भारतीय नौसेना में शामिल होगा स्वदेशी युद्धपोत ‘समर्थक’: जानिए इसकी खासियतें

भारतीय नौसेना में शामिल होगा स्वदेशी युद्धपोत 'समर्थक': जानिए इसकी खासियतें

भारतीय नौसेना में शामिल होगा स्वदेशी युद्धपोत ‘समर्थक’: जानिए इसकी खासियतें

✎ स्वदेशी बहुउद्देशीय युद्धपोत 'समर्थक' का नौसेना में सेवा-प्रवेश आत्मनिर्भर भारत (IDDM प्राथमिकता, सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची) और हिन्द महासागर में समुद्री सुरक्षा क्षमता को सुदृढ़ करता है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा एवं रक्षा: रक्षा विनिर्माण, स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था: रक्षा औद्योगिक आधार, विनिर्माण और रोज़गार  |  GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध: हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका और समुद्री सुरक्षा  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: स्वदेशी डिज़ाइन और प्रौद्योगिकी विकास
  • Prelims: बहुउद्देशीय पोत (Multi-Purpose Vessel), नौसेना में सेवा-प्रवेश (Commissioning) और INS उपसर्ग, आत्मनिर्भर भारत और रक्षा में IDDM श्रेणी, सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List), रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020, नौसेना डिज़ाइन निदेशालय (Directorate of Naval Design), INS विक्रांत — पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत, हिन्द महासागर क्षेत्र (IOR) और MAHASAGAR दृष्टिकोण, iDEX (रक्षा उत्कृष्टता हेतु नवाचार), ब्लू वाटर नौसेना
  • Essay: आत्मनिर्भरता की लहरें: स्वदेशी जहाज़ निर्माण से सामरिक स्वायत्तता तक, समुद्र पर पकड़, विश्व में पहचान: हिन्द महासागर में भारत की नौसैनिक भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: स्वदेशी बहुउद्देशीय युद्धपोत ‘समर्थक’ का नौसेना में सेवा-प्रवेश आत्मनिर्भर भारत (IDDM प्राथमिकता, सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची) और हिन्द महासागर में समुद्री सुरक्षा क्षमता को सुदृढ़ करता है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय नौसेना स्वदेशी रूप से निर्मित बहुउद्देशीय युद्धपोत ‘समर्थक’ को सेवा में शामिल करने जा रही है। रक्षा मंत्रालय की ओर से PIB पर जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह कदम नौसेना की परिचालन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी आगे ले जाता है। पोत की तकनीकी विशिष्टताओं और निर्माता का विवरण आधिकारिक विज्ञप्ति से मिलान कर लेना चाहिए। परीक्षा की दृष्टि से इस घटना का महत्त्व स्वदेशी जहाज़ निर्माण, नौसेना के आधुनिकीकरण और हिन्द महासागर में समुद्री सुरक्षा की व्यापक नीतिगत पृष्ठभूमि में है।

पृष्ठभूमि

  • भारत की लगभग 7,500 किमी लंबी तटरेखा, विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और हिन्द महासागर से गुज़रने वाले व्यापार-मार्ग नौसेना की भूमिका को सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते होता है।
  • भारतीय नौसेना लंबे समय से स्वदेशी डिज़ाइन और निर्माण पर बल दे रही है। नौसेना डिज़ाइन निदेशालय ने कई श्रेणियों के युद्धपोत डिज़ाइन किए हैं, जैसे प्रोजेक्ट 15B (विशाखापत्तनम श्रेणी) और प्रोजेक्ट 17A (नीलगिरि श्रेणी) के पोत।
  • सितंबर 2022 में INS विक्रांत के नौसेना में शामिल होने के साथ भारत देश में डिज़ाइन और निर्मित विमानवाहक पोत वाले चुनिंदा देशों में शामिल हुआ। यह स्वदेशी जहाज़ निर्माण की क्षमता का प्रमुख प्रमाण है।
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 में ‘खरीदें (भारतीय-IDDM)’ यानी भारत में स्वदेशी रूप से अभिकल्पित, विकसित और निर्मित उपकरणों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। रक्षा मंत्रालय ने समय-समय पर सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ जारी की हैं, जिनमें शामिल मदों का आयात प्रतिबंधित है।
  • सरकारी एवं निजी शिपयार्ड, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) की आपूर्ति शृंखला और iDEX जैसे नवाचार मंचों ने रक्षा विनिर्माण का दायरा बढ़ाया है। इससे रोज़गार, प्रौद्योगिकी विकास और निर्यात की संभावनाएँ भी बनती हैं।
  • भारत की समुद्री नीति में ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) की अवधारणा रही है, जिसे आगे बढ़ाकर ‘महासागर’ दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें क्षमता-निर्माण, मानवीय सहायता और आपदा राहत में नौसेना की भूमिका शामिल है।

बहुउद्देशीय युद्धपोत और नौसेना में सेवा-प्रवेश क्या है?

  • बहुउद्देशीय युद्धपोत वह पोत है जो एक से अधिक भूमिकाएँ निभाने के लिए बनाया जाता है, जैसे निगरानी, गश्त, समुद्री सुरक्षा अभियान, सहायता एवं रसद आपूर्ति तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR)। इसकी सटीक भूमिकाएँ और विशिष्टताएँ आधिकारिक विज्ञप्ति से देखनी चाहिए।
  • नौसेना में सेवा-प्रवेश (कमीशनिंग) वह औपचारिक समारोह है जिसमें निर्मित पोत को नौसेना को सौंपा जाता है और उस पर राष्ट्रीय ध्वज के साथ नौसेना ध्वज (नेवल एनसाइन) फहराया जाता है। इसके बाद वह पोत देश का युद्धपोत माना जाता है।
  • भारतीय नौसेना के पोतों के नाम के पहले ‘INS’ (Indian Naval Ship) उपसर्ग लगता है। कमीशनिंग से पहले पोत की जलावतरण (लॉन्चिंग) तथा समुद्री परीक्षण (सी ट्रायल) जैसी प्रक्रियाएँ पूरी होती हैं।
  • स्वदेशी पोत का अर्थ है कि उसका डिज़ाइन, निर्माण और बड़ी संख्या में उपकरण भारत में बने हों। इससे विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता घटती है, रखरखाव सरल होता है और युद्ध या संकट के समय आपूर्ति-बाधा का जोखिम कम होता है।
  • युद्धपोत निर्माण से इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और सॉफ़्टवेयर जैसे अनेक उद्योगों को बढ़ावा मिलता है। इसका गुणक प्रभाव (मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट) रोज़गार और औद्योगिक कौशल पर पड़ता है।
  • संवैधानिक एवं संस्थागत ढाँचे में सशस्त्र बलों का सर्वोच्च समादेश राष्ट्रपति में निहित है (अनुच्छेद 53), जबकि रक्षा नीति और अधिग्रहण का दायित्व रक्षा मंत्रालय और रक्षा अधिग्रहण परिषद के पास है। रक्षा संघ सूची का विषय है।
  • इस दिशा की चुनौतियाँ हैं: कुछ महत्त्वपूर्ण प्रणालियों (जैसे इंजन और उन्नत सेंसर) के लिए आयात पर निर्भरता, निर्माण में विलंब और लागत वृद्धि, तथा शिपयार्डों की क्षमता और कुशल जनशक्ति की सीमाएँ।
  • आगे की राह: डिज़ाइन से उपकरण तक स्वदेशी आपूर्ति शृंखला मज़बूत करना, निजी क्षेत्र एवं MSME की भागीदारी बढ़ाना, अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना और निर्धारित समय-सीमा में परियोजनाएँ पूरी करना।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
स्वदेशी रूप से निर्मित बहुउद्देशीय युद्धपोत ‘समर्थक’ पोत का नौसेना में कमीशन होना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और कदम है। इससे आयातित प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भरता घटती है।
बहुउद्देशीय (Multi-purpose) स्वरूप एक ही पोत कई भूमिकाएँ निभा सकता है, जैसे समुद्री निगरानी, सहायता और अभियान समर्थन तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत। इससे बेड़े की परिचालन लचीलापन बढ़ता है। (भूमिकाओं का ब्योरा पोत के आधिकारिक विनिर्देशों से मिलाकर पढ़ें।)
कमीशन किया जाना (Commissioning) कमीशन के बाद पोत औपचारिक रूप से नौसेना के बेड़े का भाग बनता है और उस पर नौसैनिक ध्वज फहराया जाता है। इसके बाद वह परिचालन तैनाती के लिए उपलब्ध होता है।
रक्षा मंत्रालय के अधीन भारतीय नौसेना की पहल यह पोत नौसेना की क्षमता-विकास योजना का भाग है। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति और समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।
घरेलू उद्योग की सहभागिता स्वदेशी पोत-निर्माण से शिपयार्ड, सहायक उद्योग (MSME) और रोज़गार को बल मिलता है। साथ ही स्वदेशी डिज़ाइन और निर्माण की क्षमता विकसित होती है।

महत्व

सामरिक एवं सुरक्षा

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते शक्ति-संतुलन के बीच नौसेना की उपस्थिति और निगरानी क्षमता बढ़ती है।
  • बहुउद्देशीय पोत एक साथ कई प्रकार के अभियान निभा सकते हैं, इसलिए सीमित संसाधनों से अधिक परिचालन-कवरेज मिलता है।
  • समुद्री व्यापार-मार्गों और ऊर्जा-आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है। भारत का अधिकांश व्यापार समुद्र के रास्ते होता है।

आर्थिक

  • स्वदेशी निर्माण से रक्षा आयात पर होने वाला विदेशी मुद्रा व्यय घटता है।
  • पोत-निर्माण एक उच्च-गुणक उद्योग है। इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग की सहायक इकाइयों में रोज़गार तथा मूल्य-संवर्धन होता है।
  • रक्षा विनिर्माण में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से औद्योगिक आधार मज़बूत होता है।

प्रौद्योगिकीय

  • स्वदेशी डिज़ाइन और एकीकरण की क्षमता के विकास से भावी जटिल प्लेटफ़ॉर्म के निर्माण की नींव पड़ती है।
  • स्वदेशी प्रणालियों के उपयोग से रखरखाव, उन्नयन और कल-पुर्ज़ों की आपूर्ति पर देश का नियंत्रण बना रहता है।

कूटनीतिक एवं क्षेत्रीय

  • हिंद महासागर क्षेत्र में ‘प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता’ और ‘पसंदीदा सुरक्षा साझेदार’ की भारत की छवि सुदृढ़ होती है।
  • मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) की क्षमता से पड़ोसी तटीय देशों में विश्वास बढ़ता है और सामुद्रिक सहयोग को बल मिलता है।

चुनौतियाँ

1. आयातित घटकों पर निर्भरता

  • स्वदेशी निर्माण के बावजूद इंजन, गियरबॉक्स, कुछ सेंसर और हथियार प्रणालियाँ प्रायः विदेशी स्रोतों से आती हैं।
  • आपूर्ति-शृंखला में व्यवधान से निर्माण और रखरखाव दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

2. परियोजनाओं में विलंब और लागत-वृद्धि

  • पोत-निर्माण परियोजनाओं में डिज़ाइन-परिवर्तन, शिपयार्ड की क्षमता-सीमा और अनुमोदन-प्रक्रिया के कारण देरी होती है।
  • समय-सीमा के उल्लंघन से नौसेना की क्षमता-अंतराल बना रहता है।

3. शिपयार्ड और सहायक उद्योग की क्षमता

  • भारतीय शिपयार्ड में आधुनिक सुविधाओं, कुशल श्रमशक्ति और निर्माण-उत्पादकता की कमी रहती है।
  • MSME आपूर्तिकर्ताओं को गुणवत्ता-मानकों और कार्यशील पूँजी की समस्या आती है।

4. सीमित रक्षा बजट और पूँजीगत व्यय की प्राथमिकता

  • थल, जल और वायु तीनों सेनाओं की आधुनिकीकरण आवश्यकताओं के बीच संसाधनों का संतुलन कठिन है।
  • वेतन और पेंशन का बोझ पूँजीगत अधिग्रहण के लिए उपलब्ध राशि को सीमित करता है।

5. बदलते समुद्री खतरे

  • हिंद महासागर में विदेशी नौसेनाओं की बढ़ती उपस्थिति, समुद्री डकैती और गैर-पारंपरिक खतरे चुनौती हैं।
  • मानवरहित प्रणालियों और साइबर युद्ध के कारण केवल पारंपरिक पोत पर्याप्त नहीं रह जाते।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
स्वदेशी सामग्री का स्तर पोत ‘स्वदेशी’ कहलाने पर भी महत्त्वपूर्ण उप-प्रणालियाँ आयातित हो सकती हैं।
समय-सीमा अनुबंध से कमीशन तक की लंबी अवधि क्षमता-अंतराल पैदा करती है।
कुशल मानव संसाधन पोत-निर्माण, डिज़ाइन और सिस्टम इंटीग्रेशन के प्रशिक्षित इंजीनियरों की कमी।
रखरखाव एवं जीवन-चक्र लागत स्थापना के बाद उन्नयन और मरम्मत की लागत अधिग्रहण-लागत से भी अधिक हो सकती है।
बहु-भूमिका बनाम विशेषज्ञता एक पोत से कई कार्य कराने पर किसी एक भूमिका में विशिष्ट क्षमता कम रह सकती है।
तकनीकी अप्रचलन तीव्र तकनीकी परिवर्तन के कारण दीर्घ-निर्माण वाले प्लेटफ़ॉर्म जल्दी पुराने पड़ सकते हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ (Positive Indigenisation Lists) – रक्षा मंत्रालय द्वारा अधिसूचित, जिनमें सूचीबद्ध मदों का आयात प्रतिबंधित है और उनकी घरेलू खरीद अनिवार्य है
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 (Defence Acquisition Procedure 2020) – ‘खरीदें (भारतीय-IDDM)’ श्रेणी को प्राथमिकता, जिसमें स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित उपकरण शामिल हैं
  • सागर (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) दृष्टिकोण, 2015, और उसका विस्तार महासागर (MAHASAGAR) – हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामुद्रिक सुरक्षा और सहयोग नीति

आगे की राह

  • मुख्य उप-प्रणालियों (इंजन, सेंसर, युद्ध-प्रबंधन प्रणाली) के स्वदेशी विकास के लिए DRDO, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी उद्योग के बीच समन्वित अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा दिया जाए।
  • परियोजनाओं के लिए समयबद्ध निगरानी तंत्र और अनुबंध में विलंब-दंड तथा प्रदर्शन-आधारित भुगतान की स्पष्ट व्यवस्था की जाए।
  • शिपयार्ड के आधुनिकीकरण, मॉड्यूलर निर्माण और डिजिटल डिज़ाइन तकनीकों में निवेश करके निर्माण-अवधि घटाई जाए।
  • MSME और स्टार्ट-अप को रक्षा आपूर्ति-शृंखला से जोड़ने के लिए iDEX जैसे मंचों का उपयोग तथा गुणवत्ता-प्रमाणन में सहायता दी जाए।
  • जीवन-चक्र लागत का आकलन करके रखरखाव, मरम्मत और उन्नयन की स्वदेशी क्षमता विकसित की जाए।
  • मानवरहित प्रणालियों और साइबर सुरक्षा को पारंपरिक पोतों के साथ एकीकृत करके बेड़े को भविष्य के लिए तैयार किया जाए।
  • मित्र देशों के साथ संयुक्त अभ्यास, HADR सहयोग और रक्षा-निर्यात के अवसरों के माध्यम से सामुद्रिक कूटनीति को सुदृढ़ किया जाए।
  • पूँजीगत रक्षा व्यय की अनुमानित बहु-वर्षीय योजना बनाई जाए, ताकि उद्योग को दीर्घकालिक माँग का भरोसा मिले।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

आत्मनिर्भर भारत और रक्षा स्वदेशीकरण · सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) · ब्लू-वॉटर नौसेना और हिन्द महासागर क्षेत्र (IOR) · रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 और Buy (Indian-IDDM) श्रेणी · सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची · क्रेता से निर्माता नौसेना (Buyer’s to Builder’s Navy) · पोत-निर्माण पारितंत्र और रक्षा औद्योगिक गलियारे · रक्षा निर्यात और मेक इन इंडिया · बहुउद्देशीय पोत और नौसैनिक बल-गुणक · महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी पर आयात-निर्भरता (इंजन, सेंसर, हथियार प्रणाली) · समुद्री सुरक्षा और ‘महासागर’ (MAHASAGAR) दृष्टिकोण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 53(2) – संघ की रक्षा सेनाओं की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति में निहित
  • अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 1 – भारत की रक्षा पर संसद का विधायी अधिकार
  • अनुच्छेद 73 – संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, रक्षा नीति पर लागू

अवधारणा प्रवाह

हिंद महासागर में सामरिक चुनौतियाँ और समुद्री व्यापार-मार्गों की सुरक्षा की आवश्यकता  →  नौसेना की क्षमता-विकास योजना में बहुउद्देशीय पोत की आवश्यकता की पहचान  →  रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया और स्वदेशीकरण नीति के अंतर्गत घरेलू शिपयार्ड में डिज़ाइन और निर्माण  →  समुद्री परीक्षण और स्वीकृति के बाद पोत का कमीशन  →  बेड़े में शामिल होकर निगरानी, सहायता और HADR जैसे अभियानों में तैनाती  →  आयात-निर्भरता में कमी, घरेलू उद्योग को बल और आत्मनिर्भरता की प्रगति  →  क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदारी और भारत की सामुद्रिक कूटनीति का सुदृढ़ीकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत में रक्षा अधिग्रहण और स्वदेशीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure) 2020 ने रक्षा उपापन प्रक्रिया (DPP) 2016 का स्थान लिया।
2. ‘Buy (Indian-IDDM)’ श्रेणी में स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) उपकरणों को अधिग्रहण में सर्वोच्च वरीयता दी जाती है।
3. DAP 2020 में ‘Buy (Global)’ श्रेणी को अधिग्रहण की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली श्रेणी माना गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: DAP 2020 ने DPP 2016 को प्रतिस्थापित किया। कथन 2 सही है: Buy (Indian-IDDM) सर्वाधिक वरीयता वाली श्रेणी है। कथन 3 गलत है: Buy (Global) सबसे कम प्राथमिकता की श्रेणी है और केवल विशेष परिस्थितियों में अपनाई जाती है।

Q2. अभिकथन (A): नौसेना के लिए स्वदेशी युद्धपोतों का निर्माण भारत की सामरिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है।
कारण (R): स्वदेशी निर्माण से विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटती है, रखरखाव और उन्नयन पर राष्ट्रीय नियंत्रण रहता है तथा घरेलू पोत-निर्माण एवं सहायक उद्योगों का आधार विकसित होता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किन्तु R गलत है
  4. A गलत है, किन्तु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — स्वदेशी निर्माण से आपूर्ति-शृंखला के व्यवधान, प्रतिबंधों और कलपुर्जों की कमी का जोखिम घटता है। यही सामरिक स्वायत्तता का मूल है, इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है।

Q3. भारतीय नौसेना के पोतों को उनके निर्माता पोत-यार्ड से सुमेलित कीजिए:
स्तम्भ-I (पोत): A. INS विक्रांत B. INS विशाखापत्तनम C. INS निस्तार D. INS अर्नाला
स्तम्भ-II (निर्माता): 1. कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड 2. मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड 3. हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड 4. गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-3, D-4
  3. A-1, B-2, C-4, D-3
  4. A-3, B-2, C-1, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — INS विक्रांत (स्वदेशी विमानवाहक पोत) कोचीन शिपयार्ड में बना; INS विशाखापत्तनम (P15B विध्वंसक) मझगाँव डॉक में; INS निस्तार (गोताखोरी सहायता पोत) हिंदुस्तान शिपयार्ड में; INS अर्नाला (पनडुब्बी-रोधी उथले जल का पोत) GRSE द्वारा निर्मित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ‘क्रेता नौसेना से निर्माता नौसेना बनने की यात्रा भारत की सामरिक स्वायत्तता का आधार है।’ स्वदेशी बहुउद्देशीय युद्धपोतों के नौसेना में सम्मिलित किए जाने के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर आयात-निर्भरता इस लक्ष्य में कितनी बाधक है। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका: स्वदेशी युद्धपोत का नौसेना में कमीशन होना आत्मनिर्भर भारत और ‘क्रेता से निर्माता नौसेना’ की प्रवृत्ति का उदाहरण है। INS विक्रांत (कोचीन शिपयार्ड), P15B विध्वंसक और P17A फ्रिगेट इसके प्रमुख उदाहरण हैं। भाग-1 (कथन का समर्थन): (i) सामरिक आयाम: हिन्द महासागर क्षेत्र में चीनी नौसेना की बढ़ती उपस्थिति, समुद्री व्यापार-मार्गों की सुरक्षा और बहुउद्देशीय पोतों से बल-गुणक क्षमता। (ii) आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा: प्रतिबंध, कलपुर्जों की कमी और विदेशी निर्भरता का जोखिम घटना। (iii) नीतिगत ढाँचा: DAP 2020 की Buy (Indian-IDDM) श्रेणी, सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ, iDEX, SRIJAN पोर्टल, रक्षा औद्योगिक गलियारे (उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु) और FDI सीमा में वृद्धि। (iv) आर्थिक आयाम: रोज़गार, MSME सहायक उद्योग, रक्षा निर्यात में वृद्धि (2023-24 में लगभग ₹21,000 करोड़ से अधिक) और पोत-निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी। (v) कूटनीतिक आयाम: ‘महासागर’ और SAGAR दृष्टिकोण के अंतर्गत क्षमता-निर्माण और क्षेत्रीय ‘प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता’ की भूमिका। भाग-2 (समालोचना): (i) ‘स्वदेशी’ का अर्थ पूर्ण स्वदेशी नहीं है। गैस टरबाइन, डीज़ल इंजन, उन्नत रडार, सोनार, मिसाइल प्रणाली और पनडुब्बी प्रणोदन जैसे घटकों के लिए आयात आवश्यक है। (ii) परियोजनाओं में विलंब और लागत-वृद्धि, शिपयार्डों की सीमित क्षमता, सार्वजनिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता। (iii) डिज़ाइन और अनुसंधान-विकास पर कम व्यय, DRDO-उद्योग समन्वय की कमी। (iv) स्वदेशी सामग्री के मापन और सत्यापन की चुनौतियाँ। भाग-3 (आगे की राह): कावेरी-जैसे इंजन कार्यक्रमों और समुद्री गैस टरबाइन का स्वदेशी विकास, नौसेना डिज़ाइन निदेशालय को सुदृढ़ करना, निजी शिपयार्डों और स्टार्टअप को प्रोत्साहन, समयबद्ध अधिग्रहण, ‘समुद्री भारत विज़न 2030’ और जहाज़-निर्माण वित्तपोषण सुधार, रक्षा निर्यात का विस्तार। निष्कर्ष: मूल्यांकन संतुलित हो, अर्थात् उपलब्धि वास्तविक है, पर पूर्ण आत्मनिर्भरता के लिए महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों का स्वदेशीकरण अनिवार्य है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments

Post A Comment