27 Oct भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन श्रीलंका पहुंचा: सुरक्षा संबंधी महत्व
✎ प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन का विदेशी पत्तन-ठहराव प्रशिक्षण, अंतर-संचालनीयता और सागर (SAGAR) नीति के तहत समुद्री सहयोग का व्यावहारिक रूप है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध; हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (समुद्री सुरक्षा; तटीय और समुद्री सीमाओं का प्रबंधन)
- Prelims: प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron), भारतीय नौसेना का पूर्वी नौसेना कमान (Eastern Naval Command), विशाखापत्तनम, सागर (SAGAR): क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और वृद्धि (Security and Growth for All in the Region), हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (IONS: Indian Ocean Naval Symposium), कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन (Colombo Security Conclave), पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) और भारत-श्रीलंका समुद्री निकटता, पोत पत्तन पर ठहराव (Port Call) और अंतर-संचालनीयता (Interoperability)
- Essay: समुद्री पड़ोस में विश्वास निर्माण: नौसैनिक सहयोग से क्षेत्रीय स्थिरता तक, हिंद महासागर क्षेत्र में साझा सुरक्षा और सहयोग का भारतीय दृष्टिकोण
त्वरित पुनरावृत्ति: प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन का विदेशी पत्तन-ठहराव प्रशिक्षण, अंतर-संचालनीयता और सागर (SAGAR) नीति के तहत समुद्री सहयोग का व्यावहारिक रूप है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय नौसेना का प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन श्रीलंका के प्रमुख पत्तन कोलंबो पहुँचा है। ऐसे पत्तन-ठहराव (Port Call) नौसेना के प्रशिक्षण और समुद्री तैनाती का सामान्य हिस्सा होते हैं, जिनमें अधिकारी-प्रशिक्षुओं को विदेशी पत्तनों की परिचालन परिस्थितियों से परिचित कराया जाता है और मित्र नौसेनाओं के साथ संपर्क बढ़ाया जाता है। भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री निकटता और साझा हितों को देखते हुए यह कदम द्विपक्षीय नौसैनिक संबंधों तथा हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के व्यापक ढाँचे के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। प्रेस विज्ञप्ति में इस यात्रा को सामान्य प्रशिक्षण-संबंधी गतिविधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पृष्ठभूमि
- प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन भारतीय नौसेना की वह इकाई है जो प्रशिक्षण पोतों के माध्यम से नौसैनिक प्रशिक्षुओं को समुद्र में व्यावहारिक अनुभव देती है; इसका आधार पूर्वी नौसेना कमान, विशाखापत्तनम से जुड़ा है।
- भारत की समुद्री नीति में हिंद महासागर क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है। सागर (SAGAR) नीति 2015 में घोषित की गई, जिसका उद्देश्य क्षेत्र के सभी देशों के साथ सुरक्षा सहयोग, क्षमता निर्माण और समुद्री आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना है।
- हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (IONS) 2008 में गठित हुई, जो इस क्षेत्र के नौसेना प्रमुखों के बीच संवाद और सहयोग का मंच है। भारत इसमें सक्रिय भूमिका निभाता है।
- कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन (2011) भारत की पहल पर बना त्रिपक्षीय से विस्तृत हुआ बहुपक्षीय मंच है, जिसमें हिंद महासागर के कुछ छोटे और मध्यम आकार के देश समुद्री सुरक्षा के साझा मुद्दों पर चर्चा करते हैं।
- भारत और श्रीलंका के बीच 1987 का भारत-श्रीलंका समझौता और उसके बाद के द्विपक्षीय तंत्र पड़ोसी संबंधों का आधार रहे हैं। समुद्री सुरक्षा, तस्करी-रोधी और खोज-एवं-बचाव जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों के लिए प्रासंगिक है।
प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron) क्या है?
- यह भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण पोतों का एक संगठित समूह है, जो नौसैनिक अधिकारियों और प्रशिक्षुओं को समुद्री परिचालन का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है।
- इसका संचालन पूर्वी नौसेना कमान के अधीन होता है, और इसकी तैनातियाँ प्रशिक्षण कार्यक्रम के अनुसार तय होती हैं।
- विदेशी पत्तनों पर ठहराव (Port Call) का उद्देश्य प्रशिक्षण के साथ-साथ मित्र देशों के साथ संपर्क, परस्पर परिचय और संयुक्त अभ्यास की तैयारी करना होता है।
- अंतर-संचालनीयता (Interoperability) का अर्थ है कि विभिन्न देशों की नौसेनाएँ संचार, संकेत-प्रणाली और परिचालन प्रक्रियाओं में समन्वय से कार्य कर सकें।
- समुद्री सुरक्षा में ऐसी यात्राएँ तटीय निगरानी, खोज-एवं-बचाव और मानवीय सहायता जैसे कार्यों में सहयोग की संभावनाओं को भी मजबूत करती हैं।
- भारत की समुद्री कूटनीति में पत्तन-ठहराव को सद्भावना और विश्वास-निर्माण के सशक्त माध्यम के रूप में देखा जाता है।
- पाक जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्र में भारत और श्रीलंका के बीच नियमित संवाद और समन्वय क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक माना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron) | नौसेना के प्रशिक्षु अधिकारियों और युद्धपोतों के समूह का संयुक्त समुद्री प्रशिक्षण और विदेशी बंदरगाह पर पहुँच, दोनों एक साथ पूरे करने का माध्यम |
| कोलंबो बंदरगाह (श्रीलंका) पर आगमन | पड़ोसी देश के बंदरगाह पर नौसैनिक उपस्थिति, जो द्विपक्षीय विश्वास और परिचालन सहयोग का प्रतीक है |
| हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region) में भारत की भूमिका | भारत के लिए समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का केंद्रीय सरोकार |
| नौसैनिक कूटनीति (Naval Diplomacy) | युद्धपोतों की सद्भावना यात्राएँ बिना सैन्य टकराव के मैत्री, पारस्परिक समझ और रक्षा संवाद को आगे बढ़ाती हैं |
| प्रशिक्षण और अंतरसंचालनीयता | विदेशी नौसेनाओं के साथ अभ्यास से समन्वय, संचार और संयुक्त संचालन की क्षमता बढ़ती है |
महत्व
सामरिक (Strategic)
- हिंद महासागर में भारत की समुद्री उपस्थिति को दृश्यता मिलती है और क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदारी को बल मिलता है।
- सागर (SAGAR — Security and Growth for All in the Region) की नीति के तहत क्षेत्र के सभी देशों की सुरक्षा और विकास को साझा हित के रूप में देखा जाता है, और ऐसी यात्राएँ उसी दृष्टि को व्यवहार में उतारती हैं।
कूटनीतिक (Diplomatic)
- पड़ोसी देशों के साथ ‘पहले पड़ोस’ (Neighbourhood First) दृष्टिकोण में नौसैनिक संपर्क विश्वास निर्माण का सहज और गैर-राजनीतिक माध्यम बनता है।
- द्विपक्षीय रक्षा संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अवसर खुलते हैं, जिससे दीर्घकालिक संबंधों की नींव मज़बूत होती है।
परिचालन एवं प्रशिक्षण (Operational and Training)
- प्रशिक्षु अधिकारियों को विदेशी बंदरगाह पर संचालन, नौवहन और संचार का व्यावहारिक अनुभव मिलता है।
- बहुराष्ट्रीय अभ्यासों की तैयारी और अंतरसंचालनीयता (Interoperability) के मानक बेहतर होते हैं।
आर्थिक (Economic)
- समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा से वाणिज्यिक नौवहन और बंदरगाह-आधारित व्यापार को अप्रत्यक्ष लाभ पहुँचता है।
- कोलंबो जैसे प्रमुख बंदरगाह क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला के महत्वपूर्ण नोड हैं, इसलिए उनकी सुरक्षित पहुँच का आर्थिक महत्व है।
चुनौतियाँ
1. सामुद्रिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी उपस्थिति
- हिंद महासागर में कई बड़ी शक्तियों की नौसैनिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, जिससे क्षेत्रीय संतुलन का प्रबंधन जटिल हुआ है।
- पड़ोसी देशों के साथ नौसैनिक संपर्क को सहयोग के रूप में देखा जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी संवाद आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के पड़ोस और क्षेत्रीय संबंध; GS-3: आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा
2. समुद्री सुरक्षा के गैर-पारंपरिक खतरे
- समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मत्स्यन और मानव तस्करी जैसी चुनौतियाँ क्षेत्रीय सहयोग की माँग करती हैं।
- इन खतरों से निपटने के लिए तटरक्षक बलों, नौसेनाओं और नागरिक एजेंसियों के बीच समन्वय आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आंतरिक सुरक्षा; समुद्री सुरक्षा और सीमा प्रबंधन
3. बहुपक्षीय सहयोग की सीमाएँ
- क्षेत्रीय संगठनों की संस्थागत क्षमता सीमित होने से सामूहिक सुरक्षा ढाँचा अब भी विकसित हो रहा है।
- द्विपक्षीय संबंधों में आर्थिक हितों और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाना कठिन रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारतीय विदेश नीति; क्षेत्रीय एवं बहुपक्षीय संगठन
4. पड़ोसी देशों की संवेदनशीलता
- छोटे पड़ोसी देश अपनी संप्रभुता और स्वायत्त निर्णय-क्षमता को लेकर संवेदनशील रहते हैं, इसलिए सैन्य गतिविधियों को पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत करना आवश्यक है।
- जनमत और मीडिया विमर्श में ऐसी यात्राओं की व्याख्या अलग-अलग ढंग से हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत और उसके पड़ोसी देशों के संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा | गैर-पारंपरिक खतरे (डकैती, तस्करी) वाणिज्यिक नौवहन और आपूर्ति शृंखला को बाधित कर सकते हैं |
| क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन | बाहरी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ने से क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और अविश्वास की स्थिति बन सकती है |
| विश्वास निर्माण | पड़ोसी देशों में सैन्य गतिविधियों को लेकर धारणाएँ भिन्न हो सकती हैं, जिससे कूटनीतिक संवाद प्रभावित हो सकता है |
| अंतरएजेंसी समन्वय | नौसेना, तटरक्षक बल और राज्य समुद्री एजेंसियों के बीच स्पष्ट भूमिका-विभाजन की आवश्यकता |
| संसाधन और परिचालन क्षमता | लंबी दूरी के प्रशिक्षण और नियमित तैनाती के लिए जहाजों का रखरखाव और मानव संसाधन निरंतर चाहिए |
आगे की राह
- नौसैनिक कूटनीति को नियमित द्विपक्षीय और बहुपक्षीय अभ्यासों के साथ संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि विश्वास निर्माण निरंतर बना रहे।
- सागर की नीति के अंतर्गत क्षमता-निर्माण, समुद्री डोमेन जागरूकता और सूचना-साझेदारी को प्राथमिकता दी जाए।
- पड़ोसी देशों की नौसेनाओं और तटरक्षक बलों के साथ प्रशिक्षण और संयुक्त खोज-बचाव अभ्यास बढ़ाए जाएँ।
- समुद्री डकैती और अवैध गतिविधियों से निपटने के लिए क्षेत्रीय सूचना-तंत्र और समन्वित प्रतिक्रिया-ढाँचे को सुदृढ़ किया जाए।
- बंदरगाह-आधारित आर्थिक सहयोग और समुद्री व्यापार सुविधाओं को सुरक्षा-व्यवस्था के साथ जोड़कर देखा जाए।
- पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ऐसी यात्राओं के उद्देश्य और गतिविधियों की सार्वजनिक जानकारी सुलभ कराई जाए।
- प्रशिक्षु अधिकारियों के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव को पाठ्यक्रम में शामिल कर पेशेवर दक्षता को निरंतर उन्नत किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने का राज्य का निदेश
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 2: नौसेना पर संघ का अनन्य अधिकार
अवधारणा प्रवाह
भारत सरकार द्वारा नौसेना के प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन का गठन और समुद्री यात्रा की योजना → स्क्वाड्रन का प्रशिक्षण-यात्रा पर निकलना, जिसमें प्रशिक्षु अधिकारियों को विदेशी जल-क्षेत्र में परिचालन अनुभव मिलता है → श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह पर आगमन, जो द्विपक्षीय नौसैनिक संपर्क और सद्भावना का अवसर बनता है → पारस्परिक संवाद, संयुक्त गतिविधियों और सूचना-साझेदारी से विश्वास निर्माण और परिचालन समन्वय मज़बूत होता है → विश्वास और सहयोग के परिणामस्वरूप हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को दीर्घकालिक समर्थन मिलता है
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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