दिल्ली के औद्योगिक इकाइयों में उत्सर्जन मानदंडों का उल्लंघन: एक विश्लेषण

दिल्ली के औद्योगिक इकाइयों में उत्सर्जन मानदंडों का उल्लंघन: एक विश्लेषण

दिल्ली के औद्योगिक इकाइयों में उत्सर्जन मानदंडों का उल्लंघन: एक विश्लेषण

दिल्ली में औद्योगिक उत्सर्जन निगरानीवर्तमान स्थितिअपेक्षित स्थितिOCEMS की संख्या87 स्थापित128 अनिवार्यOCEMS की कार्यशीलता39 निष्क्रिय, 48 सक्रियसभी पूर्णतः क्रियाशीलउत्सर्जन अनुपालन26/48 इकाइयाँ उल्लंघनसभी इकाइयाँ अनुपालनPTZ कैमरों की फ़ीडउल्लेखित नहींवास्तविक समय में प्रसारित
दिल्ली में औद्योगिक उत्सर्जन निगरानी

✎ औद्योगिक उत्सर्जन की वास्तविक समय निगरानी (OCEMS) तभी प्रभावी है जब प्रणाली सतत रूप से क्रियाशील हो और उसके आँकड़े नियामक प्रवर्तन से सीधे जुड़े हों; CAQM का 30 नवंबर का निर्देश इसी अंतर को भरने का प्रयास है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (Environment and Ecology): वायु प्रदूषण, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण और नियामक प्रवर्तन  |  GS Paper II — शासन एवं सांविधिक निकाय (Statutory Bodies): CAQM की भूमिका, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अंतर-राज्यीय समन्वय
  • Prelims: OCEMS (ऑनलाइन सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली), CAQM — राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं आसन्न क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग, वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) की श्रेणियाँ और PM2.5 व PM10 का अंतर, द्वितीयक कण पदार्थ (Secondary Particulate Matter) का निर्माण, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका, ग्रेडेड प्रतिक्रिया कार्य योजना (GRAP), प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)
  • Essay: पर्यावरण नियम अच्छे, क्रियान्वयन कमज़ोर: नियामक निगरानी की विश्वसनीयता का प्रश्न, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अंतर-राज्यीय समन्वय और सहकारी संघवाद: वायु प्रदूषण पर साझा उत्तरदायित्व

त्वरित पुनरावृत्ति: औद्योगिक उत्सर्जन की वास्तविक समय निगरानी (OCEMS) तभी प्रभावी है जब प्रणाली सतत रूप से क्रियाशील हो और उसके आँकड़े नियामक प्रवर्तन से सीधे जुड़े हों; CAQM का 30 नवंबर का निर्देश इसी अंतर को भरने का प्रयास है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (Delhi Pollution Control Committee — DPCC) के आँकड़ों के अनुसार, राजधानी की औद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित 87 ऑनलाइन सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणालियों (OCEMS) में से 39 निष्क्रिय पाई गईं। शेष 48 प्रणालियों के आँकड़ों में से 26 (लगभग 54 प्रतिशत) इकाइयाँ अनुमेय उत्सर्जन सीमा से अधिक उत्सर्जन करती पाई गईं। यह स्थिति उस समय सामने आई जब दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 369 यानी ‘बहुत खराब’ श्रेणी में था और वायु गुणवत्ता पूर्व चेतावनी प्रणाली ने आने वाले दिनों में ‘गंभीर’ स्थिति का पूर्वानुमान लगाया। इससे यह प्रश्न उठा है कि औद्योगिक प्रदूषण की वास्तविक समय में निगरानी कितनी प्रभावी ढंग से हो पा रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं आसन्न क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पिछले महीने जारी निर्देश में सभी संबंधित उद्योगों से OCEMS को पूर्णतः क्रियाशील करने और पैन-टिल्ट-ज़ूम (PTZ) कैमरों की फ़ीड वास्तविक समय में प्रसारित करने को कहा है, तथा इसके लिए 30 नवंबर की समय-सीमा तय की गई है। उद्योगों ने विलंब का कारण वित्तीय दबाव बताया है, जिसमें पश्चिम एशिया में संघर्ष से आपूर्ति शृंखला बाधित होने और कच्चे माल व उपकरणों की लागत बढ़ने का उल्लेख है।

पृष्ठभूमि

  • वायु प्रदूषण की विधिक संरचना: वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को उद्योगों की सहमति (consent) देने और उत्सर्जन की निगरानी का दायित्व मिला है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र सरकार को व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  • CAQM की स्थापना: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं आसन्न क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 द्वारा CAQM को सांविधिक निकाय का दर्जा मिला, जिसने पूर्व की पर्यावरण प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) प्राधिकरण (EPCA) का स्थान लिया। इसे NCR के राज्यों को निर्देश देने और उद्योगों पर नियंत्रण रखने की शक्ति प्राप्त है।
  • निगरानी का तकनीकी आधार: 128 अत्यधिक प्रदूषणकारी इकाइयों को OCEMS लगाना अनिवार्य है, जबकि दिल्ली की अनुरूप औद्योगिक क्षेत्रों (conforming industrial areas) में कुल 30,672 औद्योगिक इकाइयाँ हैं। अब तक केवल 87 इकाइयों ने प्रणाली स्थापित की है।
  • द्वितीयक प्रदूषण की समस्या: 2018 के TERI-ARAI स्रोत-विभाजन (source apportionment) अध्ययन के अनुसार उद्योग दिल्ली के वार्षिक वायु प्रदूषण भार में लगभग 26 प्रतिशत तक योगदान कर सकते हैं। सर्दियों में प्रतिकूल मौसम विज्ञान स्थितियाँ प्रदूषकों के फैलाव को सीमित करती हैं और द्वितीयक कण पदार्थ के निर्माण को बढ़ाती हैं।
  • क्षेत्रीय तुलना: CAQM के अनुसार हरियाणा में लगभग पूर्ण कवरेज है, जबकि उत्तर प्रदेश में 648 और राजस्थान में 255 इकाइयों को निगरानी प्रणाली लगानी या प्राप्त करनी है। हरियाणा में 907 इकाइयों के लिए यह आवश्यकता थी।
  • उच्च उल्लंघन वाले क्षेत्र: दिल्ली में प्रवाहित इकाइयों में धातु-प्रसंस्करण उद्योग प्रमुख हैं। 16 परिचालनरत धातु-कार्य, मिश्रधातु निर्माण, ढलाई (foundry), ब्रेज़िंग और डाई-कास्टिंग इकाइयों में से 9 को उत्सर्जन सीमा के उल्लंघन के लिए चिह्नित किया गया है।

OCEMS (ऑनलाइन सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली) क्या है?

  • यह ऐसी तकनीकी प्रणाली है जो औद्योगिक चिमनी (stack) से निकलने वाली गैसों और प्रदूषकों की मात्रा को सतत रूप से मापती है और आँकड़े नियामक प्राधिकरण के केंद्रीय सर्वर को भेजती है।
  • इसका मुख्य लाभ वास्तविक समय (real-time) डेटा है, जिससे नियामक उल्लंघन का तुरंत पता लगा सकते हैं। पारंपरिक नमूना-आधारित (periodic) जाँच में केवल सीमित अवधि का आँकड़ा मिलता है।
  • पैन-टिल्ट-ज़ूम (PTZ) कैमरे दूरस्थ दृश्य निगरानी में सहायक होते हैं, जिससे उत्सर्जन स्रोत की भौतिक स्थिति की पुष्टि की जा सकती है।
  • प्रणाली की प्रभावशीलता केवल स्थापना पर नहीं, बल्कि निरंतर संचालन, नियमित अंशांकन (calibration) और डेटा प्रसारण पर निर्भर है। निष्क्रिय प्रणाली निगरानी में अंतर पैदा करती है।
  • उत्सर्जन मानक और इकाइयों की श्रेणी का निर्धारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के दिशानिर्देशों और संबंधित नियामक अधिसूचनाओं के आधार पर होता है।
  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के संदर्भ में विश्वसनीय निगरानी प्रवर्तन और दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनती है, क्योंकि जिसका उत्सर्जन मापा नहीं जाता, उसके उल्लंघन पर कार्रवाई कठिन हो जाती है।
  • भारत में औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण का यह ढाँचा अनुच्छेद 48-क (राज्य का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व) और अनुच्छेद 51-क(छ) (नागरिकों का मूल कर्तव्य) की भावना से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ वायु को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
ऑनलाइन सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (Online Continuous Emission Monitoring Systems, OCEMS) दिल्ली की औद्योगिक इकाइयों में कुल 87 प्रणालियाँ लगी हैं। इनमें से 39 निष्क्रिय हैं और केवल 48 से डेटा प्रसारित हो रहा है, जिससे वास्तविक समय की निगरानी अधूरी है।
उल्लंघन की स्थिति प्रसारित डेटा वाली 48 इकाइयों में से कम से कम 26 (लगभग 54%) उत्सर्जन की अनुमत सीमा से अधिक पाई गईं। यह संकेत देता है कि निगरानी के दायरे में आने वाली इकाइयों में भी अनुपालन की स्थिति कमजोर है।
लक्षित इकाइयाँ उच्च प्रदूषणकारी 128 इकाइयों के लिए OCEMS लगाना अनिवार्य है, जबकि अब तक 87 ने ही इसे लगाया है। सुरक्षित औद्योगिक क्षेत्रों में कुल 30,672 औद्योगिक इकाइयाँ हैं।
औद्योगिक प्रदूषण का हिस्सा 2018 के TERI-ARAI स्रोत विभाजन अध्ययन के अनुसार दिल्ली के वार्षिक वायु प्रदूषण भार में औद्योगिक उत्सर्जन का योगदान अधिकतम 26% तक हो सकता है। यह द्वितीयक कण पदार्थ (Secondary Particulate Matter, PM) के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाता है।
वायु गुणवत्ता की पृष्ठभूमि शनिवार को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index, AQI) 369 दर्ज हुआ, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। कुछ क्षेत्रों में यह 400 से ऊपर रहा और अगले दिनों के लिए ‘गंभीर’ श्रेणी का पूर्वानुमान है।
नियामक समय-सीमा वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management in National Capital Region and Adjoining Areas, CAQM) ने संबंधित इकाइयों को OCEMS को पूर्णतः चालू करने और पैन-टिल्ट-ज़ूम कैमरों के फ़ीड का वास्तविक समय प्रसारण सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। इसकी अंतिम तिथि 30 नवंबर है।

महत्व

पर्यावरणीय

  • वास्तविक समय की निगरानी से उत्सर्जन के स्रोत की पहचान और तत्काल कार्रवाई संभव होती है, जो शीत ऋतु में वायु प्रदूषण के नियंत्रण में विशेष रूप से उपयोगी है।
  • शीत ऋतु में प्रतिकूल मौसमी दशाओं के कारण प्रदूषकों का विसरण सीमित रहता है, इसलिए औद्योगिक उत्सर्जन का प्रभाव अधिक स्पष्ट हो जाता है।
  • औद्योगिक उत्सर्जन सीधे कण पदार्थ (Particulate Matter, PM) बढ़ाता है और द्वितीयक कण पदार्थ के निर्माण में भी योगदान देता है, इसलिए इसका नियंत्रण वायु गुणवत्ता सुधार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

प्रशासनिक और नियामक

  • वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उससे लगे क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता के समन्वित प्रबंधन के लिए वैधानिक शक्तियाँ प्राप्त हैं। इस मामले में उसका निर्देश नियामक हस्तक्षेप का स्पष्ट उदाहरण है।
  • दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (Delhi Pollution Control Committee, DPCC) द्वारा डेटा का उपयोग दर्शाता है कि निगरानी प्रणाली प्रवर्तन का आधार बन सकती है।
  • निष्क्रिय प्रणालियाँ यह बताती हैं कि नियम बनाने के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन और तकनीकी रखरखाव की जवाबदेही तय करना भी उतना ही आवश्यक है।

आर्थिक

  • निगरानी प्रणाली लगाने और उसे चालू रखने की लागत औद्योगिक इकाइयों, विशेषकर सूक्ष्म और लघु उद्यमों, के लिए वित्तीय दबाव बनाती है।
  • उद्योगों ने पश्चिम एशिया के संघर्ष से आपूर्ति शृंखला बाधित होने और कच्चे माल व उपकरणों की लागत बढ़ने का हवाला दिया है। यह उद्योगों का पक्ष है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अपेक्षित है।

क्षेत्रीय समन्वय

  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्य राज्यों में भी स्थिति भिन्न है। हरियाणा में लगभग पूर्ण कवरेज बताया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश में 648 और राजस्थान में 255 इकाइयों को प्रणाली लगाने या प्राप्त करने की आवश्यकता है।
  • अंतर-राज्यीय वायु प्रदूषण में समान मानक और समन्वित प्रवर्तन की आवश्यकता इसी संदर्भ में स्पष्ट होती है।

चुनौतियाँ

1. तकनीकी और संचालन संबंधी विफलता

  • 87 में से 39 प्रणालियाँ निष्क्रिय हैं, अर्थात लगभग आधी निगरानी व्यवस्था डेटा नहीं दे रही है।
  • निष्क्रियता के कारण वास्तविक उत्सर्जन की तस्वीर अधूरी रहती है और नियामक समय पर हस्तक्षेप नहीं कर पाते।

2. अनुपालन में विलंब और वित्तीय दबाव

  • उद्योगों द्वारा वित्तीय कठिनाई का हवाला देने से अनुपालन में देरी हुई है।
  • सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए उपकरण और रखरखाव की लागत अधिक भार बन सकती है, जिससे नियम और आर्थिक व्यवहार्यता के बीच संतुलन आवश्यक है।

3. निगरानी डेटा का प्रवर्तन में उपयोग

  • 54% उल्लंघन दर यह बताती है कि प्रसारित डेटा का प्रभावी प्रवर्तन आवश्यक है।
  • डेटा संग्रह के साथ समय पर जुर्माना, संचालन पर रोक या सुधार जैसी कार्रवाई की स्पष्ट प्रक्रिया न होने पर निगरानी का उद्देश्य अधूरा रहता है।

4. धातु उद्योग में उच्च उल्लंघन

  • परिचालन में आई 16 धातु-आधारित इकाइयों (धातु कार्य, मिश्र धातु निर्माण, फाउंड्री, ब्रेजिंग और डाई-कास्टिंग) में से 9 उत्सर्जन सीमा से अधिक पाई गईं।
  • इन इकाइयों पर लक्षित निरीक्षण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है।

5. सीमित दायरा और कवरेज की खाई

  • दिल्ली में 30,672 औद्योगिक इकाइयाँ हैं, पर OCEMS की अनिवार्यता केवल 128 उच्च प्रदूषणकारी इकाइयों तक सीमित है।
  • सीमित दायरे से बाकी इकाइयों का उत्सर्जन सार्वजनिक निगरानी से बाहर रह जाता है।

6. अंतर-राज्यीय असमानता और समन्वय

  • हरियाणा में लगभग पूर्ण कवरेज है, जबकि उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बड़ी संख्या में इकाइयाँ अभी भी बाकी हैं।
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण सीमाओं से परे फैलता है, इसलिए समान मानक और साझा निगरानी ढांचा आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
निष्क्रिय निगरानी प्रणालियाँ 39 प्रणालियाँ बंद होने से वास्तविक समय का डेटा उपलब्ध नहीं, जिससे प्रवर्तन कमजोर होता है।
उल्लंघन की ऊँची दर प्रसारित डेटा वाली इकाइयों में लगभग 54% उल्लंघन, जो उत्सर्जन नियंत्रण तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर प्रश्न उठाता है।
अनुपालन में देरी 128 में से केवल 87 इकाइयों ने प्रणाली लगाई है; वित्तीय कठिनाई को कारण बताया गया है।
लागत का दबाव उपकरण और रखरखाव की लागत, विशेषकर छोटे उद्योगों के लिए, अनुपालन में बाधा बन सकती है।
सीमित दायरा 30,672 इकाइयों के मुकाबले केवल 128 पर अनिवार्यता, जिससे अधिकांश औद्योगिक उत्सर्जन निगरानी से बाहर है।
राज्यवार असमानता NCR के राज्यों में कवरेज अलग-अलग है, जिससे साझा वायु गुणवत्ता लक्ष्यों की प्राप्ति कठिन होती है।

आगे की राह

  • निष्क्रिय 39 प्रणालियों की तकनीकी जाँच कर उन्हें 30 नवंबर की समय-सीमा तक चालू कराना और डेटा प्रसारण में निरंतरता सुनिश्चित करना।
  • निगरानी डेटा में उल्लंघन पाए जाने पर पूर्व-निर्धारित और पारदर्शी प्रवर्तन प्रक्रिया लागू करना, ताकि दंड और सुधार की कार्रवाई समयबद्ध हो।
  • पैन-टिल्ट-ज़ूम कैमरों के फ़ीड को OCEMS डेटा के साथ मिलाकर सत्यापन करना, जिससे प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़े।
  • उच्च उल्लंघन वाले धातु उद्योग क्षेत्रों पर लक्षित निरीक्षण और उत्सर्जन नियंत्रण तकनीक अपनाने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन देना।
  • सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए उपकरण लागत का चरणबद्ध या साझा प्रबंधन मॉडल विकसित करना, ताकि अनुपालन आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो।
  • 128 उच्च प्रदूषणकारी इकाइयों से आगे बढ़कर निगरानी की व्याप्ति का जोखिम-आधारित विस्तार करना।
  • NCR के सभी राज्यों में समान तकनीकी मानक और डेटा प्रारूप अपनाकर अंतर-राज्यीय समन्वय को मजबूत करना।
  • निगरानी आँकड़ों और प्रवर्तन कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना, ताकि नीति में जनविश्वास और जवाबदेही बढ़े।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (Continuous Emission Monitoring System – CEMS) · वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management – CAQM) · दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (Delhi Pollution Control Committee – DPCC) · औद्योगिक उत्सर्जन और वायु प्रदूषण · द्वितीयक सूक्ष्म कण पदार्थ (Secondary Particulate Matter – PM) · प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) · सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) · पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) · अनुच्छेद 21 और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · अनुच्छेद 239AA और दिल्ली की संवैधानिक स्थिति · नियामक अनुपालन और प्रवर्तन (Regulatory Compliance and Enforcement)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: स्वच्छ वायु में जीवन का अधिकार
  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(छ): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मूल कर्तव्य

अवधारणा प्रवाह

औद्योगिक इकाइयों से कण पदार्थ और अन्य प्रदूषकों का उत्सर्जन होता है।  →  शीत ऋतु में प्रतिकूल मौसम के कारण प्रदूषक फैल नहीं पाते और द्वितीयक कण पदार्थ बनते हैं।  →  OCEMS उत्सर्जन का वास्तविक समय डेटा नियामक तक पहुँचाने के लिए लगाए जाते हैं।  →  39 प्रणालियाँ निष्क्रिय होने से डेटा का प्रवाह बाधित होता है और निगरानी अधूरी रहती है।  →  प्रसारित डेटा में 54% इकाइयाँ सीमा से अधिक उत्सर्जन करती पाई जाती हैं।  →  CAQM निर्देश देता है कि सभी संबंधित इकाइयाँ 30 नवंबर तक प्रणाली पूर्णतः चालू करें।  →  निगरानी और प्रवर्तन के सुधार से उत्सर्जन नियंत्रण और वायु गुणवत्ता में सुधार की दिशा बनती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की स्थापना एक संसदीय अधिनियम के अंतर्गत की गई है।
2. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है।
3. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) एक संवैधानिक निकाय है, जिसका उल्लेख अनुच्छेद 48A में किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: CAQM की स्थापना वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के अंतर्गत हुई। कथन 2 सही है: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 केंद्र को निर्देश जारी करने की शक्ति देती है। कथन 3 गलत है: CPCB एक वैधानिक निकाय है, जो जल अधिनियम, 1974 और वायु अधिनियम, 1981 के अंतर्गत कार्य करता है; अनुच्छेद 48A राज्य के नीति-निदेशक तत्वों से संबंधित है, किसी निकाय से नहीं।

Q2. अभिकथन (A): दिल्ली-एनसीआर में औद्योगिक उत्सर्जन वायु प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है, और प्रतिकूल मौसम में, विशेषकर शीत ऋतु में, इसका प्रभाव अधिक स्पष्ट हो जाता है।
कारण (R): वायुमंडल में अग्रदूत गैसों की रासायनिक अभिक्रियाओं से द्वितीयक सूक्ष्म कण पदार्थ बनते हैं, और शीत ऋतु में वायु के विसरण के कमज़ोर होने से ये प्रदूषक सांद्रित होकर जमा होते हैं।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:

  1. (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — (A) सही है: औद्योगिक उत्सर्जन सीधे PM बढ़ाते हैं और द्वितीयक PM के निर्माण में भी योगदान देते हैं, जैसा CAQM के निर्देश में कहा गया है। (R) भी सही है और सीधे (A) की व्याख्या करता है, क्योंकि शीत ऋतु में प्रतिकूल मौसमी दशाएँ प्रदूषकों के विसरण को रोकती हैं।

Q3. निम्नलिखित सूची-I (संवैधानिक प्रावधान) का सूची-II (विषय) से मिलान कीजिए:
सूची-I
1. अनुच्छेद 48A
2. अनुच्छेद 51A(g)
3. अनुच्छेद 21
4. अनुच्छेद 253

सूची-II
a. प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे
b. राज्य का नीति-निदेशक तत्व, जो पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा का निर्देश देता है
c. अंतरराष्ट्रीय संधियों और निर्णयों को लागू करने के लिए संसद की विधि-निर्माण शक्ति
d. न्यायिक व्याख्या द्वारा स्वच्छ पर्यावरण में जीने के अधिकार को समाविष्ट करना

सही उत्तर चुनिए:

  1. 1-b, 2-a, 3-d, 4-c
  2. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  3. 1-b, 2-c, 3-a, 4-d
  4. 1-d, 2-a, 3-b, 4-c

उत्तर: 1-b, 2-a, 3-d, 4-c — अनुच्छेद 48A (राज्य का नीति-निदेशक तत्व) का संबंध पर्यावरण संरक्षण से है (b)। अनुच्छेद 51A(g) मूल कर्तव्य है (a)। अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या से स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार जुड़ा है (d)। अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन के लिए विधि बनाने की शक्ति देता है (c)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ दिल्ली की औद्योगिक इकाइयों में लगाई गई सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणालियों में से लगभग आधी बंद पाई गईं, जबकि चालू प्रणालियों के आँकड़ों में निर्धारित सीमा से अधिक उत्सर्जन दर्ज हुआ। औद्योगिक वायु प्रदूषण के नियमन में तकनीक-आधारित निगरानी की सीमाओं की समालोचनात्मक समीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि निगरानी तंत्र की विफलता के बावजूद अनुपालन सुनिश्चित न हो, तो दिल्ली-एनसीआर में प्रभावी नियामक प्रवर्तन के लिए किन विधिक और वित्तीय उपायों की आवश्यकता होगी? (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (संकेत-बिंदु):
1. भूमिका: दिल्ली में 128 उच्च-प्रदूषणकारी इकाइयों के लिए OCEMS अनिवार्य हैं, किंतु केवल 87 ने प्रणाली लगाई; 39 बंद हैं; चालू 48 में से 26 (54%) सीमा-उल्लंघन में चिह्नित। 2018 के TERI-ARAI स्रोत-विभाजन अध्ययन के अनुसार औद्योगिक उत्सर्जन वार्षिक वायु प्रदूषण भार में अधिकतम लगभग 26% तक योगदान कर सकता है।
2. निगरानी तंत्र की संरचना: वायु अधिनियम, 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (धारा 5 में निर्देश-शक्ति) के अंतर्गत नियामक ढाँचा; वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के अंतर्गत CAQM की भूमिका; CAQM का 30 नवंबर की समय-सीमा और पैन-टिल्ट-ज़ूम कैमरों के वास्तविक-समय प्रसारण का निर्देश।
3. तकनीकी सीमाएँ: उपकरण का बंद रहना, डेटा-प्रसारण की विश्वसनीयता, स्व-रिपोर्टिंग की संभावना, और उपकरण-खरीद की लागत।
4. विधिक सिद्धांत: प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Indian Council for Enviro-Legal Action v. Union of India, 1996); सावधानी सिद्धांत (Vellore Citizens Welfare Forum v. Union of India, 1996); पूर्ण दायित्व सिद्धांत (M.C. Mehta v. Union of India, ओलियम गैस रिसाव मामला, 1986)।
5. संवैधानिक आयाम: अनुच्छेद 21 में स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार; अनुच्छेद 48A और 51A(g); अनुच्छेद 239AA के अंतर्गत दिल्ली की विधानमंडल-युक्त संघ राज्यक्षेत्र स्थिति तथा NCR में CAQM के समन्वय से सहकारी संघवाद की चुनौती।
6. उपाय: बंद प्रणालियों पर त्वरित दंड और निश्चित समय-सीमा, निगरानी आँकड़ों का सार्वजनिक प्रकाशन, स्वतंत्र सत्यापन, MSME के लिए वित्तीय सहायता या तकनीकी अनुदान (आर्थिक संवृद्धि और पर्यावरण के बीच संतुलन), और वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए GRAP जैसे प्रवर्तन उपायों का समन्वय।
7. निष्कर्ष: विकास और पर्यावरण के संतुलन पर विचार करते हुए बहुआयामी नियामक सुधार की आवश्यकता।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment