रक्षा मंत्रालय ने 4,106 करोड़ रुपये के दो बड़े रक्षा सौदे किए हस्ताक्षरित

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रक्षा मंत्रालय ने 4,106 करोड़ रुपये के दो बड़े रक्षा सौदे किए हस्ताक्षरित

रक्षा खरीद प्रक्रियारक्षा आवश्यकतासमुद्री सुरक्षाअनुमोदनडीएसी द्वाराअनुबंध हस्ताक्षर₹4,106 करोड़स्वदेशी उत्पादनउद्योग भागीदारीसशस्त्र बलों में समावेपरिचालन क्षमता
रक्षा खरीद प्रक्रिया

✎ रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 और सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची के तहत अंतरिक्ष आधारित सैन्य संचार और पनडुब्बी-रोधी भारी टॉरपीडो की खरीद स्वदेशी उत्पादन व आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को आगे बढ़ाने का नीतिगत उपाय है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, रक्षा प्रौद्योगिकी में स्वदेशीकरण)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (समुद्री सुरक्षा, सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (मेक इन इंडिया, रक्षा विनिर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी)
  • Prelims: GSAT श्रृंखला के संचार उपग्रह (भू-स्थिर कक्षा, Geostationary Orbit), रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 (Defence Acquisition Procedure 2020), रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council), सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List), IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र), रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (Defence Space Agency), भारी टॉरपीडो और पनडुब्बी-रोधी युद्ध (Anti-Submarine Warfare), Ku और Ka बैंड की संचार आवृत्तियाँ
  • Essay: आत्मनिर्भर भारत और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी प्रौद्योगिकी का महत्व, अंतरिक्ष आधारित संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा: अवसर और चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 और सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची के तहत अंतरिक्ष आधारित सैन्य संचार और पनडुब्बी-रोधी भारी टॉरपीडो की खरीद स्वदेशी उत्पादन व आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को आगे बढ़ाने का नीतिगत उपाय है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

रक्षा मंत्रालय ने GSAT-7C संचार उपग्रह और वरुणास्त्र (Varunastra) भारी भार वाले टॉरपीडो की खरीद के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। समाचार शीर्षक के अनुसार दोनों अनुबंधों का कुल मूल्य ₹4,106 करोड़ है। यह कदम सशस्त्र बलों की सुरक्षित संचार क्षमता और पनडुब्बी-रोधी युद्ध की क्षमता को सुदृढ़ करने से जुड़ा है। इसमें दो अलग क्षेत्र एक साथ आते हैं: अंतरिक्ष आधारित सैन्य संचार और समुद्री रक्षा हथियार। दोनों ही मामलों में स्वदेशी उत्पादन और रक्षा अधिग्रहण की नियमित प्रक्रिया का पालन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसलिए यह समाचार रक्षा नीति, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण, तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • रक्षा अधिग्रहण में किसी परियोजना को मंजूरी देने के लिए रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council) सर्वोच्च निर्णय-निकाय है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं। मंजूरी के बाद ही अनुबंध की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 में स्वदेशी उपकरणों की खरीद को प्राथमिकता दी गई है। इसमें भारतीय उद्योग से खरीद (Buy Indian) और भारत में निर्माण (Make) जैसी श्रेणियाँ शामिल हैं।
  • सैन्य अंतरिक्ष गतिविधियों के समन्वय के लिए वर्ष 2019 में रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी की स्थापना की गई, जबकि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के लिए वर्ष 2020 में IN-SPACe की स्थापना हुई।
  • सशस्त्र बलों के लिए सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची जारी की जाती है, जिसमें शामिल वस्तुओं का आयात चरणबद्ध ढंग से रोका जाता है और उनके देश में निर्माण को बढ़ावा दिया जाता है।
  • भारत की समुद्री सीमा और हिंद महासागर क्षेत्र में पनडुब्बियों की बढ़ती उपस्थिति को देखते हुए पनडुब्बी-रोधी युद्ध क्षमता भारतीय नौसेना की प्राथमिक आवश्यकता मानी जाती है।

GSAT-7C संचार उपग्रह और वरुणास्त्र टॉरपीडो क्या हैं?

  • GSAT श्रृंखला के उपग्रह भारत के भू-स्थिर संचार उपग्रह हैं, जो पृथ्वी के सापेक्ष एक ही स्थान पर स्थिर दिखते हैं और इसी कारण दूरसंचार व प्रसारण में उपयोगी होते हैं। इन्हें इसरो (ISRO) के माध्यम से विकसित किया जाता है।
  • GSAT-7 श्रृंखला के उपग्रह विशेष रूप से सशस्त्र बलों की सुरक्षित और निर्बाध संचार आवश्यकताओं के लिए जाने जाते हैं। इस श्रृंखला के पिछले उपग्रह नौसेना और वायुसेना के लिए संचार सहायता देते रहे हैं।
  • सैन्य संचार उपग्रह युद्धपोतों, पनडुब्बियों, विमानों, ड्रोन और जमीनी इकाइयों के बीच सुरक्षित डेटा, आवाज़ और वीडियो संचार संभव बनाते हैं। सीमावर्ती और दूरस्थ क्षेत्रों में यह क्षमता विशेष महत्व रखती है।
  • भारी टॉरपीडो एक स्व-चालित पानी के नीचे चलने वाला हथियार है, जिसे पनडुब्बियों या जहाजों से छोड़ा जाता है। यह शत्रु की पनडुब्बियों और जहाजों को निशाना बनाने के लिए प्रयोग होता है।
  • पनडुब्बी-रोधी युद्ध में सोनार (Sonar) प्रणाली से लक्ष्य का पता लगाया जाता है और टॉरपीडो उसी दिशा में मार्गदर्शन प्राप्त करता है। कई आधुनिक टॉरपीडो तार-मार्गदर्शन (Wire Guidance) का प्रयोग भी करते हैं।
  • वरुणास्त्र को भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की तकनीकी पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है, जो स्वदेशी समुद्री हथियार प्रणालियों के विकास का उदाहरण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
सौदे की राशि रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) ने GSAT-7C उपग्रह और वरुणास्त्र हेवीवेट टॉरपीडो की खरीद के लिए कुल 4,106 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं।
GSAT-7C उपग्रह यह नौसेना और अन्य सशस्त्र बलों के लिए सुरक्षित उपग्रह संचार क्षमता को सुदृढ़ करने वाली परियोजना है। समुद्री क्षेत्र में विस्तृत कमान, नियंत्रण और संचार (C3) की आवश्यकता इसका मुख्य आधार है।
वरुणास्त्र हेवीवेट टॉरपीडो यह पनडुब्बी-रोधी और सतह-रोधी युद्ध के लिए प्रयुक्त भारी वज़न का टॉरपीडो है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है। इसकी खरीद स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देती है।
प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता स्वदेशी अनुसंधान से विकसित प्रणालियों को सशस्त्र बलों की आपूर्ति से अनुसंधान, विनिर्माण और परिचालन के बीच का चक्र पूरा होता है।
समुद्री सुरक्षा उपग्रह संचार और भारी टॉरपीडो, दोनों मिलकर भारत के समुद्री सुरक्षा ढाँचे की परिचालन दक्षता बढ़ाते हैं, विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र में।

महत्व

रणनीतिक

  • उपग्रह आधारित सुरक्षित संचार से नौसैनिक इकाइयों, पोतों और पनडुब्बियों के बीच निरंतर और विश्वसनीय संपर्क बना रहता है, जो दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में विशेष महत्त्व रखता है।
  • पनडुब्बी-रोधी क्षमता में वृद्धि से भारत की समुद्री निवारण (Maritime Deterrence) नीति को व्यावहारिक आधार मिलता है।
  • सामरिक संचार का स्वदेशी स्रोत होने से बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता घटती है और संवेदनशील सूचना की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

आर्थिक

  • स्वदेशी रक्षा खरीद से घरेलू उद्योग, एमएसएमई और आपूर्ति शृंखला को ठोस मांग मिलती है।
  • रक्षा उत्पादन में घरेलू हिस्सेदारी बढ़ने से विदेशी मुद्रा की बचत होती है और भुगतान संतुलन पर दबाव कम होता है।

तकनीकी और वैज्ञानिक

  • उपग्रह और टॉरपीडो जैसी उच्च-तकनीक प्रणालियों में अनुसंधान एवं विकास को व्यावहारिक दिशा मिलती है।
  • अंतरिक्ष आधारित सैन्य संचार भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और रक्षा अनुप्रयोगों के बीच तालमेल को गहरा करता है।

संस्थागत और नीतिगत

  • यह अनुबंध रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure, DAP) के अंतर्गत स्वदेशी श्रेणी को वरीयता देने की नीति का व्यावहारिक उदाहरण है।
  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List) में शामिल वस्तुओं के आयात पर रोक से घरेलू क्षमता के उपयोग को बल मिलता है।

चुनौतियाँ

1. उच्च लागत और बजट प्रबंधन

  • भारी रक्षा व्यय का सीधा असर राजकोषीय घाटे और अन्य विकास मदों के आवंटन पर पड़ता है।
  • बहु-वर्षीय अनुबंधों में भुगतान की समय-सारणी और वित्तीय प्रतिबद्धता का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण रहता है।

2. तकनीकी क्षमता और समय-सीमा

  • उपग्रह और टॉरपीडो जैसी प्रणालियों के विकास और परीक्षण में देरी की आशंका बनी रहती है।
  • स्वदेशी उत्पादन में उच्च-गुणवत्ता वाले घटकों की उपलब्धता पर निर्भरता एक व्यावहारिक बाधा है।

3. आपूर्ति शृंखला और आयातित घटक

  • उच्च तकनीक वाले कई इलेक्ट्रॉनिक और सेंसर घटक अब भी आयात पर निर्भर हैं।
  • वैश्विक आपूर्ति व्यवधान से परियोजनाओं की लागत और समय दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

4. अंतरिक्ष और समुद्री सुरक्षा के नए आयाम

  • अंतरिक्ष में सैन्य परिसंपत्तियों की सुरक्षा और उपग्रह संचार की साइबर-सुरक्षा नई चुनौतियाँ हैं।
  • हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती समुद्री गतिविधि के बीच निरंतर निगरानी और तत्परता बनाए रखना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वित्तीय दबाव बड़े रक्षा अनुबंधों से राजकोषीय संतुलन और अन्य सामाजिक-आर्थिक व्यय पर दबाव पड़ सकता है।
समय पर परियोजना पूर्ति विकास और परीक्षण चरणों में देरी से सेवा-प्रवेश का समय आगे खिसक सकता है।
आयातित घटकों पर निर्भरता महत्त्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स और सेंसर का आयात स्वदेशीकरण के लक्ष्य को सीमित करता है।
साइबर और अंतरिक्ष सुरक्षा उपग्रह संचार पर साइबर हमलों या जैमिंग का खतरा परिचालन सुरक्षा के लिए गंभीर है।
उद्योग क्षमता का विस्तार निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में उच्च-तकनीक उत्पादन क्षमता का सीमित होना आपूर्ति पर असर डाल सकता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • आत्मनिर्भर भारत अभियान (Atmanirbhar Bharat Abhiyan)

आगे की राह

  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया के अंतर्गत स्वदेशी श्रेणी को प्राथमिकता देकर घरेलू उद्योग की भागीदारी को और बढ़ाया जाए।
  • उपग्रह और टॉरपीडो परियोजनाओं के लिए स्पष्ट समय-सारणी और नियमित निगरानी की व्यवस्था की जाए।
  • महत्त्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक और सेंसर घटकों के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन देकर आयात पर निर्भरता कम की जाए।
  • अनुसंधान एवं विकास संस्थानों और निजी उद्योग के बीच सहयोग को संस्थागत रूप दिया जाए।
  • उपग्रह संचार की साइबर-सुरक्षा के लिए सुदृढ़ मानक और परीक्षण प्रणाली विकसित की जाए।
  • बहु-वर्षीय रक्षा व्यय के लिए राजकोषीय योजना के साथ समन्वय सुनिश्चित किया जाए।
  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची का नियमित पुनरीक्षण करके नई क्षमताओं को शामिल किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure) · आत्मनिर्भर भारत · रक्षा विनिर्माण में स्वदेशीकरण · सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List) · भारतीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) · सैन्य संचार उपग्रह और भू-स्थिर कक्षा · रक्षा औद्योगिक गलियारे (Defence Industrial Corridors) · रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council) · संघ सूची की प्रविष्टि 1 (रक्षा) · रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 53: राष्ट्रपति सशस्त्र बलों का सर्वोच्च कमांडर है
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 1: भारत की रक्षा संघ का विषय

अवधारणा प्रवाह

रक्षा आवश्यकता: समुद्री सुरक्षा और सुरक्षित संचार की बढ़ती मांग  →  रक्षा मंत्रालय द्वारा रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया के तहत खरीद प्रस्ताव की स्वीकृति  →  4,106 करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर: GSAT-7C उपग्रह और वरुणास्त्र टॉरपीडो  →  स्वदेशी उद्योग और रक्षा अनुसंधान संस्थानों की भूमिका में उत्पादन और आपूर्ति का चरण  →  सशस्त्र बलों में प्रणालियों का समावेश, जिससे परिचालन क्षमता और समुद्री निवारण सुदृढ़ होते हैं

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure) रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी की जाती है और समय-समय पर संशोधित होती है।
2. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में स्वदेश में डिज़ाइन, विकास और निर्माण (IDDM) श्रेणी को वरीयता दी गई है।
3. रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council) की अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं और वह अधिग्रहण प्रस्तावों को स्वीकृति (Acceptance of Necessity) प्रदान करती है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं, क्योंकि कोई भी कथन सही नहीं है

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है, क्योंकि रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी होती है और उसे समय-समय पर अद्यतन किया जाता है। कथन 2 सही है, क्योंकि स्वदेशी डिज़ाइन, विकास और निर्माण (IDDM) श्रेणी को प्रक्रिया में प्राथमिकता दी गई है। कथन 3 भी सही है, क्योंकि रक्षा अधिग्रहण परिषद की अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं और वह अधिग्रहण प्रस्तावों को स्वीकृति प्रदान करती है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): सैन्य संचार उपग्रह नौसैनिक और सीमावर्ती अभियानों में वास्तविक समय के संचार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
कारण (R): भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Orbit) में स्थित उपग्रह पृथ्वी के एक ही भाग के ऊपर स्थिर दिखाई देते हैं, इसलिए वे विस्तृत क्षेत्र को निरंतर कवरेज देते हैं।

नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) का सही स्पष्टीकरण है — सैन्य संचार उपग्रह सेनाओं, नौसेना और वायुसेना के बीच सुरक्षित और निरंतर संचार के लिए उपयोग होते हैं, इसलिए (A) सही है। भू-स्थिर कक्षा लगभग 35,786 किलोमीटर की ऊँचाई पर होती है, जहाँ से उपग्रह पृथ्वी के बड़े भाग पर निरंतर संपर्क बनाए रखता है, अतः (R) भी सही है और वही (A) का कारण स्पष्ट करता है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलन (Match) पर विचार कीजिए:
सूची I (संस्था)
A. भारतीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe)
B. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO)
C. एन.एस.आई.एल. (NSIL)

सूची II (कार्य)
1. सैन्य और असैन्य प्रौद्योगिकियों का डिज़ाइन और विकास
2. गैर-सरकारी अंतरिक्ष गतिविधियों को प्रोत्साहन और प्राधिकरण
3. अंतरिक्ष विभाग की उत्पाद और सेवाओं का वाणिज्यिक विपणन

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-2, B-1, C-3
  2. A-1, B-2, C-3
  3. A-3, B-1, C-2
  4. A-2, B-3, C-1

उत्तर: A-2, B-1, C-3 — IN-SPACe गैर-सरकारी अंतरिक्ष गतिविधियों को प्रोत्साहित और प्राधिकृत करता है (A-2)। DRDO रक्षा प्रौद्योगिकियों के डिज़ाइन और विकास का प्रमुख संगठन है (B-1)। NSIL अंतरिक्ष विभाग की उत्पाद और सेवाओं के वाणिज्यिक विपणन का कार्य करती है (C-3)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में सैन्य संचार उपग्रहों और स्वदेशी भारी टॉरपीडो जैसी प्रणालियों के लिए हाल के अनुबंध रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा को दर्शाते हैं। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया और स्वदेशीकरण की नीतियों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि स्वदेशी रक्षा विनिर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी के मार्ग में कौन-सी संरचनात्मक बाधाएँ अब भी बनी हुई हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) भूमिका: हाल में रक्षा मंत्रालय द्वारा कुल 4,106 करोड़ रुपये के अनुबंध, जिनमें GSAT-7C सैन्य संचार उपग्रह और स्वदेशी भारी टॉरपीडो ‘वरुणास्त्र’ शामिल हैं। इससे स्वदेशी प्रणालियों पर बढ़ती निर्भरता का संकेत मिलता है।
(2) संवैधानिक ढाँचा: संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 1 (रक्षा) के अंतर्गत रक्षा केंद्र का विषय है; अनुच्छेद 73 के अंतर्गत संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार रक्षा तक है; अनुच्छेद 246 विषयों का वितरण करता है।
(3) नीतिगत उपकरण: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (श्रेणियाँ जैसे Buy (Indian-IDDM), Buy and Make (Indian), Make); रक्षा अधिग्रहण परिषद की स्वीकृति; सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation List) द्वारा आयात प्रतिस्थापन; iDEX नवाचार मंच; रक्षा औद्योगिक गलियारे (उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु); ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत अभियान।
(4) अंतरिक्ष पक्ष: IN-SPACe (2020) द्वारा निजी अंतरिक्ष गतिविधियों का प्राधिकरण; NSIL की भूमिका; प्रस्तावित अंतरिक्ष गतिविधि विधेयक (Space Activities Bill) की अधूरी स्थिति।
(5) समालोचनात्मक विश्लेषण: सामरिक स्वायत्तता, विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता में कमी, तथा रोज़गार व औद्योगिक आधार का विस्तार। दूसरी ओर: परियोजनाओं में विलंब और लागत वृद्धि के संदर्भ में CAG जैसी संस्थाओं की टिप्पणियाँ, निजी क्षेत्र के लिए सीमित डिज़ाइन-स्तर की भागीदारी, परीक्षण सुविधाओं की कमी, और लघु-मध्यम उद्यमों की वित्तीय क्षमता।
(6) बाधाएँ: गुणवत्ता प्रमाणन और परीक्षण अवसंरचना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की शर्तें, निश्चित और दीर्घकालिक मांग का अभाव, और निर्यात नीति की अनिश्चितता।
(7) निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सुधार सुझाएँ, जैसे परीक्षण अवसंरचना का विस्तार, निजी क्षेत्र के साथ दीर्घकालिक अनुबंध, तथा विधिक ढाँचे को स्पष्ट करना।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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