21 Oct मक्का रक्षा समझौता: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के सैन्य सहयोग की पूरी जानकारी
✎ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) 'एक पर हमला सब पर हमला' का सिद्धांत तो दोहराता है, पर नाटो और CSTO के विपरीत यह बल प्रयोग को बाध्य नहीं करता और सैन्य क्षमता निर्माण को प्रमुख उद्देश्य बनाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (पश्चिम एशिया, भारत के पड़ोस और खाड़ी देशों से संबंध, क्षेत्रीय संगठन और गठबंधन) | GS Paper III — सुरक्षा (रक्षा सहयोग, सैन्य गठबंधनों की प्रकृति)
- Prelims: उत्तरी अटलांटिक संधि (North Atlantic Treaty) और NATO का अनुच्छेद 5, सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO), गल्फ सहयोग परिषद (GCC) का संयुक्त रक्षा समझौता (2000), पेनिनसुला शील्ड बल (Peninsula Shield Force), हूती (Houthi) विद्रोही और लाल सागर क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति, सऊदी अरब का राष्ट्रीय गार्ड (Saudi Arabian National Guard), सामूहिक सुरक्षा और पारस्परिक रक्षा के बीच अंतर, तुर्की संसद द्वारा अंतरराष्ट्रीय संधियों का अनुसमर्थन (Ratification) और उसकी प्रक्रिया
- Essay: बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में क्षेत्रीय गठबंधन: क्या पारस्परिक रक्षा की गारंटी सीमित होती जा रही है?, मध्य-शक्ति देशों की सुरक्षा साझेदारियाँ: संप्रभुता, स्वायत्तता और सामूहिक दायित्व के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) ‘एक पर हमला सब पर हमला’ का सिद्धांत तो दोहराता है, पर नाटो और CSTO के विपरीत यह बल प्रयोग को बाध्य नहीं करता और सैन्य क्षमता निर्माण को प्रमुख उद्देश्य बनाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच 7 अगस्त को हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (Mecca Joint Defence Agreement – MJDA) का पूरा पाठ लगभग दो महीने बाद सार्वजनिक हुआ है। तुर्की ने 20 अक्टूबर को इस समझौते को अनुसमर्थन के लिए अपनी संसद के समक्ष रखा, जिसके बाद इसका पाठ व्यापक रूप से सामने आया। 16 अनुच्छेदों वाला यह दस्तावेज़ मौजूदा समय के सबसे लंबे सामूहिक सुरक्षा पाठों में गिना जा रहा है। विश्लेषण के अनुसार इस समझौते की मूल प्रकृति नाटो जैसी पारस्परिक रक्षा की नहीं है, बल्कि शांति और युद्ध, दोनों समय में संयुक्त सैन्य क्षमता के निर्माण को इसका प्रमुख उद्देश्य बताया गया है। साथ ही यह संकेत भी मिलता है कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान से जुड़े सैन्य सहयोग के कई ढाँचे पहले से मौजूद हैं। अमेरिकी सुरक्षा छत्र (Security Umbrella) के सिमटने की चर्चा के बीच इस समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में आ रहे बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
पृष्ठभूमि
- नाटो (NATO) की स्थापना 1949 की उत्तरी अटलांटिक संधि से हुई थी, जिसका अनुच्छेद 5 किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला मानता है। यह सामूहिक सुरक्षा का सबसे प्रचलित उदाहरण है।
- सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) की नींव 1992 की सामूहिक सुरक्षा संधि से पड़ी, जिसमें सदस्य देशों के सशस्त्र हमले और बल प्रयोग के अधिकार स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।
- गल्फ सहयोग परिषद (GCC) का संयुक्त रक्षा समझौता वर्ष 2000 में हुआ, और इसके अंतर्गत सामूहिक प्रतिक्रिया के लिए पेनिनसुला शील्ड बल जैसी संयुक्त सैन्य व्यवस्था विकसित की गई थी।
- यमन संघर्ष और हूती हमलों के कारण सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएँ लंबे समय से बनी हुई हैं। कई देशों ने रक्षात्मक भूमिका के लिए सैन्य संपत्तियाँ तैनात की हैं, जिनमें मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान भी शामिल है।
- पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सितंबर 2025 में सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौता (Strategic Mutual Defence Agreement) हुआ था, जिसे मक्का समझौते से पहले के द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग के रूप में देखा जाता है।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) क्या है?
- यह पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हस्ताक्षरित 16 अनुच्छेदों वाला पारस्परिक रक्षा दस्तावेज़ है, जिसमें संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और मान्यता प्राप्त सीमाओं की अनुल्लंघनीयता की रक्षा की प्रतिबद्धता दी गई है।
- अनुच्छेद 2 में ‘एक पर हमला सब पर हमला’ का सिद्धांत दोहराया गया है, परंतु सहायता के साधन खुले छोड़े गए हैं और किसी भी पक्ष को बल प्रयोग के लिए बाध्य नहीं किया गया है।
- समझौते में युद्धकालीन कार्रवाई का कोई क्रमबद्ध ढाँचा (Hierarchy) नहीं है, इसलिए सहायता त्वरित हथियार आपूर्ति, सैनिकों और प्लेटफ़ॉर्मों की अदला-बदली, तथा खुफिया और प्रौद्योगिकी साझाकरण के रूप में दी जा सकती है।
- नाटो के अनुच्छेद 5 और CSTO की संधि में सशस्त्र हमले और बल प्रयोग का स्पष्ट उल्लेख है, जबकि MJDA में सैन्य क्षमता निर्माण पर अधिक बल है। यह अंतर इसकी प्रकृति को भिन्न बनाता है।
- किसी संधि के बिना भी देश रक्षात्मक भूमिका में सैन्य सहायता दे सकते हैं; रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस, मिस्र, इटली और ब्रिटेन ने भी सऊदी अरब में ऐसी संपत्तियाँ तैनात की हैं।
- तुर्की में इसका अनुसमर्थन संसद में होना आवश्यक है, जिससे यह संधि वहाँ के संवैधानिक और विधायी ढाँचे के भीतर लागू होगी। संधियों के अनुसमर्थन की यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय विधि में एक सामान्य चरण है।
- भारत के लिए इसका महत्व खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा संरचना, ऊर्जा आपूर्ति, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और भारत-खाड़ी संबंधों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के विश्लेषण में निहित है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संधि का स्वरूप | मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (Mecca Joint Defence Agreement, MJDA) में 16 अनुच्छेद हैं। स्रोत के अनुसार इसका मुख्य उद्देश्य शांति और युद्ध, दोनों समय संयुक्त सैन्य क्षमता निर्माण है, न कि नाटो जैसी स्वतः सामूहिक प्रतिरक्षा। |
| अनुच्छेद 1 की प्रतिबद्धता | पक्ष एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सीमाओं की अनुल्लंघनीयता की रक्षा करने पर सहमत हैं। |
| अनुच्छेद 2 की सहायता व्यवस्था | सशस्त्र हमले की स्थिति में पक्ष तुरंत सहायता देंगे, पर सहायता के साधन खुले छोड़े गए हैं। किसी भी पक्ष को तीसरे देश की आक्रामकता पर बल प्रयोग के लिए बाध्य नहीं किया गया है। |
| युद्धकालीन सहायता के रूप | त्वरित हथियार आपूर्ति, सैनिकों और प्लेटफॉर्मों की पारस्परिक तैनाती, खुफिया और प्रौद्योगिकी साझाकरण जैसे विविध तरीके संभव हैं। इनके लिए अलग संधि-प्रतिबद्धता आवश्यक नहीं है। |
| पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका | स्रोत के अनुसार यह समझौता पाकिस्तान-संबद्ध सैन्य सहयोग ढाँचों के जाल को दर्शाता है, जिससे पश्चिम एशिया में उसकी उपस्थिति बढ़ने का संकेत मिलता है। |
महत्व
सैन्य एवं रणनीतिक
- संधि का केंद्र सैन्य क्षमता निर्माण है, इसलिए इसका प्रभाव तत्काल युद्ध से अधिक दीर्घकालिक रक्षा तैयारी में दिखेगा।
- लचीली सहायता व्यवस्था से पक्षों को अपनी राजनीतिक और सैन्य सीमाओं के भीतर रहते हुए सहयोग करने की छूट मिलती है।
- हूती हमलों के विरुद्ध फ्रांस, मिस्र, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों द्वारा सऊदी अरब में की गई सैन्य तैनाती इस क्षेत्र में बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाती है।
सुरक्षा संरचना के संदर्भ में
- नाटो के अनुच्छेद 5 और सामूहिक सुरक्षा संधि (Collective Security Treaty) जैसी व्यवस्थाओं से इसकी तुलना यह स्पष्ट करती है कि यह समझौता बाध्यकारी सामूहिक प्रतिरक्षा के बजाय सहयोग-आधारित ढाँचा है।
- खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council, GCC) के संयुक्त रक्षा समझौता (2000) में ‘सैन्य बल’ को प्रतिक्रिया के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था, जबकि इस संधि में ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
भारत के लिए निहितार्थ
- पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरण भारत की ऊर्जा सुरक्षा, खाड़ी में प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों की स्थिरता से सीधे जुड़े हैं।
- भारत की पश्चिम एशिया नीति को संतुलित रखने के लिए इस तरह के नए सैन्य सहयोग ढाँचों की संरचना और प्रभाव का विश्लेषण आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. बाध्यता की अस्पष्टता
- अनुच्छेद 2 में सहायता के साधन खुले छोड़े गए हैं, इसलिए किसी संकट में वास्तविक प्रतिबद्धता की सीमा तय करना कठिन है।
- सहायता का स्वरूप हर पक्ष की राजनीतिक इच्छा पर निर्भर होगा, जिससे समझौते की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS2: अंतरराष्ट्रीय संबंध, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह
2. क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन पर प्रभाव
- पाकिस्तान की बढ़ती उपस्थिति से पश्चिम एशिया में मौजूदा शक्ति-संतुलन और क्षेत्रीय गठबंधनों पर नया दबाव बन सकता है।
- बड़ी शक्तियों की भूमिका घटने या बदलने के संकेत से क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS2: भारत के पड़ोस और पश्चिम एशिया से संबंधित नीतियाँ
3. सैन्य क्षमता निर्माण की व्यावहारिक सीमाएँ
- स्रोत के अनुसार सऊदी अरब राष्ट्रीय रक्षक (Saudi Arabian National Guard) जैसी संरचनाओं की कमियाँ इस समझौते का मुख्य संदर्भ हैं, इसलिए क्षमता निर्माण की सफलता प्रशिक्षण और तकनीकी हस्तांतरण पर निर्भर करेगी।
- हथियारों की आपूर्ति और सैनिकों की तैनाती में समन्वय न होने पर सहायता की गति और प्रभावशीलता घट सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS3: रक्षा और सुरक्षा में आधुनिकीकरण की चुनौतियाँ
4. हूती संकट और समुद्री सुरक्षा
- लाल सागर क्षेत्र में हूती हमलों के कारण समुद्री व्यापार मार्ग प्रभावित हुए हैं, और इस संधि की व्यावहारिक परीक्षा इसी संदर्भ में होगी।
- बहुपक्षीय तैनाती से टकराव के विस्तार का जोखिम भी बना रहता है।
यूपीएससी लिंक: GS3: समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार मार्ग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सहायता की बाध्यता | अनुच्छेद 2 में बल प्रयोग की बाध्यता न होने से संकट के समय वास्तविक समर्थन की सीमा अनिश्चित रहती है। |
| क्षेत्रीय संतुलन | पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका से पश्चिम एशिया के मौजूदा गठबंधनों और शक्ति-संतुलन पर असर पड़ सकता है। |
| क्षमता निर्माण की गुणवत्ता | प्रशिक्षण, रखरखाव और तकनीकी हस्तांतरण की गुणवत्ता पर सफलता निर्भर करेगी। |
| समुद्री व्यापार मार्ग | लाल सागर में अस्थिरता से वैश्विक ऊर्जा और वस्तु व्यापार प्रभावित हो सकता है। |
| पारदर्शिता | संधि का पाठ लंबे समय बाद सार्वजनिक हुआ, जिससे वास्तविक दायित्वों के बारे में अनिश्चितता बनी रहती है। |
आगे की राह
- संधि के वास्तविक दायित्वों को समझने के लिए मूल पाठ और उसके व्याख्यात्मक प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए।
- पश्चिम एशिया में भारत के ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी हितों की सुरक्षा के लिए बहुपक्षीय कूटनीतिक संवाद को सक्रिय रखा जाना चाहिए।
- लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय सहयोग तंत्रों के साथ तालमेल बढ़ाना उपयोगी होगा।
- सैन्य सहयोग समझौतों में सहायता के साधनों को स्पष्ट परिभाषित करने की दिशा में अंतरराष्ट्रीय मानकों पर चर्चा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- क्षेत्रीय संघर्षों के विस्तार को रोकने के लिए संयम और राजनयिक समाधान पर बल देने वाले मंचों को मज़बूत करना आवश्यक है।
- भारत को अपनी पश्चिम एशिया नीति में ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी कल्याण और रणनीतिक संतुलन के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (Mecca Joint Defence Agreement – MJDA) · सामूहिक रक्षा (Collective Defence) · सामूहिक सुरक्षा (Collective Security) · उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organisation – NATO) · सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (Collective Security Treaty Organisation – CSTO) · खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council – GCC) · संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51 (Article 51, UN Charter) · सैन्य क्षमता निर्माण (Military Capacity Building) · रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) · पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन (Power Balance in West Asia)
अवधारणा प्रवाह
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 7 अगस्त को मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) पर हस्ताक्षर किए। → 20 अक्टूबर को तुर्की ने संधि को अनुसमर्थन के लिए अपनी संसद में प्रस्तुत किया, जिसके बाद इसका पूरा पाठ सार्वजनिक हुआ। → संधि का अनुच्छेद 2 सहायता के साधन खुले रखता है, इसलिए बल प्रयोग की अनिवार्यता नहीं बनती। → सहायता के रूप में हथियार आपूर्ति, सैन्य तैनाती और खुफिया साझाकरण जैसे विकल्प सामने आते हैं। → सैन्य क्षमता निर्माण पर बल से पश्चिम एशिया में बहुपक्षीय सुरक्षा ढाँचों का विस्तार होता है। → इसका प्रभाव क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन, समुद्री व्यापार मार्गों और भारत के पश्चिम एशिया हितों पर पड़ता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उत्तर अटलांटिक संधि (1949) के अनुच्छेद 5 में यह प्रावधान है कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।
2. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51 सदस्य राज्यों के व्यक्तिगत अथवा सामूहिक आत्मरक्षा के अंतर्निहित अधिकार को मान्यता देता है।
3. मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (MJDA) के अंतर्गत प्रत्येक पक्ष किसी तीसरे देश की आक्रामकता की स्थिति में अनिवार्य रूप से बल-प्रयोग करने के लिए बाध्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: नाटो का अनुच्छेद 5 सामूहिक रक्षा का केंद्रीय प्रावधान है। कथन 2 भी सही है, क्योंकि अनुच्छेद 51 आत्मरक्षा के अधिकार को मान्यता देता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि MJDA का अनुच्छेद 2 सहायता के साधनों को खुला छोड़ता है और सैन्य बल-प्रयोग को बाध्यकारी नहीं बनाता।
Q2. अभिकथन (A): मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को नाटो-शैली की सामूहिक रक्षा संधि की तुलना में सैन्य क्षमता निर्माण पर अधिक केंद्रित माना जाता है।
कारण (R): इस समझौते के अनुच्छेद 2 में किसी भी पक्ष को किसी तीसरे देश के आक्रमण की स्थिति में बल-प्रयोग के लिए बाध्य नहीं किया गया है, और सहायता के साधन खुले छोड़े गए हैं।
सही उत्तर चुनिए:
कूट (Codes): (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। (b) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है। (c) A सही है, परंतु R गलत है। (d) A गलत है, परंतु R सही है।
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, परंतु R गलत है।
- A गलत है, परंतु R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं, और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है। बाध्यकारी बल-प्रयोग न होने और सहायता के साधन खुले होने के कारण ही समझौता सैन्य क्षमता निर्माण पर केंद्रित दिखता है। नाटो और CSTO की तुलना में यह अंतर स्पष्ट है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन कीजिए:
सूची I (संधि/संगठन)
1. उत्तर अटलांटिक संधि (North Atlantic Treaty)
2. सामूहिक सुरक्षा संधि (Collective Security Treaty)
3. खाड़ी सहयोग परिषद का संयुक्त रक्षा समझौता (GCC Joint Defence Agreement)
सूची II (वर्ष)
a. 2000
b. 1949
c. 1992
कूट:
- 1-a, 2-b, 3-c
- 1-b, 2-c, 3-a
- 1-c, 2-a, 3-b
- 1-b, 2-a, 3-c
उत्तर: 1-b, 2-c, 3-a — उत्तर अटलांटिक संधि 1949 में हस्ताक्षरित हुई, सामूहिक सुरक्षा संधि (ताशकंद) 1992 में और GCC का संयुक्त रक्षा समझौता 2000 में। इन वर्षों को याद रखना मुख्य परीक्षा के तुलनात्मक उत्तरों में भी उपयोगी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (MJDA) के अनुच्छेद 2 में सैन्य सहायता को ‘सभी उपलब्ध साधनों’ तक सीमित रखा गया है, जिससे इसे नाटो-शैली की सामूहिक रक्षा संधि से अलग माना जाता है। इस विशेषता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और तुलना कीजिए कि यह व्यवस्था नाटो और सामूहिक सुरक्षा संधि (CSTO) की सामूहिक रक्षा संरचनाओं से किस प्रकार भिन्न है। साथ ही बताइए कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर ऐसी संधियों का क्या प्रभाव हो सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर के बिंदु: (1) प्रस्तावना: 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हस्ताक्षरित MJDA, जिसका पाठ तुर्की संसद में अनुसमर्थन हेतु प्रस्तुत हुआ; 16 अनुच्छेदों वाला यह दस्तावेज़ सामूहिक सुरक्षा ग्रंथों में अपेक्षाकृत विस्तृत है। (2) MJDA के प्रावधान: अनुच्छेद 1 में संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य सीमाओं की अनुल्लंघनीयता; अनुच्छेद 2 में ‘एक पर हमला सभी पर हमला’ सिद्धांत, पर बल-प्रयोग की बाध्यता नहीं; शांति और युद्ध दोनों काल में सैन्य क्षमता निर्माण पर बल; युद्धकालीन सहायता के साधन (त्वरित हथियार आपूर्ति, सैनिकों और प्लेटफ़ॉर्मों का अंतर-स्थापन, खुफिया और प्रौद्योगिकी साझाकरण) का खुला होना। (3) तुलना: नाटो (1949) की सामूहिक रक्षा में सशस्त्र हमले और बल-प्रयोग का स्पष्ट अधिकार; CSTO (1992, ताशकंद) में भी सैन्य बल-प्रयोग का प्रावधान; GCC संयुक्त रक्षा समझौता (2000) ‘सैन्य सशस्त्र बल’ को प्रतिक्रिया-विकल्प के रूप में सूचीबद्ध करता है; MJDA इन सबसे अधिक लचीला है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51 आत्मरक्षा का अंतर्निहित अधिकार देता है, जिसके संदर्भ में ऐसी संधियों की वैधता पर भी विचार करें। (4) पक्ष-विपक्ष के मत: समर्थक तर्क—लचीलापन, रणनीतिक अस्पष्टता (strategic ambiguity) से प्रतिरोधक क्षमता, और क्षमता-निर्माण से साझेदारों की रक्षा-तैयारी; आलोचक तर्क—अस्पष्ट प्रतिबद्धता से विश्वसनीय प्रतिरोध कमज़ोर, सुरक्षा-दुविधा (security dilemma) में वृद्धि, और ‘दोहरी जिम्मेदारी’ की समस्या। अमेरिकी सुरक्षा छत्र के सिकुड़ने की धारणा से क्षेत्रीय शक्तियों के नए गठबंधनों का संदर्भ। (5) भारत के लिए निहितार्थ: खाड़ी में बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की चिंता; रणनीतिक स्वायत्तता बनाम गठबंधन-राजनीति का संतुलन; भारत-सऊदी रणनीतिक साझेदारी परिषद जैसे द्विपक्षीय तंत्रों के साथ सामंजस्य। (6) निष्कर्ष: संधि की प्रकृति को ‘सैन्य क्षमता-निर्माण आधारित सामूहिक रक्षा’ के रूप में परिभाषित करते हुए, उसकी विश्वसनीयता और क्षेत्रीय स्थिरता पर संतुलित राय।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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