24 Oct ISRO का NVS-03 उपग्रह: NavIC को पुनः सक्रिय करेगा, जानिए कैसे?
✎ NavIC भारत की सात-उपग्रह वाली क्षेत्रीय नौसंचालन प्रणाली (IRNSS) है, जो स्थिति-निर्धारण के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रहों पर निर्भर है और परमाणु घड़ी की विफलता इसकी सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती रही है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उसके अनुप्रयोग) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (संचार एवं नौसंचालन प्रणालियों की सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता) | GS Paper III — अवसंरचना (परिवहन और परिवहन प्रौद्योगिकी में उपग्रह आधारित स्थिति-निर्धारण का उपयोग)
- Prelims: NavIC और IRNSS (भारतीय क्षेत्रीय नौसंचालन उपग्रह प्रणाली), स्थिति-निर्धारण, नौसंचालन और समय-निर्धारण (PNT) सेवाएँ, मानक सेवा और प्रतिबंधित सेवा का अंतर, भू-स्थिर कक्षा (GEO) और भू-समकालिक कक्षा (GSO) में उपग्रहों का स्थान, L5 और S बैंड संकेत, GPS, GLONASS, Galileo, BeiDou और QZSS की तुलना, PSLV प्रक्षेपण यान और ISRO की भूमिका
- Essay: अंतरिक्ष आधारित अवसंरचना में आत्मनिर्भरता: राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक हित का संतुलन, एक प्रणाली की विफलता, एक तकनीकी निर्भरता: आयातित घटकों की चुनौती और स्वदेशी प्रौद्योगिकी का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: NavIC भारत की सात-उपग्रह वाली क्षेत्रीय नौसंचालन प्रणाली (IRNSS) है, जो स्थिति-निर्धारण के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रहों पर निर्भर है और परमाणु घड़ी की विफलता इसकी सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती रही है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने तीसरे नई पीढ़ी के नौसंचालन उपग्रह NVS-03 के 30 अक्टूबर को प्रक्षेपण की योजना बनाई है। भारत की क्षेत्रीय उपग्रह नौसंचालन प्रणाली NavIC की स्थिति-निर्धारण सेवा इसलिए रुक गई थी कि उसके कुछ उपग्रहों की आयु पूरी हो चुकी थी, परमाणु घड़ियाँ विफल हो गई थीं और हाल में प्रतिस्थापन उपग्रहों के प्रक्षेपण असफल रहे थे। सरकार ने संसद को बताया था कि वर्तमान में केवल तीन सक्रिय उपग्रह (IRNSS-1B, IRNSS-1I और NVS-01) बचे हैं, जबकि मूल स्थिति-निर्धारण सेवा के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रह आवश्यक हैं। NVS-02 को दीर्घवृत्तीय स्थानांतरण कक्षा में सही ढंग से स्थापित किया गया था, परंतु उसकी प्रणोदन प्रणाली अंतिम कक्षा में पहुँचने के लिए आवश्यक युक्तियाँ सम्पन्न नहीं कर सकी। NVS-03 की सफलता से प्रणाली को न्यूनतम संख्या में उपग्रह उपलब्ध होंगे और स्थिति-निर्धारण सेवा पुनः शुरू हो सकती है।
पृष्ठभूमि
- कारगिल युद्ध (1999) के बाद भारत ने अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय उपग्रह नौसंचालन प्रणाली के विकास की दिशा में काम शुरू किया, क्योंकि संघर्ष क्षेत्रों में अमेरिकी GPS संकेतों पर पूर्ण निर्भरता रणनीतिक रूप से जोखिमपूर्ण थी।
- जुलाई 2013 से अब तक ISRO ने 11 नौसंचालन उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं, जिनकी कुल लागत लगभग 2,250 करोड़ रुपये बताई गई है। इनमें से छह उपग्रह मुख्यतः आयातित परमाणु घड़ियों के दोषपूर्ण होने और कुछ मामलों में कक्षीय समस्याओं के कारण विफल हुए।
- परमाणु घड़ी किसी भी नौसंचालन उपग्रह का केंद्रीय घटक है, क्योंकि सटीक समय-संकेत के बिना दूरी और स्थिति की गणना संभव नहीं होती। इसलिए इस घटक की विश्वसनीयता प्रणाली की विश्वसनीयता तय करती है।
- सरकार ने ट्रेनों की वास्तविक-समय निगरानी जैसे लक्ष्यों के लिए इस प्रणाली को उपयोगी माना है, और इसके लिए NavIC-सक्षम उपकरणों के प्रसार को महत्वपूर्ण बताया गया है।
NavIC क्या है?
- NavIC का पूरा अर्थ Navigation with Indian Constellation है। आधिकारिक तकनीकी नाम भारतीय क्षेत्रीय नौसंचालन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) है।
- इसमें सात उपग्रहों का समूह (constellation) है, जो भारतीय भू-भाग और उसके आसपास लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र को कवर करता है। इसलिए यह एक क्षेत्रीय प्रणाली है, वैश्विक नहीं।
- इसके तीन उपग्रह भू-स्थिर कक्षा (GEO) में और चार उपग्रह भू-समकालिक कक्षा (GSO) में झुकी हुई कक्षा में स्थित हैं। इससे भारत के ऊपर उपग्रहों की दृश्यता बनी रहती है।
- पूर्ण रूप से कार्यरत प्रणाली में सार्वजनिक उपयोग के लिए मानक सेवा लगभग 10 मीटर तक की सटीकता देती है, जबकि सैन्य और विशेष उपयोगकर्ताओं के लिए अधिक सटीक प्रतिबंधित सेवा उपलब्ध है।
- यह प्रणाली L5 और S बैंड में संकेत प्रसारित करती है। भारतीय भू-भाग में इसके संकेत अधिक सुगम कोण से पहुँचते हैं, जिससे घाटियों और घने जंगलों जैसे क्षेत्रों में GPS की तुलना में बेहतर कवरेज मिलता है।
- वैश्विक प्रणालियों में अमेरिका का GPS, रूस का GLONASS, यूरोपीय संघ का Galileo, चीन का BeiDou और जापान का QZSS शामिल हैं। NavIC इनसे भिन्न है क्योंकि यह क्षेत्रीय और स्वदेशी है।
- स्थिति-निर्धारण (positioning) के लिए न्यूनतम चार सक्रिय उपग्रह आवश्यक हैं। तीन उपग्रह होने पर केवल समय-निर्धारण (timing) सेवा चल सकती है, जैसा कि वर्तमान स्थिति में है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संरचना (Constellation) | नाविक (NavIC) मूलतः भारतीय प्रादेशिक नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) है और इसका परिचालन नाम नाविक है। इसकी पूर्ण संरचना में सात उपग्रह होते हैं। |
| भौगोलिक कवरेज | भारतीय उपमहाद्वीप और उसके चारों ओर लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र को यह सेवा देता है। इसी कारण इसे प्रादेशिक प्रणाली कहा जाता है, जबकि अमेरिकी GPS वैश्विक प्रणाली है। |
| सेवा के स्तर | सार्वजनिक उपयोग के लिए लगभग 10 मीटर तक की सटीकता का लक्ष्य रखा गया था। अधिक सटीक प्रतिबंधित सेवा शुल्क देकर चुनिंदा उपयोगकर्ताओं, जैसे बड़ी निर्माण परियोजनाओं और सैन्य बलों, को उपलब्ध होती है। |
| उद्देश्य की पृष्ठभूमि | कारगिल युद्ध (1999) के बाद अमेरिकी GPS पर निर्भरता के जोखिम को देखते हुए इस पर कार्य आरंभ हुआ। इसी से रणनीतिक स्वायत्तता का तर्क जुड़ा है। |
| भारतीय भूभाग में बेहतर कवरेज | GPS के संकेत भारत में कम कोण से पहुँचते हैं, जिससे घाटियों और वनों जैसे क्षेत्रों में कठिनाई होती है। पूर्ण रूप से कार्यरत नाविक इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर कवरेज दे सकता है। |
| रेलवे और परिवहन में उपयोग | लगभग 12,000 रेलगाड़ियों की वास्तविक समय ट्रैकिंग का सरकारी लक्ष्य है। इनमें से लगभग 8,700 रेलगाड़ियाँ पहले से इस प्रणाली से सुसज्जित बताई गई हैं। |
महत्व
रणनीतिक और सुरक्षा महत्व
- विदेशी नौवहन प्रणाली पर निर्भर रहे बिना सैन्य और सामरिक स्थिति निर्धारण की क्षमता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करती है।
- संकट के समय किसी बाहरी प्रणाली की उपलब्धता या सीमाओं पर निर्भर न रहना सुरक्षा योजना की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कारगिल युद्ध का अनुभव इसी तर्क का आधार है।
आर्थिक और परिवहन महत्व
- रेलगाड़ियों की वास्तविक समय ट्रैकिंग से सुरक्षा, समय-पालन और परिचालन दक्षता बढ़ाने में सहायता मिलती है।
- परिवहन, लॉजिस्टिक्स और निर्माण क्षेत्र में सटीक स्थिति डेटा उत्पादकता बढ़ाने का आधार बनता है, जो आर्थिक संवृद्धि से जुड़ा है।
वैज्ञानिक और तकनीकी महत्व
- उपग्रह नौवहन प्रणाली का संचालन अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, परमाणु घड़ी जैसे परिशुद्ध उपकरण और उपग्रह नियंत्रण में क्षमता निर्माण करता है।
- भारतीय संस्थाओं द्वारा संपूर्ण प्रणाली का स्वदेशी विकास देश की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को आगे बढ़ाता है।
चुनौतियाँ
1. परमाणु घड़ी पर निर्भरता और आयातित घटक
- नाविक के कई उपग्रह मुख्यतः दोषपूर्ण आयातित परमाणु घड़ियों के कारण विफल हुए। समय-निर्धारण की परिशुद्धता पर पूरी प्रणाली आधारित है, इसलिए यह सबसे संवेदनशील कड़ी है।
- परिशुद्ध घटकों का स्वदेशी उत्पादन और उनकी गुणवत्ता-परीक्षण व्यवस्था मजबूत किए बिना प्रणाली की दीर्घकालिक विश्वसनीयता कठिन है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: अंतरिक्ष और स्वदेशी प्रौद्योगिकी
2. प्रक्षेपण विफलताएँ और उपग्रह बेड़े का क्षरण
- NVS-02 को सही कक्षा में प्रक्षेपित किया गया था, किंतु उसकी प्रणोदन प्रणाली अंतिम कक्षा तक पहुँचने के लिए आवश्यक युद्धाभ्यास नहीं कर सकी।
- ग्यारह उपग्रहों के प्रक्षेपण के बावजूद परिचालन उपग्रहों की संख्या न्यूनतम आवश्यकता से नीचे चली गई। संसद को बताया गया कि अब केवल तीन उपग्रह स्थिति-निर्धारण सेवा के लिए उपलब्ध हैं, जबकि मूल सेवा के लिए न्यूनतम चार चाहिए।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: अंतरिक्ष कार्यक्रम और ISRO की उपलब्धियाँ तथा सीमाएँ
3. वैश्विक प्रणालियों की तुलना में सीमित दायरा
- नाविक का कवरेज क्षेत्रीय है, इसलिए भारत के बाहर इसकी उपयोगिता सीमित है। वैश्विक GNSS प्रणालियों की तुलना में इसका व्यापक अंतरराष्ट्रीय उपयोग संभव नहीं है।
- सार्वजनिक सेवा की 10 मीटर सटीकता और शुल्क-आधारित सटीक सेवा का संतुलन बनाए रखना नीतिगत चुनौती है, क्योंकि निजी और सार्वजनिक उपयोगकर्ताओं की अपेक्षाएँ भिन्न होती हैं।
यूपीएससी लिंक: भूगोल एवं विज्ञान: उपग्रह नौवहन प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन
4. परियोजना में विलंब और बहु-कारकीय देरी
- NVS-03 का प्रक्षेपण पाइपलाइन में वर्ष 2025 के अंत से था, किंतु कई कारणों से इसमें विलंब हुआ। ऐसे विलंब सेवा बहाली की समय-सीमा को अनिश्चित बनाते हैं।
- बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं में समय पर क्रियान्वयन और लागत नियंत्रण संस्थागत समन्वय पर निर्भर करते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन एवं लोक नीति: सार्वजनिक परियोजनाओं का क्रियान्वयन और समय-प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| परमाणु घड़ी की विफलता | छह उपग्रहों की विफलता मुख्यतः दोषपूर्ण आयातित परमाणु घड़ियों से जुड़ी बताई गई है, जो प्रणाली की मूल विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाती है। |
| प्रक्षेपण और कक्षा संबंधी समस्याएँ | प्रणोदन विफलता और कक्षा-संबंधी कठिनाइयों से परिचालन उपग्रहों की संख्या चार की न्यूनतम सीमा से नीचे गई। |
| सेवा की उपलब्धता | वर्तमान में केवल तीन उपग्रह उपलब्ध होने से स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण सेवा संभव नहीं है, केवल समय-सेवा कार्यरत है। |
| सीमित भौगोलिक दायरा | प्रादेशिक कवरेज होने से वैश्विक स्तर पर उपयोगिता सीमित है और अंतरराष्ट्रीय विश्वास निर्माण कठिन है। |
| रेलवे ट्रैकिंग लक्ष्य में विलंब | लगभग 12,000 रेलगाड़ियों के लक्ष्य की तुलना में लगभग 8,700 रेलगाड़ियों के सुसज्जित होने से कार्य अभी अधूरा है। |
| परियोजना लागत और जवाबदेही | लगभग 2,250 करोड़ रुपये की प्रणाली में बार-बार उपग्रह हानि से सार्वजनिक निधि के उपयोग और जवाबदेही पर प्रश्न उठते हैं। |
आगे की राह
- परमाणु घड़ी और अन्य परिशुद्ध घटकों के स्वदेशी विकास तथा गुणवत्ता-परीक्षण की स्पष्ट रूपरेखा बनाई जाए।
- उपग्रह प्रक्षेपण से पहले प्रणोदन प्रणाली और कक्षा-प्रवेश से जुड़े जोखिमों का स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए।
- परिचालन उपग्रहों की न्यूनतम संख्या बनाए रखने के लिए प्रतिस्थापन उपग्रहों की समयबद्ध योजना और बैकअप व्यवस्था तैयार की जाए।
- रेलवे और परिवहन क्षेत्र में नाविक के एकीकरण का लक्ष्य समयबद्ध रूप से पूरा करने के लिए अंतर-विभागीय समन्वय मजबूत किया जाए।
- सार्वजनिक सेवा और प्रतिबंधित सेवा के बीच स्पष्ट उपयोग-नीति बनाई जाए, ताकि पारदर्शिता और उपयोगकर्ता-विश्वास बना रहे।
- क्षेत्रीय प्रणाली की सीमाओं को देखते हुए अन्य उपग्रह प्रणालियों के साथ अंतर-संचालनीयता (Interoperability) पर तकनीकी अध्ययन किया जाए।
- उपग्रह विफलताओं से प्राप्त अनुभवों को सार्वजनिक दस्तावेज़ों के माध्यम से संस्थागत सीख के रूप में संकलित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नाविक (NavIC): भारतीय क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System – IRNSS) · सैटेलाइट आधारित स्थिति निर्धारण (Satellite-based Positioning) · वैश्विक नौवहन उपग्रह प्रणाली (Global Navigation Satellite System – GNSS) · परमाणु घड़ी (Atomic Clock) और उपग्रह विफलता · रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) · दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी (Dual-use Technology) · अंतरिक्ष नीति 2023 (Indian Space Policy 2023) · भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) · आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी उपग्रह प्रौद्योगिकी · रेलवे में वास्तविक समय ट्रैकिंग और सुरक्षा प्रणाली · न्यूनतम परिचालन उपग्रह आवश्यकता (Minimum Operational Satellites) · दुर्गम भू-भाग में स्थिति निर्धारण की सीमाएँ
अवधारणा प्रवाह
भारत ने कारगिल युद्ध (1999) के अनुभव से विदेशी GPS पर निर्भरता के जोखिम को पहचाना। → इसके परिणामस्वरूप IRNSS के रूप में सात उपग्रहों की प्रादेशिक नौवहन प्रणाली नाविक विकसित की गई। → 2013 से प्रक्षेपित ग्यारह उपग्रहों में से छह की विफलता मुख्यतः दोषपूर्ण आयातित परमाणु घड़ियों और कक्षा-समस्याओं से हुई। → परिचालन उपग्रह घटकर तीन रह गए, जो स्थिति-निर्धारण के लिए आवश्यक न्यूनतम चार से कम हैं, इसलिए केवल समय-सेवा कार्यरत है। → NVS-03 के प्रक्षेपण से परिचालन उपग्रहों की संख्या न्यूनतम सीमा तक पहुँचाने की योजना है। → प्रणाली की बहाली से स्थिति-निर्धारण सेवा, रेलवे ट्रैकिंग और रणनीतिक उपयोग पुनः संभव होंगे।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नाविक (NavIC) एक क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जो भारतीय उपमहाद्वीप और उसके चारों ओर लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र को कवर करती है।
2. नाविक की सात उपग्रह संरचना में तीन उपग्रह भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Orbit) में और चार उपग्रह झुकी हुई भू-तुल्यकाली कक्षा (Inclined Geosynchronous Orbit) में स्थापित हैं।
3. नाविक की मानक स्थिति निर्धारण सेवा (Standard Positioning Service) केवल सैन्य उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: नाविक का सेवा क्षेत्र भारत और उसके आसपास लगभग 1,500 किमी तक है। कथन 2 सही है: तीन उपग्रह भू-स्थिर और चार झुकी हुई भू-तुल्यकाली कक्षा में हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि मानक सेवा सार्वजनिक उपयोग के लिए है (लगभग 10 मीटर तक की सटीकता के साथ), जबकि सीमित और अधिक सटीक सेवा चुनिंदा उपयोगकर्ताओं, जैसे सेना, के लिए है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): पर्वतीय घाटियों और घने वनों जैसे कुछ भारतीय भू-भागों में नाविक, वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणाली (GPS) की तुलना में बेहतर कवरेज दे सकती है।
कारण (R): नाविक के उपग्रह भारतीय क्षेत्र के ऊपर ऐसी कक्षाओं में स्थापित हैं, जिससे इस क्षेत्र में संकेत अपेक्षाकृत ऊँचे कोण से प्राप्त होते हैं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — नाविक के उपग्रहों की स्थिति भारतीय क्षेत्र के अपेक्षाकृत ऊपर होने से संकेत ऊँचे कोण पर मिलते हैं, जिससे घाटियों और वनों में बेहतर पहुँच संभव होती है। यही कारण अभिकथन को स्पष्ट करता है। जबकि GPS के संकेत भारत में अपेक्षाकृत कम कोण पर पहुँचते हैं, इसलिए कुछ क्षेत्रों में उनकी पहुँच कठिन होती है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलित सूचियों पर विचार कीजिए:
सूची-I (उपग्रह नौवहन प्रणाली)
A. GLONASS
B. Galileo
C. BeiDou
D. QZSS
सूची-II (स्वामी देश/क्षेत्र)
1. यूरोपीय संघ
2. चीन
3. रूस
4. जापान
सही सुमेलन चुनिए:
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-3, B-1, C-2, D-4
- A-2, B-3, C-1, D-4
- A-3, B-4, C-1, D-2
उत्तर: A-3, B-1, C-2, D-4 — GLONASS रूस की वैश्विक प्रणाली है (A-3), और Galileo यूरोपीय संघ की वैश्विक प्रणाली है (B-1)। BeiDou चीन की प्रणाली है (C-2), जबकि QZSS जापान की क्षेत्रीय संवर्धन प्रणाली है (D-4)। इन सभी प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन नौवहन नीति के लिए उपयोगी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत की क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली नाविक को परमाणु घड़ियों की विफलता और प्रक्षेपण संबंधी असफलताओं के कारण सेवा में व्यवधान का सामना करना पड़ा है। इस पृष्ठभूमि में, स्वदेशी नौवहन क्षमता के रणनीतिक और विकासात्मक औचित्य का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि ऐसी प्रणालियों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए किन नीतिगत उपायों की आवश्यकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. भूमिका: नाविक (NavIC), जो भारतीय क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली (IRNSS) का परिचालन नाम है, सात उपग्रहों की संरचना है और भारत तथा उसके आसपास लगभग 1,500 किमी क्षेत्र को कवर करती है। नवीनतम समाचार के अनुसार NVS-03 का प्रक्षेपण नाविक को पुनः न्यूनतम चार परिचालन उपग्रहों की स्थिति तक ले जाने के लिए प्रस्तावित है।
2. उत्पत्ति और रणनीतिक औचित्य: वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के बाद अमेरिकी GPS पर निर्भरता की सीमा सामने आई, जब सैन्य बलों को संघर्ष क्षेत्रों में स्थिति सहायता देने में कठिनाई हुई। इससे सैन्य, सीमा प्रबंधन और आपदा प्रबंधन में स्वतंत्र क्षमता का तर्क बना।
3. सेवा संरचना: सार्वजनिक मानक सेवा (लगभग 10 मीटर सटीकता) और चुनिंदा उपयोगकर्ताओं के लिए सीमित और अधिक सटीक सेवा। इसके दोहरे उपयोग (civil-military) पहलू पर चर्चा।
4. विफलता का विश्लेषण: ISRO द्वारा जुलाई 2013 से अब तक 11 नौवहन उपग्रह प्रक्षेपित किए गए, जिनमें से छह मुख्यतः आयातित परमाणु घड़ियों के दोष और कुछ मामलों में कक्षीय समस्याओं के कारण विफल हुए। लगभग 2,250 करोड़ रुपये की परियोजना में आयात-निर्भरता की समालोचना, और स्वदेशी परमाणु घड़ी विकसित करने की आवश्यकता।
5. संसदीय सूचना: केंद्र सरकार द्वारा संसद में स्वीकार किया गया कि मूल स्थिति निर्धारण सेवा के लिए न्यूनतम चार परिचालन उपग्रह आवश्यक हैं और वर्तमान में केवल तीन उपग्रह (IRNSS-1B, IRNSS-1I, NVS-01) कार्यरत हैं, जिससे समय (timing) सेवा चालू है परंतु स्वतंत्र स्थिति निर्धारण सेवा नहीं।
6. तुलनात्मक दृष्टि: GPS (अमेरिका), GLONASS (रूस), Galileo (यूरोपीय संघ), BeiDou (चीन) से तुलना; वैश्विक कवरेज बनाम क्षेत्रीय सटीकता और स्वतंत्रता का संतुलन। मल्टी-कॉन्स्टेलेशन रिसीवरों के प्रचलन का संदर्भ।
7. उपयोग के क्षेत्र: रेलवे में लगभग 12,000 ट्रेनों की वास्तविक समय ट्रैकिंग का सरकारी लक्ष्य, जिसमें लगभग 8,700 ट्रेनें पहले से सुसज्जित; परिवहन, कृषि, आपदा प्रबंधन और मोबाइल आधारित स्थान सेवाएँ।
8. नीतिगत ढाँचा: भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023, IN-SPACe की भूमिका, अंतरिक्ष विभाग और ISRO की संस्थागत भूमिका; निजी क्षेत्र और उद्योग की सहभागिता; आपूर्ति शृंखला में आयात-निर्भरता घटाने की आवश्यकता।
9. समालोचनात्मक संतुलन: स्वदेशी प्रणाली के पक्ष में रणनीतिक स्वायत्तता बनाम लागत, विकास-समय और परीक्षण की चुनौतियाँ; बहु-प्रणाली (multi-constellation) समर्थन से जोखिम घटाने का विकल्प।
10. निष्कर्ष: विश्वसनीयता के लिए उपग्रह-निर्माण गुणवत्ता, स्वदेशी घटक विकास, प्रक्षेपण सफलता दर, पुनर्स्थापना योजना और सार्वजनिक-निजी सहभागिता का समन्वित दृष्टिकोण।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
- ISRO का NVS-03 उपग्रह: NavIC को पुनः सक्रिय करेगा, जानिए कैसे? - October 24, 2026
- UPSC Alert: India Launches National Action Plan for Inland Small Fisheries - October 24, 2026
- विशेष अभियान 6: कपड़ा आयुक्त कार्यालय ने सफाई और दक्षता में बढ़ाया योगदान - October 24, 2026

No Comments