नमामी गंगे: औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण से गंगा की रक्षा

नमामी गंगे: औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण से गंगा की रक्षा

नमामी गंगे: औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण से गंगा की रक्षा

नमामी गंगे: औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण से गंगा की रक्षा — औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण: नामामी गंगे के तहत नियमों द्वारा स्थिरता
आरेख: औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण: नामामी गंगे के तहत नियमों द्वारा स्थिरता

✎ नमामि गंगे (2014, NMCG, जल शक्ति मंत्रालय) में औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण का आधार है — GPI की पहचान, OCEMS से सतत निगरानी, ETP/CETP/ZLD से उपचार और जल अधिनियम, 1974 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत प्रदूषक भुगतान…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण: प्रदूषण, पर्यावरणीय क्षरण एवं संरक्षण  |  GS Paper III — पर्यावरण प्रभाव आकलन एवं सतत विकास  |  GS Paper II — सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप, संघ-राज्य सहयोग, सांविधिक/नियामक निकाय  |  GS Paper I — भूगोल: भारत की नदी प्रणालियाँ (गंगा बेसिन)
  • Prelims: नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme), राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), राष्ट्रीय गंगा परिषद, अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग (GPI), सतत ऑनलाइन बहिःस्राव निगरानी प्रणाली (OCEMS), शून्य तरल निस्सारण (ZLD), सामान्य बहिःस्राव उपचार संयंत्र (CETP), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)
  • Essay: नदियाँ केवल जलधारा नहीं, सभ्यता की जीवनरेखा हैं: विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन, विनियमन बनाम प्रोत्साहन: सतत औद्योगिक विकास का मार्ग

त्वरित पुनरावृत्ति: नमामि गंगे (2014, NMCG, जल शक्ति मंत्रालय) में औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण का आधार है — GPI की पहचान, OCEMS से सतत निगरानी, ETP/CETP/ZLD से उपचार और जल अधिनियम, 1974 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत प्रदूषक भुगतान सिद्धांत पर प्रवर्तन।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा बेसिन में औद्योगिक प्रदूषण को घटाने के लिए अपनाई जा रही नियामक रणनीति पर प्रेस सूचना कार्यालय (PIB) की विज्ञप्ति जारी हुई है। इसमें प्रदूषणकारी उद्योगों की निगरानी, मानकों का प्रवर्तन और बहिःस्राव के उपचार जैसे विनियमन-आधारित उपायों को गंगा के दीर्घकालिक संरक्षण का आधार बताया गया है। गंगा पर्यावरण, शासन और सतत विकास से जुड़े प्रश्नों का केंद्रीय विषय है, इसलिए यह मुद्दा परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • गंगा की मुख्य धारा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है। इसका बेसिन भारत के बड़े भूभाग और अत्यंत घनी आबादी को समेटे हुए है। इसी कारण नगरीय सीवेज और औद्योगिक बहिःस्राव का दबाव यहाँ अधिक है।
  • गंगा कार्य योजना (1985) और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (NGRBA, 2009) के बाद वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम को ‘फ्लैगशिप’ कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया। इसे केंद्रीय क्षेत्र की योजना के रूप में 100% केंद्रीय वित्तपोषण मिलता है।
  • कार्यक्रम का क्रियान्वयन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) करता है। वर्ष 2016 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के अंतर्गत NGRBA के स्थान पर राष्ट्रीय गंगा परिषद और संबंधित प्राधिकरणों का ढाँचा बनाया गया।
  • कार्यक्रम के प्रमुख स्तंभ हैं: सीवेज उपचार अवसंरचना, औद्योगिक बहिःस्राव की निगरानी, नदी-तट विकास, नदी सतह की सफाई, जैव-विविधता संरक्षण, वनीकरण और जन-भागीदारी (गंगा ग्राम आदि)।
  • न्यायपालिका की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (गंगा प्रदूषण मामला, 1985) में सर्वोच्च न्यायालय ने चमड़ा शोधन इकाइयों जैसे उद्योगों पर बहिःस्राव उपचार की बाध्यता लगाई। इस मामले ने प्रदूषक भुगतान सिद्धांत और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को पुष्ट किया। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) भी इस विषय पर आदेश देता रहा है।
  • आरंभिक वर्षों में कार्यक्रम का ज़ोर सीवेज अवसंरचना पर रहा। बाद में यह समझा गया कि केवल अवसंरचना से समाधान नहीं होगा और स्रोत पर ही औद्योगिक प्रदूषण का नियमन आवश्यक है।

औद्योगिक प्रदूषण न्यूनीकरण (नमामि गंगे के अंतर्गत) क्या है?

  • औद्योगिक प्रदूषण न्यूनीकरण का अर्थ है उद्योगों से निकलने वाले बहिःस्राव (Effluent) की मात्रा और विषाक्तता को स्रोत पर ही घटाना, ताकि अनुपचारित जल नदी में न पहुँचे। गंगा बेसिन में चमड़ा शोधन, शराब आसवनी, लुगदी एवं कागज, चीनी और वस्त्र जैसे उद्योग इस दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं।
  • अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग (GPI) वे इकाइयाँ हैं जिन्हें CPCB के मानदंडों पर गंभीर प्रदूषक के रूप में चिह्नित किया गया है। गंगा बेसिन में इनका निरीक्षण, निगरानी और अनुपालन का सत्यापन प्राथमिकता से किया जाता है।
  • निगरानी का प्रमुख उपकरण सतत ऑनलाइन बहिःस्राव निगरानी प्रणाली (OCEMS) है। इसमें उद्योग के निस्सारण बिंदु पर लगे सेंसर बहिःस्राव के मानक (जैसे BOD, COD, pH) का आँकड़ा लगातार CPCB या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) के सर्वर तक भेजते हैं। इससे मानव हस्तक्षेप कम होता है और पारदर्शिता बढ़ती है।
  • उपचार के स्तर पर प्रत्येक इकाई के लिए बहिःस्राव उपचार संयंत्र (ETP) अनिवार्य है। छोटी इकाइयों के समूहों (जैसे कानपुर के जाजमऊ के चमड़ा उद्योग) के लिए सामान्य बहिःस्राव उपचार संयंत्र (CETP) बनाए गए हैं। कुछ श्रेणियों के लिए शून्य तरल निस्सारण (ZLD) की अपेक्षा की गई है, जिसमें उपचारित जल का पुनः उपयोग होता है और नदी में कोई तरल नहीं छोड़ा जाता।
  • विधिक आधार: जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत CPCB और SPCB उद्योगों को स्थापना की सहमति (Consent to Establish) और संचालन की सहमति (Consent to Operate) देते हैं। उल्लंघन होने पर वे बंदी या विद्युत/जल आपूर्ति काटने जैसे निर्देश जारी कर सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 व्यापक निर्देश-शक्ति देता है, और जल उपकर अधिनियम, 1977 जल-उपभोग पर उपकर का प्रावधान करता है।
  • पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति प्रदूषक भुगतान सिद्धांत पर आधारित है, अर्थात क्षति की भरपाई प्रदूषक करे। यह सिद्धांत भारतीय न्यायशास्त्र में अनुच्छेद 21 से जुड़ा है। इसके साथ अनुच्छेद 48A (राज्य का पर्यावरण संरक्षण का नीति-निर्देश) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का मूल कर्तव्य) भी प्रासंगिक हैं।
  • ‘विनियमन के माध्यम से सततता’ का आशय है कि केवल दंड पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्पष्ट मानक, तकनीकी निगरानी, नियमित निरीक्षण, उपचारित जल का पुनः उपयोग और उद्योगों की जवाबदेही का समन्वित ढाँचा चाहिए। जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) संशोधन अधिनियम, 2024 ने कुछ उल्लंघनों को अपराध-मुक्त कर दंड को आर्थिक रूप दिया, जिससे ‘व्यापार सुगमता’ और पर्यावरणीय अनुपालन के संतुलन पर बहस उठती है।
  • चुनौतियाँ: SPCB की सीमित क्षमता और संसाधन, छोटी इकाइयों में अनुपालन की ऊँची लागत, CETP के संचालन में कमी, निगरानी-आँकड़ों का विश्वसनीय प्रवर्तन में रूपांतरण, तथा नगरीय सीवेज के साथ औद्योगिक बहिःस्राव का मिश्रण। समाधान के रूप में सख्त प्रवर्तन, तकनीकी उन्नयन, जल-पुनर्चक्रण को प्रोत्साहन और नागरिक निगरानी को मज़बूत करना आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme) का ढाँचा: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) कार्यान्वयन एजेंसी है और जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है गंगा संरक्षण के लिए एक केंद्रीय समन्वय संस्था बनी। उद्योग, नगर निकाय और राज्य एजेंसियाँ एक ही दिशा में काम कर सकती हैं।
अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों (GPI) की पहचान और निगरानी: चर्मशोधन, आसवनी, लुगदी-कागज़, चीनी, वस्त्र जैसी श्रेणियाँ शामिल नियामक संसाधन सबसे बड़े प्रदूषकों पर केंद्रित होते हैं। गंगा बेसिन में औद्योगिक बहिःस्राव का भार घटाना संभव होता है।
ऑनलाइन सतत बहिःस्राव निगरानी प्रणाली (OCEMS) और वास्तविक समय का डेटा उद्योग स्वयं रिपोर्ट करें, इस पर निर्भरता घटती है। उल्लंघन की तुरंत पहचान होती है और मानव हस्तक्षेप तथा भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम होती है।
शून्य तरल निर्वहन (Zero Liquid Discharge – ZLD) और साझा बहिःस्राव उपचार संयंत्र (CETP) उपचारित जल का पुन: उपयोग होता है और नदी में सीधा निर्वहन रुकता है। MSME इकाइयों के लिए साझा संयंत्र किफ़ायती समाधान है।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 के अंतर्गत निर्देश तथा जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के प्रावधान बंदी, विद्युत-जल आपूर्ति रोकने और जुर्माने जैसी कार्रवाई का वैधानिक आधार मिलता है। विनियमन विधिक रूप से टिकाऊ बनता है।
तृतीय-पक्ष निरीक्षण और केंद्र-राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का समन्वय निरीक्षण की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ती है। राज्य बोर्डों की क्षमता-कमी की पूर्ति होती है।

महत्व

पर्यावरणीय आयाम

  • गंगा में प्रदूषण भार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा औद्योगिक बहिःस्राव से आता है। इसमें क्रोमियम जैसी भारी धातुएँ, रंग और कार्बनिक प्रदूषक शामिल हैं। स्रोत पर नियंत्रण से जैव-रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD) घटती है और जलीय जैव-विविधता बचती है।
  • गंगा डॉल्फ़िन और घड़ियाल जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के आवास की गुणवत्ता सुधरती है।
  • नदी का पारिस्थितिक प्रवाह (ई-फ़्लो) तभी सार्थक होता है जब जल की गुणवत्ता भी सुधरे।

आर्थिक आयाम

  • ZLD और जल के पुन: उपयोग से उद्योगों की ताज़ा जल पर निर्भरता घटती है। जल-अभाव वाले क्षेत्रों में उत्पादन की निरंतरता बनी रहती है।
  • स्वच्छ नदी से कृषि, मत्स्य और तीर्थाटन पर आधारित आजीविका सुरक्षित होती है। यह ‘अर्थ गंगा’ की अवधारणा से जुड़ता है।
  • पर्यावरण-अनुपालन वाले उत्पादों की निर्यात बाज़ार में स्वीकार्यता बढ़ती है। चमड़ा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में यह विशेष रूप से प्रासंगिक है।

सामाजिक एवं जन-स्वास्थ्य आयाम

  • औद्योगिक विषैले पदार्थ पेयजल और खाद्य श्रृंखला में पहुँचते हैं। इनसे त्वचा रोग, जल-जनित रोग और कैंसर का जोखिम बढ़ता है। नियंत्रण से जन-स्वास्थ्य सुरक्षित होता है।
  • गंगा की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता के कारण इसकी स्वच्छता से सामाजिक विश्वास और जन-भागीदारी मज़बूत होती है।

शासन एवं विधिक आयाम

  • सहकारी संघवाद का उदाहरण: केंद्र (NMCG) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मिलकर काम करते हैं।
  • प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी (OCEMS) से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है।
  • ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान करे’ और सतर्कता के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप मिलता है।

सतत विकास एवं वैश्विक आयाम

  • सतत विकास लक्ष्य (SDG) 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता), SDG 12 और SDG 14 की दिशा में प्रगति होती है।
  • नदी-पुनर्जीवन का यह मॉडल अन्य नदियों के लिए अनुकरणीय हो सकता है।

चुनौतियाँ

1. कमज़ोर प्रवर्तन और संस्थागत क्षमता

  • राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में कर्मचारी, तकनीकी विशेषज्ञता और प्रयोगशालाओं की कमी है।
  • जुर्माने प्रायः निवारक प्रभाव के लिए बहुत कम होते हैं। अनुपालन की जाँच भी अनियमित रहती है।
  • स्थानीय राजनीतिक और आर्थिक दबाव कार्रवाई को कमज़ोर करते हैं।

2. MSME इकाइयों पर अनुपालन का बोझ

  • छोटे चर्मशोधन और वस्त्र उद्योगों के लिए ZLD की पूँजी और संचालन लागत अधिक है।
  • CETP का रखरखाव और संचालन ख़राब रहने से वे अक्सर निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरते।
  • कठोर बंदी से रोज़गार का नुकसान होता है।

3. निगरानी डेटा में हेरफेर और विश्वसनीयता

  • OCEMS सेंसरों के साथ छेड़छाड़ या उनके अंशांकन में त्रुटि की आशंका रहती है।
  • डेटा संग्रह के बावजूद उस पर समय पर कार्रवाई नहीं होती।
  • अनधिकृत और अपंजीकृत इकाइयाँ निगरानी के दायरे से बाहर रहती हैं।

4. विखंडित अधिकार-क्षेत्र और समन्वय

  • जल राज्य सूची का विषय है, जबकि अंतर्राज्यीय नदियों का विनियमन संघ के अधिकार में आता है। इससे उत्तरदायित्व बँट जाता है।
  • गंगा बेसिन के कई राज्यों के बीच नीति और प्रवर्तन में असमानता है।
  • नगरीय सीवेज और औद्योगिक बहिःस्राव के मिश्रण से उत्तरदायित्व तय करना कठिन हो जाता है।

5. विनियमन बनाम आर्थिक संवृद्धि का द्वंद्व

  • जल अधिनियम के गैर-अपराधीकरण से ‘व्यापार में सुगमता’ तो बढ़ती है, पर निवारक शक्ति के घटने की चिंता भी है।
  • कठोर मानक उद्योगों को कम सख़्त क्षेत्रों में स्थानांतरित होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

6. प्रदूषण का बहु-स्रोत स्वरूप

  • गंगा में प्रदूषण का बड़ा भाग अनुपचारित घरेलू सीवेज से आता है। केवल उद्योगों पर नियंत्रण पर्याप्त नहीं है।
  • कृषि अपवाह और जल-प्रवाह में कमी नदी की स्वयं-शुद्धि क्षमता घटाते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
प्रवर्तन बोर्डों में कर्मचारियों की कमी और जुर्मानों का कमज़ोर निवारक प्रभाव
तकनीकी अनुपालन OCEMS डेटा की सटीकता, छेड़छाड़ और कार्रवाई में विलंब
छोटे उद्योग ZLD और CETP की ऊँची लागत; रोज़गार पर असर
संघीय समन्वय जल पर राज्य और संघ की साझा भूमिका के कारण उत्तरदायित्व में अस्पष्टता
विधिक ढाँचा गैर-अपराधीकरण से निवारण-क्षमता घटने का जोखिम
बहु-स्रोत प्रदूषण सीवेज और कृषि अपवाह का योगदान, जिससे उद्योग-केंद्रित उपाय अधूरे रहते हैं

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme) – राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) द्वारा क्रियान्वित एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन
  • गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan), 1985 – गंगा सफ़ाई का पहला संगठित प्रयास, जिसके अनुभव से नमामि गंगे का स्वरूप बना
  • राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan) – गंगा के बाहर की नदियों में प्रदूषण-उपशमन के लिए
  • अर्थ गंगा (Arth Ganga) – गंगा-केंद्रित सतत आर्थिक विकास का मॉडल, जो नमामि गंगे का अंग है

आगे की राह

  • OCEMS डेटा का स्वचालित विश्लेषण और सीमा पार होने पर तत्काल दंड तथा बंदी की प्रणाली लागू की जाए। इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रिमोट सेंसिंग का उपयोग हो।
  • राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रयोगशाला सुविधाएँ और स्वतंत्र वित्त-पोषण सुनिश्चित किए जाएँ।
  • MSME के लिए CETP के रखरखाव हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी, रियायती ऋण और प्रौद्योगिकी-सहायता उपलब्ध हो।
  • ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान करे’ के सिद्धांत पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति प्रदूषण की मात्रा के अनुपात में तय की जाए, ताकि निवारक प्रभाव बना रहे।
  • उपचारित बहिःस्राव के पुन: उपयोग को प्रोत्साहन मिले; ZLD और जल-दक्षता के लिए कर-छूट या हरित प्रमाणन दिए जाएँ।
  • उद्योग और नगरीय सीवेज का एकीकृत बेसिन-स्तरीय प्रबंधन किया जाए, साथ ही पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ़्लो) बनाए रखा जाए।
  • अनुपालन-रिपोर्ट, निरीक्षण-परिणाम और OCEMS डेटा सार्वजनिक किए जाएँ तथा स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज की निगरानी में भागीदारी हो।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेशों के अनुपालन की नियमित समीक्षा हो और राज्यों के बीच प्रवर्तन के मानक एकसमान किए जाएँ।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) एवं नमामि गंगे कार्यक्रम · अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग (GPI) · ऑनलाइन सतत बहिःस्राव निगरानी प्रणाली (OCEMS) · शून्य तरल निस्सरण (Zero Liquid Discharge) · प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) · सामान्य बहिःस्राव उपचार संयंत्र (CETP) · पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 और 5 · अनुच्छेद 21, 48A तथा 51A(g) · सहकारी संघवाद एवं केंद्र-राज्य समन्वय · विनियमन बनाम प्रोत्साहन : सतत विकास की संतुलित रणनीति

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21 – स्वच्छ पर्यावरण और जीवन का अधिकार
  • अनुच्छेद 48A – राज्य का पर्यावरण संरक्षण-दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(g) – नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण-कर्तव्य
  • अनुच्छेद 262 – अंतर्राज्यीय नदी-जल विवाद का न्यायनिर्णयन
  • अनुच्छेद 253 – अंतर्राष्ट्रीय करारों हेतु संसद का विधायन
  • सातवीं अनुसूची: संघ सूची प्रविष्टि 56, राज्य सूची प्रविष्टि 17 – अंतर्राज्यीय नदियाँ और जल

अवधारणा प्रवाह

गंगा बेसिन में औद्योगिक इकाइयों से अनुपचारित या अपर्याप्त उपचारित बहिःस्राव का निर्वहन  →  नदी में जैविक और विषैले प्रदूषकों का बढ़ना, जल-गुणवत्ता और जैव-विविधता में गिरावट  →  जन-स्वास्थ्य, आजीविका और सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव; विधिक और न्यायिक हस्तक्षेप  →  नमामि गंगे के अंतर्गत NMCG द्वारा GPI की पहचान, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धारा 5 के निर्देश और OCEMS की स्थापना  →  ZLD, CETP और तृतीय-पक्ष निरीक्षण के माध्यम से अनुपालन तथा उल्लंघन पर दंड  →  स्रोत पर प्रदूषण-भार में कमी और जल का पुन: उपयोग  →  स्वच्छ नदी, सतत विकास और जन-स्वास्थ्य में सुधार

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. नमामि गंगे कार्यक्रम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत एक सोसायटी है।
2. राष्ट्रीय गंगा परिषद की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं।
3. नमामि गंगे एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें केंद्र और राज्य 60:40 के अनुपात में व्यय वहन करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NMCG सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत है और जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। कथन 2 सही है: 2016 के आदेश से बनी राष्ट्रीय गंगा परिषद के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं। कथन 3 गलत है: नमामि गंगे केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसका वित्तपोषण शत-प्रतिशत केंद्र सरकार करती है। अतः केवल दो कथन सही हैं।

Q2. अभिकथन (A): गंगा बेसिन के अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों के लिए ऑनलाइन सतत बहिःस्राव निगरानी प्रणाली (OCEMS) लगाना आवश्यक किया गया है।
कारण (R): इससे बहिःस्राव की गुणवत्ता के आँकड़े वास्तविक समय में नियामक संस्थाओं को मिलते हैं और समय-समय पर होने वाली मैन्युअल नमूना-जाँच पर निर्भरता घटती है।
नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — OCEMS अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों में लगाई जाती है। यह बहिःस्राव के मापदंडों की सतत निगरानी करती है और आँकड़े CPCB तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों तक पहुँचाती है। इसी कारण नियमन में पारदर्शिता आती है और अनुपालन की जाँच सुगम होती है। अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. स्तंभ-I (पर्यावरणीय सिद्धांत) को स्तंभ-II (संबंधित वाद) से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ-I
A. सावधानी का सिद्धांत (Precautionary Principle)
B. लोक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine)
C. प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (बिछड़ी प्रकरण)
D. निरपेक्ष दायित्व (Absolute Liability)
स्तंभ-II
1. एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ
2. वेल्लोर सिटिज़न्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ
3. एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (ओलियम गैस रिसाव)
4. इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-3, D-4
  3. A-2, B-1, C-4, D-3
  4. A-4, B-3, C-2, D-1

उत्तर: A-2, B-1, C-4, D-3 — वेल्लोर सिटिज़न्स वाद (1996) में सावधानी का सिद्धांत स्थापित हुआ। कमल नाथ वाद (1997) में लोक न्यास सिद्धांत लागू किया गया। बिछड़ी प्रकरण में इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन वाद (1996) ने प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को स्थापित किया। ओलियम गैस रिसाव वाद (1986-87) में निरपेक्ष दायित्व का सिद्धांत आया।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण में विनियामक उपायों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ को प्रभावी ढंग से लागू करने में कौन-सी बाधाएँ आती हैं तथा उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): गंगा भारत की राष्ट्रीय नदी (2008) है, जो लगभग 2,525 किमी लंबी है और पाँच मुख्य राज्यों (उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल) से गुज़रती है। गंगा एक्शन प्लान (1985) से नमामि गंगे (2014-15; आरंभिक परिव्यय ₹20,000 करोड़; केंद्रीय क्षेत्र की योजना) तक का क्रम बताइए। मात्रा में घरेलू सीवेज का हिस्सा अधिक है, पर औद्योगिक बहिःस्राव विषैला है (क्रोमियम तथा अन्य भारी धातुएँ), इसलिए उसका नियमन अलग से आवश्यक है।

मुख्य भाग (क) संस्थागत एवं विधिक ढाँचा: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (धारा 3 और 5); जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974; गंगा नदी (पुनरुद्धार, संरक्षण एवं प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016; राष्ट्रीय गंगा परिषद (अध्यक्ष: प्रधानमंत्री), NMCG, CPCB तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड। जल शक्ति मंत्रालय नोडल मंत्रालय है। NGT अधिनियम, 2010 के तहत हरित अधिकरण की भूमिका बताइए।
(ख) विनियामक उपाय: अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों (GPI) की पहचान एवं निरीक्षण; OCEMS द्वारा सतत निगरानी; चमड़ा शोधन (टैनरी), आसवनी और लुगदी-कागज़ उद्योगों में शून्य तरल निस्सरण; CETP (जैसे कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र में); बंद करने के निर्देश और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति।
(ग) न्यायिक आधार: एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (गंगा प्रदूषण, टैनरी वाद) में उद्योगों को उपचार संयंत्र लगाने का निर्देश; इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन (1996) से प्रदूषक भुगतान सिद्धांत; वेल्लोर सिटिज़न्स (1996) से सावधानी का सिद्धांत; अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार), अनुच्छेद 48A और 51A(g)।
(घ) आलोचनात्मक मूल्यांकन: उपलब्धियाँ — अनुपालन में वृद्धि, उद्योगों की ऑनलाइन निगरानी, अनेक उद्योगों का बंद होना या सुधार। कमियाँ — राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में कर्मचारियों और तकनीकी क्षमता की कमी; आँकड़ों की विश्वसनीयता और OCEMS से छेड़छाड़ की आशंका; CETP का कमज़ोर संचालन; लघु उद्योगों के लिए ZLD की लागत; पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की वसूली में देरी; केंद्र-राज्य समन्वय की कमी। जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) संशोधन अधिनियम, 2024 द्वारा कुछ अपराधों को कारावास की जगह आर्थिक दंड के दायरे में लाने के लाभ और अवरोधक प्रभाव घटने की आशंका, दोनों पक्ष रखिए।
(ङ) सुधार (निष्कर्ष सहित): स्वतंत्र तृतीय-पक्ष अंकेक्षण, SPCB का सुदृढ़ीकरण, सार्वजनिक प्रकटीकरण, छोटे उद्योगों को क्लस्टर आधारित साझा उपचार तथा वित्तीय सहायता, जल का पुनः उपयोग, और विनियमन को प्रोत्साहन के साथ जोड़ना। समापन: ऐसी संतुलित रणनीति सतत विकास तथा ‘अविरल-निर्मल गंगा’ के लक्ष्य के अनुरूप है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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