13 Oct केरल में ‘मायांगिल्ला केरलम’ अभियान: 10,000 से ज्यादा मामले, ड्रग विरोधी प्रयासों को बल

✎ 'मयंगिला केरलम्' के चार स्तंभ (प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति, पुनर्वास) NDPS अधिनियम, 1985 (धारा 64A व 71 में उपचार के प्रावधान) और अनुच्छेद 47 की भावना के अनुरूप हैं; 'मादक द्रव्य' राज्य सूची की प्रविष्टि 8 में है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय: स्वास्थ्य, नशामुक्ति और संवेदनशील वर्गों से जुड़े मुद्दे | GS Paper II — संघवाद और शासन: राज्य सूची व समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र–राज्य भूमिका | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा: मादक पदार्थों की तस्करी और संगठित अपराध | GS Paper IV — नीतिशास्त्र: दंड बनाम उपचार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति-निर्माण
- Prelims: मादक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act), 1985, अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व), वाणिज्यिक मात्रा (Commercial Quantity), NDPS अधिनियम की धारा 64A और धारा 71, सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA), 2003 — धारा 6(ख), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), नशा मुक्त भारत अभियान (2020), राष्ट्रीय मादक पदार्थ मांग न्यूनीकरण कार्य योजना (NAPDDR), सातवीं अनुसूची: राज्य सूची की प्रविष्टि 8 (मादक द्रव्य), अंतरराष्ट्रीय नशा-विरोधी दिवस (26 जून)
- Essay: नशा मुक्त समाज: केवल प्रवर्तन से नहीं, रोकथाम, उपचार और पुनर्वास के समन्वय से संभव, युवा और मादक पदार्थ: दंडात्मक कार्रवाई बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण
त्वरित पुनरावृत्ति: ‘मयंगिला केरलम्’ के चार स्तंभ (प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति, पुनर्वास) NDPS अधिनियम, 1985 (धारा 64A व 71 में उपचार के प्रावधान) और अनुच्छेद 47 की भावना के अनुरूप हैं; ‘मादक द्रव्य’ राज्य सूची की प्रविष्टि 8 में है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के आबकारी मंत्री ने 13 अक्टूबर 2026 को विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान बताया कि आबकारी विभाग ‘मयंगिला केरलम्’ (केरल नशे में नहीं डूबेगा) अभियान के अंतर्गत व्यापक नशा-विरोधी रणनीति पर काम कर रहा है। अभियान के चार स्तंभ हैं: प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति और पुनर्वास। प्रवर्तन के घटक ‘ऑपरेशन थंडर’ के अंतर्गत वर्तमान सरकार के कार्यभार संभालने के बाद से 10,000 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 4,000 से अधिक मामले NDPS अधिनियम के तहत और 5,000 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों के निकट तंबाकू उत्पादों की बिक्री से संबंधित हैं। शेष मामले आबकारी कानूनों के अंतर्गत दर्ज हैं। जागरूकता के लिए 27 परिसरों को नशा-मुक्त परिसर घोषित किया गया है। राज्य में 14 ज़िला-स्तरीय नशामुक्ति केंद्र चल रहे हैं, इन सभी में मनोचिकित्सकों की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है, और सुविधा का विस्तार सभी 78 तालुकों तक करने का प्रयास है। पुनर्वास केंद्र सामाजिक संगठनों के सहयोग से स्थापित करने की योजना है।
पृष्ठभूमि
- नशे की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और आंतरिक सुरक्षा, तीनों से जुड़ी है। इसलिए आधुनिक नीतियाँ आपूर्ति न्यूनीकरण, मांग न्यूनीकरण और हानि न्यूनीकरण (Harm Reduction) को एक साथ अपनाती हैं।
- संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य औषधीय प्रयोजन के अतिरिक्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और drugs के उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा। यह नीति निदेशक तत्त्व है, अतः न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है, परंतु नीति-निर्माण का मार्गदर्शक है।
- भारत में मादक पदार्थों पर प्रमुख कानून NDPS अधिनियम, 1985 है। इसमें 1988, 2001, 2014 और 2021 में संशोधन हुए। 2001 के संशोधन से मात्रा के आधार पर दंड (अल्प, मध्यम और वाणिज्यिक मात्रा) का स्तरीकरण किया गया।
- संघीय विभाजन: ‘मादक द्रव्य’ राज्य सूची की प्रविष्टि 8 में है, जबकि ‘औषधियाँ और विष’ समवर्ती सूची की प्रविष्टि 19 में हैं (अफ़ीम के संबंध में संघ सूची की प्रविष्टि 59 के अधीन)। इसलिए राज्य का आबकारी विभाग मद्य और मादक पदार्थों दोनों के नियमन में भूमिका निभाता है।
- केंद्र स्तर पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) शीर्ष समन्वय एजेंसी है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने नशा मुक्त भारत अभियान (2020) और राष्ट्रीय मादक पदार्थ मांग न्यूनीकरण कार्य योजना (NAPDDR) के माध्यम से मांग न्यूनीकरण का ढाँचा बनाया है। इसमें जागरूकता, उपचार और पुनर्वास पर बल है।
- केरल में मद्य-सेवन की न्यूनतम वैधानिक आयु 23 वर्ष है। मीडिया-रिपोर्टों के अनुसार हाल की एक दुर्घटना के बाद नाबालिग/कम आयु के ग्राहकों को शराब परोसने वाले बारों पर कार्रवाई कड़ी करने की बात उठी है। इससे आपूर्ति-पक्ष के नियमन की चुनौती भी सामने आती है।
‘मयंगिला केरलम्’ अभियान और NDPS अधिनियम क्या हैं?
- ‘मयंगिला केरलम्’ केरल आबकारी विभाग का नशा-विरोधी अभियान है। इसके चार स्तंभ हैं: प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति और पुनर्वास। यह आपूर्ति और मांग, दोनों पक्षों पर एक साथ काम करने का मॉडल है।
- ऑपरेशन थंडर अभियान का प्रवर्तन घटक है। इसमें NDPS अधिनियम, आबकारी कानूनों और शैक्षणिक संस्थानों के निकट तंबाकू बिक्री के विरुद्ध मामले दर्ज किए जाते हैं। तंबाकू बिक्री का नियमन COTPA, 2003 की धारा 6(ख) के अंतर्गत है, जो शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर तंबाकू उत्पादों की बिक्री को प्रतिबंधित करती है।
- जागरूकता स्तंभ के अंतर्गत नशा-मुक्त परिसर घोषित किए जा रहे हैं (समाचार के अनुसार अब तक 27)। साथ ही राज्य के विमुक्ति अभियान के अंतर्गत खेल और अन्य क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियों की भागीदारी वाले कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
- नशामुक्ति स्तंभ: राज्य में 14 ज़िला-स्तरीय नशामुक्ति केंद्र कार्यरत हैं। सभी केंद्रों में मनोचिकित्सकों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है और सुविधाओं का विस्तार 78 तालुकों तक करने का लक्ष्य है। इससे उपचार तक पहुँच बढ़ेगी, जो नशे की लत को स्वास्थ्य-समस्या मानने के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
- पुनर्वास स्तंभ: उपचार के बाद व्यक्ति को समाज, शिक्षा और रोज़गार से जोड़ना आवश्यक है, ताकि पुनः नशे की ओर लौटने (Relapse) की आशंका घटे। केरल सामाजिक संगठनों के सहयोग से पुनर्वास केंद्र स्थापित करने की योजना बना रहा है।
- NDPS अधिनियम, 1985 मादक औषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के उत्पादन, निर्माण, कब्ज़ा, बिक्री, परिवहन और उपभोग को नियंत्रित करता है। इसकी धारा 37 में जमानत की कड़ी शर्तें हैं। वाणिज्यिक मात्रा के मामलों में कठोर दंड का प्रावधान है, और धारा 31A में कुछ बार-बार अपराध करने वालों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है।
- अधिनियम में उपचार-आधारित प्रावधान भी हैं। धारा 64A के अनुसार जो नशे का आदी व्यक्ति स्वेच्छा से चिकित्सा उपचार कराता है, उसे अल्प मात्रा के कब्ज़े या उपभोग के अभियोजन से उन्मुक्ति मिल सकती है। धारा 71 सरकार को नशे की पहचान, उपचार, नशामुक्ति और पुनर्वास के केंद्र स्थापित करने का अधिकार देती है। केरल का नशामुक्ति और पुनर्वास पर बल इसी भावना के अनुरूप है।
- विश्लेषण: दर्ज मामलों की बड़ी संख्या प्रवर्तन की सक्रियता दर्शाती है, पर अधिकांश मामले उपभोक्ता या छोटे विक्रेताओं पर हो सकते हैं। इसलिए अभियान की सफलता का आकलन अभियोजन-दर, आपूर्ति-शृंखला पर चोट, उपचार पूरा करने वालों की संख्या और पुनः लत लगने की दर जैसे संकेतकों से होना चाहिए, केवल दर्ज मामलों से नहीं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| चार स्तंभों वाली रणनीति – प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति और पुनर्वास | अभियान केवल दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह आपूर्ति में कमी (Supply Reduction), माँग में कमी (Demand Reduction) और क्षति में कमी (Harm Reduction), तीनों को एक साथ साधने का प्रयास करता है। |
| ऑपरेशन थंडर (प्रवर्तन स्तंभ) | अभियान के प्रवर्तन स्तंभ के अंतर्गत 10,000 से अधिक मामले दर्ज हुए। इनमें 4,000 से अधिक मादक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act), 1985 के तहत, 5,000 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों के पास तंबाकू-बिक्री के और शेष आबकारी कानूनों के तहत हैं। |
| नशामुक्त परिसर (जागरूकता स्तंभ) | 27 परिसरों को नशामुक्त घोषित किया गया है। विमुक्ति अभियान के अंतर्गत खेल और अन्य क्षेत्रों की हस्तियों की भागीदारी से कार्यक्रम होते हैं। इससे युवाओं में निवारक संदेश पहुँचता है। |
| 14 ज़िला स्तरीय नशामुक्ति केंद्र (उपचार स्तंभ) | प्रत्येक ज़िले में उपचार की सुविधा उपलब्ध है। सभी 14 केंद्रों पर मनोचिकित्सक नियुक्त करने की प्रक्रिया चल रही है, जिससे उपचार चिकित्सकीय रूप से विश्वसनीय बनेगा। |
| 78 तालुकों तक विस्तार की योजना | नशामुक्ति सेवाओं को ज़िला मुख्यालय से तालुक स्तर तक ले जाने का लक्ष्य है। इससे उपचार पाने में दूरी और कलंक की बाधा घटेगी। |
| सामाजिक संगठनों की साझेदारी से पुनर्वास केंद्र | उपचार के बाद आजीविका, परामर्श और सामाजिक पुनःसमावेशन के लिए नागरिक समाज की क्षमता का उपयोग होगा। इससे पुनः नशे की ओर लौटने (Relapse) की आशंका कम होती है। |
महत्व
सामाजिक एवं जन-स्वास्थ्य
- मादक पदार्थों का सेवन मानसिक रोग, संक्रामक रोग (सुई साझा करने से HIV/हेपेटाइटिस) और सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनता है। उपचार-केंद्रित ढाँचा नशे को आपराधिक समस्या के साथ-साथ स्वास्थ्य की समस्या भी मानता है।
- स्कूल-कॉलेज परिसरों को नशामुक्त बनाने से किशोरों और युवाओं में नशे की शुरुआत की आयु को टालने में सहायता मिलती है।
- तालुक स्तर तक नशामुक्ति सेवाएँ पहुँचने से ग्रामीण और वंचित वर्गों की पहुँच बढ़ती है।
विधिक एवं प्रशासनिक
- NDPS अधिनियम, COTPA और आबकारी कानूनों का एक साथ प्रयोग विभिन्न पदार्थों (मादक औषधि, तंबाकू, शराब) के लिए बहु-स्तरीय नियंत्रण दर्शाता है।
- आबकारी विभाग की भूमिका केवल राजस्व वसूली और अवैध शराब की रोकथाम से बढ़कर नशा-निवारण और पुनर्वास तक विस्तृत हुई है।
- विधानसभा में प्रश्नकाल के माध्यम से कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
संघवाद एवं नीतिगत
- मादक औषधियाँ समवर्ती सूची के आपराधिक कानून के दायरे में आती हैं, जबकि नशीली शराब और जन-स्वास्थ्य राज्य सूची के विषय हैं। इसलिए केंद्रीय अधिनियम का क्रियान्वयन और राज्य की स्वास्थ्य-पहल मिलकर चलती हैं।
- राज्य द्वारा चलाया गया अभियान ‘प्रयोगशाला के रूप में राज्य’ का उदाहरण है, जिसकी सफल पद्धतियाँ अन्य राज्य अपना सकते हैं।
आर्थिक एवं मानव-पूँजी
- नशे से कार्य-उत्पादकता, घरेलू आय और स्वास्थ्य-व्यय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उपचार और पुनर्वास से व्यक्ति पुनः आर्थिक गतिविधि में लौट पाता है।
- युवा जनसंख्या के लाभ (Demographic Dividend) को सुरक्षित रखने के लिए नशा-निवारण आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. प्रवर्तन में मात्रा-आधारित असंतुलन
- खबर के अनुसार दर्ज मामलों में बड़ा हिस्सा तंबाकू-बिक्री का है। इससे प्रवर्तन का दबाव छोटे विक्रेताओं और उपभोक्ताओं पर अधिक और आपूर्ति-शृंखला के बड़े सरगनाओं पर कम रहने का जोखिम है।
- अधिक मामले दर्ज होना अपने आप में सफलता का सूचक नहीं है। परिणाम-आधारित मापदंड जैसे दोषसिद्धि दर और सेवन में कमी अधिक उपयुक्त हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3 आंतरिक सुरक्षा; GS-2 शासन एवं जवाबदेही
2. अंतरराज्यीय एवं अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क
- सिंथेटिक ड्रग, कूरियर और डार्क-वेब आधारित आपूर्ति के कारण केवल राज्य स्तर का प्रवर्तन अपर्याप्त है।
- समुद्री मार्ग और बंदरगाह-निर्भर तटीय राज्यों में केंद्रीय एजेंसियों, तटरक्षक बल और राज्य पुलिस के बीच समन्वय आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-3 संगठित अपराध और आतंकवाद का संबंध; मादक पदार्थ तस्करी
3. नशामुक्ति केंद्रों में विशेषज्ञ मानव-संसाधन की कमी
- 14 केंद्रों में मनोचिकित्सकों की नियुक्ति अभी प्रक्रियाधीन है, यानी चिकित्सकीय क्षमता अभी पूर्ण नहीं है।
- प्रशिक्षित परामर्शदाता, नर्स और मनोवैज्ञानिक की कमी से उपचार की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2 स्वास्थ्य; मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017
4. कलंक और उपचार में देरी
- नशे के आदी व्यक्ति को अपराधी मानने की सामाजिक प्रवृत्ति के कारण वे उपचार लेने से हिचकते हैं।
- NDPS अधिनियम की धारा 64A उपचार के लिए स्वेच्छा से आने वाले व्यक्ति को अभियोजन से उन्मुक्ति देती है, पर इसकी जानकारी सीमित है।
यूपीएससी लिंक: GS-2 सामाजिक न्याय; संवेदनशील वर्गों के लिए तंत्र
5. पुनर्वास की स्थायित्व संबंधी समस्या
- पुनर्वास केंद्र अभी विकास की अवस्था में हैं और सामाजिक संगठनों पर निर्भर हैं, जिनकी वित्तीय व गुणवत्ता-निगरानी की व्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए।
- आजीविका और कौशल से जुड़ाव के बिना पुनः नशे की ओर लौटने का जोखिम बना रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2 NGO और स्वयं-सहायता समूहों की भूमिका
6. आँकड़ों और मूल्यांकन की कमी
- सेवन की व्यापकता पर विश्वसनीय राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण और डेटा के बिना अभियान की प्रभावशीलता का आकलन कठिन है।
- ‘नशामुक्त परिसर’ की घोषणा के बाद सतत निगरानी न हो तो यह केवल औपचारिकता रह सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2 नीति-निर्माण में साक्ष्य का उपयोग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| प्रवर्तन | छोटे मामलों की भरमार, जबकि वित्तीय नेटवर्क और बड़े सरगनाओं पर कार्रवाई सीमित हो सकती है |
| उपचार ढाँचा | चिकित्सकों की नियुक्ति लंबित, तालुक स्तर पर सुविधाओं का विस्तार अभी योजनाधीन |
| पुनर्वास | सामाजिक संगठनों के सहयोग पर निर्भरता; मानक और निगरानी तंत्र अस्पष्ट |
| जागरूकता | 27 परिसरों तक सीमित घोषणा; प्रभाव के मापन के सूचक अनुपस्थित |
| विधिक व्यवस्था | NDPS अधिनियम में व्यसनी को अपराधी और रोगी, दोनों रूपों में देखने की द्वैधता |
| अंतर-एजेंसी समन्वय | राज्य आबकारी, पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बीच खुफिया सूचना का आदान-प्रदान |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- विमुक्ति अभियान (Vimukthi Mission) – केरल के आबकारी विभाग का नशा-निवारण कार्यक्रम, जिसका उल्लेख समाचार में है
- नशा मुक्त भारत अभियान (Nasha Mukt Bharat Abhiyaan) – सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा 2020 में शुरू; जागरूकता और उपचार पर केंद्रित
- नशीली दवाओं की माँग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (National Action Plan for Drug Demand Reduction) – निवारक शिक्षा, उपचार और समेकित पुनर्वास केंद्रों के लिए केंद्रीय सहायता
- मानस हेल्पलाइन 1933 (MANAS) – नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की नशा-संबंधी सूचना और परामर्श हेतु टोल-फ्री सेवा
- राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम (National Tobacco Control Programme) – तंबाकू-सेवन में कमी और COTPA के क्रियान्वयन के लिए
आगे की राह
- प्रवर्तन का केंद्र छोटे उपभोक्ताओं से हटाकर आपूर्ति-शृंखला, वित्तीय प्रवाह और संपत्ति-जब्ती (NDPS अधिनियम का अध्याय 5-क) पर किया जाए।
- सभी 14 ज़िला केंद्रों में मनोचिकित्सक, परामर्शदाता और नर्स की स्थायी नियुक्ति समयबद्ध ढंग से पूरी की जाए और फिर तालुक स्तर पर विस्तार हो।
- NDPS अधिनियम की धारा 64A और धारा 71 के प्रावधानों का प्रचार हो, ताकि व्यसनी व्यक्ति बिना भय के उपचार ले सके।
- पुनर्वास में कौशल-प्रशिक्षण, आजीविका और परिवार-परामर्श को जोड़ा जाए तथा साझेदार सामाजिक संगठनों के लिए मान्यता और निगरानी के स्पष्ट मानक बनें।
- नशामुक्त परिसर की घोषणा को नियमित अंकेक्षण, छात्र-सहभागिता और शिकायत-निवारण तंत्र से जोड़ा जाए।
- राज्य पुलिस, आबकारी, तटरक्षक बल और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के बीच NCORD तंत्र के माध्यम से वास्तविक-समय की खुफिया साझेदारी हो।
- सेवन की व्यापकता का समय-समय पर राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण हो और परिणाम-आधारित सूचक (उपचार पूर्णता दर, पुनः नशे की दर) सार्वजनिक किए जाएँ।
- विद्यालय पाठ्यचर्या में जीवन-कौशल शिक्षा और सहपाठी-नेतृत्व वाले निवारक कार्यक्रम शामिल किए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बहुआयामी रणनीति (प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति और पुनर्वास) · स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) · माँग न्यूनीकरण बनाम आपूर्ति न्यूनीकरण · हानि न्यूनीकरण (Harm Reduction) · अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) · आबकारी विभाग और राज्य सूची की प्रविष्टि 8 · सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA), 2003 · नशामुक्ति केंद्र और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 · सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक संगठन · नशामुक्त परिसर · सहकारी संघवाद और अंतर-एजेंसी समन्वय · नशा मुक्त भारत अभियान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 47 – नशीले पदार्थों के निषेध का राज्य-कर्तव्य
- अनुच्छेद 21 – जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 8 – नशीली शराब पर राज्य का अधिकार
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 6 – जन-स्वास्थ्य राज्य का विषय
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 1 – आपराधिक कानून, NDPS क्षेत्र
अवधारणा प्रवाह
मादक पदार्थों और तंबाकू की उपलब्धता तथा युवाओं में बढ़ता सेवन → आपूर्ति पर नियंत्रण हेतु ऑपरेशन थंडर के अंतर्गत NDPS, COTPA और आबकारी कानूनों के तहत प्रवर्तन → परिसरों और समुदाय में जागरूकता तथा नशामुक्त परिसर से माँग में कमी → नशे के आदी व्यक्तियों की पहचान और ज़िला/तालुक नशामुक्ति केंद्रों में चिकित्सकीय उपचार → सामाजिक संगठनों की सहभागिता से पुनर्वास, कौशल और आजीविका से जुड़ाव → पुनः नशे में लौटने का जोखिम घटता है और व्यक्ति समाज में पुनःसमावेशित होता है → मूल्यांकन और डेटा के आधार पर नीति-सुधार तथा अभियान का सतत संचालन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) का गठन इसी अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों के प्रयोग से 1986 में किया गया।
2. अधिनियम की धारा 64A के अंतर्गत जो व्यक्ति स्वेच्छा से नशामुक्ति उपचार कराता है, उसे कुछ परिस्थितियों में अभियोजन से उन्मुक्ति मिल सकती है।
3. 2014 के संशोधन के बाद कुछ अपराधों के पुनरावृत्ति-दोषियों के लिए मृत्युदंड अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NCB का गठन 1986 में NDPS Act के अंतर्गत किया गया। कथन 2 सही है: धारा 64A में स्वेच्छा से उपचार कराने वाले नशे के आदी व्यक्तियों को उन्मुक्ति का प्रावधान है। कथन 3 गलत है: 2014 के संशोधन ने धारा 31A के अंतर्गत मृत्युदंड की अनिवार्यता समाप्त कर उसे विवेकाधीन बना दिया।
Q2. अभिकथन (A): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को निर्देश देता है कि वह औषधीय प्रयोजन के सिवाय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और drugs के उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करे।
कारण (R): राज्य के नीति निदेशक तत्व न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A सही है, किंतु R गलत है — अनुच्छेद 47 का पाठ अभिकथन में सही दिया गया है। परंतु अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निदेशक तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, इसलिए R गलत है।
Q3. सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA), 2003 के अनुसार तंबाकू उत्पादों की बिक्री के संबंध में कौन-सा युग्म सही है?
- शैक्षणिक संस्थानों के 50 गज के भीतर तथा 21 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को निषिद्ध
- शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर तथा 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को निषिद्ध
- शैक्षणिक संस्थानों के 200 गज के भीतर तथा 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को निषिद्ध
- शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर तथा 21 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को निषिद्ध
उत्तर: शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर तथा 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को निषिद्ध — COTPA, 2003 की धारा 6 के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को तथा शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर तंबाकू उत्पादों की बिक्री प्रतिबंधित है। आयु 21 वर्ष करने का प्रस्ताव कानून नहीं बना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ‘मादक पदार्थों का दुरुपयोग जितनी कानून-व्यवस्था की समस्या है, उतनी ही लोक स्वास्थ्य की भी।’ केरल के ‘मयंगिल्ला केरलम’ अभियान के चार स्तंभों (प्रवर्तन, जागरूकता, नशामुक्ति और पुनर्वास) के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि राज्य-स्तरीय पहलों को प्रभावी बनाने में कौन-सी संस्थागत और विधिक चुनौतियाँ बाधक हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: समाचार के तथ्य दीजिए। Operation Thunder के अंतर्गत 10,000 से अधिक मामले, जिनमें 4,000 से अधिक NDPS Act के, 5,000 से अधिक विद्यालय-महाविद्यालय के निकट तंबाकू बिक्री के और शेष आबकारी कानूनों के हैं। इसके अतिरिक्त 27 नशामुक्त परिसर, 14 जिला नशामुक्ति केंद्र (सभी में मनोचिकित्सक नियुक्त करने की प्रक्रिया) और 78 तालुकों तक विस्तार की योजना।
खंड 1 (विधिक-संवैधानिक ढाँचा): अनुच्छेद 47 (नीति निदेशक तत्व) और अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य का अधिकार। राज्य सूची की प्रविष्टि 8 (मादक द्रव्य) और प्रविष्टि 6 (लोक स्वास्थ्य); NDPS Act, 1985 केंद्रीय कानून है, जबकि आबकारी राज्य का विषय है। NDPS Act की धारा 27 (उपभोग), धारा 37 (जमानत की कठोर शर्तें), धारा 64A (स्वेच्छा से उपचार कराने वाले को उन्मुक्ति) और धारा 71 (उपचार एवं पुनर्वास केंद्र)। COTPA, 2003 की धारा 6 (18 वर्ष से कम आयु को और शिक्षण संस्थान के 100 गज के भीतर बिक्री निषिद्ध)।
खंड 2 (कथन का परीक्षण): आपूर्ति न्यूनीकरण से मामलों की संख्या बढ़ती है, पर अधिकांश गिरफ़्तारियाँ उपभोक्ताओं या छोटी मात्रा के मामलों में होती हैं, जिससे अपराधीकरण का खतरा रहता है। माँग न्यूनीकरण के लिए नशामुक्ति और पुनर्वास आवश्यक है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और मनोचिकित्सकों की उपलब्धता का प्रश्न। हानि न्यूनीकरण का दृष्टिकोण (ओपिओइड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी)। केंद्र की पहलें: राष्ट्रीय औषधि माँग न्यूनीकरण कार्य योजना (NAPDDR), नशा मुक्त भारत अभियान (2020) और MANAS हेल्पलाइन 1933।
खंड 3 (चुनौतियाँ): अंतर-एजेंसी समन्वय (राज्य आबकारी, पुलिस, NCB, सीमा शुल्क और DRI), अंतरराज्यीय एवं अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क, डार्क वेब और कूरियर के माध्यम से आपूर्ति। साक्ष्य संबंधी चुनौतियाँ: तोफान सिंह बनाम तमिलनाडु राज्य (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि NDPS अधिकारी के समक्ष स्वीकारोक्ति साक्ष्य में अग्राह्य है। साथ ही कम दोषसिद्धि दर, नशामुक्ति केंद्रों में कर्मचारियों और धन की कमी, कलंक और पुनरावृत्ति (relapse)।
खंड 4 (आगे की राह): जागरूकता कार्यक्रमों का प्रभाव-मूल्यांकन, तालुक-स्तर पर नशामुक्ति सेवाएँ, सामाजिक संगठनों के साथ पुनर्वास में मान्यता-मानकों के साथ सहभागिता, कौशल-प्रशिक्षण और रोजगार से पुनःएकीकरण, नियमित आँकड़े और निगरानी। केंद्र-राज्य सहकारी संघवाद के अंतर्गत संयुक्त कार्रवाई।
निष्कर्ष: संतुलित मत यह है कि प्रवर्तन आवश्यक है, किंतु पर्याप्त नहीं। स्वास्थ्य-आधारित और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण ही दीर्घकालिक समाधान देगा।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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