्री का डिजिटलीकरण करना और उसे ऑनलाइन मंच के माध्यम से व्यापक जनसमुदाय के लिए साझा करना है। यह कदम भारत की कला, स्मारकों, संग्रहालयों और अभिलेखों को भौतिक सीमाओं से परे पहुँचाने की दिशा में सरकारी प्रयासों को आगे बढ़ाता है। प्रेस विज्ञप्ति में सहमति ज्ञापन की विस्तृत शर्तों का उल्लेख उपलब्ध अंश में नहीं है, इसलिए परीक्षा की दृष्टि से इसे मुख्यतः डिजिटल सुलभता और सांस्कृतिक संरक्षण के नीतिगत संदर्भ में समझना उपयोगी है।
पृष्ठभूमि
- भारत की सांस्कृतिक विरासत में पुरातात्त्विक स्थल, मंदिर, पांडुलिपियाँ, चित्रकला, हस्तशिल्प, संग्रहालय में रखी वस्तुएँ और मौखिक परंपराएँ सम्मिलित हैं। इनमें से कई वस्तुएँ भौतिक क्षरण, प्राकृतिक आपदा और उचित रखरखाव के अभाव से प्रभावित होती हैं।
- भारत ने विश्व धरोहर संरक्षण सम्मेलन, 1972 का अनुसमर्थन 1977 में किया, जिसके अंतर्गत सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों की पहचान और संरक्षण होता है।
- राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के माध्यम से दुर्लभ पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण पर पहले से कार्य होता रहा है, जिससे डिजिटल अभिलेखन की नीतिगत पृष्ठभूमि बनी है।
- इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ सांस्कृतिक सामग्री तक पहुँच का स्वरूप बदला है। डिजिटल मंच शोधार्थियों, विद्यार्थियों और दूर बैठे नागरिकों के लिए विरासत को सुलभ बनाते हैं।
- सरकार और निजी या अंतरराष्ट्रीय तकनीकी संस्थाओं के बीच सहयोग को विभिन्न क्षेत्रों में नीतिगत रूप से अपनाया जा रहा है, जिसमें सांस्कृतिक क्षेत्र भी शामिल है।
सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण क्या है?
- डिजिटलीकरण (Digitisation) का अर्थ है भौतिक वस्तुओं, दस्तावेजों और स्थलों को उच्च गुणवत्ता वाले चित्रों, स्कैन, वीडियो और त्रि-आयामी (3D) मॉडल के रूप में डिजिटल प्रारूप में बदलना।
- डिजिटल अभिलेखन से मूल वस्तुओं के बार-बार संचालन की आवश्यकता घटती है, जिससे उनका भौतिक क्षरण कम होता है और संरक्षण सरल होता है।
- मेटाडेटा (Metadata) वह सूचना है जो किसी डिजिटल वस्तु के बारे में विवरण देती है, जैसे उसका काल, स्थान, सामग्री और स्रोत। सही मेटाडेटा से खोज और शोध आसान होता है।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership) में सरकार नीति, स्वामित्व और मूल सामग्री की प्रामाणिकता सुनिश्चित करती है, जबकि तकनीकी संस्था मंच, तकनीक या वितरण में सहयोग देती है।
- सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्त्वीय स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 और प्राचीन कला निधि अधिनियम, 1972 जैसे कानूनी ढाँचे प्रमुख हैं। डिजिटलीकरण इन कानूनों का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक उपाय है।
- डिजिटल सामग्री के साथ कॉपीराइट, डेटा सुरक्षा और मूल वस्तु के स्वामित्व से जुड़े प्रश्न भी उठते हैं, जिनका समाधान सहमति ज्ञापन की शर्तों और संबंधित कानूनों के आधार पर होता है।
- अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (जैसे मौखिक परंपराएँ और लोक-कलाएँ) का दस्तावेजीकरण भी डिजिटल माध्यम से संभव है, जिसके अंतर्गत 2003 के यूनेस्को सम्मेलन के प्रावधान प्रासंगिक हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding – MoU) की प्रकृति | संस्कृति मंत्रालय और गूगल आर्ट्स एंड कल्चर (Google Arts & Culture) के बीच यह एक सहयोगात्मक, गैर-बाध्यकारी व्यवस्था है। इसमें सार्वजनिक धन का सीधा हस्तांतरण या कानूनी दायित्व तय करने वाली संविदा नहीं होती, बल्कि सहयोग का ढाँचा तय होता है। |
| डिजिटलीकरण का दायरा | भारत की सांस्कृतिक विरासत, जिसमें कला, संग्रहालय और अभिलेखीय सामग्री शामिल हो सकती है, को उच्च-गुणवत्ता वाली डिजिटल प्रतियों के रूप में सुरक्षित किया जाता है। इससे भौतिक वस्तुओं के क्षरण पर निर्भरता घटती है। |
| वैश्विक पहुँच का माध्यम | गूगल आर्ट्स एंड कल्चर का मंच दुनिया भर के उपयोगकर्ताओं को ऑनलाइन दर्शन, आभासी प्रदर्शनियों और विस्तृत जानकारी की सुविधा देता है। इससे भारतीय विरासत की अंतरराष्ट्रीय दृश्यता बढ़ती है। |
| शैक्षणिक और अनुसंधान उपयोग | छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षकों को प्राथमिक स्रोतों तक दूरस्थ पहुँच मिलती है। यह भारतीय इतिहास और कला के अध्ययन को लोकतांत्रिक बनाने में सहायक है। |
| सार्वजनिक-निजी भागीदारी का स्वरूप | सरकारी संस्थाओं की सामग्री और एक तकनीकी मंच के बीच सहयोग का यह उदाहरण है। इसमें संरक्षण का दायित्व सरकारी संस्थाओं के पास रहता है, जबकि प्रस्तुति और तकनीकी संचालन में निजी मंच की भूमिका होती है। |
महत्व
सांस्कृतिक और शैक्षणिक
- सांस्कृतिक विरासत का डिजिटल संग्रह भौतिक क्षति, प्राकृतिक आपदा और समय के प्रभाव से जोखिम कम करने का एक उपाय है।
- भारतीय कला, वास्तुकला, हस्तशिल्प और लोक परंपराओं को विस्तृत दृश्य रूप में प्रस्तुत करने से जनसामान्य में सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ती है।
- विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्य सामग्री के पूरक के रूप में डिजिटल संसाधन उपयोगी होते हैं।
प्रशासनिक और संस्थागत
- सांस्कृतिक संस्थानों के बीच डिजिटलीकरण के मानक तय करने और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को गति मिलती है।
- अभिलेखों का व्यवस्थित डिजिटल सूचीकरण भविष्य की नीति-निर्माण और शोध के लिए आधार तैयार करता है।
अंतरराष्ट्रीय
- भारतीय सांस्कृतिक विरासत की ऑनलाइन उपलब्धता विदेशी दर्शकों के बीच भारत की सॉफ्ट पावर (Soft Power) को सुदृढ़ करती है।
- वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक छवि का प्रसार कूटनीतिक संवाद में भी सहायक हो सकता है।
चुनौतियाँ
1. प्रतिलिप्यधिकार और बौद्धिक संपदा अधिकार
- डिजिटल प्रतियों के प्रसार से यह प्रश्न उठता है कि मूल कृति, उसकी छवि और उसके पुनरुत्पादन पर अधिकार किसके पास है।
- भारत में प्रतिलिप्यधिकार का नियमन प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957 (Copyright Act, 1957) द्वारा होता है। सार्वजनिक डोमेन में आने वाली सामग्री और संस्थागत स्वामित्व वाली सामग्री के बीच स्पष्ट भेद आवश्यक है।
- विदेशी मंच पर सामग्री के उपयोग की शर्तों का पारदर्शी होना राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: बौद्धिक संपदा अधिकार; सरकारी नीति के कानूनी पहलू
2. प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) द्वारा संरक्षित स्मारकों के संबंध में प्राचीन स्मारक और पुरातत्त्व स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 (Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958) लागू होता है।
- डिजिटलीकरण से दस्तावेज़ीकरण सुदृढ़ होता है, परंतु भौतिक संरक्षण का स्थान डिजिटल प्रति नहीं ले सकती।
- डिजिटल सामग्री के आधार पर भौतिक संरक्षण के बजट में कटौती का जोखिम नीति स्तर पर ध्यान देने योग्य है।
यूपीएससी लिंक: संस्कृति; संरक्षण से संबंधित कानूनी ढाँचा; प्राचीन स्मारक
3. डेटा की गुणवत्ता, प्रामाणिकता और दीर्घकालिक संरक्षण
- उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों और विवरणात्मक आँकड़ों का मानकीकरण आवश्यक है, ताकि सामग्री की प्रामाणिकता बनी रहे।
- डिजिटल फ़ाइलों के प्रारूप बदलने से दीर्घकालिक अभिगम्यता पर प्रश्न उठते हैं। इसके लिए खुले और स्थायी मानकों को अपनाना उपयोगी है।
- मूल और डिजिटल प्रति के बीच की सीमा स्पष्ट रखना शोधकर्ताओं के लिए आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: डिजिटल अभिलेखीय प्रबंधन; सांस्कृतिक संस्थाओं की क्षमता-निर्माण
4. डिजिटल विभाजन और पहुँच की असमानता
- इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों तक असमान पहुँच के कारण ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के छात्र इस संसाधन का पूरा लाभ नहीं ले पाते।
- भाषाई विविधता को देखते हुए विवरण और इंटरफ़ेस का बहुभाषी होना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: डिजिटल विभाजन; समावेशी विकास; भारत की भाषाई विविधता
5. निजी मंच पर निर्भरता और डेटा शासन
- किसी एक विदेशी तकनीकी मंच पर निर्भरता से सामग्री की दीर्घकालिक उपलब्धता और शर्तों में बदलाव का जोखिम रहता है।
- उपयोगकर्ता-व्यवहार से जुड़े आँकड़ों के संग्रह और उपयोग के लिए स्पष्ट नियम आवश्यक हैं। इस संबंध में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023) का ढाँचा प्रासंगिक है।
यूपीएससी लिंक: डिजिटल शासन; साइबर सुरक्षा; डेटा संरक्षण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| प्रतिलिप्यधिकार | मूल कृतियों की छवियों के पुनरुत्पादन और व्यावसायिक उपयोग की शर्तें स्पष्ट होनी चाहिए। |
| भौतिक संरक्षण | डिजिटल प्रति भौतिक संरक्षण का विकल्प नहीं है; बजट और रखरखाव की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। |
| दीर्घकालिक अभिगम्यता | फ़ाइल प्रारूप और तकनीक में बदलाव से डिजिटल अभिलेख अप्राप्य हो सकते हैं। |
| डिजिटल विभाजन | इंटरनेट की असमान उपलब्धता से लाभ का वितरण सीमित रह सकता है। |
| तकनीकी निर्भरता | एक ही निजी मंच पर अत्यधिक निर्भरता नीतिगत जोखिम पैदा कर सकती है। |
| डेटा शासन | उपयोगकर्ता और सामग्री से जुड़े आँकड़ों के उपयोग पर पारदर्शी नियम आवश्यक हैं। |
आगे की राह
- डिजिटलीकरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मानक (Standards) तय किए जाएँ, ताकि विभिन्न संस्थानों की सामग्री एकसमान गुणवत्ता और प्रारूप में उपलब्ध हो।
- प्रतिलिप्यधिकार की स्थिति वाली सामग्री और सार्वजनिक डोमेन की सामग्री का स्पष्ट वर्गीकरण किया जाए तथा उपयोग की शर्तें सार्वजनिक की जाएँ।
- डिजिटल प्रति को भौतिक संरक्षण का पूरक माना जाए और स्मारकों व संग्रहों के रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित किया जाए।
- दीर्घकालिक संरक्षण के लिए खुले और स्थायी फ़ाइल प्रारूपों का उपयोग तथा बहु-स्थानीय बैकअप की व्यवस्था की जाए।
- डिजिटल सामग्री को भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों व पुस्तकालयों तक पहुँच बढ़ाई जाए।
- उपयोगकर्ता डेटा के संग्रह और उपयोग के लिए डेटा संरक्षण के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
- सरकारी संस्थानों, शिक्षण संस्थानों और तकनीकी मंचों के बीच समन्वय के लिए स्पष्ट भूमिका-विभाजन और निगरानी तंत्र बनाया जाए।
- डिजिटल विरासत के प्रति जनजागरूकता और शोधकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सांस्कृतिक विरासत का डिजिटीकरण · समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding – MoU) · संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) · भारत का पुरातात्विक सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) · प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 · प्राचीन वस्तु एवं कला निधि अधिनियम, 1972 (Antiquities and Art Treasures Act, 1972) · प्रतिलिपि-अधिकार (Copyright) और सार्वजनिक प्रयोग हेतु कृतियाँ · राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts) · अनुच्छेद 49 और राज्य की संरक्षण-बाध्यता · संघ सूची की प्रविष्टि 67 (Union List Entry 67) · डिजिटल विभाजन (Digital Divide) · सांस्कृतिक संप्रभुता और डेटा-नियंत्रण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 49 – राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों का संरक्षण राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(f) – सांस्कृतिक विरासत के मूल्यांकन और संरक्षण का मौलिक कर्तव्य
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 67 – राष्ट्रीय महत्त्व के प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों पर संघ की विधायी शक्ति
अवधारणा प्रवाह
भारत की सांस्कृतिक विरासत (कला, अभिलेख, स्मारक और संग्रह) का संरक्षित संग्रह संस्कृति मंत्रालय के पास है। → संस्कृति मंत्रालय और गूगल आर्ट्स एंड कल्चर के बीच समझौता ज्ञापन के माध्यम से सहयोग का ढाँचा तय होता है। → सामग्री का उच्च-गुणवत्ता वाला डिजिटलीकरण किया जाता है और उसका विवरणात्मक वर्गीकरण होता है। → डिजिटल सामग्री ऑनलाइन मंच पर सार्वजनिक की जाती है, जिससे देश-विदेश के उपयोगकर्ताओं की पहुँच बढ़ती है। → बढ़ी हुई पहुँच से शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक जागरूकता को बल मिलता है तथा भारत की सॉफ्ट पावर का विस्तार होता है। → साथ ही प्रतिलिप्यधिकार, दीर्घकालिक संरक्षण और डेटा शासन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता बनी रहती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्राचीन वस्तु एवं कला निधि अधिनियम, 1972 के अंतर्गत ‘पुरावस्तु’ (Antiquity) को ऐसी वस्तु के रूप में परिभाषित किया गया है जो कम से कम सौ वर्ष पुरानी हो।
2. पुरावस्तुओं के निर्यात हेतु किसी प्रकार की अनुमति या लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती।
3. संघ सूची की प्रविष्टि 67 के अंतर्गत संसद द्वारा विधि बनाकर राष्ट्रीय महत्व घोषित प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों का विषय संघ के अधीन आता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: 1972 के अधिनियम में पुरावस्तु की परिभाषा सौ वर्ष पुरानी वस्तु के रूप में दी गई है। कथन 2 गलत है, क्योंकि इस अधिनियम के अंतर्गत पुरावस्तुओं के निर्यात पर कठोर नियंत्रण है और अनुमति आवश्यक है। कथन 3 सही है, क्योंकि यह विषय संघ सूची की प्रविष्टि 67 में आता है। अतः सही कथन दो हैं।
Q2. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): सार्वजनिक प्रयोग हेतु उपलब्ध (Public Domain) प्राचीन कृतियों का डिजिटीकरण करके उन्हें व्यापक रूप से साझा किया जा सकता है, इसके लिए प्रतिलिपि-अधिकार का उल्लंघन होना आवश्यक नहीं है।
कारण (R): भारत में साहित्यिक, नाटकीय, संगीत और कलात्मक कृतियों पर प्रतिलिपि-अधिकार लेखक के जीवनकाल तथा उसकी मृत्यु के पश्चात साठ वर्षों तक बना रहता है।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सत्य है, किंतु (R) असत्य है
- (A) असत्य है, किंतु (R) सत्य है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — कारण (R) सत्य है, क्योंकि भारत में प्रतिलिपि-अधिकार की अवधि लेखक के जीवनकाल और उसके पश्चात साठ वर्ष की होती है। जब यह अवधि समाप्त हो जाती है, तब कृति सार्वजनिक प्रयोग में आ जाती है और उसका डिजिटीकरण व साझाकरण प्रतिलिपि-अधिकार का उल्लंघन नहीं होता। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित स्तंभों का मिलान कीजिए:
स्तंभ I (संस्था/अधिनियम): A. राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, B. भारत का पुरातात्विक सर्वेक्षण, C. प्राचीन वस्तु एवं कला निधि अधिनियम, 1972
स्तंभ II (कार्य-क्षेत्र): i. पुरावस्तुओं के निर्यात का नियंत्रण, ii. राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण, iii. पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण
सही मिलान चुनिए:
- A-iii, B-ii, C-i
- A-i, B-ii, C-iii
- A-ii, B-iii, C-i
- A-iii, B-i, C-ii
उत्तर: A-iii, B-ii, C-i — राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का कार्य पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण है (A-iii)। भारत का पुरातात्विक सर्वेक्षण राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण करता है (B-ii)। प्राचीन वस्तु एवं कला निधि अधिनियम, 1972 पुरावस्तुओं के निर्यात को नियंत्रित करता है (C-i)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सरकारी संस्थाओं और वैश्विक प्रौद्योगिकी मंचों के बीच सांस्कृतिक विरासत के डिजिटीकरण हेतु समझौता ज्ञापन जैसे उपाय विरासत के संरक्षण और उसकी सर्वसुलभता दोनों को बढ़ाते हैं, इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि ऐसे साझेदारी मॉडल में प्रतिलिपि-अधिकार संरक्षण और डिजिटल रूप में उपलब्ध विरासत-संबंधी डेटा पर राष्ट्रीय नियंत्रण किस सीमा तक सुरक्षित रह सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
1. भूमिका: संस्कृति मंत्रालय और वैश्विक मंच के बीच समझौता ज्ञापन का तथ्यात्मक उल्लेख; सांस्कृतिक विरासत की परिभाषा में पुरातात्विक, पांडुलिपि, कला और अभिलेखीय संपदा का समावेश।
2. संवैधानिक एवं विधिक आधार: अनुच्छेद 49 (राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं के संरक्षण की राज्य की बाध्यता); संघ सूची की प्रविष्टि 67 (संसद द्वारा घोषित राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल); प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958; प्राचीन वस्तु एवं कला निधि अधिनियम, 1972 (पुरावस्तु की परिभाषा, निर्यात नियंत्रण); प्रतिलिपि-अधिकार अधिनियम, 1957 (कृतियों पर अवधि और सार्वजनिक प्रयोग की स्थिति)।
3. संस्थागत ढाँचा: भारत का पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) का भौतिक संरक्षण में केंद्रीय स्थान; राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (2003 में आरंभ) का पांडुलिपि दस्तावेजीकरण में योगदान; डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत डिजिटल अवसंरचना का विस्तार।
4. समर्थन में तर्क: व्यापक पहुँच और शैक्षणिक उपयोग; भौतिक क्षरण से बचाव हेतु डिजिटल प्रतिलिपि का महत्व; आपदा या क्षति की स्थिति में जोखिम-न्यूनीकरण; दूरस्थ क्षेत्रों और शोधार्थियों की पहुँच।
5. आलोचनात्मक पक्ष: विदेशी मंच पर डेटा-होस्टिंग से डेटा-संप्रभुता का प्रश्न; सार्वजनिक धन से निर्मित सामग्री के व्यावसायिक उपयोग की शर्तें; डिजिटल विभाजन के कारण ग्रामीण और कम साक्षरता वाले समूहों का सीमित लाभ; सामग्री के चयन और प्रस्तुति में एकरूपता या सांस्कृतिक दृष्टि का प्रश्न।
6. विचार-संतुलन: वाल्टर बेंजामिन की रचना ‘द वर्क ऑफ आर्ट इन द एज ऑफ मेकेनिकल रिप्रोडक्शन’ (1935) के संदर्भ में यांत्रिक पुनरुत्पादन से मूल कृति की ‘आभा’ पर बहस; सार्वजनिक-डोमेन और निजी-लाइसेंस मॉडल की तुलना; पारदर्शी अनुबंध-शर्तों, डेटा-स्थानीयकरण और भारतीय संस्थाओं के स्वामित्व-अधिकार की आवश्यकता।
7. निष्कर्ष: संतुलित और तर्कसंगत स्थिति, जिसमें डिजिटीकरण का समर्थन करते हुए मूल स्वामित्व, प्रतिलिपि-अधिकार की स्पष्टता और राष्ट्रीय नियंत्रण के लिए स्पष्ट विधिक व संस्थागत सुरक्षा-उपायों पर बल दिया गया हो।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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