06 Nov सर्वोच्च न्यायालय: दिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण का मुख्य कारण वाहन उत्सर्जन
✎ दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के पाँच प्रमुख स्रोतों, यानी औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, निर्माण-विध्वंस की धूल, सड़क की धूल और पराली दहन, के नियमन का वैधानिक दायित्व वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के पास है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — पर्यावरण (वायु प्रदूषण के स्रोत, वायु गुणवत्ता नियामक ढांचा, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन एवं संवैधानिक निकाय (वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग, न्यायपालिका की भूमिका, स्वतः संज्ञान याचिका) | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अवसंरचना एवं परिवहन (शहरी गतिशीलता, सार्वजनिक परिवहन, वाहन मानक)
- Prelims: वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) की श्रेणियाँ: 301-400 ‘बहुत खराब’ और 401-500 ‘गंभीर’, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM): राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और सटवर्ती क्षेत्रों के लिए वैधानिक निकाय, 2021 अधिनियम के अंतर्गत, ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP): AQI स्तर के आधार पर चरणबद्ध कार्रवाई, भारत स्टेज (BS) उत्सर्जन मानक: BS-VI मानक अप्रैल 2020 से देशभर में लागू, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme — NCAP), 2019, वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, प्रदूषण नियंत्रण (PUC) प्रमाणपत्र: मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अंतर्गत वाहनों की उत्सर्जन जाँच, अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व)
- Essay: स्वच्छ वायु: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का विस्तार और न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका, शहरी गतिशीलता और पर्यावरण का संतुलन: सार्वजनिक परिवहन, वाहन मानक और नगरीय योजना की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के पाँच प्रमुख स्रोतों, यानी औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, निर्माण-विध्वंस की धूल, सड़क की धूल और पराली दहन, के नियमन का वैधानिक दायित्व वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के पास है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय ने वायु प्रदूषण से संबंधित स्वतः संज्ञान याचिका की सुनवाई के दौरान दिल्ली-एनसीआर में वाहन उत्सर्जन को वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारक बताया और वायु गुणवत्ता सूचकांक में तत्काल, मध्यम और दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने दिल्ली और गाज़ियाबाद, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद को जोड़ने वाली सड़कों पर वाहनों के भारी दबाव तथा ‘बंपर-टू-बंपर’ यातायात पर चिंता जताई। सुनवाई में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने पाँच प्रमुख क्षेत्रों, यानी औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, निर्माण और विध्वंस की धूल, सड़क की धूल और पराली दहन, से जुड़े नियामक ढांचे और लागू किए गए उपायों की जानकारी दी। उस दिन वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 391 दर्ज हुआ, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है और ‘गंभीर’ श्रेणी के निकट है। पीठ ने कहा कि वह कुछ आदेश पारित करेगी और इस याचिका पर 16 नवंबर को सुनवाई होगी।
पृष्ठभूमि
- वायु प्रदूषण पर न्यायिक हस्तक्षेप की शुरुआत एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ जैसे मामलों से हुई, जिनमें उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण को अनुच्छेद 21 से जोड़ा। वर्ष 1998 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से पर्यावरण प्रदूषण निवारण और नियंत्रण प्राधिकरण (EPCA) गठित हुआ था।
- वायु प्रदूषण की समस्या को अंतर-राज्यीय स्वरूप देने के लिए केंद्र सरकार ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के माध्यम से वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की स्थापना की, जिसने पूर्ववर्ती EPCA का स्थान लिया और इसे अधिक वैधानिक शक्तियाँ प्रदान की गईं।
- वाहन उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए भारत में BS-VI उत्सर्जन मानक अप्रैल 2020 से लागू हैं। पुराने वाहनों की उत्सर्जन जाँच और PUC प्रमाणपत्र की व्यवस्था मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अंतर्गत आती है।
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) 2019 में शुरू हुआ, जिसमें कई शहरों में वायु प्रदूषण के स्तर में कमी के लक्ष्य तय किए गए। दिल्ली-एनसीआर के लिए CAQM ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के माध्यम से AQI-आधारित चरणबद्ध कार्रवाई की व्यवस्था लागू की है।
- पराली दहन (Stubble Burning) का प्रभाव मौसमी होता है और इसका अनुपात हवा की दिशा, तापमान और धुंध की स्थिति के अनुसार बदलता है। इस संदर्भ में किसानों को मशीनों के उपयोग के लिए जागरूक करना एक प्रमुख नीतिगत उपाय है।
वाहन उत्सर्जन और वायु गुणवत्ता प्रबंधन का नियामक ढांचा क्या है?
- वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index — AQI) वायु की गुणवत्ता को 0 से 500 के पैमाने पर मापता है। 0-50 ‘अच्छी’, 51-100 ‘संतोषजनक’, 101-200 ‘मध्यम’, 201-300 ‘खराब’, 301-400 ‘बहुत खराब’ और 401-500 ‘गंभीर’ श्रेणी होती है।
- वाहन उत्सर्जन से नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10) निकलते हैं। भीड़-भाड़ वाले मार्गों पर धीमी गति से चलने वाले वाहन इन उत्सर्जनों को और बढ़ाते हैं।
- वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और सटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधार के लिए समन्वय, निगरानी और निर्देश देने वाला वैधानिक निकाय है। इसमें राज्यों और केंद्र के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
- ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) AQI के बढ़ते स्तर के अनुसार चरणबद्ध कदम तय करता है, जैसे निर्माण गतिविधियों पर रोक, कुछ श्रेणी के वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध और सार्वजनिक परिवहन का सुदृढ़ीकरण।
- पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक आधार में अनुच्छेद 48A (राज्य का दायित्व) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का मूल कर्तव्य) शामिल हैं। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण को जीवन के अधिकार का अंग माना गया है।
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 वायु प्रदूषण नियंत्रण के मूल वैधानिक आधार हैं।
- पाँच प्रमुख स्रोत हैं: औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, निर्माण और विध्वंस की धूल, सड़क की धूल और पराली दहन। किसी एक स्रोत पर नियंत्रण से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं होता, इसलिए बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण आवश्यक है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| स्वतः संज्ञान याचिका (Suo Motu Case) | सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के नियामक ढाँचे की जाँच के लिए स्वयं संज्ञान लेकर सुनवाई की। यह न्यायिक हस्तक्षेप का एक रूप है, जिसका आधार अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार माना जाता है। |
| वाहन उत्सर्जन को प्रमुख कारण मानना | सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण में वाहन उत्सर्जन एक बड़ा योगदानकर्ता है। दिल्ली को गाज़ियाबाद, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद से जोड़ने वाली सड़कों पर वाहनों की भारी संख्या और बंपर-टू-बंपर यातायात को समस्या की जड़ बताया गया। |
| प्रदूषण के पाँच प्रमुख क्षेत्र | औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, निर्माण एवं विध्वंस की धूल, सड़क की धूल और पराली दहन। केंद्र सरकार ने इन्हीं पाँच क्षेत्रों के आधार पर नियामक ढाँचे की व्याख्या की। |
| पराली दहन का योगदान | केंद्र के प्रतिनिधि के अनुसार बृहस्पतिवार को दिल्ली के प्रदूषण में पराली दहन का हिस्सा 14 प्रतिशत रहा। न्यायालय ने किसानों को पराली जलाने के बजाय मशीनों के प्रयोग के बारे में शिक्षित करने पर बल दिया। |
| प्रदूषण नियंत्रण (PUC) प्रमाणपत्रों की जियो-टैगिंग | प्रदूषण नियंत्रण (PUC) प्रमाणपत्रों को भौगोलिक रूप से चिह्नित करना निगरानी और प्रवर्तन को सुदृढ़ करने का उपाय है। इसके साथ प्रतिबंधित वाहनों के प्रवेश पर रोक और शिकायतों के आधार पर स्पष्ट रूप से प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई की जा रही है। |
| वायु गुणवत्ता की वर्तमान स्थिति | समग्र वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 391 रहा, जो ‘गंभीर’ श्रेणी के निकट है। 59 निगरानी केंद्रों में से 30 ने ‘गंभीर’ और शेष ने ‘बहुत खराब’ श्रेणी दर्ज की। रोहिणी में सर्वाधिक AQI 475 दर्ज हुआ। |
महत्व
स्वास्थ्य एवं सामाजिक महत्त्व
- वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का 400 के आसपास पहुँचना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है, विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और श्वसन रोगियों के लिए।
- न्यायालय ने कहा कि सड़कों पर रहने और काम करने वाले गरीब लोग इस प्रदूषण के सबसे अधिक शिकार हैं, क्योंकि उनकी आजीविका बाहर के काम पर निर्भर है।
संवैधानिक एवं विधिक महत्त्व
- स्वच्छ वायु को जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए यह सुनवाई नागरिक अधिकारों से सीधे संबद्ध है।
- सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कि कार्रवाई तात्कालिक, मध्यम और दीर्घकालिक होनी चाहिए, नीति निर्माण में समयबद्ध दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- विद्यालयों को बंद करने या हाइब्रिड मोड में चलाने की याचिका पर न्यायालय ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर निर्णय लेने की बात कही, जो वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित शासन का उदाहरण है।
प्रशासनिक एवं शासन-संबंधी महत्त्व
- प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के बीच समन्वित कार्रवाई आवश्यक है, क्योंकि प्रदूषक सीमाओं को नहीं मानते।
- वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management) जैसी संस्थाएँ इसी समन्वय के लिए बनाई गई हैं।
चुनौतियाँ
1. अंतर्राज्यीय वाहन यातायात का दबाव
- दिल्ली को जोड़ने वाली सड़कों पर बाहरी राज्यों के वाहनों की भारी संख्या से प्रदूषण का भार सीमा के पार फैलता है।
- बंपर-टू-बंपर जाम में वाहन कम गति पर चलते हैं, जिससे ईंधन की खपत और उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-III: पर्यावरण संरक्षण; परिवहन अवसंरचना और शहरी गतिशीलता
2. पराली दहन की मौसमी समस्या
- पराली दहन का प्रदूषण में योगदान मौसमी होता है और प्रायः रबी फसल की बुवाई से पहले तीव्र हो जाता है।
- मशीनीकृत विकल्पों की लागत और उपलब्धता की कमी किसानों के लिए व्यावहारिक बाधा है।
यूपीएससी लिंक: GS-III: कृषि और पर्यावरण का अंतर्संबंध; फसल अवशेष प्रबंधन
3. बहु-एजेंसी समन्वय और नियामक विखंडन
- वायु प्रदूषण के पाँच क्षेत्रों के लिए अलग-अलग विभाग और प्राधिकरण उत्तरदायी हैं, जिससे जवाबदेही बँटती है।
- राज्यों और केंद्र के बीच नीतिगत प्राथमिकताओं में तालमेल बिठाना एक निरंतर चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: केंद्र-राज्य संबंध; सहकारी संघवाद और अंतर-राज्यीय समन्वय
4. प्रवर्तन और निगरानी की कमजोरी
- PUC प्रमाणपत्रों की जियो-टैगिंग और सोशल मीडिया शिकायतों से प्रवर्तन में सुधार हो रहा है, किंतु प्रभावी दंड और नियमित जाँच अब भी आवश्यक है।
- निर्माण एवं विध्वंस की धूल के नियंत्रण के लिए स्थल-स्तरीय निगरानी की क्षमता सीमित है।
यूपीएससी लिंक: GS-III: पर्यावरण प्रशासन; प्रवर्तन तंत्र और नियामक क्षमता
5. आजीविका बनाम पर्यावरणीय उपाय
- न्यायालय ने ध्यान दिलाया कि गरीब वर्ग के लिए त्योहारों का समय ही आय का प्रमुख अवसर होता है, इसलिए प्रतिबंधों का सामाजिक प्रभाव असमान होता है।
- प्रतिबंधों के साथ वैकल्पिक रोजगार और संक्रमण सहायता न हो तो नीति का विरोध और अनुपालन में कमी दोनों बढ़ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-II: सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गों के लिए नीतियाँ; GS-III: समावेशी विकास
6. आपातकालीन उपायों का वैज्ञानिक आधार
- विद्यालय बंद करने या हाइब्रिड मोड लागू करने जैसे निर्णयों के लिए AQI की सीमा और विशेषज्ञ राय का स्पष्ट ढाँचा आवश्यक है।
- ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (Graded Response Action Plan) के चरणबद्ध उपायों का प्रभावी और समयबद्ध कार्यान्वयन चुनौती बना हुआ है।
यूपीएससी लिंक: GS-II: सरकारी नीतियों का कार्यान्वयन; GS-III: आपदा और आपात स्थिति प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| वाहन उत्सर्जन | बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों और बंपर-टू-बंपर यातायात पर नियंत्रण कठिन है। |
| पराली दहन | मशीनीकृत विकल्पों की लागत और किसानों तक पहुँच की कमी से मौसमी उत्सर्जन बना रहता है। |
| नियामक समन्वय | पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर अलग-अलग प्राधिकरणों की जिम्मेदारी से जवाबदेही बिखरती है। |
| प्रवर्तन | PUC जियो-टैगिंग और शिकायत-आधारित कार्रवाई के बावजूद नियमित जाँच की क्षमता सीमित है। |
| सामाजिक प्रभाव | दैनिक मजदूरी पर निर्भर वर्ग प्रतिबंधों से सबसे अधिक प्रभावित होता है। |
| आपातकालीन निर्णय | विद्यालय बंद करने जैसे निर्णयों के लिए स्पष्ट मानक और विशेषज्ञ आधार आवश्यक है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme)
आगे की राह
- वाहन उत्सर्जन पर अंतर्राज्यीय समन्वय: दिल्ली-एनसीआर के प्रवेश बिंदुओं पर संयुक्त निगरानी और सार्वजनिक परिवहन के विस्तार से निजी वाहनों का भार घटाया जाए।
- PUC प्रमाणपत्रों की जियो-टैगिंग के साथ प्रदूषण-नियंत्रण मानकों के अनुपालन की वास्तविक समय (Real-time) निगरानी सुनिश्चित की जाए।
- पुराने और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के चरणबद्ध निस्तारण के लिए स्पष्ट नीति और प्रोत्साहन तंत्र लागू किए जाएँ।
- पराली दहन रोकने के लिए मशीनों की उपलब्धता, किराये पर सेवा और फसल अवशेष प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता का विस्तार किया जाए।
- वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान के बीच समन्वय बढ़ाकर चरणबद्ध उपायों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो।
- निर्माण एवं विध्वंस की धूल और सड़क की धूल के लिए स्थल-स्तरीय निगरानी और दंडात्मक प्रावधानों को सुदृढ़ किया जाए।
- विद्यालय बंद करने या हाइब्रिड मोड के निर्णय के लिए AQI की स्पष्ट सीमा और विशेषज्ञ समिति की राय को संस्थागत रूप दिया जाए।
- गरीब और दैनिक मजदूरी वाले वर्ग के लिए प्रतिबंधों के दौरान आजीविका सहायता और वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index – AQI) · वाहन उत्सर्जन (Vehicular Emissions) · दिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण · वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management – CAQM) · स्वतः संज्ञान याचिका (Suo Motu Case) · अनुच्छेद 21 और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार · अनुच्छेद 48क और अनुच्छेद 51क(छ) · पराली दहन (Stubble Burning) · प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) · ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (Graded Response Action Plan – GRAP) · सतत विकास (Sustainable Development) · न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: स्वच्छ वायु सहित जीवन का अधिकार
- अनुच्छेद 48A: राज्य का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(g): पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
- अनुच्छेद 32: स्वतः संज्ञान पर रिट क्षेत्राधिकार
अवधारणा प्रवाह
वाहनों की बढ़ती संख्या और अंतर्राज्यीय यातायात से सड़कों पर भीड़ बढ़ती है → बंपर-टू-बंपर जाम में कम गति पर अधिक उत्सर्जन होता है और प्रदूषक वायुमंडल में जमा होते हैं → शीतकाल में कम हवा की गति और तापीय व्युत्क्रमण से प्रदूषक जमीन के पास फँस जाते हैं → AQI लगभग 400 तक पहुँचने पर ‘गंभीर’ श्रेणी की स्थिति बनती है और विद्यालय बंद करने जैसे विकल्प विचाराधीन होते हैं → सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर केंद्र के पाँच-क्षेत्रीय नियामक ढाँचे की समीक्षा करता है → PUC जियो-टैगिंग, प्रतिबंध और पराली विकल्पों के माध्यम से प्रवर्तन और समन्वय को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्रवाई होती है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 48क राज्य को पर्यावरण की रक्षा और उसके संवर्धन का निर्देश देता है।
2. संविधान का अनुच्छेद 51क(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसके संवर्धन को राज्य का नीति-निदेशक तत्व बनाता है।
3. उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग माना है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- इनमें से कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 48क (42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) नीति-निदेशक तत्व है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 51क(छ) मूल कर्तव्य है, नीति-निदेशक तत्व नहीं। कथन 3 सही है: MC Mehta तथा Subhash Kumar वाद जैसे निर्णयों में न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या में स्वच्छ पर्यावरण को शामिल किया।
Q2. कथन (A): वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को दिल्ली-एनसीआर और उससे सटे क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता के समन्वित नियंत्रण का दायित्व सौंपा गया है।
कारण (R): वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के अंतर्गत बने इस आयोग को संसद ने एक से अधिक राज्यों में समन्वित प्रदूषण नियंत्रण के लिए स्थापित किया है।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — CAQM अधिनियम, 2021 के अंतर्गत आयोग दिल्ली-एनसीआर तथा संलग्न क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता के समन्वय, नियंत्रण और निगरानी का वैधानिक निकाय है। इसी कारण कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है। यह आयोग पूर्ववर्ती EPCA का स्थान लेता है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए:
सूची I (संवैधानिक प्रावधान)
a. अनुच्छेद 21
b. अनुच्छेद 48क
c. अनुच्छेद 51क(छ)
सूची II (विषय-वस्तु)
1. राज्य का नीति-निदेशक तत्व: पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व
2. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
3. नागरिकों का मूल कर्तव्य: प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा
सही मिलान का चयन कीजिए:
- a-2, b-1, c-3
- a-1, b-2, c-3
- a-3, b-1, c-2
- a-2, b-3, c-1
उत्तर: a-2, b-1, c-3 — अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है (a-2)। अनुच्छेद 48क राज्य का नीति-निदेशक तत्व है (b-1)। अनुच्छेद 51क(छ) नागरिकों का मूल कर्तव्य है (c-3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ दिल्ली-एनसीआर में वाहन उत्सर्जन को वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण मानते हुए उच्चतम न्यायालय ने तात्कालिक, मध्यम और दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता पर बल दिया है। दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण नियंत्रण ढाँचे की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। इसके साथ यह भी बताइए कि स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्यायिक रूप से मान्यता देने से राज्य की नीति-निर्माण संबंधी शक्तियों और संस्थागत समन्वय पर क्या प्रभाव पड़ता है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (MODEL-ANSWER SKELETON):
1. भूमिका: स्वतः संज्ञान याचिका में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ द्वारा वाहन उत्सर्जन, ‘बंपर-टू-बंपर’ यातायात और AQI के 400 के निकट पहुँचने पर चिंता; उस दिन AQI 391 तथा 59 निगरानी केंद्रों में से 30 पर ‘गंभीर’ स्तर; सुनवाई 16 नवंबर के लिए स्थगित।
2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, Subhash Kumar बनाम बिहार राज्य, 1991); अनुच्छेद 48क (राज्य का दायित्व); अनुच्छेद 51क(छ) (नागरिकों का मूल कर्तव्य); अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत जनहित याचिका तथा स्वतः संज्ञान की शक्ति।
3. वैधानिक ढाँचा: वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981; पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986; मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (धारा 115 के अंतर्गत PUC); वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021; राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP, 2019); GRAP।
4. सरकार द्वारा प्रस्तुत पाँच क्षेत्र: औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, निर्माण और विध्वंस की धूल, सड़क की धूल और पराली दहन; पराली दहन का योगदान न्यायालय में 14 प्रतिशत बताया गया। वाहनों हेतु प्रवेश-प्रतिबंध, PUC प्रमाणपत्रों की जियो-टैगिंग और सोशल मीडिया शिकायतों पर कार्रवाई का उल्लेख।
5. न्यायिक सक्रियता का योगदान: MC Mehta वाद (सार्वजनिक परिवहन का CNG में परिवर्तन, वाहन उत्सर्जन पर कड़े मानक) और वायु प्रदूषण पर न्यायालय की निरंतर निगरानी।
6. संतुलित दृष्टिकोण: (क) समर्थन में: जीवन के अधिकार के साथ स्वच्छ वायु का सीधा संबंध, नीतिगत निष्क्रियता पर न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता; (ख) आलोचना में: कार्यपालिका और विधायिका की भूमिका में अतिक्रमण का खतरा, विशेषज्ञ-आधारित नीति की जगह न्यायिक आदेश; (ग) विशेषज्ञों की राय पर निर्भरता (जैसे स्कूल बंद करने के प्रश्न पर न्यायालय का रुख) को संस्थागत संतुलन के उदाहरण के रूप में रखना।
7. आर्थिक-सामाजिक आयाम: ‘गरीब ही वास्तविक पीड़ित’ की टिप्पणी; दैनिक मज़दूरों की आजीविका पर प्रतिबंधों का प्रभाव; न्यायसंगत परिवर्तन (just transition) का विचार; वाहन-परिवर्तन के लिए वित्तीय सहायता।
8. संघीय समन्वय: दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित NCR राज्यों के बीच समन्वय; आयोग की भूमिका; प्रवर्तन की चुनौती।
9. निष्कर्ष: न्यायिक निगरानी और कार्यपालिका की विशेषज्ञ-आधारित नीति के बीच संतुलन, सतत विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बहु-स्तरीय उपाय।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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