कर्नाटक HC ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ नारे पर FIR रद्द की

कर्नाटक HC ने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' नारे पर FIR रद्द की

कर्नाटक HC ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ नारे पर FIR रद्द की

FIR रद्द करने की प्रक्रियाशिकायत दर्जदेरी से, वीडियो परजाँचपहचान नहीं, साक्ष्य नहींउच्च न्यायालय में याचिCrPC 482 के तहतअदालत का निर्णयFIR रद्द
FIR रद्द करने की प्रक्रिया

✎ उच्च न्यायालय धारा 482 CrPC (अब BNSS की धारा 528) के अंतर्गत, अनुच्छेद 226 व 227 के सहारे, प्राथमिकी तब रद्द कर सकता है जब अपराध के तत्व सिद्ध न हों या बिना अपेक्षित पूर्व स्वीकृति के कार्यवाही जारी रखना विधिसम्मत न हो।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): न्यायपालिका, उच्च न्यायालय की शक्तियाँ और मौलिक अधिकार  |  GS Paper II — शासन (Governance): आपराधिक न्याय प्रणाली और विधि-सुधार
  • Prelims: प्राथमिकी (First Information Report — FIR) और उसे रद्द करने का अधिकार क्षेत्र, अनुच्छेद 226 और 227: उच्च न्यायालय की रिट शक्ति और अधीक्षण शक्ति, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482: उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ (Inherent Powers); अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153B और 505(1)(b); अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 197 और 353, पूर्व स्वीकृति (Prior Sanction): कुछ अपराधों में अभियोजन से पहले सरकारी अनुमति की अनिवार्यता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 — 1 जुलाई 2024 से प्रभावी, अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(2): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन, State of Haryana v. Bhajan Lal (1992): प्राथमिकी रद्द करने के दिशानिर्देश
  • Essay: विधि का शासन और दांडिक प्रक्रिया का संभावित दुरुपयोग: अभियोजन की शक्ति बनाम नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था: युक्तियुक्त निर्बंधन की सीमाएँ

त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च न्यायालय धारा 482 CrPC (अब BNSS की धारा 528) के अंतर्गत, अनुच्छेद 226 व 227 के सहारे, प्राथमिकी तब रद्द कर सकता है जब अपराध के तत्व सिद्ध न हों या बिना अपेक्षित पूर्व स्वीकृति के कार्यवाही जारी रखना विधिसम्मत न हो।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल पीठ (न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद) ने एक याचिका पर मांड्या के वेस्ट पुलिस थाने में दर्ज वह प्राथमिकी रद्द कर दी, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 153B और 505(1)(b) के अंतर्गत पंजीकृत थी। मामला 18 दिसंबर 2022 को एक राजनीतिक दल के प्रदर्शन से जुड़ा था, जिसमें कथित रूप से ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए थे। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे प्रदर्शन में इस नारे का लगना अत्यंत असंभाव्य था। साथ ही अदालत ने पाया कि शिकायत घटना के लगभग दो वर्ष बाद, एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित वीडियो के आधार पर दर्ज कराई गई थी, और जाँच एजेंसी प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों की कोई ठोस पहचान नहीं कर सकी थी। अदालत के अनुसार, धारा 153B के तत्व सिद्ध नहीं होते थे और धारा 505 के अंतर्गत अपेक्षित पूर्व स्वीकृति भी प्राप्त नहीं की गई थी, इसलिए लंबित दांडिक कार्यवाही जारी रखना अनावश्यक माना गया। यह निर्णय दांडिक कार्यवाही को रद्द करने की उच्च न्यायालय की शक्ति, पूर्व स्वीकृति के महत्व और अभिव्यक्ति से जुड़े अपराधों में साक्ष्य की कसौटी को एक साथ सामने लाता है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 153B राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल लांछन और दावे से संबंधित है, जबकि धारा 505(1)(b) ऐसे कथनों से संबंधित है जो जनता में भय या आशंका उत्पन्न करें और सार्वजनिक शांति भंग करने की ओर ले जाएँ।
  • घटना 18 दिसंबर 2022 की है, जबकि शिकायत लगभग दो वर्ष बाद दर्ज हुई। विलंब और केवल वीडियो-आधारित साक्ष्य के कारण जाँच आगे नहीं बढ़ सकी।
  • दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 उच्च न्यायालय को न्याय के उद्देश्य की रक्षा, न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतर्निहित शक्तियाँ देती है। इसी आधार पर उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 और 227 के साथ इन कार्यवाहियों को रद्द कर सकता है।
  • CrPC की धारा 196 के अंतर्गत कुछ अपराधों में अभियोजन से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी। इसका उद्देश्य तुच्छ या राजनीतिक रूप से प्रेरित मामलों में अनावश्यक अभियोजन रोकना है।
  • 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू हो गई हैं। इसलिए ऐसी याचिकाओं का प्रक्रियात्मक आधार अब BNSS की धारा 528 के अंतर्गत आता है, जबकि मूल सिद्धांत पूर्ववत हैं।

प्राथमिकी रद्द करना (Quashing of FIR) क्या है?

  • प्राथमिकी रद्द करना वह न्यायिक उपाय है जिसमें उच्च न्यायालय किसी प्राथमिकी या उससे उत्पन्न दांडिक कार्यवाही को समाप्त कर देता है, ताकि न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।
  • इसका स्रोत मुख्य रूप से CrPC की धारा 482 (अब BNSS की धारा 528) में निहित अंतर्निहित शक्तियाँ हैं, और संवैधानिक आधार अनुच्छेद 226 एवं 227 है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने State of Haryana v. Bhajan Lal (1992) में ऐसी परिस्थितियाँ बताई हैं जिनमें प्राथमिकी रद्द की जा सकती है, जैसे आरोप स्वयं अपराध का गठन न करते हों या कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण हो।
  • अदालत यह देखती है कि प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व बनते हैं या नहीं, परंतु साक्ष्य का गहन मूल्यांकन सामान्यतः विचारण न्यायालय का कार्य है।
  • पूर्व स्वीकृति (Prior Sanction) ऐसी व्यवस्था है जिसमें कुछ अपराधों का संज्ञान लेने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेनी होती है। इसके बिना कार्यवाही कानूनन दोषपूर्ण मानी जा सकती है।
  • अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, किंतु अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था जैसे आधारों पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं।
  • विलंबित शिकायत और केवल अप्रमाणित वीडियो क्लिप पर आधारित प्रकरण में अभियुक्त की पहचान, कथन की प्रामाणिकता और आशय सिद्ध करना कठिन होता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
न्यायालय और अधिकार-क्षेत्र उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 226 और 227 तथा दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure, CrPC) की धारा 482 के अंतर्गत याचिका पर विचार किया। इससे स्पष्ट होता है कि लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) उच्च न्यायालय के पास है।
निरस्त किए गए आरोप भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code, IPC) की धारा 153B (राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध कथन) और धारा 505(1)(b) (लोक-शांति भंग करने वाले कथन) के अंतर्गत दर्ज प्रकरण को निरस्त किया गया। ये धाराएँ सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता से जुड़े अपराधों से संबंधित हैं।
निरस्तीकरण का मुख्य आधार न्यायालय ने दो आधार बताए: धारा 153 के आवश्यक तत्त्व सिद्ध होते प्रतीत नहीं हुए, और धारा 505 के अंतर्गत अभियोजन के लिए पूर्व स्वीकृति (Prior Sanction) प्राप्त नहीं की गई थी।
शिकायत में विलंब घटना 18 दिसंबर 2022 की थी, जबकि शिकायत लगभग दो वर्ष बाद दर्ज हुई और वह एक यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित वीडियो पर आधारित थी। विलंब और साक्ष्य की प्रकृति दोनों ने निर्णय को प्रभावित किया।
जाँच एजेंसी की सीमा जाँच एजेंसी प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों की पहचान और समाज पर ऐसे नारों के परिणामों के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं जुटा सकी। इससे जाँच की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठता है।

महत्व

विधिक महत्त्व

  • आपराधिक कार्यवाही के निरस्तीकरण में न्यायालय यह परखता है कि आरोप विधि के आवश्यक तत्त्वों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल आरोप लगा देना पर्याप्त आधार नहीं माना जाता।
  • धारा 505 जैसे अपराधों में पूर्व स्वीकृति की अनिवार्यता यह दर्शाती है कि कुछ प्रावधानों में अभियोजन से पहले प्रशासनिक या विधिक स्तर पर जाँच की व्यवस्था रखी गई है, ताकि उनका दुरुपयोग रोका जा सके।

संवैधानिक महत्त्व

  • भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) और उस पर लगने वाले उचित प्रतिबंध (अनुच्छेद 19(2)) के बीच संतुलन की न्यायिक परख इस निर्णय में दिखती है।
  • उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226 और 227 की शक्तियाँ नागरिकों को अनावश्यक आपराधिक अभियोजन से संरक्षण देने का माध्यम हैं।

प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक महत्त्व

  • प्राथमिकी (First Information Report, FIR) दर्ज करने और जाँच की गुणवत्ता पर यह निर्णय एक संदर्भ बिंदु बनता है।
  • वीडियो साक्ष्य के स्रोत, उसकी प्रामाणिकता और उसके प्रसार में लगे समय का परीक्षण आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए महत्त्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ

1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोक-व्यवस्था के बीच संतुलन

  • सार्वजनिक स्थानों पर दिए गए नारों या भाषणों से सामुदायिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है, इसलिए राज्य के पास विधिक हस्तक्षेप का अधिकार है।
  • परंतु हर विवादित कथन को अपराध मान लेने से वैध राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति पर अनुचित दबाव पड़ सकता है।

2. विलंबित शिकायत और साक्ष्य की विश्वसनीयता

  • घटना के दो वर्ष बाद दर्ज शिकायत में मूल स्थिति का पुनर्निर्माण कठिन होता है।
  • केवल ऑनलाइन प्रसारित वीडियो पर आधारित मामलों में स्रोत, संपादन और संदर्भ की जाँच आवश्यक है।

3. पूर्व स्वीकृति प्रक्रिया का पालन

  • कुछ अपराधों में अभियोजन से पहले सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति अनिवार्य है। इसका पालन न होने पर कार्यवाही टिक नहीं पाती।
  • प्रक्रियागत त्रुटियाँ पूरे प्रकरण को कमजोर करती हैं, जिससे न्याय व्यवस्था में समय और संसाधन दोनों की हानि होती है।

4. जाँच एजेंसी की क्षमता

  • प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों की पहचान न हो पाना दर्शाता है कि भीड़ से जुड़े मामलों में जाँच के आधुनिक साधनों की कमी हो सकती है।
  • वैज्ञानिक जाँच, वीडियो विश्लेषण और गवाहों के संरक्षण की व्यवस्था मजबूत करना आवश्यक है।

5. पुराने और नए आपराधिक कानूनों के बीच संक्रमण

  • यह प्रकरण भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत था, जबकि 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita, BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, BNSS) लागू हैं।
  • लंबित पुराने मामलों में किस कानून के प्रावधान लागू होंगे, यह व्याख्या का विषय बनता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता का विषय
अभिव्यक्ति बनाम सार्वजनिक व्यवस्था वैध अभिव्यक्ति और सामुदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाने वाले कथन के बीच स्पष्ट रेखा खींचना कठिन है।
विलंबित शिकायतें लंबे समय बाद दर्ज मामलों में साक्ष्य कमजोर होते हैं और निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
डिजिटल साक्ष्य की प्रामाणिकता यूट्यूब जैसे मंचों से लिए गए वीडियो का संदर्भ, संपादन और स्रोत जाँचे बिना उन पर निर्भरता जोखिमपूर्ण है।
पूर्व स्वीकृति का पालन स्वीकृति के बिना दर्ज अभियोजन अदालत में टिक नहीं पाता, जिससे प्रक्रियागत विलंब होता है।
जाँच की सीमाएँ पहचान और सबूत जुटाने की क्षमता कमजोर होने पर मामले अंततः निरस्त या लंबित हो जाते हैं।
कानूनों का संक्रमण पुराने और नए आपराधिक कानूनों के बीच लंबित मामलों के प्रबंधन में भ्रम की संभावना है।

आगे की राह

  • शिकायत दर्ज करने की समय-सीमा और विलंब के कारणों के लिए स्पष्ट प्रक्रिया बनाई जाए, ताकि पुराने और कमजोर साक्ष्यों पर आधारित मामले प्रारंभ में ही छाने जा सकें।
  • पूर्व स्वीकृति वाले अपराधों में प्रारंभिक जाँच और स्वीकृति प्राधिकारी की भूमिका को पहले से तय किया जाए।
  • वीडियो और डिजिटल साक्ष्य की प्रामाणिकता जाँचने के लिए फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाई जाए।
  • पुलिस को भीड़ से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक जाँच, वीडियो विश्लेषण और गवाह संरक्षण के प्रशिक्षण दिए जाएँ।
  • भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संक्रमण-काल में लंबित मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ।
  • अभिव्यक्ति और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा के सिद्धांतों को पुलिस और अभियोजन अधिकारियों तक प्रशिक्षण के माध्यम से पहुँचाया जाए।
  • झूठी या प्रेरित शिकायतों को रोकने के लिए शिकायतकर्ता की प्रारंभिक जाँच का तंत्र मजबूत किया जाए, ताकि नागरिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द दोनों सुरक्षित रहें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्राथमिकी रद्द करना (Quashing of FIR) · अंतर्निहित शक्ति (Inherent Powers) · धारा 482, दंड प्रक्रिया संहिता (Section 482, Code of Criminal Procedure) · भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) · अनुच्छेद 226 एवं 227 (Articles 226 and 227) · भजन लाल मामला, 1992 (State of Haryana v. Bhajan Lal) · भाषण की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) · अनुच्छेद 19(2) के युक्तियुक्त प्रतिबंध · सार्वजनिक व्यवस्था बनाम सार्वजनिक शांति (Public Order) · पूर्व स्वीकृति (Previous Sanction) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Court)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 19(1)(a): भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • अनुच्छेद 19(2): लोक-व्यवस्था पर उचित प्रतिबंध
  • अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, निरस्तीकरण याचिका का आधार
  • अनुच्छेद 227: उच्च न्यायालय का अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण

अवधारणा प्रवाह

एक राजनीतिक दल की रैली में कथित नारे से संबंधित वीडियो यूट्यूब पर प्रसारित हुआ।  →  वीडियो देखने के दो वर्ष बाद शिकायतकर्ता ने प्राथमिकी दर्ज कराई, और धारा 153B व 505(1)(b) IPC के अंतर्गत मामला बना।  →  जाँच एजेंसी प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों की पहचान और ठोस साक्ष्य नहीं जुटा सकी।  →  आरोपियों ने अनुच्छेद 226 व 227 तथा CrPC की धारा 482 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में याचिका दी।  →  न्यायालय ने पाया कि धारा 153 के तत्त्व सिद्ध नहीं होते और धारा 505 के लिए पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई थी।  →  आपराधिक कार्यवाही निरस्त की गई, और यह निर्णय अभिव्यक्ति, साक्ष्य और प्रक्रिया के संतुलन का उदाहरण बना।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन तथा अन्य प्रयोजनों के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
2. अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय का अधीक्षण केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है जो उसके मूल अधिकार-क्षेत्र (Original Jurisdiction) में आते हैं।
3. दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure) की धारा 482 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को संरक्षित करती है, किंतु इनका प्रयोग न्याय के उद्देश्य की पूर्ति या न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने हेतु ही किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है, क्योंकि अनुच्छेद 226 मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य प्रयोजनों के लिए रिट जारी करने की व्यापक शक्ति देता है। कथन 2 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 227 के अधीक्षण की शक्ति उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी न्यायालयों और अधिकरणों तक फैली है, मूल अधिकार-क्षेत्र तक सीमित नहीं। कथन 3 सही है, अतः उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित में से दो कथनों को पढ़िए। एक कथन अभिकथन (A) है और दूसरा कारण (R) है।

अभिकथन (A): किसी अपराध का संज्ञान लेने के लिए विधि द्वारा अपेक्षित पूर्व स्वीकृति के बिना दर्ज आपराधिक कार्यवाही को उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्ति के अंतर्गत रद्द कर सकता है।
कारण (R): पूर्व स्वीकृति एक वैधानिक शर्त है, जिसके अभाव में संज्ञान की वैधता प्रभावित होती है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — पूर्व स्वीकृति के बिना संज्ञान वैधानिक रूप से दोषपूर्ण माना जाता है, इसलिए ऐसी कार्यवाही को उच्च न्यायालय रद्द कर सकता है। इस प्रकार (R) सीधे (A) की व्याख्या करता है। दोनों कथन सही हैं और सम्बन्ध भी सही है।

Q3. राज्य हरियाणा बनाम भजन लाल (State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992) के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित दिशानिर्देश किस विषय से सम्बन्धित हैं?

  1. संविधान संशोधन की सीमा तय करना
  2. प्राथमिकी या शिकायत को रद्द करने हेतु उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति के प्रयोग के मानदंड
  3. राष्ट्रपति द्वारा दया-याचिका पर निर्णय की प्रक्रिया
  4. निर्वाचन आयोग की आचार संहिता लागू करने की शक्तियाँ

उत्तर: प्राथमिकी या शिकायत को रद्द करने हेतु उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति के प्रयोग के मानदंड — इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने उन परिस्थितियों की श्रेणियाँ बताईं जिनमें प्राथमिकी या कार्यवाही को धारा 482 (दंड प्रक्रिया संहिता) के अंतर्गत रद्द किया जा सकता है। यह मानदंड आज भी ऐसे मामलों में संदर्भित होते हैं। शेष विकल्प इस निर्णय से सम्बन्धित नहीं हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ किसी सार्वजनिक प्रदर्शन में लगाए गए उत्तेजक नारों से जुड़े आपराधिक प्रकरण में उच्च न्यायालय द्वारा प्राथमिकी रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति के प्रयोग का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या दो वर्ष के विलंब से दर्ज शिकायत, जाँच में पहचान न हो पाना और पूर्व स्वीकृति का अभाव ऐसी कार्यवाही को समाप्त करने के लिए पर्याप्त आधार हैं? भाषण की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के संवैधानिक संतुलन के संदर्भ में अपने तर्क दीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर की रूपरेखा: (1) भूमिका: कर्नाटक उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति वी. श्रीषानंद) द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 153ख और 505(1)(ख) के अंतर्गत लंबित कार्यवाही रद्द करने का तथ्यात्मक सार; 18 दिसंबर 2022 की घटना, मंड्या पुलिस थाने में दो वर्ष बाद दर्ज शिकायत, वीडियो के आधार पर कार्यवाही। (2) संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा: अनुच्छेद 226 और 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शक्तियाँ; दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 का संगत उपबंध) द्वारा अंतर्निहित शक्ति; धारा 196 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कुछ अपराधों में पूर्व स्वीकृति की अनिवार्यता; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संगत उपबंध। (3) न्यायिक मानदंड: राज्य हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) के दिशानिर्देश; प्रक्रिया के दुरुपयोग और न्याय के हित का सिद्धांत; प्राथमिकी दर्ज करने की अनिवार्यता पर ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2013/2014, संविधान पीठ) का संदर्भ, और प्रारंभिक जाँच का अवसर। (4) मौलिक अधिकार का पक्ष: अनुच्छेद 19(1)(क) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और भारत की संप्रभुता तथा अखंडता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध; श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में ‘उत्तेजना’ (incitement) और ‘निकट एवं वर्तमान संकट’ की कसौटी; केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) में केवल हिंसा-प्रेरक अभिव्यक्ति को दंडनीय मानने का सिद्धांत; बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995) में केवल नारों को हिंसा-प्रेरक न मानने का निर्णय। (5) विरोधी दृष्टिकोण: राज्य का सामुदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने का दायित्व; अपराध की गंभीरता के आधार पर जाँच जारी रखने का तर्क; शिकायतकर्ता के अधिकार; विलंब की स्थिति में साक्ष्य-क्षति का प्रश्न। (6) तर्कपूर्ण निष्कर्ष: विलंब, पहचान का अभाव और पूर्व स्वीकृति की कमी को स्वतंत्र आधार मानना; प्रत्येक मामले में तथ्यों की जाँच; नियंत्रित और संतुलित न्यायिक हस्तक्षेप का संतुलन; सुझाव के रूप में शीघ्र जाँच, स्वीकृति-प्रक्रिया की पारदर्शिता और अभिव्यक्ति व सार्वजनिक व्यवस्था के बीच अनुपातिकता (proportionality) की कसौटी।

स्रोत: verdictum.in

Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: हाल ही में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे से संबंधित एक मामले में FIR रद्द कर दी। यह घटना किस राजनीतिक दल की रैली से जुड़ी थी?

  1. A) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  2. B) भारतीय जनता पार्टी
  3. C) जनता दल (सेक्युलर)
  4. D) आम आदमी पार्टी

उत्तर: B) भारतीय जनता पार्टी — कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की रैली में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे से संबंधित FIR को रद्द कर दिया, इसे ‘अकल्पनीय’ बताया।

Mains: कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे से संबंधित FIR को रद्द करने के हालिया फैसले के संदर्भ में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन पर कर्नाटक राज्य के विशेष संदर्भ में चर्चा कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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