03 Oct एल नीनो से निपटने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र निगरानी जरूरी क्यों?

✎ अल नीनो प्रशांत महासागर के गर्म होने से जुड़ा एक जलवायु पैटर्न है जो भारत में मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे सूखे की स्थिति और व्यापक पारिस्थितिकीय तनाव उत्पन्न हो सकता है, जिसके लिए एक समन्वित और व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, जलवायु विज्ञान) | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
- Prelims: अल नीनो, ला नीना, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), पारिस्थितिकीय निगरानी, जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर झीलें, मृदा नमी, कोरल रीफ्स, पश्चिमी विक्षोभ
- Essay: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अनुकूलन रणनीतियाँ, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो प्रशांत महासागर के गर्म होने से जुड़ा एक जलवायु पैटर्न है जो भारत में मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे सूखे की स्थिति और व्यापक पारिस्थितिकीय तनाव उत्पन्न हो सकता है, जिसके लिए एक समन्वित और व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र निगरानी नेटवर्क आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, देश के लगभग 200 पारिस्थितिकीविदों ने एक आपातकालीन पारिस्थितिकी तंत्र-व्यापी निगरानी नेटवर्क के लिए अपील की है। यह अपील विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक संभावित रूप से कठिन मानसून के बाद की अवधि में प्रवेश कर चुका है, जिसमें दक्षिण-पश्चिम मानसून में 12.6 प्रतिशत वर्षा की कमी देखी गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष के शेष भाग के लिए देश के अधिकांश हिस्सों में अत्यधिक शुष्क परिस्थितियों की भविष्यवाणी की है, जिसे मजबूत होते अल नीनो (El Niño) की स्थिति और बढ़ा सकती है।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ा है और वैश्विक मौसम पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।
- भारत में हाल के वर्षों में चक्रवातों जैसी वायुमंडलीय गड़बड़ी का पूर्वानुमान लगाने में पर्याप्त दक्षता हासिल की है, और IMD अत्यधिक वर्षा और लू जैसी चरम मौसमी घटनाओं के लिए अलर्ट जारी करता है।
- हालांकि, पारिस्थितिकीय प्रणालियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की निगरानी अभी भी विभिन्न अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समूहों के बीच विभाजित है, जिससे एक एकीकृत प्रतिक्रिया में कमी आती है।
- वर्षा की कमी के बावजूद, विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र (जैसे जंगल या आर्द्रभूमि) मिट्टी की नमी, वनस्पति, भूजल या मानवीय दबाव जैसे स्थानीय कारकों के कारण अलग-अलग प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
- उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की वास्तविक समय की निगरानी के लिए की गई पहल, जैसे वसुंधरा ताल में सेंसर का उपयोग, स्थानीय पारिस्थितिकीय स्थितियों की सूक्ष्म निगरानी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- गर्म सर्दियाँ, अनियमित पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) और घटता हिम आवरण पहले से ही हिमालय में नमी चक्र को बदल रहे हैं, जिससे जंगल वसंत से पहले आग के प्रति संवेदनशील हो रहे हैं।
- समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के स्वास्थ्य को समझने के लिए कोरल रीफ्स (Coral Reefs) में थर्मल तनाव की पहचान करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह तटरेखाओं को लहरों और कटाव से बचाने में मदद करता है।
अल नीनो क्या है?
- अल नीनो एक आवधिक जलवायु पैटर्न है जो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की विशेषता है।
- यह ‘अल नीनो-दक्षिणी दोलन’ (El Niño-Southern Oscillation – ENSO) नामक एक बड़े चक्र का गर्म चरण है, जिसमें एक ठंडा चरण भी होता है जिसे ला नीना (La Niña) कहा जाता है।
- अल नीनो की घटना आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होती है और लगभग 9 से 12 महीने तक चलती है, हालांकि यह कभी-कभी अधिक समय तक भी रह सकती है।
- यह वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ आ सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखा और गर्मी बढ़ सकती है।
- भारत में, अल नीनो अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) को कमजोर करता है, जिससे कम वर्षा होती है और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- यह कृषि उत्पादन, जल उपलब्धता और समग्र अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
- अल नीनो के प्रभाव केवल वायुमंडलीय नहीं होते बल्कि नदियों, आर्द्रभूमि, खेतों, जंगलों और महासागरों में जल की उपलब्धता को कम करके पारिस्थितिकीय तनाव को भी बढ़ाते हैं।
- इसकी निगरानी और पूर्वानुमान भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा किया जाता है, जो इसके संभावित प्रभावों के बारे में अलर्ट जारी करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अल नीनो (El Niño) प्रभाव | मानसून के बाद की अवधि में अत्यधिक शुष्क परिस्थितियाँ, नदियों और आर्द्रभूमियों में जल की कमी, कृषि, वन और महासागरों पर तनाव। |
| पारिस्थितिकीय तनाव | सूखे की लंबी अवधि का सामना करने की पारिस्थितिकी प्रणालियों की क्षमता में भिन्नता, स्थानीय पारिस्थितिकीय स्थितियों का महत्व। |
| सूक्ष्म-निगरानी (Micro-monitoring) | पारिस्थितिकीय बारीकियों को समझने, दुर्लभ संसाधनों को संकटग्रस्त पारिस्थितिकी प्रणालियों तक पहुंचाने और लचीलेपन की पहचान करने में सहायक। |
| क्षेत्र-स्तरीय अवलोकन (Field-level Observations) | उपग्रह डेटा को पूरक बनाना, मिट्टी की नमी, वनस्पति तनाव और जानवरों की गतिविधियों पर नज़र रखना। |
| समन्वय ढाँचा | विभिन्न अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समूहों के बीच सहयोग, जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सुदृढ़ प्रतिक्रिया। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- अल नीनो के कारण शुष्क परिस्थितियों से वन, कृषि और समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों पर बढ़ते तनाव को समझना और प्रबंधित करना।
- स्थानीय पारिस्थितिकीय स्थितियों के महत्व को पहचानना, क्योंकि समान वर्षा की कमी वाले दो वन अलग-अलग प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
- पारिस्थितिकी प्रणालियों के लचीलेपन की पहचान करना और संकटग्रस्त क्षेत्रों में संसाधनों को निर्देशित करना।
आपदा प्रबंधन
- चरम मौसमी घटनाओं जैसे तीव्र वर्षा और गर्मी की लहरों के लिए IMD की भविष्यवाणियों को पारिस्थितिकीय निगरानी से जोड़ना।
- ग्लेशियल झीलों की वास्तविक समय की निगरानी के माध्यम से प्रारंभिक चेतावनी तंत्र को मजबूत करना, जैसा कि उत्तराखंड में किया जा रहा है।
- जंगलों में आग लगने और समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों में थर्मल तनाव जैसी आपदाओं को रोकने के लिए पूर्व-सक्रिय उपाय करना।
शासन और नीति निर्माण
- एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र-व्यापी निगरानी नेटवर्क की आवश्यकता, जिसमें विभिन्न संस्थान शामिल हों।
- जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति एक मजबूत और समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया विकसित करने के लिए एक समन्वय ढाँचा स्थापित करना।
- नीति निर्माताओं को सूक्ष्म-स्तरीय डेटा प्रदान करना ताकि वे विशिष्ट पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए लक्षित हस्तक्षेप कर सकें।
चुनौतियाँ
1. समग्र निगरानी का अभाव
- पारिस्थितिकीय निगरानी अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समूहों के बीच विभाजित है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण
2. स्थानीय भिन्नताओं को समझना
- समान वर्षा की कमी के बावजूद विभिन्न पारिस्थितिकी प्रणालियों की प्रतिक्रिया में अंतर, जिन्हें केवल बड़े पैमाने के डेटा से नहीं समझा जा सकता।
यूपीएससी लिंक: भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
3. संसाधनों का कुशल आवंटन
- दुर्लभ संसाधनों को सबसे अधिक संकटग्रस्त पारिस्थितिकी प्रणालियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए सटीक, सूक्ष्म-स्तरीय डेटा की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन और शमन
4. जलवायु परिवर्तन के जटिल प्रभाव
- गर्म सर्दियाँ, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) में अनियमितता और घटते हिमपात जैसे कारक हिमालय में नमी चक्र को बदल रहे हैं, जिससे वन आग के प्रति संवेदनशील हो रहे हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अल नीनो का प्रभाव | मानसून के बाद की अवधि में अत्यधिक शुष्क परिस्थितियाँ, जल उपलब्धता में कमी और पारिस्थितिकी प्रणालियों पर तनाव। |
| पारिस्थितिकीय प्रतिक्रिया में भिन्नता | समान जलवायु परिस्थितियों में भी विभिन्न पारिस्थितिकी प्रणालियों की अलग-अलग प्रतिक्रिया, स्थानीय कारकों का महत्व। |
| समग्र निगरानी नेटवर्क की कमी | विभिन्न संस्थानों के बीच पारिस्थितिकीय निगरानी का बिखराव, एक एकीकृत प्रतिक्रिया में बाधा। |
| संसाधन आवंटन की चुनौती | सूक्ष्म-स्तरीय डेटा के अभाव में संकटग्रस्त पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए लक्षित हस्तक्षेपों की कमी। |
| हिमालयी पारिस्थितिकी का बदलता स्वरूप | गर्म सर्दियाँ, अनियमित पश्चिमी विक्षोभ और घटता हिमपात, जिससे वन आग के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे हैं। |
आगे की राह
- एक आपातकालीन पारिस्थितिकी तंत्र-व्यापी निगरानी नेटवर्क स्थापित करना, जिसमें विभिन्न वैज्ञानिक और सरकारी संस्थान शामिल हों।
- उपग्रह डेटा को क्षेत्र-स्तरीय अवलोकनों के साथ पूरक करना, जिसमें मिट्टी की नमी, वनस्पति तनाव और पशुओं की गतिविधियों की निगरानी शामिल हो।
- ग्लेशियल झीलों और अन्य संवेदनशील पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए वास्तविक समय की निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र विकसित करना।
- विभिन्न हितधारकों, जैसे अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समूहों के बीच एक समन्वय ढाँचा बनाना।
- अल नीनो जैसे जलवायु प्रभावों के कारण होने वाले पारिस्थितिकीय तनाव को कम करने के लिए लक्षित और स्थानीयकृत हस्तक्षेपों की पहचान करना।
- जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय परिवर्तनों, विशेष रूप से हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में, का अध्ययन और अनुकूलन रणनीतियाँ विकसित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
एल नीनो · पारिस्थितिकीय प्रतिबल · जलवायु परिवर्तन · पारिस्थितिकी तंत्र निगरानी · सूखा · मौसम पूर्वानुमान · आपदा प्रबंधन · जलवायु अनुकूलन · सतत विकास · समन्वय तंत्र
अवधारणा प्रवाह
अल नीनो का प्रभाव → मानसून के बाद शुष्क परिस्थितियाँ → पारिस्थितिकी प्रणालियों पर बढ़ता तनाव → सूक्ष्म-निगरानी और क्षेत्र-स्तरीय अवलोकन की आवश्यकता → समन्वित निगरानी नेटवर्क और प्रतिक्रिया
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. एल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से संबंधित एक जलवायु घटना है।
2. भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर एल नीनो का प्रभाव आमतौर पर वर्षा में कमी के रूप में देखा जाता है।
3. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) देश में चरम मौसमी घटनाओं की निगरानी और पूर्वानुमान के लिए जिम्मेदार प्रमुख एजेंसी है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। एल नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है। कथन 2 सही है। एल नीनो का भारत के दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे आमतौर पर कम वर्षा होती है। कथन 3 सही है। IMD भारत में मौसम संबंधी पूर्वानुमान और चरम मौसमी घटनाओं की चेतावनी जारी करने वाली प्राथमिक एजेंसी है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कारक पारिस्थितिकीय प्रतिबल (Ecological Stress) को बढ़ा सकता/सकते है/हैं?
1. मिट्टी की नमी में कमी
2. वनस्पति आवरण में परिवर्तन
3. भूजल स्तर में गिरावट
4. मानवीय दबाव
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए सभी कारक (मिट्टी की नमी में कमी, वनस्पति आवरण में परिवर्तन, भूजल स्तर में गिरावट और मानवीय दबाव) पारिस्थितिकीय प्रतिबल को बढ़ा सकते हैं। ये कारक किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र की शुष्क मौसम या अन्य जलवायु विविधताओं का सामना करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ एल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के संदर्भ में पारिस्थितिकी तंत्र-व्यापी निगरानी नेटवर्क की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए। भारत में इस तरह के नेटवर्क को प्रभावी बनाने के लिए किन चुनौतियों का समाधान किया जाना चाहिए? (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में एल नीनो और उसके संभावित प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करें। पारिस्थितिकी तंत्र-व्यापी निगरानी नेटवर्क की आवश्यकता और महत्व को विस्तार से समझाएं, जिसमें स्थानीय पारिस्थितिकीय स्थितियों की भूमिका और सूक्ष्म-निगरानी के लाभ शामिल हों। भारत में ऐसे नेटवर्क को प्रभावी बनाने में आने वाली चुनौतियों जैसे संस्थागत विभाजन, संसाधनों की कमी और समन्वय की कमी पर प्रकाश डालें। इन चुनौतियों के समाधान के लिए नीतिगत उपायों और संस्थागत सुधारों का सुझाव दें। निष्कर्ष में जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन में ऐसे नेटवर्क की भूमिका को रेखांकित करें।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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