वैश्विक सौर सहयोग: BRE शिखर सम्मेलन में भारत की प्रतिबद्धता

वैश्विक सौर सहयोग: BRE शिखर सम्मेलन में भारत की प्रतिबद्धता

वैश्विक सौर सहयोग: BRE शिखर सम्मेलन में भारत की प्रतिबद्धता

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का विकासशुरुआतभारत और फ्रांसउद्देश्यसौर ऊर्जा को बढ़ावाविस्तारसदस्य देशों का सहयोगपरिणामपरियोजनाओं को सहयोग
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का विकास

✎ अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की शुरुआत 2015 में भारत और फ्रांस की पहल से हुई, इसका मुख्यालय गुरुग्राम में है, और इसकी प्रारंभिक सदस्यता कर्क और मकर रेखा के बीच के देशों तक सीमित थी।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और अंतरराष्ट्रीय संगठन/समूह, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग)  |  GS Paper III — पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन (नवीकरणीय ऊर्जा, पेरिस समझौता, ऊर्जा संक्रमण)  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी / ऊर्जा सुरक्षा (सौर ऊर्जा प्रौद्योगिकी, ऊर्जा भंडारण और विद्युत ग्रिड एकीकरण)
  • Prelims: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance — ISA) और उसका मुख्यालय (गुरुग्राम, हरियाणा), ISA की सदस्यता: कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच स्थित देश, ISA का आरंभ (2015, पेरिस में COP21 के दौरान भारत और फ्रांस की पहल), वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (One Sun One World One Grid — OSOWOG) की अवधारणा, राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission) और उसका राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) से संबंध, मिशन इनोवेशन (Mission Innovation) और स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान में सहयोग, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) की भूमिका तथा गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता लक्ष्य
  • Essay: अंतरराष्ट्रीय सौर सहयोग: ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु न्याय और विकासशील देशों की भागीदारी, नवीकरणीय ऊर्जा में वैश्विक सहयोग: विकसित और विकासशील देशों के बीच प्रौद्योगिकी और वित्त की चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की शुरुआत 2015 में भारत और फ्रांस की पहल से हुई, इसका मुख्यालय गुरुग्राम में है, और इसकी प्रारंभिक सदस्यता कर्क और मकर रेखा के बीच के देशों तक सीमित थी।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने BRE शिखर सम्मेलन एवं प्रदर्शनी 2026 (BRE Summit & Expo 2026) में वैश्विक सौर सहयोग के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे मंचों के माध्यम से सौर ऊर्जा के विस्तार, प्रौद्योगिकी साझेदारी और सदस्य देशों के बीच सहयोग के महत्व को रेखांकित किया गया। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी घरेलू क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का प्रयास कर रहा है।

पृष्ठभूमि

  • वर्ष 2015 में पेरिस में आयोजित जलवायु सम्मेलन (COP21) के दौरान भारत और फ्रांस ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना और इसके लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता जुटाना है।
  • ISA का मुख्यालय भारत में गुरुग्राम (हरियाणा) में स्थित है। इसके ढांचा समझौते (Framework Agreement) को संयुक्त राष्ट्र की संधि के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • वर्ष 2018 में भारत ने OSOWOG की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों के बीच सौर ऊर्जा के आदान-प्रदान हेतु अंतरमहाद्वीपीय विद्युत ग्रिड के विचार पर चर्चा हुई।
  • भारत ने वर्ष 2021 में ग्लासगो में COP26 के दौरान पंचामृत लक्ष्यों की घोषणा की, जिसमें 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य शामिल है।
  • सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का घरेलू कार्यक्रम राष्ट्रीय सौर मिशन (2010) से आरंभ हुआ, जिसे राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के अंतर्गत रखा गया था।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) क्या है?

  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने के लिए सदस्य देशों का अंतरसरकारी मंच है, जिसका आरंभ 2015 में भारत और फ्रांस की पहल से हुआ।
  • इसकी प्राथमिक सदस्यता उन देशों तक सीमित थी जो कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच या उनके आसपास स्थित हैं, जहाँ सौर विकिरण की उपलब्धता अधिक होती है। बाद में ढांचा समझौते में संशोधन कर संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों को इसमें शामिल होने की अनुमति दी गई।
  • ISA का मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा) में है, और यह सौर ऊर्जा से संबंधित अनुसंधान, क्षमता निर्माण तथा वित्तपोषण को सुगम बनाने का कार्य करता है।
  • OSOWOG की अवधारणा के अंतर्गत सौर ऊर्जा को सीमाओं के पार विद्युत ग्रिड के माध्यम से साझा करने का विचार है, ताकि सौर ऊर्जा उत्पादन के समय-क्षेत्रीय अंतर का लाभ उठाया जा सके।
  • सौर ऊर्जा की प्रमुख चुनौतियों में रुक-रुक कर उपलब्ध होना (intermittency) और ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता शामिल है, जिनके समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रौद्योगिकी साझेदारी महत्वपूर्ण है।
  • मिशन इनोवेशन (Mission Innovation) एक अलग मंच है जिसमें सरकारें स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाने के लिए सहयोग करती हैं; भारत इसका सदस्य है।
  • भारत में सौर ऊर्जा का विस्तार सौर पार्कों, नवीकरणीय ऊर्जा खरीद दायित्व और विद्युत ग्रिड के सुदृढ़ीकरण जैसे उपायों से जुड़ा है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) भारत और फ्रांस की पहल पर वर्ष 2015 में पेरिस के COP21 सम्मेलन में शुरू हुआ। इसका मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा) में है।
सदस्यता का स्वरूप मूल रूप से सूर्य-समृद्ध देशों (कर्क और मकर रेखा के बीच) के लिए बना था। बाद में संशोधन के माध्यम से इसकी सदस्यता संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के लिए खोल दी गई।
वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (OSOWOG) सीमापार विद्युत ग्रिड के माध्यम से सौर ऊर्जा के वैश्विक आदान-प्रदान का दीर्घकालिक लक्ष्य, जिसे गठबंधन के अंतर्गत आगे बढ़ाया जा रहा है।
सौर ऊर्जा का तकनीकी सहयोग क्षमता निर्माण, अनुसंधान, प्रशिक्षण और सस्ती वित्तीय पहुँच के माध्यम से विकासशील देशों में सौर परियोजनाओं की लागत और जोखिम घटाना।
जलवायु लक्ष्यों से संबंध पेरिस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के लक्ष्यों की पूर्ति में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भूमिका।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • विकासशील देशों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए पूँजी और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता बढ़ाकर निवेश को गति मिलती है।
  • सौर ऊर्जा निर्माण और आपूर्ति शृंखला में साझेदारी से व्यापार और रोज़गार के नए अवसर बनते हैं।
  • ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य भारत के साथ-साथ सहयोगी देशों के भुगतान संतुलन पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।

सामरिक एवं कूटनीतिक महत्व

  • दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से भारत की विदेश नीति में ऊर्जा संक्रमण एक प्रमुख विषय बन गया है।
  • साझा मंच पर नेतृत्व भारत की अंतरराष्ट्रीय जलवायु कूटनीति की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है।

पर्यावरणीय महत्व

  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने में सहायता मिलती है।
  • सौर ऊर्जा का विस्तार वायु प्रदूषण और ऊर्जा सुरक्षा, दोनों की चुनौतियों के समाधान में योगदान देता है।

ऊर्जा सुरक्षा एवं सतत विकास

  • विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों तक विद्युत पहुँच को बढ़ाने में उपयोगी है।
  • सौर ऊर्जा के वैश्विक विस्तार से सतत विकास लक्ष्यों, विशेषकर स्वच्छ और किफायती ऊर्जा से जुड़े लक्ष्य, की प्राप्ति में मदद मिलती है।

चुनौतियाँ

1. वित्तीय बाधाएँ

  • सौर ऊर्जा परियोजनाओं में प्रारंभिक पूँजी लागत अधिक होती है, और विकासशील देशों के लिए रियायती वित्त सीमित है।
  • जलवायु वित्त के वादों और वास्तविक प्रवाह के बीच अंतर बना हुआ है।

2. प्रौद्योगिकी और आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता

  • सौर पैनल और उसके घटकों के विनिर्माण में कुछ देशों का अत्यधिक केंद्रण आपूर्ति जोखिम पैदा करता है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े प्रश्न सहयोग की गति को प्रभावित करते हैं।

3. ग्रिड एकीकरण और ऊर्जा भंडारण

  • सौर ऊर्जा की परिवर्तनशील प्रकृति के कारण ग्रिड स्थिरता और भंडारण की चुनौती बनी रहती है।
  • सीमापार विद्युत संपर्क के लिए तकनीकी, नियामकीय और राजनयिक समन्वय आवश्यक है।

4. जलवायु न्याय और विकासशील देशों की आकांक्षाएँ

  • समान किंतु विभेदित उत्तरदायित्व के सिद्धांत के आधार पर विकसित और विकासशील देशों के दायित्वों पर मतभेद बने रहते हैं।
  • ऊर्जा संक्रमण के दौरान विकासशील देशों की विकास संबंधी आवश्यकताओं का संतुलन एक चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वित्त की उपलब्धता सौर परियोजनाओं के लिए रियायती और दीर्घकालिक वित्त की कमी से कई देशों में परियोजनाएँ धीमी पड़ती हैं।
आपूर्ति शृंखला का केंद्रण सौर घटकों के विनिर्माण में सीमित देशों पर निर्भरता से मूल्य और आपूर्ति में अस्थिरता का जोखिम है।
ग्रिड और भंडारण परिवर्तनशील उत्पादन के कारण विद्युत ग्रिड का संतुलन बनाए रखना कठिन है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण नवीनतम तकनीक तक सुलभ पहुँच और क्षमता निर्माण के बिना सहयोग के परिणाम सीमित रहते हैं।
सदस्य देशों की भागीदारी गठबंधन के लक्ष्यों को व्यवहार में उतारने के लिए सदस्य देशों की नीतिगत और वित्तीय प्रतिबद्धता में एकरूपता आवश्यक है।

आगे की राह

  • रियायती वित्त और जोखिम-शमन तंत्र के माध्यम से विकासशील देशों में सौर परियोजनाओं के लिए पूँजी जुटाने की व्यवस्था सुदृढ़ की जाए।
  • सौर विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला में विविधीकरण के लिए क्षेत्रीय और द्विपक्षीय साझेदारियों को बढ़ावा दिया जाए।
  • क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण और तकनीकी ज्ञान साझा करने के कार्यक्रम विकासशील देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किए जाएँ।
  • भंडारण प्रौद्योगिकी और ग्रिड आधुनिकीकरण में अनुसंधान एवं निवेश को प्राथमिकता दी जाए।
  • सीमापार विद्युत ग्रिड परियोजनाओं के लिए तकनीकी मानकों, नियामकीय ढाँचे और द्विपक्षीय समझौतों पर समन्वय बढ़ाया जाए।
  • सौर ऊर्जा सहयोग को पेरिस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय योगदान लक्ष्यों और जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं से जोड़कर मापने योग्य लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ।
  • सदस्य देशों के बीच ज्ञान, आँकड़े और सर्वोत्तम प्रथाओं के नियमित आदान-प्रदान हेतु संस्थागत तंत्र मज़बूत किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) · सौर कूटनीति · एक सूर्य एक विश्व एक ग्रिड · पेरिस समझौता (Paris Agreement) · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) · गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता लक्ष्य · जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन · आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता · जलवायु वित्त · दक्षिण-दक्षिण सहयोग

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51 – अंतरराष्ट्रीय शांति और संधि-दायित्वों का सम्मान
  • अनुच्छेद 253 – अंतरराष्ट्रीय समझौतों के कार्यान्वयन हेतु विधायी शक्ति
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची, प्रविष्टि 14 – विदेशों के साथ संधियाँ और करार

अवधारणा प्रवाह

विकासशील देशों में ऊर्जा की माँग और जलवायु लक्ष्यों के दबाव से सौर ऊर्जा का महत्व बढ़ा।  →  भारत और फ्रांस की पहल पर अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना हुई, जिसकी सदस्यता बाद में विस्तृत की गई।  →  गठबंधन के अंतर्गत प्रौद्योगिकी, क्षमता निर्माण और वित्त के माध्यम से सदस्य देशों में सौर परियोजनाओं को सहयोग मिला।  →  साझा मंचों जैसे सम्मेलनों और प्रदर्शनियों में नेतृत्व की पुनः पुष्टि से सहयोग की राजनयिक गति बनी रहती है।  →  निवेश, आपूर्ति शृंखला और ग्रिड एकीकरण में प्रगति से सौर ऊर्जा का व्यावहारिक विस्तार होता है।  →  ऊर्जा सुरक्षा, कार्बन उत्सर्जन में कमी और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान मिलता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) का मुख्यालय भारत में है।
2. इस गठबंधन की सदस्यता केवल कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच स्थित देशों तक सीमित है।
3. इस गठबंधन की स्थापना वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन (COP21) के दौरान भारत और फ्रांस की पहल पर हुई थी।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. इनमें से कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: ISA का मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा) में है। कथन 2 गलत है: मूल फ्रेमवर्क समझौता केवल उष्ण कटिबंधीय देशों तक सीमित था, परंतु 2018 के संशोधन से सदस्यता सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्यों के लिए खोल दी गई। कथन 3 सही है: इसकी घोषणा 2015 में पेरिस में भारत और फ्रांस ने की थी। अतः उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अपनी जलवायु कूटनीति का एक प्रमुख स्तंभ बनाया है।
कारण (R): सौर फोटोवोल्टेइक (PV) प्रौद्योगिकी प्रकाश-वोल्टीय प्रभाव (photovoltaic effect) के माध्यम से सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, पर R गलत है।
  4. A गलत है, पर R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — A सही है, क्योंकि भारत अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे मंचों के माध्यम से सौर सहयोग को विदेश नीति और जलवायु कूटनीति से जोड़ता है। R भी सही है: PV कोशिकाएँ प्रकाश-वोल्टीय प्रभाव पर कार्य करती हैं। R, A का कारण स्पष्ट करता है, क्योंकि सौर ऊर्जा की तकनीकी क्षमता ही उसे सहयोग का व्यावहारिक विषय बनाती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत की सौर कूटनीति को अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) के संदर्भ में समझाइए। ‘एक सूर्य एक विश्व एक ग्रिड’ जैसी पहलों की संभावनाओं और सीमाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय सौर सहयोग वित्त और प्रौद्योगिकी के अभाव में मुख्यतः घोषणात्मक रह जाता है? अपने तर्क दीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON: (1) परिचय: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन (COP21) के दौरान भारत और फ्रांस की पहल पर हुई; मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा) में है; 2018 के संशोधन से सदस्यता सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्यों के लिए खुली; ‘एक सूर्य एक विश्व एक ग्रिड’ (One Sun One World One Grid) का दीर्घकालिक दृष्टिकोण। (2) घरेलू आधार: जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन (2010), राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत; विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत नवीकरणीय ऊर्जा का खुला पहुँच (open access) एवं नवीकरणीय खरीद दायित्व; गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य (COP26, ग्लासगो में घोषित)। (3) अंतरराष्ट्रीय ढाँचा: पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 (कार्बन बाज़ार एवं सहकारी दृष्टिकोण) और भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) से सौर सहयोग का संबंध; दक्षिण-दक्षिण सहयोग की अवधारणा। (4) संभावनाएँ: प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण, सौर पार्क और ग्रिड अवसंरचना साझेदारी, भारत की विदेश नीति में ऊर्जा कूटनीति का विस्तार। (5) सीमाएँ एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण: जलवायु वित्त (climate finance) की अपर्याप्तता और ऋण-भार; सौर पीवी आपूर्ति श्रृंखला पर चीन के प्रभुत्व से आयात-निर्भरता; घरेलू विनिर्माण हेतु ALMM जैसी नीतियों का व्यापारिक एवं विश्व-व्यापार नियमों के साथ तनाव; ग्रिड एकीकरण और भंडारण की तकनीकी चुनौतियाँ; ‘एक ग्रिड’ का भू-राजनीतिक एवं विद्युत व्यापार ढाँचे के बिना कठिन होना। (6) संतुलित मत: विकासवादी दृष्टि (जलवायु न्याय, सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व) बनाम व्यावहारिक दृष्टि (निजी निवेश, मिश्रित वित्त, मानक-निर्माण); निष्कर्ष में यह कि घोषणा से परिणाम तक का मार्ग वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और घरेलू क्षमता पर निर्भर है। (7) निष्कर्ष: सहकारी संघवाद की भाँति अंतरराष्ट्रीय सहयोग में भी संस्थागत क्रियान्वयन की भूमिका निर्णायक है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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