07 Nov पुस्तकालय पुस्तक घोटाला: मद्रास उच्च न्यायालय की दो वर्ष पूर्व चेतावनी

✎ सार्वजनिक पुस्तकालयों की पुस्तक-खरीद में पारदर्शिता, निर्धारित नियमों का पालन और लोक-क्षेत्र की कृतियों के भ्रामक पुनर्प्रकाशन पर रोक, सार्वजनिक धन की जवाबदेही के लिए अनिवार्य है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन (Governance): पारदर्शिता और जवाबदेही, सार्वजनिक क्रय (Public Procurement) में सुधार, राज्य सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था | GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction), न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और न्यायालय द्वारा निर्देश जारी करने की सीमा | GS Paper III — अर्थव्यवस्था / बौद्धिक संपदा अधिकार: कॉपीराइट (Copyright) की अवधि और सार्वजनिक क्षेत्र (Public Domain) की कृतियों का पुनर्प्रकाशन | GS Paper IV — नैतिकता: सार्वजनिक धन के दुरुपयोग पर सिविल सेवक की जवाबदेही और सत्यनिष्ठा (Probity)
- Prelims: सार्वजनिक पुस्तकालय (Public Library) और राज्य सूची की प्रविष्टि 12, संविधान का अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता), कॉपीराइट अधिनियम, 1957 (Copyright Act, 1957) और कॉपीराइट की अवधि, लोक-क्षेत्र (Public Domain) की कृतियाँ, तमिलनाडु पारदर्शिता निविदा अधिनियम, 1998 (Tamil Nadu Transparency in Tenders Act, 1998), सामान्य वित्तीय नियम (General Financial Rules), 2017, सार्वजनिक हित याचिका (Public Interest Litigation), न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) बनाम न्यायिक संयम (Judicial Restraint)
- Essay: सार्वजनिक क्रय में पारदर्शिता: भ्रष्टाचार पर रोक का सबसे प्रभावी उपाय, न्यायपालिका की भूमिका: शासन-सुधार में अदालतों के निर्देशों की सीमा और संभावना
त्वरित पुनरावृत्ति: सार्वजनिक पुस्तकालयों की पुस्तक-खरीद में पारदर्शिता, निर्धारित नियमों का पालन और लोक-क्षेत्र की कृतियों के भ्रामक पुनर्प्रकाशन पर रोक, सार्वजनिक धन की जवाबदेही के लिए अनिवार्य है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु के सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए पुस्तकों की खरीद में कथित अनियमितताओं को “घोटाला” कहा और राज्य सरकार से इसकी जाँच हेतु समिति गठित करने को कहा। न्यायालय ने क्रय के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने के निर्देश भी दिए। यह आदेश अब इसलिए चर्चा में है क्योंकि लेखक पेरुमल मुरुगन ने कोयंबटूर के पेरियार अरिवुलगम में पहुँची घटिया पुस्तकों और उनमें गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी का मुद्दा उजागर किया। इस संदर्भ में अदालत द्वारा क्रय-व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने की पूर्व कोशिश को समझना प्रासंगिक है। यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया, न्यायिक निगरानी और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़े संवैधानिक व शासकीय प्रश्नों को सामने रखता है।
पृष्ठभूमि
- अदालत के समक्ष याचिका एक साहित्यिक मंच से जुड़े याचिकाकर्ता ने दायर की थी, जिसमें आरोप था कि सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए पुस्तकों की खरीद में गड़बड़ी होती है। याचिकाकर्ता ने शपथ-पत्र के साथ तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किए, जिन्हें अदालत ने गंभीरता से लिया।
- सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए पुस्तकें खरीदने का अधिकार सार्वजनिक पुस्तकालय निदेशक (Director of Public Library) के पास है। निदेशक प्रकाशकों से प्रस्ताव आमंत्रित करने के लिए अधिसूचना जारी करता है।
- निर्धारित नियमों के अनुसार यह शर्त थी कि पुस्तक के प्रकाशन का वर्ष बदला नहीं जाना चाहिए, परंतु याचिका में ऐसे कई उदाहरण बताए गए जहाँ पुराने प्रकाशन को नए वर्ष के साथ प्रस्तुत किया गया।
- याचिका के अनुसार उन कृतियों को चुना गया जिनका कॉपीराइट समाप्त हो चुका था या जो राष्ट्रीयकृत थीं।
सार्वजनिक पुस्तकालय क्रय-प्रणाली क्या है?
- सार्वजनिक पुस्तकालय ऐसे पुस्तकालय हैं जो राज्य या स्थानीय निकाय द्वारा संचालित या वित्त-पोषित होते हैं। भारत में पुस्तकालय राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 12 में आते हैं, इसलिए इनका प्रशासन मुख्यतः राज्य सरकारों के अधीन है।
- सरकारी खरीद में सामान्यतः खुली निविदा (Open Tender), पारदर्शी मूल्यांकन और निर्धारित समिति द्वारा प्रस्तावों की जाँच की प्रक्रिया अपनाई जाती है, ताकि पक्षपात और मिलीभगत की संभावना कम हो।
- भारत में केंद्र सरकार के वित्तीय नियमों का आधार सामान्य वित्तीय नियम, 2017 है। राज्य सरकारें अपने स्तर पर भी पारदर्शिता के लिए कानून बनाती हैं, जैसे तमिलनाडु पारदर्शिता निविदा अधिनियम, 1998।
- कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत लेखक के जीवनकाल और उसके बाद निर्धारित वर्षों तक कृति पर अधिकार रहता है। अवधि समाप्त होने पर कृति लोक-क्षेत्र (Public Domain) में चली जाती है और उसका मुक्त पुनर्प्रकाशन किया जा सकता है।
- लोक-क्षेत्र की कृति का पुनर्प्रकाशन कानूनी रूप से वैध है, परंतु प्रकाशन-वर्ष, शीर्षक और लेखक का विवरण भ्रामक रूप से बदलना प्रशासनिक धोखाधड़ी की श्रेणी में आ सकता है। यही इस मामले का मूल प्रश्न है।
- संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक और अन्य अधिकारों के प्रवर्तन तथा किसी भी उद्देश्य हेतु रिट जारी करने की शक्ति देता है। इसी के अंतर्गत न्यायालय जाँच समिति गठित करने और प्रक्रिया-संबंधी निर्देश देने का आदेश दे सकता है।
- सार्वजनिक हित याचिका के माध्यम से नागरिक या संस्थाएँ प्रशासनिक अनियमितताओं को न्यायालय के समक्ष ला सकती हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय का दायित्व तथ्यों की प्रारंभिक जाँच और शासन को सुधार के निर्देश देने तक सीमित रहता है, जबकि दोष-निर्धारण और दंड की कार्यवाही प्रशासनिक और विधिक संस्थाओं द्वारा होती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| न्यायिक हस्तक्षेप का स्वरूप | मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ ने सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए पुस्तक खरीद में कथित अनियमितताओं को ‘घोर घोटाला’ कहा और राज्य सरकार को जाँच समिति गठित करने का निर्देश दिया। |
| याचिका का आधार | याचिका रिट याचिका (Writ Petition) के रूप में दायर हुई थी, जो संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शक्ति है। इसमें शिकायतकर्ता ने प्रक्रिया की विस्तृत कार्यप्रणाली शपथ-पत्र के साथ रखी। |
| कथित कार्यप्रणाली (Modus Operandi) | निदेशक, सार्वजनिक पुस्तकालय (Director of Public Libraries) द्वारा अधिसूचना जारी कर प्रकाशकों से पुस्तकें मँगवाई जाती थीं। शर्तों के बावजूद प्रकाशन वर्ष बदलने और पुरानी पुस्तकों को नए आवरण व नए शीर्षक के साथ छापने के उदाहरण सामने आए। |
| खरीद का नियम | एक बार किसी पुस्तक की सार्वजनिक पुस्तकालय के लिए खरीद होने पर अगले पाँच वर्षों तक उसी पुस्तक की दोबारा खरीद नहीं की जा सकती। न्यायालय के अनुसार इस नियम का स्पष्ट उल्लंघन हुआ। |
| पुनर्मुद्रण का दुरुपयोग | राष्ट्रीयकृत (Nationalised) पुस्तकें और वे पुस्तकें जिनका प्रतिलिप्यधिकार (Copyright) समाप्त हो चुका है, दोबारा छापी गईं। लेखकों के वैध उत्तराधिकारी प्रतिलिप्यधिकार उल्लंघन की शिकायत नहीं कर सकते, इसलिए ऐसी पुनर्मुद्रण प्रथा का दुरुपयोग सरल हो जाता है। |
| पारदर्शिता के निर्देश | न्यायालय ने खरीद में पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए, ताकि सार्वजनिक धन के उपयोग और पुस्तक चयन की जवाबदेही सुनिश्चित हो। |
महत्व
शासन और जवाबदेही
- सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता और जवाबदेही का सिद्धांत यह बताता है कि सरकारी धन से होने वाली हर खरीद का तर्कसंगत आधार और दस्तावेज़ी प्रमाण होना चाहिए।
- न्यायालय का हस्तक्षेप दिखाता है कि विभागीय नियंत्रण में कमी होने पर न्यायपालिका जाँच का आदेश देकर प्रशासनिक जवाबदेही को सक्रिय कर सकती है।
संवैधानिक और विधिक
- रिट क्षेत्राधिकार के माध्यम से मनमानी और अनियमित प्रशासनिक कार्रवाई पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का प्रयोग इस मामले में व्यावहारिक रूप में दिखता है।
- समानता के सिद्धांत के संदर्भ में, सार्वजनिक खरीद में मनमाने चयन से प्रकाशकों के बीच अवसर की समानता प्रभावित होती है, जो अनुच्छेद 14 की भावना से जुड़ा प्रश्न है।
सांस्कृतिक और शैक्षणिक
- सार्वजनिक पुस्तकालय ज्ञान तक पहुँच का माध्यम हैं। गलत ऐतिहासिक सूचना वाली पुस्तकें पाठकों, विशेषकर छात्रों, की समझ को विकृत कर सकती हैं।
- साहित्यिक और ऐतिहासिक कृतियों की प्रामाणिकता बनाए रखना बौद्धिक संपदा और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण से जुड़ा विषय है।
आर्थिक
- सार्वजनिक धन का अनुचित उपयोग और पुनर्मुद्रित पुस्तकों की ऊँची कीमतें राजकोषीय संसाधनों के दुरुपयोग का उदाहरण बन सकती हैं।
- प्रकाशन उद्योग में ईमानदार प्रकाशकों के लिए निष्पक्ष बाज़ार सुनिश्चित करना आर्थिक दक्षता के लिए आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव
- अधिसूचना की शर्तों और वास्तविक चयन के बीच अंतर होने पर निर्णय-प्रक्रिया का आधार अस्पष्ट हो जाता है।
- दस्तावेज़ी रिकॉर्ड और निर्णय के कारण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने से निगरानी कठिन हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही; लोक सेवा में नैतिकता
2. पुस्तकों की प्रामाणिकता और तथ्यात्मक शुद्धता
- पुनर्मुद्रित पुस्तकों में प्रकाशन वर्ष और लेखक की जानकारी बदलने से पाठकों को भ्रामक जानकारी मिलती है।
- ऐतिहासिक तथ्यों की त्रुटियाँ सार्वजनिक शिक्षा की गुणवत्ता और ऐतिहासिक समझ को प्रभावित करती हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-1: भारतीय इतिहास और साहित्यिक विरासत; GS-2: शिक्षा से जुड़े शासकीय मुद्दे
3. प्रतिलिप्यधिकार और बौद्धिक संपदा की सीमाएँ
- जिन कृतियों का प्रतिलिप्यधिकार समाप्त हो चुका है, उनके पुनर्मुद्रण पर कानूनी रोक नहीं होती, जिससे दुरुपयोग की गुंजाइश बनती है।
- वैध उत्तराधिकारियों द्वारा शिकायत न किए जाने से प्रणाली के भीतर स्वतः निगरानी का अभाव रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) से जुड़े मुद्दे
4. निगरानी और आंतरिक नियंत्रण की कमज़ोरी
- पाँच वर्ष की पुनर्खरीद रोक जैसे नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी आंतरिक जाँच तंत्र आवश्यक है।
- शिकायत प्राप्त होने पर ही जाँच शुरू होना दर्शाता है कि नियमित ऑडिट और समीक्षा व्यवस्था कमज़ोर रही।
यूपीएससी लिंक: GS-2: प्रशासनिक सुधार; सरकारी विभागों में आंतरिक नियंत्रण
5. शिकायत निवारण में विलंब
- याचिका दायर होने के बाद भी निष्कर्ष तक पहुँचने में समय लगना प्रशासनिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर विलंब को दर्शाता है।
- लंबित जाँच से दोषी पाए जाने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई और जनविश्वास दोनों प्रभावित होते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: न्यायिक व्यवस्था में विलंब; शासन में त्वरित निर्णय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता का विषय |
|---|---|
| नियमों का उल्लंघन | पाँच वर्ष की पुनर्खरीद रोक और प्रकाशन वर्ष संबंधी शर्तों की अनदेखी। |
| गुणवत्ता नियंत्रण | पुस्तकों में गंभीर ऐतिहासिक त्रुटियाँ पहुँचने से शैक्षणिक विश्वसनीयता पर प्रश्न। |
| प्रतिलिप्यधिकार का दुरुपयोग | समाप्त प्रतिलिप्यधिकार वाली कृतियों के नए शीर्षक और आवरण के साथ पुनर्मुद्रण। |
| सार्वजनिक धन का उपयोग | अनियमित खरीद से राजकोषीय संसाधनों की हानि और जवाबदेही का प्रश्न। |
| निगरानी तंत्र | आंतरिक ऑडिट और नियमित समीक्षा की कमी, जिससे शिकायत पर ही जाँच शुरू होती है। |
आगे की राह
- सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए पुस्तक खरीद की सभी चरणों की प्रक्रिया, चयन के मानदंड और निर्णय के कारण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराए जाएँ।
- खरीद से पहले प्रकाशन वर्ष, संस्करण और प्रतिलिप्यधिकार स्थिति की स्वतंत्र सत्यापन व्यवस्था लागू की जाए।
- पुस्तकों की तथ्यात्मक शुद्धता जाँचने के लिए विषय-विशेषज्ञों की समीक्षा समिति बनाई जाए।
- पाँच वर्ष की पुनर्खरीद रोक जैसे नियमों के पालन की नियमित आंतरिक ऑडिट और डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली अपनाई जाए।
- न्यायालय द्वारा गठित जाँच समिति की रिपोर्ट समयबद्ध रूप से प्रकाशित की जाए और उस पर की गई कार्रवाई का सार्वजनिक विवरण दिया जाए।
- शिकायत निवारण के लिए स्वतंत्र शिकायत तंत्र बनाया जाए, ताकि याचिका दायर करने की नौबत कम आए।
- प्रकाशकों और लेखकों के बीच पुनर्मुद्रण से संबंधित नैतिक और विधिक दिशा-निर्देश स्पष्ट किए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) · पारदर्शिता (Transparency) · उत्तरदायित्व (Accountability) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) · अनुच्छेद 226 (Article 226) · जनहित याचिका (Public Interest Litigation) · सामान्य वित्तीय नियम, 2017 (General Financial Rules, 2017) · ई-खरीद (e-Procurement) · सार्वजनिक पुस्तकालय (Public Libraries) · भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) · सूचना का अधिकार (Right to Information) · राज्य सूची (State List) · प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार, याचिका का मूल आधार
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता, खरीद में मनमानी के विरुद्ध
अवधारणा प्रवाह
सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए पुस्तक खरीद की अधिसूचना और प्रकाशकों से प्रस्ताव आमंत्रित करना। → खरीद की शर्तों (प्रकाशन वर्ष, पाँच वर्ष की रोक) के उल्लंघन और पुरानी पुस्तकों के नए शीर्षक से पुनर्मुद्रण की कथित प्रथा। → शिकायतकर्ता द्वारा शपथ-पत्र के साथ रिट याचिका दायर करना (अनुच्छेद 226)। → उच्च न्यायालय द्वारा तथ्यों की समीक्षा कर इसे ‘घोर घोटाला’ कहना और जाँच समिति गठित करने का निर्देश देना। → पारदर्शी खरीद प्रक्रिया के लिए न्यायालय के दिशा-निर्देश और सरकारी स्तर पर जाँच। → जाँच रिपोर्ट के आधार पर नियमों का सुदृढ़ीकरण, निगरानी तंत्र और जवाबदेही में सुधार।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सार्वजनिक पुस्तकालय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची का विषय है।
2. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है।
3. ई-खरीद प्रणाली सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता बढ़ाने का एक उपाय है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: पुस्तकालय एवं संग्रहालय राज्य सूची (प्रविष्टि 32) के विषय हैं। कथन 2 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 से व्यापक है और यह विधिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु भी रिट जारी करने की शक्ति देता है। कथन 3 सही है, क्योंकि ई-खरीद से निविदा-प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी बढ़ती है।
Q2. कथन (A): उच्च न्यायालय सार्वजनिक पुस्तकालयों हेतु पुस्तकों की खरीद में अनियमितताओं की जाँच के लिए राज्य सरकार को समिति गठित करने का निर्देश दे सकता है।
कारण (R): अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है, बल्कि विधिक अधिकारों के प्रवर्तन तक विस्तृत है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य उद्देश्य हेतु भी रिट जारी करने की शक्ति देता है, इसलिए लोक-व्यय से जुड़ी अनियमितताओं पर भी न्यायिक हस्तक्षेप संभव है। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने इसी शक्ति के आधार पर जाँच समिति गठित करने और पारदर्शी प्रक्रिया के निर्देश दिए। अतः (R) (A) की सही व्याख्या है।
Q3. भारतीय संविधान की किस सूची में ‘पुस्तकालय, संग्रहालय और ऐसी अन्य संस्थाएँ, जो राज्य द्वारा नियंत्रित या वित्त-पोषित हों’ विषय आते हैं?
- संघ सूची
- राज्य सूची
- समवर्ती सूची
- अवशिष्ट विषय
उत्तर: राज्य सूची — सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 32 में राज्य द्वारा नियंत्रित या वित्त-पोषित पुस्तकालय और संग्रहालय आते हैं। इसी कारण सार्वजनिक पुस्तकालयों की खरीद एवं प्रबंधन मुख्यतः राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। समवर्ती सूची में वे विषय आते हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों विधि बना सकते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने सार्वजनिक पुस्तकालयों हेतु पुस्तकों की खरीद में कथित अनियमितताओं को ‘घोटाले से कम नहीं’ कहा और पारदर्शी प्रक्रिया के निर्देश दिए। सार्वजनिक खरीद में भ्रष्टाचार और गुणवत्ता-ह्रास रोकने में न्यायिक हस्तक्षेप तथा प्रशासनिक नियंत्रण की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि न्यायालय के निर्देशों के बावजूद ऐसी व्यवस्था को स्थायी रूप से पारदर्शी बनाने के लिए किन संस्थागत उपायों की आवश्यकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. भूमिका: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ (न्यायमूर्ति आर. महादेवन एवं न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन) का आदेश; याचिका जून 2024 में प्राप्त आरोप; समिति गठन और पारदर्शिता निर्देश; घटिया पुस्तकों की हालिया सार्वजनिक चर्चा को संदर्भ में रखें।
2. कार्यप्रणाली के दोष (आदेश में उल्लिखित): निदेशक, लोक पुस्तकालय द्वारा निविदा सूचना; प्रकाशन वर्ष बदलकर पुरानी पुस्तकों का पुनः प्रकाशन (जैसे कल्कि की ‘शिवकामियिन सबथम’ की प्रतिलिपि का नए शीर्षक से प्रस्तुत होना); राष्ट्रीयकृत पुस्तकों और समाप्त कॉपीराइट वाली कृतियों के पुनर्प्रकाशन का दुरुपयोग; पाँच वर्ष तक पुनः खरीद न करने के नियम का उल्लंघन।
3. विधिक आधार: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता और न्यायिक समीक्षा; जनहित याचिका का महत्व; राज्य सूची की प्रविष्टि 32 (पुस्तकालय राज्य का विषय); अनुच्छेद 14 के अंतर्गत मनमानी के विरुद्ध संरक्षण; अनुच्छेद 298 के अंतर्गत राज्य की संविदात्मक शक्ति की सीमाएँ।
4. न्यायिक हस्तक्षेप के पक्ष में तर्क: प्रशासनिक निष्क्रियता में न्यायालय की भूमिका; निर्देश द्वारा जाँच का आरंभ; पारदर्शी नियम तय करना।
5. सीमाएँ और आलोचना: शक्ति-पृथक्करण का सिद्धांत; न्यायिक अतिक्रमण की आशंका; तथ्य-निर्धारण हेतु न्यायालय की सीमित क्षमता; विशेषज्ञ समिति पर निर्भरता।
6. संस्थागत उपाय: सामान्य वित्तीय नियम, 2017 के अंतर्गत खरीद-नियम; ई-खरीद प्रणाली और सार्वजनिक खुलासा; केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशानिर्देश; भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) के अंतर्गत जाँच-प्रक्रिया, जिसमें धारा 17A के अंतर्गत पूर्व अनुमति का प्रावधान सम्मिलित है; राज्य लोकायुक्त की भूमिका; सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत अभिलेखों तक पहुँच; सामाजिक लेखापरीक्षा।
7. निष्कर्ष: न्यायिक निर्देश अल्पकालिक सुधार हैं, जबकि स्थायी पारदर्शिता हेतु प्रक्रियात्मक सुधार, स्वतंत्र निगरानी, डिजिटल अभिलेख और नागरिक-सहभागिता आवश्यक है। प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को प्रासंगिक बताएँ।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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