15 Oct कासरगोड में मिला मेगालिथिक कब्रगाह और संभावित शैल कला: जानिए महत्वपूर्ण तथ्य
✎ महापाषाण शवाधान मृतक-संस्कार की पुरातात्त्विक पहचान हैं, जबकि लैटेराइट शैल पर बने कप्यूल और पदचिह्न जैसे उत्कीर्णन स्थलों के संरक्षण में खनन सबसे बड़ा खतरा हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय विरासत एवं संस्कृति (प्रागैतिहासिक काल, महापाषाण संस्कृति, शैल चित्रकला) | GS Paper I — भौगोलिक विशेषताएँ (लैटेराइट शैल और उसका क्षेत्रीय महत्त्व) | GS Paper III — पर्यावरण एवं संरक्षण (खनन से पुरातात्त्विक स्थलों को क्षति; विरासत संरक्षण बनाम विकास)
- Prelims: महापाषाण संस्कृति (Megalithic Culture) और शवाधान के प्रकार — डोलमेन, किस्त, शवाधान कलश, शैल चित्रकला और पेट्रोग्लिफ़ (Petroglyphs) — खुदाई या उत्कीर्णन द्वारा बनाए गए चित्र, कप्यूल (Cupules) — शैल सतह पर बने छोटे गोलाकार कटोरानुमा गड्ढे, लैटेराइट (Laterite) शैल — लौह ऑक्साइड युक्त, मानसून में अलग गुण वाली चट्टान, केरल के प्रमुख शैल चित्र स्थल — एड़क्कल गुफाएँ (वयनाड़), भीमबेटका शैल आश्रय (मध्य प्रदेश) — यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्वीय स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 — राष्ट्रीय महत्त्व के स्थलों का संरक्षण, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) — राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों का संरक्षण
- Essay: खनन, विकास और विरासत: प्रागैतिहासिक स्थलों के संरक्षण की चुनौती, स्थानीय शोधकर्ताओं और अकादमिक संस्थानों की भूमिका: जन-सहभागी पुरातत्व का महत्त्व
त्वरित पुनरावृत्ति: महापाषाण शवाधान मृतक-संस्कार की पुरातात्त्विक पहचान हैं, जबकि लैटेराइट शैल पर बने कप्यूल और पदचिह्न जैसे उत्कीर्णन स्थलों के संरक्षण में खनन सबसे बड़ा खतरा हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के कासरगोड़ ज़िले की मडिक्काई ग्राम पंचायत में एक महापाषाणकालीन शवाधान (Burial Chamber) और संभावित शैल चित्रकला की खोज हुई है। कन्नमकुलमपारा में लैटेराइट शैल पर दो पदचिह्न उत्कीर्ण मिले हैं, जबकि तीर्थंकरा में लैटेराइट से बना शवाधान मिला है, जिसका किनारा लैटेराइट खनन के दौरान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया है। स्थानीय पुरातत्व शोधकर्ता सतीशन कलियम के अन्वेषण से यह खोज सामने आई। इतिहास विभाग के विशेषज्ञ डॉ. नंदकुमार कोरोथ ने स्थलों का निरीक्षण कर पुष्टि की कि शवाधान महापाषाणकालीन है और उत्कीर्ण आकृतियाँ मानव-निर्मित हैं। वहीं पुरातत्वविद के. कृष्णराज ने शैल आकृति को कप्यूल से मिलता-जुलता बताया, परन्तु आगे की जाँच आवश्यक मानी है। यह खोज इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उत्तरी केरल में महापाषाणकालीन बसाहटों और शैल कला के साक्ष्यों का क्षेत्रीय मानचित्र इससे और समृद्ध होता है।
पृष्ठभूमि
- महापाषाण काल लौह युग से जुड़ा एक पुरातात्त्विक चरण है, जिसमें मृतकों को पत्थरों से बनी संरचनाओं में दफ़नाने या उनके अवशेष रखने की परंपरा थी। दक्षिण भारत में इसके साक्ष्य व्यापक रूप से मिले हैं।
- भारत में महापाषाण स्मारकों के प्रमुख प्रकार हैं — डोलमेन (पत्थर की फाटकनुमा संरचना), किस्त (पत्थर के संदूक जैसे शवाधान), मेनहिर (खड़े पत्थर) और शवाधान कलश। इनमें से कई स्थल ग्रेनाइट या लैटेराइट जैसी स्थानीय चट्टानों से बने हैं।
- केरल में शैल चित्रकला के सबसे प्रसिद्ध साक्ष्य वयनाड़ की एड़क्कल गुफाओं में मिलते हैं। उत्तरी केरल के कई स्थलों पर भी लैटेराइट शैल पर उत्कीर्ण आकृतियाँ मिली हैं, जिन्हें क्षेत्रीय शोध में एक समान शैली के रूप में देखा जा रहा है।
- लैटेराइट खनन निर्माण सामग्री के लिए प्रचलित है, परन्तु इससे पुरातात्त्विक स्थलों को सीधा खतरा पहुँचता है। इसी कारण संरक्षण और खनन नियमन के बीच संतुलन एक नीतिगत प्रश्न बन जाता है।
- भारत में 1958 के प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्वीय स्थल तथा अवशेष अधिनियम के अंतर्गत संरक्षित स्मारकों के आसपास निर्माण और उत्खनन पर प्रतिबंध या नियमन होता है। राज्य स्तर पर भी ऐसे स्थलों की पहचान और संरक्षण की व्यवस्था की जाती है।
महापाषाण शवाधान और शैल चित्रकला क्या हैं?
- महापाषाण (Megalith) का शाब्दिक अर्थ है बड़ा पत्थर। इस काल में मृतकों की स्मृति में बड़े पत्थरों से संरचनाएँ बनाई जाती थीं, जो दफ़न स्थल और स्मारक दोनों का काम करती थीं।
- शवाधान (Burial Chamber) में शव या उसके अवशेषों को पत्थर के कक्ष में रखा जाता है। इससे मृतक-संस्कार, सामाजिक स्तरीकरण और धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी मिलती है।
- शैल चित्रकला (Rock Art) में चट्टानों पर रंग से चित्र बनाए जाते हैं, जबकि पेट्रोग्लिफ़ (Petroglyphs) में पत्थर को खुरच या ठोककर आकृतियाँ उत्कीर्ण की जाती हैं।
- कप्यूल (Cupules) शैल सतह पर मानव द्वारा बनाए गए छोटे, गोलाकार कटोरानुमा गड्ढे होते हैं। ये प्रागैतिहासिक शैल कला का एक प्रचलित रूप हैं और भारत के कई स्थलों पर मिलते हैं।
- लैटेराइट लौह ऑक्साइड से समृद्ध एक छिद्रयुक्त चट्टान है, जो उष्णकटिबंधीय और मानसूनी क्षेत्रों में बनती है। यह मुलायम होते हुए भी खुली हवा में कठोर हो जाती है, इसलिए प्राचीन काल से निर्माण और उत्कीर्णन के लिए उपयोगी रही है।
- स्थानीय ‘पल्लम’ (Pallam) से तात्पर्य प्राकृतिक जलाशय से है। इस स्थल पर उत्कीर्णन जलाशयों के किनारे मिले हैं, जिनके जलमग्न रहने से वे लंबे समय तक सुरक्षित रहे।
- पुरातात्त्विक साक्ष्य की पुष्टि के लिए स्थल का सर्वेक्षण, दस्तावेज़ीकरण और आवश्यकतानुसार उत्खनन आवश्यक होता है। अंतिम निष्कर्ष विशेषज्ञ अध्ययन के बाद ही माना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| थीर्थनकरा (Theerthankara) का महापाषाण शवाधान कक्ष | लैटेराइट में बना यह ढाँचा महापाषाणीय काल (Megalithic Period) की शवाधान परंपरा का साक्ष्य है। ऊपरी छिद्र और भीतर भरी मिट्टी से इसके उपयोग और बाद की स्थिति का अनुमान लगता है। |
| कन्नमकुलमपर (Kannamkulampara) के शैलचित्र (Rock Art) | लैटेराइट चट्टान पर उकेरे गए दो पदचिह्न (लगभग 10 इंच लंबाई और 6 इंच चौड़ाई) मिले हैं। इनकी शैली उत्तरी केरल की अन्य शैल-कला स्थलों से मिलती है। |
| कपमार्क या कप्यूल (Cupules) की संभावना | स्थानीय पुरातत्त्वविद् के. कृष्णराज के अनुसार कुछ आकृतियाँ मानव-निर्मित गोलाकार, प्याले जैसी गहराइयाँ हो सकती हैं। इसकी पुष्टि के लिए आगे जाँच आवश्यक है। |
| पल्लम (Pallam) के किनारे की स्थिति | शैल-कला प्राकृतिक जलाशयों के तट पर मिली है, जो इस क्षेत्र में बसावट और जल-स्रोतों के बीच संबंध की ओर संकेत करती है। |
| लैटेराइट पत्थर का उपयोग | लैटेराइट कठोर और स्थानीय रूप से सुलभ है, इसलिए प्राचीन समुदायों ने निर्माण और शैल-कला दोनों के लिए इसका उपयोग किया होगा। यह भूवैज्ञानिक संदर्भ भी देता है। |
महत्व
ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक
- महापाषाणीय काल के शवाधान और शैल-कला से उत्तरी केरल की प्रागैतिहासिक बसावट का क्रम समझने में सहायता मिलती है।
- समान स्थलों (जैसे अरियित्तपारा, ककट्ट, एरिक्कुलम वलियापारा) से तुलना करके क्षेत्रीय सांस्कृतिक सीमाओं का अध्ययन संभव होता है।
- पदचिह्नों की शैली का तुलनात्मक विश्लेषण लोहे के औज़ारों के प्रयोग और शिल्प-तकनीक के बारे में जानकारी दे सकता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक
- शवाधान और चित्रण से मृतक-संस्कार, धार्मिक विश्वास और समुदाय के जीवन-व्यवहार के संकेत मिलते हैं।
- जल-स्रोतों के समीप शैल-कला होना जल और जीविका से जुड़ी सामुदायिक चेतना का संकेत हो सकता है।
भूवैज्ञानिक और पर्यावरणीय
- लैटेराइट पर उकेरी गई आकृतियाँ मानसून में जलमग्न रहने और वर्षा की सीधी मार से बचने के कारण सदियों तक सुरक्षित रहीं। इससे स्थल-चयन और संरक्षण के प्राकृतिक कारकों की समझ बढ़ती है।
चुनौतियाँ
1. लैटेराइट खनन से क्षति
- थीर्थनकरा के शवाधान कक्ष का किनारा खनन के दौरान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका है।
- खनन स्थल पर उत्खनन और संरक्षण के बीच टकराव एक वास्तविक चुनौती है। खनन को विनियमित करने का वैधानिक ढाँचा भी स्पष्ट होना चाहिए।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और खनन विनियमन; खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957
2. पुरातात्त्विक प्रमाणीकरण की आवश्यकता
- चित्र को मानव-निर्मित शैल-कला मानना या कप-मार्क (Cupules) मानना अभी प्रारंभिक निष्कर्ष है। वैज्ञानिक जाँच और दस्तावेज़ीकरण के बिना निश्चित व्याख्या संभव नहीं।
- स्थानीय शोधकर्ताओं की खोज और विशेषज्ञ पुष्टि के बीच समन्वय आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय पुरातत्त्व और संस्कृति; प्रागैतिहासिक और आद्य-ऐतिहासिक काल
3. विरासत का कानूनी संरक्षण
- खोजे गए स्थल औपचारिक रूप से संरक्षित सूची में आने तक जोखिम में रहते हैं।
- केंद्र और राज्य के बीच अधिकार-क्षेत्र का स्पष्ट बँटवारा होना चाहिए, क्योंकि पुरातत्त्व राज्य और केंद्र दोनों के विषयों से जुड़ा है।
यूपीएससी लिंक: संघीय ढाँचा; प्राचीन स्मारक और पुरातत्त्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958
4. जल-स्रोतों और पारिस्थितिकी पर दबाव
- पल्लम और उनके आसपास का क्षेत्र कृषि, निर्माण और शहरीकरण से प्रभावित हो सकता है।
- जल-स्रोतों के कारण ही शैल-कला बची है, इसलिए उनके ह्रास से पुरातात्त्विक साक्ष्य भी प्रभावित होंगे।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण और जल-संसाधन प्रबंधन
5. प्राकृतिक क्षरण और मानवीय हस्तक्षेप
- लैटेराइट पत्थर मौसम और नमी से धीरे-धीरे क्षरित होता है। खुले में पड़े चित्र और पदचिह्न जल्दी मिट सकते हैं।
- आसपास की बसावट और पर्यटन से होने वाला अनियंत्रित स्पर्श भी नुकसान पहुँचा सकता है।
यूपीएससी लिंक: सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण; आपदा और पर्यावरणीय क्षरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| लैटेराइट खनन | शवाधान कक्ष के किनारे की क्षति और अन्य स्थलों के नष्ट होने का खतरा |
| चित्रों की व्याख्या में अनिश्चितता | मानव-निर्मित शैल-कला और प्राकृतिक आकृतियों के बीच भेद के लिए विशेषज्ञ जाँच आवश्यक |
| कानूनी संरक्षण की देरी | औपचारिक घोषणा से पहले स्थल विकास या खनन के लिए खुले रह सकते हैं |
| जल-स्रोतों का ह्रास | पल्लम के सूखने या भराव से शैल-कला के संरक्षण का प्राकृतिक आधार कमज़ोर होगा |
| सीमित संस्थागत क्षमता | स्थानीय स्तर पर पर्याप्त दस्तावेज़ीकरण और रखरखाव के संसाधन कम हो सकते हैं |
आगे की राह
- संभावित स्थलों का त्वरित वैज्ञानिक सर्वेक्षण और दस्तावेज़ीकरण किया जाए, जिसमें रिकॉर्ड, स्थान-निर्देशांक और छवि-अभिलेख शामिल हों।
- थीर्थनकरा और कन्नमकुलमपर क्षेत्र में लैटेराइट खनन पर अस्थायी रोक या सीमांकन पर विचार हो, ताकि आगे क्षति न हो।
- शैल-कला की पहचान के लिए रसायनिक और सूक्ष्म-स्तरीय जाँच सहित विशेषज्ञ मूल्यांकन कराया जाए।
- स्थानीय शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालय के इतिहास विभागों और राज्य पुरातत्त्व विभाग के बीच औपचारिक समन्वय बने।
- स्थानीय समुदाय और पंचायत को धरोहर-जागरूकता में शामिल किया जाए, ताकि स्थलों की सुरक्षा जन-भागीदारी से हो।
- संरक्षण के लिए स्थलों का वैधानिक वर्गीकरण और सीमा-निर्धारण प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जाए।
- तुलनात्मक अध्ययन के लिए उत्तरी केरल के समान स्थलों का एकीकृत मानचित्र और डेटाबेस तैयार हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 49: राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों का संरक्षण
- अनुच्छेद 51A(h): वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जाँच की भावना
अवधारणा प्रवाह
लैटेराइट चट्टानों पर प्राचीन समुदायों द्वारा शवाधान और चित्रण किए जाते हैं (महापाषाणीय काल के साक्ष्य)। → जल-स्रोतों के किनारे होने से चित्र मानसून में जलमग्न रहकर और वर्षा से बचकर सुरक्षित रहते हैं। → स्थानीय शोधकर्ता द्वारा खोज होती है और इतिहासकार उसकी पुष्टि करते हैं। → लैटेराइट खनन से थीर्थनकरा के शवाधान कक्ष को आंशिक क्षति पहुँचती है। → विशेषज्ञ जाँच और वैधानिक संरक्षण की प्रक्रिया शुरू होती है। → सर्वेक्षण, दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण नीति से स्थानीय इतिहास और केरल की प्रागैतिहासिक संस्कृति का अध्ययन आगे बढ़ता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महापाषाणकालीन संस्कृति का संबंध मुख्य रूप से दक्षिण भारत से है।
2. शैल कला (Rock Art) केवल गुफाओं के भीतर ही पाई जाती है।
3. कार्बन डेटिंग (Carbon Dating) का उपयोग पुरातात्विक स्थलों की आयु निर्धारण के लिए किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: महापाषाणकालीन संस्कृति के अवशेष मुख्य रूप से दक्षिण भारत में पाए जाते हैं, जिनमें कब्रें और स्मारक शामिल हैं। कथन 2 गलत है: शैल कला गुफाओं के अलावा खुली चट्टानों, शिलाखंडों और अन्य प्राकृतिक सतहों पर भी पाई जाती है। कथन 3 सही है: कार्बन डेटिंग एक वैज्ञानिक विधि है जिसका उपयोग पुरातात्विक और भूवैज्ञानिक नमूनों की आयु निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
Q2. महापाषाणकालीन दफन कक्षों (Megalithic burial chambers) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. ये आमतौर पर बड़े पत्थरों से निर्मित होते हैं।
2. इनमें मृतकों के साथ दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी दफनाई जाती थीं।
3. ये केवल कृषि समाजों से संबंधित हैं।
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है: महापाषाणकालीन दफन कक्ष बड़े पत्थरों (मेगालिथ) से बनाए जाते थे। कथन 2 सही है: इन कब्रों में मृतकों के साथ अक्सर मिट्टी के बर्तन, औजार और आभूषण जैसी वस्तुएं पाई जाती हैं, जो उनके जीवनशैली और विश्वासों को दर्शाती हैं। कथन 3 गलत है: महापाषाणकालीन संस्कृतियां विभिन्न प्रकार के समाजों में मौजूद थीं, जिनमें शिकारी-संग्राहक और चरवाहे समुदाय भी शामिल थे, न कि केवल कृषि समाज।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ महापाषाणकालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। भारत में पुरातात्विक खोजों के माध्यम से प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन में इन स्थलों का क्या महत्व है? (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: महापाषाणकालीन संस्कृति का संक्षिप्त परिचय, इसकी समय-सीमा और भौगोलिक विस्तार।
मुख्य भाग:
1. महापाषाणकालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ: बड़े पत्थरों का उपयोग (मेगालिथ), दफन प्रथाएँ (जैसे सिस्ट, डोलमेन, मेन्हीर), मिट्टी के बर्तनों का उपयोग, लौह उपकरणों का प्रचलन (इस काल के अंत तक), कृषि और पशुपालन के शुरुआती प्रमाण।
2. भारत में पुरातात्विक खोजों का महत्व: प्राचीन सभ्यताओं के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन को समझने में मदद, मानव बस्तियों के पैटर्न का अध्ययन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान के प्रमाण, क्षेत्रीय इतिहास का पुनर्निर्माण, आधुनिक तकनीकों (जैसे कार्बन डेटिंग, भू-भौतिकीय सर्वेक्षण) का उपयोग करके इन स्थलों का अध्ययन।
3. हालिया खोजों (जैसे कासरगोड में) का संदर्भ: ये खोजें कैसे क्षेत्रीय इतिहास और महापाषाणकालीन प्रसार पर नया प्रकाश डालती हैं।
निष्कर्ष: भारत की समृद्ध पुरातात्विक विरासत और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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