07 Nov यूक्रेन शांति वार्ता से पहले कीव पर रूसी मिसाइल हमले, पाँच घायल

✎ युद्ध के बीच भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि नागरिकों, नागरिक वस्तुओं और जीवन-रक्षक ढाँचे (जैसे पेयजल सुविधाएँ) पर हमले को निषिद्ध करती है, और इसका पालन शांति-वार्ता से स्वतंत्र रूप से अनिवार्य है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय एवं वैश्विक संस्थाएँ, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कूटनीति) | GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत के हित और वैश्विक शांति प्रयास)
- Prelims: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4): बल प्रयोग या बल की धमकी पर सामान्य निषेध, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51: आत्मरक्षा का अधिकार, जिनेवा अभिसमय (Geneva Conventions), 1949 और उनके 1977 के अतिरिक्त प्रोटोकॉल, अतिरिक्त प्रोटोकॉल I का अनुच्छेद 54: जीवित रहने के लिए अनिवार्य वस्तुओं (जैसे पेयजल सुविधाएँ) पर हमला निषिद्ध, अतिरिक्त प्रोटोकॉल I का अनुच्छेद 56: बाँध, तटबंध और परमाणु विद्युत संयंत्र जैसे खतरनाक बल वाले कार्यों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के मूल सिद्धांत: भेदभाव (Distinction), आनुपातिकता (Proportionality) और सावधानी (Precaution), यूक्रेन की राजधानी कीव और उसमें बहने वाली नदी द्निपर (Dnipro), संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी, ज़ापोरिज्झिया क्षेत्र: यूक्रेन का वह भाग जहाँ युद्ध-रेखा (Front Line) के निकट मानवीय संकट उभरा, काला सागर अनाज पहल (Black Sea Grain Initiative), 2022: संयुक्त राष्ट्र और तुर्की की मध्यस्थता से हुआ समझौता
- Essay: युद्ध के बीच शांति-वार्ता: कूटनीति की संभावनाएँ और सीमाएँ, युद्ध में नागरिक जीवन की रक्षा: क्या अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि पर्याप्त है?
त्वरित पुनरावृत्ति: युद्ध के बीच भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि नागरिकों, नागरिक वस्तुओं और जीवन-रक्षक ढाँचे (जैसे पेयजल सुविधाएँ) पर हमले को निषिद्ध करती है, और इसका पालन शांति-वार्ता से स्वतंत्र रूप से अनिवार्य है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
यूक्रेन की राजधानी कीव पर रूस की मिसाइलों के हमले में कम से कम पाँच लोग घायल हुए, आवासीय और वाणिज्यिक भवन क्षतिग्रस्त हुए, एक पुल पर यातायात रोकना पड़ा तथा बिजली और जल आपूर्ति बाधित हुई। यह घटना ऐसे समय हुई जब रूस, यूक्रेन और अमेरिका के वार्ताकार अबू धाबी में युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से वार्ता के लिए मिलने वाले थे। अमेरिकी प्रशासन की मध्यस्थता में यह चौथा दौर होता, जबकि इससे पहले का दौर फरवरी में जिनेवा में हुआ था। साथ ही, ज़ापोरिज्झिया क्षेत्र के कोम्यशुवाखा गाँव में एक पूर्व स्कूल को सहायता वितरण केंद्र बनाए जाने के बाद हुए हवाई हमले में 55 लोगों की मृत्यु की सूचना है, जिससे मानवीय विधि के पालन का प्रश्न फिर से उठा है। क्षेत्रीय और सुरक्षा संबंधी प्रश्न अब भी अनसुलझे हैं, इसलिए नई वार्ता का स्वरूप अभी अनिश्चित है।
पृष्ठभूमि
- फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर आक्रमण के बाद यह संघर्ष अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे गंभीर सुरक्षा संकट बन गया है।
- युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आम सहमति न बन पाने के कारण शांति-प्रयास मुख्यतः अलग-अलग देशों और क्षेत्रीय मध्यस्थों के माध्यम से आगे बढ़े हैं।
- काला सागर अनाज पहल (2022) के तहत युद्ध के बीच अनाज निर्यात के लिए मार्ग खोलने का समझौता हुआ था, जो सीमित मानवीय सहयोग का उदाहरण माना जाता है।
- युद्ध-क्षेत्र में ऊर्जा संयंत्र, जल आपूर्ति और नागरिक आवास बार-बार निशाने पर आए हैं, जिससे शीत ऋतु में नागरिकों के लिए गंभीर मानवीय परिणाम सामने आए हैं।
- अबू धाबी, जिनेवा और इस्तांबुल जैसे स्थानों पर होने वाली वार्ताएँ यह दर्शाती हैं कि तटस्थ मंचों का चयन कूटनीतिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू होता है।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि क्या है?
- अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (International Humanitarian Law) वह विधि-व्यवस्था है जो सशस्त्र संघर्ष के दौरान युद्ध के साधनों और तरीकों को सीमित करती है और गैर-लड़ाकों की रक्षा करती है।
- इसका मूल स्रोत जिनेवा अभिसमय, 1949 है, जिसे 1977 के अतिरिक्त प्रोटोकॉल ने और विस्तार दिया।
- भेदभाव का सिद्धांत कहता है कि हमले केवल सैन्य लक्ष्यों पर हों, नागरिकों और नागरिक वस्तुओं पर नहीं।
- आनुपातिकता के सिद्धांत के अनुसार सैन्य लाभ की तुलना में नागरिक हानि अत्यधिक नहीं होनी चाहिए।
- अतिरिक्त प्रोटोकॉल I का अनुच्छेद 54 उन वस्तुओं को संरक्षण देता है जो नागरिक आबादी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य हैं, जैसे पेयजल सुविधाएँ और कृषि क्षेत्र।
- अनुच्छेद 56 बाँध, तटबंध और परमाणु विद्युत संयंत्र जैसे खतरनाक बल वाले कार्यों पर हमले को सीमित करता है, क्योंकि उनके टूटने से व्यापक नागरिक क्षति हो सकती है।
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) राज्यों के बीच बल प्रयोग पर सामान्य निषेध लगाता है, जबकि अनुच्छेद 51 आत्मरक्षा का अपवाद देता है। मानवीय विधि युद्ध के दौरान भी लागू रहती है, चाहे युद्ध का कारण वैध माना जाए या नहीं।
- युद्धविराम और शांति-समझौते अलग प्रक्रियाएँ हैं; मानवीय विधि का पालन युद्ध के किसी भी चरण में अनिवार्य रहता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| शांति वार्ता का स्वरूप | रूस, यूक्रेन और अमेरिका के वार्ताकार अबू धाबी (संयुक्त अरब अमीरात) में मिल रहे हैं। यह ट्रंप प्रशासन की मध्यस्थता में होने वाला चौथा दौर है, जबकि पिछला दौर फरवरी में जिनेवा में हुआ था। |
| हमले का लक्ष्य और प्रभाव | कीव में मिसाइल हमलों से आवासीय और वाणिज्यिक भवन क्षतिग्रस्त हुए, दनिपर नदी पर बने पुल पर यातायात बंद हुआ और बिजली तथा जल आपूर्ति बाधित हुई। नागरिक ढाँचे पर ऐसे हमले मानवीय क़ानून की दृष्टि से गंभीर प्रश्न उठाते हैं। |
| ऊर्जा अवसंरचना | कीव और झिटोमिर क्षेत्रों की ऊर्जा सुविधाओं को नुकसान पहुँचा है। इससे ताप और जल आपूर्ति प्रणालियाँ प्रभावित हुई हैं, जो शहरी सेवाओं की सुदृढ़ता पर निर्भरता को दर्शाता है। |
| ज़ापोरिज्झिया क्षेत्र की घटना | कोमिशुवाखा गाँव में सहायता वितरण केंद्र बने पूर्व विद्यालय और निकटवर्ती आश्रय स्थल पर गाइडेड बमों से हमला हुआ। रिपोर्ट के अनुसार इसमें 55 लोगों की मृत्यु हुई और कई लोग अब भी लापता हैं। यह अग्रिम मोर्चे के पास मानवीय सहायता के जोखिमों को रेखांकित करता है। |
| मध्यस्थता की भूमिका | पश्चिमी सरकारें शांति पहल के लिए नया सूत्र खोज रही हैं, जबकि क्षेत्रीय और सुरक्षा संबंधी प्रश्न अनसुलझे हैं। मध्यस्थ की भूमिका वार्ता को पटरी पर बनाए रखने में केंद्रीय होती है। |
महत्व
भू-राजनीतिक महत्व
- यह संघर्ष यूरोप की सुरक्षा संरचना से जुड़ा है। नाटो (NATO) और यूरोपीय संघ (EU) की नीतियों पर इसका सीधा असर है, और इससे शीत युद्ध के बाद बनी सुरक्षा व्यवस्था की पुनर्समीक्षा हो रही है।
- महाशक्तियों के बीच संवाद का मंच बनना वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है। किसी भी समझौते की शर्तें भविष्य के संघर्ष-समाधान ढाँचों के लिए मिसाल बन सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधि और मानवीय पक्ष
- नागरिक ढाँचे, विद्यालयों और मानवीय सहायता केंद्रों पर हमले अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law) के सिद्धांतों पर प्रश्न उठाते हैं। इनमें भेदभाव और अनुपातिकता के सिद्धांत प्रमुख हैं।
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) के अंतर्गत सदस्य देशों से बल प्रयोग के निषेध और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की अपेक्षा की जाती है। यह घटना उस व्यवस्था की प्रभावशीलता की परीक्षा है।
ऊर्जा और आर्थिक प्रभाव
- ऊर्जा सुविधाओं पर हमलों से यूक्रेन की ऊर्जा सुरक्षा कमजोर होती है। युद्ध की लंबी अवधि वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव डालती है, जिससे विकासशील देश भी प्रभावित होते हैं।
- प्रतिबंधों और ऊर्जा व्यापार की स्थिति से वैश्विक कीमतों पर असर पड़ता है। यह भारत जैसे आयातक देशों की ऊर्जा सुरक्षा नीति के लिए भी प्रासंगिक है।
भारत की विदेश नीति के संदर्भ में
- भारत ने संघर्ष के दौरान संवाद और कूटनीति पर बल दिया है। यह रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति का व्यावहारिक उदाहरण है, जिसमें भारत किसी एक गुट के साथ पूर्ण रूप से नहीं जुड़ता।
- 2022 में यूक्रेन से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन गंगा चलाया गया था। यह भारत के प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा और संकट-प्रबंधन क्षमता का उदाहरण है।
चुनौतियाँ
1. युद्धविराम और स्थायी शांति का अभाव
- वार्ता के बावजूद क्षेत्रीय और सुरक्षा संबंधी प्रश्न हल नहीं हुए हैं। युद्धविराम (Ceasefire) और स्थायी समाधान के बीच की दूरी बनी हुई है।
- पिछले दौरों के बाद भी हमले जारी रहने से वार्ता पर विश्वास कम होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: अंतरराष्ट्रीय संबंध, संघर्ष समाधान और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
2. नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय कानून का उल्लंघन
- आवासीय क्षेत्रों, ऊर्जा सुविधाओं और सहायता केंद्रों पर हमले नागरिक हताहतों का कारण बनते हैं।
- जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया धीमी है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय न्याय तंत्र की पहुँच सीमित है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: अंतरराष्ट्रीय संगठन, मानवीय कानून और मानवाधिकार
3. मानवीय सहायता तक पहुँच
- अग्रिम मोर्चे के निकट के गाँवों में सहायता वितरण असुरक्षित हो जाता है।
- लापता लोगों की खोज और घायलों के उपचार में संसाधनों की कमी बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: मानवीय सहायता और आपदा प्रबंधन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग
4. ऊर्जा और शहरी अवसंरचना का संकट
- बिजली और जल आपूर्ति बाधित होने से शीतकाल में ताप और स्वच्छ जल की समस्या गंभीर हो जाती है।
- ऊर्जा ढाँचे की मरम्मत में लंबा समय और भारी लागत लगती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आधारभूत संरचना, ऊर्जा सुरक्षा और आपदा-सहिष्णु ढाँचा
5. ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाज़ार पर दबाव
- युद्ध और प्रतिबंधों से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है, जिससे वैश्विक कीमतों में अस्थिरता आती है।
- आयातक देशों को वैकल्पिक स्रोत और सामरिक भंडार पर निर्भर होना पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| वार्ता की सफलता | पिछले दौरों के बाद भी मूल प्रश्न अनसुलझे हैं, इसलिए स्थायी समझौते की संभावना अनिश्चित है। |
| नागरिक हताहत | आवासीय, ऊर्जा और मानवीय सहायता ढाँचों पर हमलों से नागरिक जीवन और मानवीय कानून दोनों प्रभावित होते हैं। |
| जवाबदेही | युद्ध अपराधों की जाँच और दोषियों को दंड दिलाने की प्रक्रिया धीमी और जटिल है। |
| ऊर्जा सुरक्षा | बिजली और ताप आपूर्ति बाधित होने से शहरी जीवन और सार्वजनिक सेवाएँ संकट में हैं। |
| आर्थिक अस्थिरता | ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति शृंखला पर दबाव से वैश्विक मुद्रास्फीति (Inflation) का जोखिम बढ़ता है। |
आगे की राह
- युद्धविराम के लिए चरणबद्ध सत्यापन तंत्र बनाया जाए, ताकि वार्ता के परिणाम जमीन पर लागू हो सकें।
- नागरिक ढाँचों और मानवीय सहायता केंद्रों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सख़्ती से पालन सुनिश्चित हो।
- युद्ध अपराधों की स्वतंत्र जाँच के लिए अंतरराष्ट्रीय निकायों की भूमिका सुदृढ़ की जाए।
- मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए सुरक्षित गलियारों पर सहमति बने और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों को सहयोग मिले।
- ऊर्जा सुविधाओं की मरम्मत और आपातकालीन आपूर्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता जुटाई जाए।
- वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में स्थिरता के लिए आपूर्ति विविधीकरण और रणनीतिक भंडार पर ध्यान दिया जाए।
- संघर्ष-समाधान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और क्षेत्रीय मंचों के बीच समन्वय बढ़ाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
युद्धविराम (Ceasefire) · संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) · बल प्रयोग का निषेध (Prohibition of Use of Force) · अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी विधि (International Humanitarian Law) · नागरिकों का संरक्षण (Protection of Civilians) · शांतिपूर्ण विवाद निपटान (Pacific Settlement of Disputes) · संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) · मानवतावादी सहायता (Humanitarian Assistance) · रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) · बहुपक्षीय कूटनीति (Multilateral Diplomacy) · ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा (Protection of Energy Infrastructure) · क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता (Territorial Integrity and Sovereignty)
अवधारणा प्रवाह
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी रहने से दोनों पक्षों में अविश्वास बना हुआ है। → अमेरिका की मध्यस्थता में अबू धाबी में शांति वार्ता का नया दौर निर्धारित होता है। → वार्ता से पहले कीव और ज़ापोरिज्झिया क्षेत्र में मिसाइल और गाइडेड बम हमले होते हैं। → हमलों से आवासीय भवन, ऊर्जा सुविधाएँ और सहायता केंद्र प्रभावित होते हैं, तथा नागरिक हताहत होते हैं। → नागरिक ढाँचे पर हमलों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और युद्धविराम की संभावना पर प्रश्न उठते हैं। → इन परिस्थितियों में पश्चिमी सरकारें नए सूत्र खोजती हैं, और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण बनती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं: संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन।
2. अस्थायी सदस्य महासभा द्वारा दो वर्ष की अवधि के लिए निर्वाचित किए जाते हैं।
3. सुरक्षा परिषद के सार-वस्तु संबंधी किसी भी निर्णय को महासभा दो-तिहाई बहुमत से किसी स्थायी सदस्य के निषेधाधिकार (Veto) के बावजूद लागू करा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- इनमें से कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: स्थायी सदस्यों की संख्या पाँच है और वे चार्टर के अनुच्छेद 23 में उल्लिखित हैं। कथन 2 सही है: अस्थायी सदस्य महासभा द्वारा दो वर्ष के कार्यकाल हेतु चुने जाते हैं। कथन 3 गलत है: महासभा किसी स्थायी सदस्य के निषेधाधिकार को दो-तिहाई बहुमत से निरस्त नहीं कर सकती; उसकी सिफारिशें सामान्यतः अनुशंसात्मक होती हैं।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) सदस्य देशों को किसी अन्य राज्य की प्रादेशिक अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग की धमकी या स्वयं बल प्रयोग से प्रतिषिद्ध करता है।
कारण (R): चार्टर का अनुच्छेद 51 व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा के अंतर्निहित अधिकार को मान्यता देता है, जब तक सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने हेतु आवश्यक उपाय नहीं करती।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है। — (A) सही है: अनुच्छेद 2(4) बल प्रयोग के निषेध का मूल सिद्धांत है। (R) भी सही है: अनुच्छेद 51 आत्मरक्षा का अपवाद प्रदान करता है। परंतु (R) अपवाद का वर्णन है, इसलिए वह (A) की व्याख्या नहीं करता; सामान्य नियम और उसके अपवाद अलग-अलग प्रावधान हैं।
Q3. सूची-I (संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद) को सूची-II (उनके विषय) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I:
(a) अनुच्छेद 33
(b) अनुच्छेद 41
(c) अनुच्छेद 42
(d) अनुच्छेद 99
सूची-II:
1. वायु, जल और थल सेना द्वारा सैन्य प्रवर्तन उपाय
2. महासचिव द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति को खतरे वाले मामले को सुरक्षा परिषद के ध्यान में लाना
3. वार्ता, मध्यस्थता और सुलह सहित शांतिपूर्ण विवाद निपटान
4. आर्थिक प्रतिबंध जैसे सशस्त्र बल के प्रयोग से भिन्न उपाय
सही सुमेलन चुनिए:
- (a)-1, (b)-2, (c)-3, (d)-4
- (a)-3, (b)-4, (c)-1, (d)-2
- (a)-4, (b)-3, (c)-2, (d)-1
- (a)-2, (b)-1, (c)-4, (d)-3
उत्तर: (a)-3, (b)-4, (c)-1, (d)-2 — अनुच्छेद 33 शांतिपूर्ण विवाद निपटान से संबंधित है (2)। अनुच्छेद 41 बल-रहित उपाय, जैसे आर्थिक प्रतिबंध, का प्रावधान करता है (4)। अनुच्छेद 42 सैन्य उपायों का प्रावधान करता है (1)। अनुच्छेद 99 के अंतर्गत महासचिव शांति को खतरे वाले मामलों को सुरक्षा परिषद के ध्यान में ला सकता है (2 के स्थान पर, अर्थात सूची-II में 2)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सशस्त्र संघर्ष के दौरान शांति-वार्ता प्रायः युद्धविराम से पहले या उसके अभाव में आरंभ होती है और इससे नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न अधिक जटिल हो जाता है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए कि क्या कूटनीतिक वार्ता को अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी विधि के सिद्धांतों से अलग रखा जा सकता है? साथ ही उत्तर दीजिए कि ऐसी स्थिति में बहुपक्षीय संस्थाओं और तटस्थ मध्यस्थों की भूमिका कितनी प्रभावी हो सकती है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) भूमिका: हाल की घटना का संदर्भ लें, परंतु किसी पक्ष पर दोष-निर्धारण से बचें; केवल तथ्य और विधिक स्थिति रखें। (2) विधिक ढाँचा: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(3) (शांतिपूर्ण विवाद निपटान), अनुच्छेद 2(4) (बल-प्रयोग निषेध), अनुच्छेद 33 (वार्ता, मध्यस्थता, सुलह), अनुच्छेद 51 (आत्मरक्षा) और अध्याय VII (अनुच्छेद 39-42) का उल्लेख करें। (3) अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी विधि: जिनेवा कन्वेंशन 1949 का सामान्य अनुच्छेद 3; अतिरिक्त प्रोटोकॉल I (1977) के अनुच्छेद 48 (विभेद का मूल नियम) और अनुच्छेद 51 (नागरिक जनसंख्या का संरक्षण); रोम संविधि (1998) का अनुच्छेद 8 (युद्ध अपराध) और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की भूमिका। (4) वार्ता बनाम विधि का तर्क: यथार्थवाद (हंस मॉर्गेन्थाऊ) का तर्क कि शक्ति-संतुलन ही शांति तय करता है; उदारवादी संस्थावाद (रॉबर्ट कियोहेन) का तर्क कि नियम-आधारित संस्थाएँ सहयोग बढ़ाती हैं; इमैनुएल कांट की ‘Perpetual Peace’ की अवधारणा। (5) ऐतिहासिक उदाहरण: मिन्स्क समझौते (2014-15), मार्च 2022 की इस्तांबुल वार्ता, 2022 का काला सागर अनाज पहल (Black Sea Grain Initiative), जिसमें संयुक्त राष्ट्र और तुर्की की मध्यस्थता थी; इनसे प्राप्त सीख। (6) भारत का दृष्टिकोण: संवाद और कूटनीति पर बल, रणनीतिक स्वायत्तता, ‘ऑपरेशन गंगा’ (2022) के माध्यम से नागरिक निकासी और मानवतावादी सहायता की भूमिका; गुटनिरपेक्षता की नीति का आधुनिक रूप। (7) विश्लेषण: ऊर्जा अवसंरचना और नागरिक ठिकानों पर हमले अंतरराष्ट्रीय विधि की कसौटी पर कैसे परखे जाते हैं; स्वतंत्र जाँच तंत्र और मानवीय गलियारों की आवश्यकता। (8) निष्कर्ष: संतुलित मत रखें कि कूटनीति और विधि परस्पर पूरक हैं; मानवीय संरक्षण को वार्ता के एजेंडे से अलग रखना कठिन है, परंतु प्रवर्तन की सीमाएँ बनी रहती हैं।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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