आरबीआई दर वृद्धि: मुद्रास्फीति, कच्चे तेल और वैश्विक दरों का महत्व समझें

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आरबीआई दर वृद्धि: मुद्रास्फीति, कच्चे तेल और वैश्विक दरों का महत्व समझें

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RBI दर वृद्धि का प्रभाव

✎ भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना है, जिसके लिए वह रेपो दर जैसे उपकरणों का उपयोग करके मुद्रास्फीति को नियंत्रित करता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, संवृद्धि, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।  |  GS Paper III — सरकारी बजट के मुख्य घटक।  |  GS Paper III — मुद्रास्फीति और इसका प्रबंधन।
  • Prelims: रेपो दर (Repo Rate), मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC), मुद्रास्फीति (Inflation), उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI), राजकोषीय नीति (Fiscal Policy), मात्रात्मक सहजता (Quantitative Easing)
  • Essay: भारत में आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए मौद्रिक नीति की भूमिका।, मुद्रास्फीति नियंत्रण: चुनौतियाँ और समाधान।

त्वरित पुनरावृत्ति: भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना है, जिसके लिए वह रेपो दर जैसे उपकरणों का उपयोग करके मुद्रास्फीति को नियंत्रित करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा मौद्रिक नीति समिति (MPC) की आगामी बैठक में नीतिगत दरों, विशेष रूप से रेपो दर (Repo Rate) में वृद्धि की संभावना है। विश्लेषकों का मानना है कि RBI मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने और वैश्विक आर्थिक रुझानों के जवाब में यह कदम उठा सकता है। इस संभावित वृद्धि से अर्थव्यवस्था में उधार लेने की लागत बढ़ेगी, जिससे जमा और ऋण दोनों पर ब्याज दरें प्रभावित होंगी।

पृष्ठभूमि

  • पिछले लगभग दो वर्षों से मौद्रिक सहजता (Monetary Accommodation) की नीति अपनाने के बाद, भारतीय रिज़र्व बैंक अब नीतिगत समर्थन वापस लेने की तैयारी में है।
  • अगस्त MPC की बैठक के कार्यवृत्त (minutes) में पहले ही ऐसे कदम का संकेत दिया गया था, और तब से घरेलू मुद्रास्फीति और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) के आंकड़े, साथ ही अमेरिका में उच्च ब्याज दरें, बॉन्ड यील्ड और कमोडिटी की कीमतें, RBI पर दरें बढ़ाने का दबाव डाल रही हैं।
  • घरेलू स्तर पर खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) व्यापक होती जा रही है, जिसका मुख्य कारण ऊर्जा की ऊँची कीमतें और खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि है। अल नीनो (El Niño) से संबंधित व्यवधानों का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है।
  • वैश्विक स्तर पर, पश्चिम एशिया में संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध ने आर्थिक अनिश्चितता को बढ़ाया है, जिससे आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) और देश के बाहरी संतुलन पर प्रभाव की चिंताएँ बढ़ गई हैं।
  • महाराष्ट्र के कई तालुकों में सूखे की घोषणा और अन्य राज्यों में भी सूखे की संभावना, साथ ही जलाशयों का निम्न स्तर, रबी की फसल को प्रभावित कर सकता है, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ेगा।

मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति नियंत्रण

  • मौद्रिक नीति (Monetary Policy) भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अपनाई गई वह नीति है जिसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (Money Supply) और ऋण की उपलब्धता को विनियमित करना है ताकि मूल्य स्थिरता (Price Stability) बनाए रखी जा सके और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके।
  • रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। रेपो दर में वृद्धि से बैंकों के लिए उधार लेना महंगा हो जाता है, जिससे वे आगे ग्राहकों को दिए जाने वाले ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति कम होती है।
  • मुद्रास्फीति वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में सामान्य वृद्धि है, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो जाती है। RBI का प्राथमिक लक्ष्य मुद्रास्फीति को एक निश्चित सीमा के भीतर रखना है, जो वर्तमान में 4% (+/- 2%) है।
  • मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) एक छह सदस्यीय निकाय है, जिसमें RBI के तीन अधिकारी और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन बाहरी सदस्य शामिल होते हैं। यह समिति भारत में बेंचमार्क ब्याज दर तय करने के लिए जिम्मेदार है।
  • मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए RBI विभिन्न उपकरणों का उपयोग करता है, जिनमें रेपो दर, रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate), नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR) और सांविधिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR) शामिल हैं।
  • उच्च ब्याज दरें उपभोक्ता मांग (Consumer Demand) और निवेश (Investment) को हतोत्साहित करती हैं, जिससे मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने में मदद मिलती है। हालांकि, इससे आर्थिक संवृद्धि की गति धीमी हो सकती है।
  • वैश्विक कारक जैसे कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरें और भू-राजनीतिक तनाव भी भारत की मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति निर्णयों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
रेपो दर में संभावित वृद्धि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा मुद्रास्फीति (Inflation) पर नियंत्रण पाने और अर्थव्यवस्था में अत्यधिक मांग को कम करने का प्रयास।
मुद्रास्फीति का व्यापक होना खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि के साथ-साथ अल नीनो (El Niño) के प्रभावों के कारण खुदरा मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ना, जिससे नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता हुई।
वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि से RBI पर घरेलू दरों को बढ़ाने का दबाव, ताकि पूंजी बहिर्वाह (Capital Outflow) को रोका जा सके।
कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से आयातित मुद्रास्फीति का खतरा और देश के बाहरी संतुलन (External Balance) पर नकारात्मक प्रभाव।
GDP वृद्धि और मुद्रास्फीति अनुमानों का संशोधन RBI द्वारा अर्थव्यवस्था की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपने आर्थिक अनुमानों को समायोजित करना, जो भविष्य की मौद्रिक नीति का आधार बनेगा।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • रेपो दर में वृद्धि से उधार लेने की लागत बढ़ेगी, जिससे व्यक्तिगत, गृह और वाहन ऋण सहित सभी प्रकार के ऋण महंगे हो जाएंगे।
  • उच्च ब्याज दरें जमा दरों को भी बढ़ाएंगी, जिससे बचत को प्रोत्साहन मिलेगा और उपभोग मांग पर अंकुश लगेगा।
  • यह कदम मुद्रास्फीति की उम्मीदों को नियंत्रित करने में मदद करेगा, जिससे दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता सुनिश्चित होगी।

मौद्रिक नीति का महत्व

  • RBI की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) का यह निर्णय लगभग दो वर्षों के ‘समायोज्य रुख’ (Accommodative Stance) से नीतिगत समर्थन को वापस लेने की शुरुआत का संकेत देता है।
  • यह वैश्विक आर्थिक रुझानों, विशेष रूप से अमेरिकी ब्याज दरों और कमोडिटी की कीमतों के प्रति भारत की मौद्रिक नीति की प्रतिक्रिया को दर्शाता है।
  • यह कदम केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता और अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए उसके जनादेश को रेखांकित करता है।

सामाजिक प्रभाव

  • उच्च ऋण लागत से उपभोक्ता खर्च और निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों में कुछ मंदी आ सकती है।
  • मुद्रास्फीति पर नियंत्रण से विशेष रूप से गरीब और निश्चित आय वर्ग के लोगों के लिए क्रय शक्ति (Purchasing Power) की रक्षा होगी।
  • कृषि क्षेत्र पर अल नीनो के संभावित प्रभावों और सूखे की आशंका से ग्रामीण आय और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

चुनौतियाँ

1. मुद्रास्फीति पर नियंत्रण

  • खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि, साथ ही अल नीनो से संबंधित व्यवधानों के कारण खुदरा मुद्रास्फीति का व्यापक होना एक बड़ी चुनौती है।
  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक तनाव भी मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ा रहे हैं।

2. आर्थिक संवृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन

  • ब्याज दरों में वृद्धि से मुद्रास्फीति नियंत्रित हो सकती है, लेकिन इससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी होने का भी जोखिम है।
  • RBI को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके नीतिगत निर्णय संवृद्धि को अनावश्यक रूप से बाधित न करें।

3. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता

  • पश्चिम एशिया में संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी भू-राजनीतिक घटनाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता पैदा कर रही हैं।
  • कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी झटके पैदा करती है।

4. मौसम संबंधी जोखिम

  • अल नीनो की स्थिति का विस्तार और कम जलाशय स्तर रबी की फसल को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति और बढ़ सकती है।
  • सूखे की घोषणा और अन्य राज्यों में इसकी संभावना कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
घरेलू खुदरा मुद्रास्फीति खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि तथा अल नीनो के प्रभाव से व्यापक दबाव।
वैश्विक ब्याज दरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दर वृद्धि से पूंजी बहिर्वाह का दबाव और घरेलू दरों में वृद्धि की आवश्यकता।
कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर $100 प्रति बैरल से ऊपर की कीमतें आयातित मुद्रास्फीति और बाहरी संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।
अल नीनो और सूखा कम जलाशय स्तर और सूखे की आशंका से रबी की फसल प्रभावित होने तथा खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम।
आर्थिक संवृद्धि बनाम मूल्य स्थिरता मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए दर वृद्धि से आर्थिक संवृद्धि धीमी होने की संभावना।

आगे की राह

  • भारतीय रिज़र्व बैंक को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और संवृद्धि को बनाए रखने के बीच एक सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा।
  • सरकार को आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने के लिए कदम उठाने चाहिए, जैसे कि खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुव्यवस्थित करना और आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी को रोकना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश को बढ़ावा देकर ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाई जानी चाहिए, जिससे कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भरता कम हो।
  • कृषि क्षेत्र को मौसम संबंधी झटकों से बचाने के लिए सिंचाई सुविधाओं में सुधार और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) को मौद्रिक नीति के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए, ताकि समग्र आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
  • वैश्विक आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक घटनाओं की बारीकी से निगरानी करनी चाहिए, ताकि संभावित बाहरी झटकों के लिए तैयार रहा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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अवधारणा प्रवाह

उच्च मुद्रास्फीति और वैश्विक दर वृद्धि का दबाव  →  RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक  →  रेपो दर में संभावित वृद्धि  →  उधार लेने की लागत में वृद्धि  →  मांग में कमी और मुद्रास्फीति नियंत्रण  →  आर्थिक संवृद्धि पर संभावित प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारत में बेंचमार्क ब्याज दरों का निर्धारण करती है।
2. MPC में छह सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं।
3. रेपो दर में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में उधार लेने की लागत कम होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। MPC भारत में मौद्रिक नीति का निर्धारण करती है, जिसमें बेंचमार्क ब्याज दरें शामिल हैं। कथन 2 सही है। MPC में छह सदस्य होते हैं, तीन RBI से (गवर्नर, डिप्टी गवर्नर और एक अधिकारी) और तीन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त। कथन 3 गलत है। रेपो दर में वृद्धि से बैंकों के लिए RBI से उधार लेना महंगा हो जाता है, जिससे वे आगे ग्राहकों को अधिक ब्याज दरों पर ऋण देते हैं, परिणामस्वरूप उधार लेने की लागत बढ़ती है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कारक भारत में मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकता है?
1. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें
2. एल नीनो घटना
3. अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि
4. सरकारी व्यय में वृद्धि
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए सभी कारक भारत में मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकते हैं। कच्चे तेल की कीमतें आयातित मुद्रास्फीति का कारण बनती हैं। एल नीनो कृषि उत्पादन को प्रभावित कर खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ा सकता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि से पूंजी बहिर्वाह हो सकता है और रुपये का अवमूल्यन हो सकता है, जिससे आयात महंगा हो जाता है। सरकारी व्यय में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ सकती है, जिससे मांग-जनित मुद्रास्फीति हो सकती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, उन प्रमुख वैश्विक और घरेलू कारकों पर भी चर्चा कीजिए जो वर्तमान में भारत की मुद्रास्फीति दर को प्रभावित कर रहे हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में मौद्रिक नीति समिति (MPC) की संरचना, उसके उद्देश्यों (मुख्य रूप से मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण) और रेपो दर जैसे उपकरणों का उल्लेख होना चाहिए। मुद्रास्फीति नियंत्रण में इसकी प्रभावशीलता का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें, जिसमें इसकी सीमाओं और राजकोषीय नीति के साथ समन्वय की आवश्यकता शामिल हो। दूसरे भाग में, वर्तमान मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले कारकों को विस्तार से बताएं, जैसे कि कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरें (विशेषकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की), भू-राजनीतिक तनाव (रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष), एल नीनो प्रभाव, घरेलू मांग और आपूर्ति-पक्ष के व्यवधान। इन कारकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को भी स्पष्ट करें।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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