रक्षा मंत्रालय ने ₹770 करोड़ में खरीदे बेहतर एलएलडब्ल्यू राडार, सेना की ताकत बढ़ेगी

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रक्षा मंत्रालय ने ₹770 करोड़ में खरीदे बेहतर एलएलडब्ल्यू राडार, सेना की ताकत बढ़ेगी

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स्वदेशी रडार अधिग्रण प्रक्रिया

✎ सुधरा हुआ निम्न-स्तरीय हल्का रडार (ILLLWR) DRDO द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीक पर आधारित है, जो सेना को निम्न ऊंचाई वाले हवाई खतरों, विशेषकर ड्रोन, का पता लगाने की क्षमता देता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — आंतरिक सुरक्षा और रक्षा  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (रक्षा अनुसंधान एवं स्वदेशी उत्पादन)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III — अर्थव्यवस्था (मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में औद्योगिक नीति)
  • Prelims: निम्न-स्तरीय हल्का रडार (Low Level Light Weight Radar), सुधरा हुआ निम्न-स्तरीय हल्का रडार (Improved Low Level Light Weight Radar), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और उसकी प्रयोगशालाएं, रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council) और स्वीकृति का चरण, सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List), भारत में निर्माण (Make in India) और आत्मनिर्भर भारत (Atmanirbhar Bharat), रडार क्षितिज (Radar Horizon) और निम्न-ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्य, संघ सूची की प्रविष्टि 1 (रक्षा), सातवीं अनुसूची
  • Essay: रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता: अवसर और चुनौतियां, आधुनिक युद्ध में वायु रक्षा और निम्न-ऊंचाई वाले खतरों की बढ़ती चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: सुधरा हुआ निम्न-स्तरीय हल्का रडार (ILLLWR) DRDO द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीक पर आधारित है, जो सेना को निम्न ऊंचाई वाले हवाई खतरों, विशेषकर ड्रोन, का पता लगाने की क्षमता देता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए सुधरे हुए निम्न-स्तरीय हल्के रडार (ILLLWR) के अधिग्रहण हेतु ₹770 करोड़ का अनुबंध किया है। यह रडार निम्न ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई लक्ष्यों, जैसे ड्रोन, हेलीकॉप्टर और अन्य कम उड़ान वाले खतरों का पता लगाने के लिए उपयोगी है। समाचार का महत्त्व इस बात में है कि यह खरीद सेना की वायु रक्षा क्षमता को मज़बूत करने के साथ-साथ स्वदेशी रक्षा उत्पादन और रक्षा अधिग्रहण की नीति-प्रक्रिया के अनुरूप है। अनुबंध के ब्योरे का विश्लेषण करते समय परीक्षार्थी को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सुविधा मुख्यतः पहले से विकसित और परखी गई तकनीक के उन्नत संस्करण की खरीद से जुड़ी है।

पृष्ठभूमि

  • निम्न-स्तरीय हल्का रडार का मूल विकास भारत में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के माध्यम से हुआ है, जिससे देश की रडार तकनीक में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति दिखती है।
  • सेना की वायु रक्षा आवश्यकताएं बदल रही हैं। ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हथियारों के बढ़ते उपयोग ने निम्न-स्तरीय निगरानी को अधिक महत्त्वपूर्ण बना दिया है।
  • रक्षा खरीद में स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने के लिए सरकार ने सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची जैसे उपाय अपनाए हैं, जिनमें चरणबद्ध ढंग से आयात पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य रखा गया है।
  • रक्षा अधिग्रहण में परियोजना की स्वीकृति, निविदा, मूल्यांकन और अनुबंध के चरण होते हैं। सामान्यतः रक्षा अधिग्रहण परिषद प्रारंभिक स्वीकृति देती है, जिसके बाद खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
  • आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र और सार्वजनिक उपक्रमों की भागीदारी बढ़ाने पर बल दिया गया है, जिससे घरेलू औद्योगिक आधार सुदृढ़ होता है।

सुधरा हुआ निम्न-स्तरीय हल्का रडार (ILLLWR) क्या है?

  • रडार (Radar) एक ऐसी प्रणाली है जो रेडियो तरंगों के परावर्तन के आधार पर वस्तुओं की दूरी, दिशा और गति का पता लगाती है।
  • निम्न-स्तरीय रडार का मुख्य कार्य भूमि के समीप और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों की पहचान करना है, जिन्हें सामान्य लंबी दूरी के रडार अक्सर पकड़ नहीं पाते।
  • रडार क्षितिज (Radar Horizon) के कारण पृथ्वी की वक्रता से निम्न ऊंचाई वाले लक्ष्य रडार की पहुंच से बाहर रह सकते हैं, इसलिए ऐसे रडार विशेष रूप से उपयोगी होते हैं।
  • “हल्का” (Light Weight) शब्द का अर्थ है कि इन्हें आसानी से परिवहन किया जा सकता है और सीमावर्ती या पर्वतीय क्षेत्रों में तेज़ी से तैनात किया जा सकता है।
  • “सुधरा हुआ” संस्करण पिछले मॉडल की तुलना में बेहतर पहचान क्षमता, विश्वसनीयता और परिचालन दक्षता का संकेत देता है, हालांकि इसकी विस्तृत तकनीकी विशिष्टताएं सार्वजनिक स्रोतों से सत्यापित करनी चाहिए।
  • सेना की वायु रक्षा इकाइयां ऐसे रडार का उपयोग शत्रु के ड्रोन, हेलीकॉप्टर और अन्य निम्न-उड़ान खतरों की समय पर चेतावनी के लिए करती हैं।
  • स्वदेशी रडार का उत्पादन रक्षा आयात पर निर्भरता घटाता है, विदेशी मुद्रा की बचत करता है और रक्षा उद्योग में रोज़गार तथा तकनीकी क्षमता को बढ़ाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
प्रकार निम्न-ऊँचाई पर उड़ने वाले हवाई लक्ष्यों (ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज़ मिसाइल आदि) का पता लगाने के लिए हल्का रडार (Radar)
विकास संस्था रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की इलेक्ट्रॉनिक्स एवं रडार विकास स्थापना (LRDE) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित
उन्नयन मौजूदा प्रणाली का उन्नत संस्करण (Improved Low Level Light Weight Radar, ILLLWR), जिसमें क्षमता और परिचालन-दक्षता बढ़ाने पर बल है
गतिशीलता हल्के वज़न और सीमित परिवहन-साधनों के साथ दुर्गम व पहाड़ी क्षेत्रों में शीघ्र तैनाती के लिए उपयुक्त
उपयोगकर्ता भारतीय थलसेना की वायु रक्षा इकाइयाँ, जो निचले स्तर के वायु खतरों के विरुद्ध अग्रिम निगरानी करती हैं
अनुबंध मूल्य 770 करोड़ रुपये का अनुबंध, जो रक्षा अधिग्रहण में स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहन देने का संकेत है

महत्व

सामरिक महत्त्व

  • निम्न-ऊँचाई के खतरे रडार की सामान्य पकड़ से बाहर रह सकते हैं, इसलिए ऐसे रडार वायु रक्षा के ‘निचले स्तर’ की कमी को पूरा करते हैं।
  • ड्रोन और छोटे मानवरहित वायान (UAV) जैसे खतरों के बढ़ने से अग्रिम क्षेत्र में शीघ्र चेतावनी प्रणाली की आवश्यकता बढ़ी है।
  • सैन्य इकाइयों को गतिशील रूप से तैनात करने की क्षमता से सीमावर्ती और पर्वतीय क्षेत्रों में परिचालन-लचीलापन बढ़ता है।

आर्थिक और औद्योगिक महत्त्व

  • स्वदेशी डिज़ाइन और उत्पादन से आयात पर निर्भरता घटती है और विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure, DAP) के तहत देसी उद्योग की भागीदारी से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों सहित आपूर्ति श्रृंखला को अवसर मिलते हैं।
  • उन्नत रडार तकनीक से इलेक्ट्रॉनिक्स और संवेदक (Sensor) विनिर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में क्षमता-निर्माण होता है।

नीतिगत महत्त्व

  • यह अनुबंध रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की नीति का व्यावहारिक उदाहरण है, जिससे अनुसंधान एवं विकास से उत्पादन तक की शृंखला सुदृढ़ होती है।
  • सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग से रक्षा उत्पादन-पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को बल मिलता है।

चुनौतियाँ

1. बदलता खतरा-परिदृश्य

  • ड्रोन की गति, आकार और उड़ान-पथ लगातार बदल रहे हैं, इसलिए किसी एक पीढ़ी का रडार शीघ्र पुराना पड़ सकता है।
  • कम परावर्तन क्षमता (Low Radar Cross Section) वाले लक्ष्यों की पहचान कठिन होती है।

2. स्वदेशी उत्पादन की आपूर्ति-श्रृंखला

  • रडार में प्रयुक्त कुछ उच्च-तकनीक घटक (जैसे विशेष इलेक्ट्रॉनिक्स और अर्धचालक) अब भी आयात पर निर्भर हो सकते हैं।
  • घटकों की उपलब्धता में विलंब से उत्पादन-कार्यक्रम प्रभावित होता है।

3. भूभाग और पर्यावरणीय बाधाएँ

  • पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्रों में क्लटर (Clutter) के कारण संकेतों की पहचान कठिन होती है।
  • तापमान और आर्द्रता की अति-स्थितियों में उपकरणों की विश्वसनीयता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है।

4. लागत, समय-सीमा और परियोजना प्रबंधन

  • बड़े रक्षा अनुबंधों में लागत-वृद्धि और वितरण में विलंब सामान्य समस्याएँ हैं।
  • तकनीकी परीक्षण, गुणवत्ता-आश्वासन और प्रशिक्षण के चरणों में समय लगता है, जिससे तैनाती धीमी हो सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
तकनीकी अप्रचलन ड्रोन और हवाई खतरों की प्रकृति बदलने से उन्नयन की निरंतर आवश्यकता
आयातित घटक उच्च-तकनीक पुर्जों पर निर्भरता से स्वदेशीकरण का लक्ष्य प्रभावित
भूभागीय बाधाएँ पहाड़ी और वन-क्षेत्रों में संकेत-क्लटर से पहचान की सटीकता घटती
परियोजना विलंब उत्पादन और वितरण में देरी से सैन्य तैयारी का समय-क्रम बिगड़ता
लागत प्रबंधन बड़े अनुबंधों में मूल्य-वृद्धि से संसाधनों के उपयोग पर दबाव
प्रशिक्षण और रखरखाव नई प्रणाली के संचालन और सेवा-व्यवस्था के लिए कुशल जनशक्ति की आवश्यकता

आगे की राह

  • रडार जैसे संवेदक-प्रणालियों के लिए उच्च-तकनीक घटकों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि आयात-निर्भरता क्रमशः कम हो।
  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और उद्योग के बीच प्रौद्योगिकी-हस्तांतरण की स्पष्ट व्यवस्था बने।
  • ड्रोन और निम्न-ऊँचाई खतरों के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए नियमित उन्नयन-चक्र सुनिश्चित किया जाए।
  • अनुबंधों में समय-सीमा, गुणवत्ता-मानक और दंड-प्रावधानों की निगरानी के लिए सुदृढ़ परियोजना-प्रबंधन तंत्र अपनाया जाए।
  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को रक्षा आपूर्ति-श्रृंखला से जोड़ने के लिए सहायक-इकाई (Vendor) विकास कार्यक्रम को गति दी जाए।
  • सीमावर्ती और पर्वतीय क्षेत्रों की भू-आकृति को ध्यान में रखकर परीक्षण-प्रोटोकॉल विकसित किए जाएँ।
  • सैन्य कर्मियों के लिए संचालन और रखरखाव का नियमित प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure) · स्वदेशीकरण (Indigenisation) · आत्मनिर्भर भारत (Atmanirbhar Bharat) · मेक इन इंडिया (Make in India) · रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council) · सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List) · वायु रक्षा (Air Defence) · रडार (Radar) · डीआरडीओ (DRDO) · रक्षा उत्पादन (Defence Production)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 53: संघ की कार्यपालिका शक्ति और रक्षा-प्रशासन
  • अनुच्छेद 246: सातवीं अनुसूची के अंतर्गत संघ का विधायी अधिकार

अवधारणा प्रवाह

निम्न-ऊँचाई खतरों (ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज़ मिसाइल) के बढ़ने से वायु रक्षा में क्षमता-अंतर उभरता है  →  थलसेना की आवश्यकता-विवरण तय होता है और रक्षा मंत्रालय के स्तर पर अधिग्रहण-प्रक्रिया आरंभ होती है  →  रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council, DAC) की स्वीकृति के बाद रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया के अंतर्गत निविदा-चयन होता है  →  DRDO की LRDE द्वारा विकसित उन्नत रडार के लिए 770 करोड़ रुपये का अनुबंध हस्ताक्षरित होता है  →  स्वदेशी उत्पादन, परीक्षण और आपूर्ति के चरण पूरे होते हैं  →  थलसेना की वायु रक्षा इकाइयों में तैनाती होती है  →  निचले स्तर पर निगरानी-क्षमता सुदृढ़ होती है और आयात-निर्भरता में कमी आती है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो भारत में रक्षा उपकरणों के अधिग्रहण से संबंधित हैं:
1. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया की ‘Buy (Indian-IDDM)’ श्रेणी में भारतीय अभिकल्पना, विकास और निर्माण वाले उपकरणों को प्राथमिकता दी जाती है।
2. रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) किसी प्रस्तावित अधिग्रहण के लिए स्वीकृति की आवश्यकता (Acceptance of Necessity) प्रदान करती है।
3. सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List) वित्त मंत्रालय द्वारा जारी की जाती है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: ‘Buy (Indian-IDDM)’ श्रेणी में स्वदेशी अभिकल्पना और विकास वाले उपकरणों को वरीयता मिलती है। कथन 2 सही है: DAC सैद्धांतिक स्वीकृति (AoN) देती है, जो अधिग्रहण प्रस्ताव की पहली औपचारिक मंज़ूरी है। कथन 3 गलत है: सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग द्वारा जारी होती है, वित्त मंत्रालय द्वारा नहीं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): निम्न-स्तरीय हल्का रडार निम्न ऊँचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और हेलीकॉप्टर जैसे हवाई खतरों का पता लगाने में उपयोगी है।
कारण (R): रडार विद्युत-चुंबकीय तरंगें प्रेषित करता है और परावर्तित प्रतिध्वनि के विश्लेषण से लक्ष्य की स्थिति एवं गति का अनुमान लगाता है।

उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — रडार का मूल सिद्धांत यह है कि वह विद्युत-चुंबकीय तरंगें भेजकर परावर्तित संकेतों से लक्ष्य की दूरी, दिशा और गति ज्ञात करता है। इसी क्षमता के कारण निम्न ऊँचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और हेलीकॉप्टर जैसे लक्ष्यों का पता लगाया जा सकता है, जो भूभाग से टकराकर पारंपरिक निगरानी से बच जाते हैं। अतः R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत की रक्षा अधिग्रहण नीति में स्वदेशीकरण पर बढ़ता बल सशस्त्र बलों की परिचालन तत्परता और घरेलू रक्षा विनिर्माण, दोनों को प्रभावित करता है। इस नीति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, बताइए कि यदि स्वदेशी क्षमता समय पर प्रणाली उपलब्ध न करा सके, तो सशस्त्र बलों की आपात आवश्यकताओं और आयात-निर्भरता के बीच संतुलन कैसे साधा जाना चाहिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल उत्तर बिंदु):
1. भूमिका: सुधारित निम्न-स्तरीय हल्का रडार (ILLWR) के लिए ₹770 करोड़ का अनुबंध, जो वायु रक्षा में स्वदेशी क्षमता का उदाहरण है; रडार (Radar) द्वारा निम्न ऊँचाई के ड्रोन और हवाई लक्ष्यों का पता लगाने की आवश्यकता का उल्लेख।
2. नीतिगत ढाँचा: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) में ‘Buy (Indian-IDDM)’, ‘Buy and Make (Indian)’ और ‘Make’ श्रेणियाँ; रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) द्वारा स्वीकृति (AoN); सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ (रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग द्वारा जारी); आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की भूमिका; रक्षा उत्पादन नीति के अंतर्गत निजी क्षेत्र और सार्वजनिक उपक्रमों की भागीदारी।
3. संस्थागत भूमिका: डीआरडीओ (DRDO) की प्रयोगशालाएँ (जैसे लॉजिस्टिक्स एवं रडार विकास से जुड़ी इकाइयाँ) द्वारा अभिकल्पना और विकास; उद्योग को तकनीक-हस्तांतरण; iDEX जैसी नवाचार पहलें।
4. समर्थन में तर्क: आयात-निर्भरता घटना, विदेशी मुद्रा बचत, औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का विकास, दीर्घकालिक रखरखाव और सेवा-क्षमता, संवेदनशील तकनीक पर संप्रभु नियंत्रण।
5. आलोचनात्मक पक्ष: विकास में विलंब, परीक्षण और प्रमाणन की लंबी अवधि, लागत-वृद्धि, एकल-विक्रेता निर्भरता, सीमित अनुसंधान-एवं-विकास निवेश, और आपात खरीद के लिए अपर्याप्त लचीलापन। कारगिल समीक्षा समिति (1999) की सिफारिशों के आलोक में रक्षा तैयारी के संस्थागत सुधारों का स्मरण।
6. संतुलित मत: स्वदेशीकरण को चरणबद्ध और परिणाम-आधारित रखना; आपात आवश्यकताओं हेतु सीमित और नियंत्रित आयात का विकल्प; उद्योग के लिए स्पष्ट मांग-संकेत और समयबद्ध परीक्षण।
7. निष्कर्ष: स्वदेशीकरण दीर्घकालिक सामरिक स्वायत्तता के लिए आवश्यक है, परंतु उसकी सफलता समयबद्धता, गुणवत्ता-आश्वासन और उद्योग-अनुसंधान समन्वय पर निर्भर है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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