सीएसआईआर-सीसीएमबी ने यादाद्री में किसानों को जलवायु-लचीले चावल के बीज वितरित किए

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सीएसआईआर-सीसीएमबी ने यादाद्री में किसानों को जलवायु-लचीले चावल के बीज वितरित किए

जलवायु-अनुकूल चावल बीज वितरण प्रक्रियाजलवायु परिवर्तन प्रभावफसल उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाअनुसंधान विकासCSIR-CCMB व ICAR-IIRRबीज वितरणकिसानों को जागरूकता सहितकृषि उत्पादकता सुधारखाद्य सुरक्षा में वृद्धि
जलवायु-अनुकूल चावल बीज वितरण प्रक्रिया

✎ जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने हेतु वैज्ञानिक नवाचार का एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — कृषि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण  |  GS Paper I — भूगोल (फसल पैटर्न)
  • Prelims: CSIR-CCMB, ICAR-IIRR, जलवायु-अनुकूल फसलें, चावल की किस्में, खाद्य सुरक्षा, कृषि अनुसंधान, जैविक प्रौद्योगिकी
  • Essay: जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि: चुनौतियाँ एवं समाधान, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में वैज्ञानिक नवाचारों की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने हेतु वैज्ञानिक नवाचार का एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (CSIR-CCMB) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIRR) के सहयोग से विकसित जलवायु-अनुकूल चावल की नई किस्मों के बीज तेलंगाना के यादद्री भुवनगिरी जिले के किसानों को वितरित किए हैं। इन किस्मों को पोषण संबंधी चुनौतियों (जैसे मधुमेह) और कृषि संबंधी समस्याओं (जैसे रोग प्रतिरोधक क्षमता, उच्च मृदा लवणता और कम फास्फोरस की स्थिति) का समाधान करने के लिए विकसित किया गया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ चावल एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है और लाखों किसानों की आजीविका का आधार है।
  • जलवायु परिवर्तन, जिसमें अनियमित वर्षा पैटर्न, तापमान में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाएँ शामिल हैं, कृषि उत्पादकता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।
  • पारंपरिक चावल की किस्में अक्सर इन बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील होती हैं, जिससे फसल का नुकसान और खाद्य असुरक्षा बढ़ती है।
  • कृषि अनुसंधान संस्थान जलवायु-अनुकूल फसलें विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो कठोर पर्यावरणीय परिस्थितियों का सामना कर सकें और उच्च उपज दे सकें।
  • पोषण सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है, और ऐसी फसलें विकसित करना जो न केवल जलवायु-अनुकूल हों बल्कि मधुमेह जैसी बीमारियों के प्रति संवेदनशील आबादी के लिए भी फायदेमंद हों, एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • वैज्ञानिक-किसान संवाद कार्यक्रम अनुसंधान को खेतों तक पहुँचाने और किसानों को नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में क्या हैं?

  • जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में वे हैं जिन्हें बदलती जलवायु परिस्थितियों, जैसे सूखा, बाढ़, उच्च तापमान, मृदा लवणता और कीटों/रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होने के लिए विकसित किया गया है।
  • इन किस्मों को पारंपरिक प्रजनन विधियों या आधुनिक जैविक प्रौद्योगिकी तकनीकों (जैसे आनुवंशिक इंजीनियरिंग) का उपयोग करके विकसित किया जा सकता है।
  • इन किस्मों का मुख्य उद्देश्य प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी स्थिर और उच्च उपज सुनिश्चित करके खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना है।
  • CSIR-CCMB और ICAR-IIRR द्वारा विकसित नई किस्मों में रोग और कीट प्रतिरोधक क्षमता, उच्च मृदा लवणता और कम फास्फोरस की स्थिति को सहन करने की क्षमता जैसी विशेषताएँ हैं।
  • इनमें से कुछ किस्में मधुमेह-अनुकूल भी हैं, जो पोषण संबंधी लाभ प्रदान करती हैं और विशेष आहार आवश्यकताओं वाली आबादी के लिए उपयुक्त हैं।
  • ये किस्में किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद करती हैं, जिससे उनकी आय और आजीविका सुरक्षित होती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में बदलती जलवायु परिस्थितियों, जैसे उच्च मृदा लवणता और कम फास्फोरस स्तरों के प्रति प्रतिरोधी। यह किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद करता है।
रोग और कीट प्रतिरोधी फसल क्षति को कम करता है, जिससे उपज में वृद्धि होती है और रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है।
उच्च उपज वाली किस्में प्रति एकड़ अधिक उत्पादन सुनिश्चित करती हैं, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है और खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है।
मधुमेह-अनुकूल किस्में पोषक तत्वों से भरपूर चावल प्रदान करती हैं, विशेष रूप से उन आबादी के लिए जो मधुमेह के प्रति संवेदनशील हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
वैज्ञानिक-किसान संवाद कार्यक्रम वैज्ञानिकों और किसानों के बीच सीधा संवाद स्थापित करता है, जिससे कृषि अनुसंधान के परिणामों को जमीनी स्तर तक पहुँचाया जा सके और किसानों की प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सके।

महत्व

कृषि और खाद्य सुरक्षा

  • जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में किसानों को चरम मौसमी घटनाओं और पर्यावरणीय तनावों का सामना करने में मदद करती हैं, जिससे फसल की विफलता का जोखिम कम होता है।
  • उच्च उपज वाली और रोग प्रतिरोधी किस्में देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करती हैं, विशेषकर चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्न के उत्पादन में।
  • पोषण संबंधी चुनौतियों का समाधान करती हैं, जैसे कि मधुमेह-अनुकूल चावल की किस्में, जो विशेष आबादी के लिए स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती हैं।

आर्थिक महत्व

  • बेहतर बीज और कृषि पद्धतियों को अपनाने से किसानों की आय में वृद्धि होती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
  • रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों पर निर्भरता कम होने से किसानों की लागत घटती है और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
  • कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश से नई प्रौद्योगिकियों का उदय होता है, जो कृषि क्षेत्र में नवाचार और उत्पादकता को बढ़ाता है।

वैज्ञानिक और संस्थागत महत्व

  • CSIR-CCMB और ICAR-IIRR जैसे संस्थानों के बीच सहयोग कृषि अनुसंधान में अंतर-संस्थागत समन्वय के महत्व को दर्शाता है।
  • बोम्मईपल्ली में CSIR-CCMB की सुविधा उन्नत चावल किस्मों के परीक्षण और विकास के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य करती है, जो भविष्य के अनुसंधान के लिए आधार प्रदान करती है।
  • वैज्ञानिक-किसान संवाद कार्यक्रम अनुसंधान को जमीनी हकीकत से जोड़ता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि विकसित की गई किस्में किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।

चुनौतियाँ

1. किसानों द्वारा नई किस्मों को अपनाने में हिचकिचाहट

  • पारंपरिक खेती के तरीकों और बीजों के प्रति किसानों का लगाव नई, बेहतर किस्मों को अपनाने में बाधा बन सकता है।
  • नई किस्मों के प्रदर्शन और लाभों के बारे में जागरूकता की कमी भी एक चुनौती है।

2. बीज वितरण और उपलब्धता

  • विकसित की गई जलवायु-अनुकूल और पोषण-समृद्ध किस्मों के बीजों को बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुँचाना एक लॉजिस्टिक चुनौती है।
  • गुणवत्तापूर्ण बीजों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

3. जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव

  • जलवायु परिवर्तन की अप्रत्याशित प्रकृति और चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति नई किस्मों के अनुकूलन और प्रदर्शन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
  • लगातार अनुसंधान और विकास की आवश्यकता है ताकि नई चुनौतियों का सामना किया जा सके।

4. अनुसंधान और विकास के लिए वित्तपोषण

  • कृषि अनुसंधान और नई किस्मों के विकास के लिए पर्याप्त और निरंतर वित्तपोषण की आवश्यकता होती है।
  • सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से निवेश को आकर्षित करना महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
नई किस्मों का व्यापक प्रसार छोटे और सीमांत किसानों तक इन उन्नत बीजों की पहुँच सुनिश्चित करना।
किसानों का प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण नई किस्मों की खेती के लिए आवश्यक वैज्ञानिक पद्धतियों और तकनीकों के बारे में किसानों को शिक्षित करना।
बाजार लिंकेज और मूल्य निर्धारण किसानों को उनकी जलवायु-अनुकूल और पोषण-समृद्ध उपज के लिए उचित मूल्य प्राप्त करने में मदद करना।
निरंतर अनुसंधान और अनुकूलन जलवायु परिवर्तन के लगातार बदलते परिदृश्य के अनुकूल नई किस्मों का विकास जारी रखना।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission)
  • परम्परागत कृषि विकास योजना (Paramparagat Krishi Vikas Yojana)
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (Rashtriya Krishi Vikas Yojana)

आगे की राह

  • उन्नत बीजों के वितरण नेटवर्क को मजबूत करना और दूरदराज के क्षेत्रों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना।
  • किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित करना ताकि उन्हें नई किस्मों के लाभों और खेती के तरीकों के बारे में शिक्षित किया जा सके।
  • कृषि अनुसंधान और विकास में सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना ताकि नवाचार को गति मिल सके।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों (Climate-Resilient Agricultural Practices) को बढ़ावा देने के लिए किसानों को वित्तीय प्रोत्साहन और सब्सिडी प्रदान करना।
  • किसानों और वैज्ञानिकों के बीच नियमित संवाद मंच स्थापित करना ताकि अनुसंधान को जमीनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला जा सके।
  • फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को प्रोत्साहित करना और विभिन्न जलवायु-अनुकूल फसलों के विकास पर ध्यान केंद्रित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जलवायु-लचीली चावल की किस्में · CSIR-CCMB · ICAR-IIRR · कृषि अनुसंधान · खाद्य सुरक्षा · पोषण सुरक्षा · किसानों की आय · जलवायु परिवर्तन · सतत कृषि · फसल विविधीकरण · बीज वितरण कार्यक्रम · वैज्ञानिक-किसान संवाद

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48’, ‘note’: ‘कृषि और पशुपालन का संगठन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}

अवधारणा प्रवाह

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय तनाव  →  फसल उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव  →  CSIR-CCMB और ICAR-IIRR द्वारा अनुसंधान  →  जलवायु-अनुकूल और पोषण-समृद्ध चावल किस्मों का विकास  →  किसानों को बीजों का वितरण और जागरूकता  →  कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा में सुधार

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. CSIR-CCMB (कोशिका और आणविक जीव विज्ञान केंद्र) भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान है।
2. ICAR-IIRR (भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान) चावल की खेती से संबंधित अनुसंधान और विकास पर केंद्रित है।
3. हाल ही में, CSIR-CCMB ने किसानों को जलवायु-लचीली चावल की किस्में वितरित की हैं, जो उच्च मिट्टी लवणता और कम फास्फोरस की स्थिति का सामना कर सकती हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 और 2 सही हैं। CSIR-CCMB वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के तहत आता है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का हिस्सा है। ICAR-IIRR भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत एक प्रमुख चावल अनुसंधान संस्थान है। कथन 3 भी सही है, जैसा कि समाचार में बताया गया है कि CSIR-CCMB ने ICAR-IIRR के साथ मिलकर विकसित की गई जलवायु-लचीली चावल की किस्में वितरित की हैं जो उच्च मिट्टी लवणता और कम फास्फोरस की स्थिति का सामना कर सकती हैं।

Q2. जलवायु-लचीली फसल किस्मों के विकास और वितरण का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

  1. किसानों को नई कृषि मशीनरी खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना।
  2. कृषि निर्यात को बढ़ावा देना और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाना।
  3. जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों का सामना करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि को अनुकूल बनाना।
  4. रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को पूरी तरह से समाप्त करना।

उत्तर: जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों का सामना करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि को अनुकूल बनाना। — जलवायु-लचीली फसल किस्मों का विकास और वितरण मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली चुनौतियों, जैसे सूखा, बाढ़, लवणता और कीटों के हमलों का सामना करने के लिए किया जाता है, ताकि कृषि उत्पादकता बनी रहे और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने में जलवायु-लचीली फसल किस्मों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संबंध में कृषि अनुसंधान संस्थानों के योगदान पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जलवायु-लचीली फसल किस्मों की अवधारणा और भारत में इसकी आवश्यकता का संक्षिप्त परिचय दें (जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव)।
2. **खाद्य सुरक्षा में भूमिका:**
* बदलते मौसम पैटर्न, सूखा, बाढ़ और कीटों के हमलों के बावजूद स्थिर फसल उत्पादन सुनिश्चित करना।
* पोषण सुरक्षा में सुधार (जैसे मधुमेह-अनुकूल किस्में)।
* खाद्य आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता बढ़ाना।
3. **किसानों की आय बढ़ाने में भूमिका:**
* फसल के नुकसान को कम करके उपज की स्थिरता सुनिश्चित करना।
* इनपुट लागत में कमी (जैसे कम पानी, कम उर्वरक की आवश्यकता)।
* बाजार में बेहतर गुणवत्ता और मांग वाली फसलों से अधिक मूल्य प्राप्त करना।
* जोखिम कम करके कृषि को अधिक लाभदायक बनाना।
4. **कृषि अनुसंधान संस्थानों का योगदान:**
* **CSIR-CCMB और ICAR-IIRR जैसे संस्थानों का उदाहरण:** उन्नत किस्मों का विकास (रोग प्रतिरोधी, कीट प्रतिरोधी, उच्च लवणता/कम फास्फोरस सहनशील)।
* **प्रौद्योगिकी हस्तांतरण:** किसानों तक नई किस्मों और तकनीकों को पहुंचाना (जैसे बीज वितरण कार्यक्रम, वैज्ञानिक-किसान संवाद)।
* **क्षमता निर्माण:** किसानों को नई कृषि पद्धतियों के बारे में शिक्षित करना।
* **नीति निर्माण में सहायता:** सरकार को कृषि नीतियों के लिए वैज्ञानिक इनपुट प्रदान करना।
5. **चुनौतियाँ और आगे की राह (समालोचनात्मक विश्लेषण):**
* इन किस्मों को अपनाने में किसानों के सामने आने वाली चुनौतियाँ (जागरूकता की कमी, प्रारंभिक लागत, बाजार पहुंच)।
* अनुसंधान और विकास में निरंतर निवेश की आवश्यकता।
* सरकारी नीतियों और योजनाओं का समर्थन (जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना)।
* स्थानीय जलवायु और मिट्टी की स्थितियों के अनुकूल किस्मों का विकास।
6. **निष्कर्ष:** जलवायु-लचीली फसलें भारत की कृषि स्थिरता और ग्रामीण समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिसके लिए अनुसंधान, नीति और किसान सहभागिता का एक समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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