22 Oct महाराष्ट्र में सूखे के दौर में मौसम-निर्भरता से मुक्ति: किसानों की सफलता की कहानी
✎ सूखे जैसी जलवायु-अनिश्चितता में कृषि की सुरक्षा का मापदंड केवल वर्षा की कुल मात्रा नहीं, बल्कि जल की उत्पादकता (प्रति इकाई जल से आय) और फसल-चयन की लचीलापन है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि: फसल प्रारूप, सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य, ग्रामीण रोजगार) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन और पर्यावरण (सूखा, जलवायु परिवर्तन, जल संरक्षण) | GS Paper II — शासन (राज्य द्वारा सूखा घोषणा की प्रक्रिया, लघु एवं सीमांत किसानों के लिए नीतिगत समावेशन)
- Prelims: खरीफ और रबी फसलें: बुवाई-अवधि और मानसून पर निर्भरता, सूखा घोषणा: राज्य सरकार द्वारा तालुका/जिला स्तर पर, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के ढाँचे में, जल उत्पादकता (Water Productivity): प्रति इकाई जल से प्राप्त उत्पादन या आय, सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation): ड्रिप एवं स्प्रिंकलर पद्धति, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana): ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ घटक, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की अनुशंसा पर सरकार द्वारा घोषित, राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF), राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार परियोजना (NICRA)
- Essay: जलवायु अनिश्चितता के दौर में कृषि की लचीलापन: वर्षा-आधारित योजना से जल-आधारित योजना तक, सीमित संसाधन, छोटे खेत और समावेशी ग्रामीण विकास: किसान के चुनाव से नीति के लिए सबक
त्वरित पुनरावृत्ति: सूखे जैसी जलवायु-अनिश्चितता में कृषि की सुरक्षा का मापदंड केवल वर्षा की कुल मात्रा नहीं, बल्कि जल की उत्पादकता (प्रति इकाई जल से आय) और फसल-चयन की लचीलापन है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
महाराष्ट्र में चालू खरीफ मौसम के दौरान वर्षा की अनियमितता से बड़े पैमाने पर फसल-संकट उत्पन्न हुआ है। राज्य सरकार ने 358 तालुकाओं में से 265 तालुकाओं में सूखा घोषित किया है और खरीफ फसलों का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा जोखिम में बताया गया है। इस परिस्थिति में यह तर्क सामने आया है कि नीति का केंद्र अब केवल खाद्यान्न सुरक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीण आय और रोजगार की रक्षा तथा कृषि की वर्षा-संवेदनशीलता घटाने पर होना चाहिए। लेख यह भी दिखाता है कि जहाँ किसान सीमित जल का उपयोग लचीले फसल-चयन से कर रहे हैं, वहाँ जल की प्रति इकाई आय अधिक हो सकती है। यह विषय सिंचाई नीति और लघु किसानों के लिए मूल्य-समर्थन व्यवस्था की प्रासंगिकता से जुड़ता है।
पृष्ठभूमि
- 1972 के सूखे के समय प्राथमिक चुनौती भुखमरी से बचाव थी, जबकि वर्तमान में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार के कारण प्राथमिकता आय, रोजगार और कृषि की संवेदनशीलता घटाने की ओर स्थानांतरित हुई है।
- वार्षिक कुल वर्षा अब कृषि जोखिम का पर्याप्त संकेतक नहीं है। लेख के अनुसार महाराष्ट्र में पिछले 10 वर्षों में से 7 वर्षों में औसत वर्षा हुई, फिर भी 5 वर्षों में खरीफ और रबी खेती गंभीर रूप से प्रभावित हुई, क्योंकि बुवाई में देरी, शुष्क अवधि और अधिक वर्षा से फसलें प्रभावित हुईं।
- सूखा घोषणा राज्य सरकार की प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के ढाँचे और राज्य के सूखा प्रबंधन मैनुअल के अनुरूप होती है। इसके बाद राहत उपाय और SDRF से सहायता जैसे कदम उठाए जाते हैं।
- जल-कमी के कारण कई क्षेत्रों में गन्ने जैसी अधिक जल-आवश्यकता वाली फसल से अल्पावधि सब्ज़ी फसलों की ओर बदलाव हुआ है, जिससे फसल प्रारूप जल-उपलब्धता के अनुरूप ढलता दिखता है।
- लघु एवं सीमांत किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा होने के बावजूद व्यवहार में वह सुरक्षा कागज़ों पर ही सीमित रहती है, क्योंकि उनकी उपज का बड़ा हिस्सा खुले बाज़ार में बिकता है। इसलिए लेख इन किसानों की कुशलता को नीति में केंद्रीय स्थान देने की माँग करता है।
मौसम-निरपेक्ष (Season-independent) फसल प्रणाली क्या है?
- इसका अर्थ है ऐसी कृषि पद्धति जिसमें फसल-चयन और बुवाई का निर्णय केवल निश्चित बुवाई-खिड़की (sowing window) पर निर्भर न रहे, बल्कि उपलब्ध थोड़ी मात्रा के जल का उपयोग जब भी संभव हो, वहाँ तक लचीलापन हो।
- अल्पावधि फसलें, सब्ज़ियाँ और ऐसी किस्में, जो सीमित सिंचाई में भी अच्छी उपज दें, इस प्रणाली के प्रमुख घटक हैं।
- जल-आधारित मूल्यांकन में भूमि की इकाई के बजाय प्रति लीटर या प्रति इकाई जल पर आय मापी जाती है, जिससे सीमित संसाधन का वास्तविक आर्थिक महत्व स्पष्ट होता है।
- ‘प्रकट वरीयता’ (Revealed Preference) की अर्थशास्त्रीय अवधारणा के अनुसार किसानों के वास्तविक चुनाव उनकी प्राथमिकताओं का सबसे विश्वसनीय संकेत होते हैं; इन्हीं चुनावों से जल-नीति के लिए सुराग मिलते हैं।
- उदाहरण: सोलापुर ज़िले के शेतफल गाँव में एक किसान ने लगभग 72,000 लीटर क्षमता वाले नलकूप (Borewell) से पाँच गुंठा में फली (cluster beans) उगाकर लगभग 30,000 रुपये का लाभ लिया, जबकि उसी जल से तीन गुंठा में मक्का से लगभग 5,000 रुपये की अनुमानित आय होती।
- रोजगार पर प्रभाव भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सब्ज़ी जैसी गहन फसलों में श्रम की माँग अधिक होती है और इससे ग्रामीण आजीविका का विस्तार संभव है।
- नीतिगत दृष्टि से इसका अर्थ है सूक्ष्म सिंचाई और जल-कुशल फसल प्रारूप को बढ़ावा देना, साथ ही छोटे किसानों के लिए बाज़ार और मूल्य-सुरक्षा के उपाय सुदृढ़ करना।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| वर्षा का बदलता स्वरूप | वार्षिक कुल वर्षा सामान्य होने पर भी बुवाई में देरी, शुष्क अवधि और अधिक वर्षा से फसल-हानि होती है। महाराष्ट्र में पिछले 10 वर्षों में 7 वर्ष औसत वर्षा हुई, फिर भी 5 वर्षों में खरीफ और रबी की खेती बाधित हुई। |
| ऋतु-निरपेक्ष फसल प्रणाली (Season-independent Cropping) | निश्चित बुवाई-अवधि की बाध्यता से कम बँधी खेती, जो सीमित जल उपलब्ध होने पर उसका उपयोग कर सके। इसका उद्देश्य फसल-चक्र को वर्षा के वितरण के अनुरूप ढालना है। |
| जल उत्पादकता (Water Productivity) | प्रति इकाई जल से प्राप्त आय या रोजगार को मापने का पैमाना। भूमि-आधारित आय के बजाय जल-आधारित आय का मूल्यांकन करने पर कम जल वाली फसलों का लाभ स्पष्ट होता है। |
| कम अवधि की उच्च मूल्य फसलें | प्याज और सब्ज़ियों जैसी कम अवधि की फसलें सीमित नलकूप जल में अधिक लाभ देती हैं। इंदापुर (धाराशिव) में जल की कमी के कारण गन्ने से इन फसलों की ओर बदलाव हुआ। |
| प्रकट अधिमान (Revealed Preference) | किसानों के वास्तविक चुनाव से उनकी प्राथमिकताओं का अनुमान लगाया जाता है। यह नीति-निर्माण के लिए व्यावहारिक साक्ष्य देता है, जैसे कि सिंचाई नीति में किस प्रकार की सहायता उपयोगी होगी। |
| नलकूप-आधारित सिंचाई | सीमित भूजल का सूक्ष्म उपयोग। शेतफळ (सोलापुर) में लगभग 72,000 लीटर जल से ग्वार (Cluster Beans) की पाँच गुंठा खेती से 30,000 रुपये का लाभ हुआ, जबकि उतने ही जल से मक्का की तीन गुंठा खेती का अनुमानित आय 5,000 रुपये थी। |
महत्व
आर्थिक
- जल-आधारित लाभप्रदता से सीमित संसाधन का अधिक मूल्य प्राप्त होता है। ग्वार में प्रति 72,000 लीटर जल पर अनुमानित लाभ मक्का से कहीं अधिक रहा।
- गन्ने से सब्ज़ी-फसलों की ओर बदलाव से ग्रामीण समृद्धि बढ़ी, जो यह दिखाता है कि जल की कमी भी आय के नए अवसर खोल सकती है।
- ग्रामीण आय में विविधता से किसान एक फसल की विफलता के जोखिम से कुछ हद तक बचते हैं।
खाद्य सुरक्षा और कृषि-नीति
- 1972 के सूखे में अकाल-रोकथाम सर्वोच्च प्राथमिकता थी। आज पर्याप्त खाद्यान्न भंडार उपलब्ध होने से नीति का केंद्र ग्रामीण आय और रोजगार की सुरक्षा हो गया है।
- नीति का दीर्घकालिक लक्ष्य वर्षा-अनिश्चितता के प्रति कृषि की संवेदनशीलता को घटाना है, न कि केवल राहत देना।
रोजगार और सामाजिक पक्ष
- सब्ज़ी और कम अवधि की फसलों में प्रति इकाई भूमि अधिक श्रम लगता है, जिससे ग्रामीण रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
- छोटे भूखंडों पर कुशल उत्पादन से लघु और सीमांत किसानों की आजीविका अधिक टिकाऊ और व्यापक रूप से साझा हो सकती है।
जल संसाधन और पर्यावरण
- सीमित जल का सक्षम उपयोग भूजल पर दबाव घटाने में सहायक हो सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जल-स्तर लगातार गिर रहा है।
- जल-आधारित मूल्यांकन सिंचाई नीति को भूमि-आधारित मानदंड से हटाकर जल-दक्षता की दिशा में ले जाता है।
चुनौतियाँ
1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का सीमित संरक्षण
- छोटे किसानों द्वारा उत्पादित कई कम अवधि की और सब्ज़ी-फसलों के लिए प्रभावी MSP व्यवस्था नहीं है, अर्थात कागज़ पर भी सुरक्षा नहीं मिलती।
- MSP की घोषणा और खरीद की व्यवस्था मुख्यतः कुछ फसलों और क्षेत्रों तक सीमित है, इसलिए बाज़ार भाव गिरने पर किसान को जोखिम स्वयं उठाना पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि विपणन, न्यूनतम समर्थन मूल्य और खाद्य प्रबंधन
2. भूजल का घटता स्तर
- जल की कमी के कारण इंदापुर में गन्ने की खेती घटी, जो दर्शाता है कि जल-गहन फसलें अब जोखिम भरी हो गई हैं।
- नलकूपों पर निर्भरता बढ़ने से भूजल का अत्यधिक दोहन होता है और दीर्घकाल में जल-सुरक्षा कमज़ोर होती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जल संसाधन, भूजल प्रबंधन और सिंचाई
3. वर्षा की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन
- वार्षिक वर्षा के कुल योग से कृषि-जोखिम का सही आकलन नहीं होता, क्योंकि वर्षा का समय और वितरण महत्वपूर्ण है।
- देरी से वर्षा, लंबी शुष्क अवधि और अचानक अधिक वर्षा एक साथ फसल-चक्र को बाधित करते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-1: भारतीय मानसून; GS-3: जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव
4. व्यापक सूखे में ग्रामीण आय की सुरक्षा
- महाराष्ट्र में 358 तालुकों में से 265 तालुकों में सूखा घोषित किया गया, और लगभग 70 प्रतिशत खरीफ फसलें संकट में बताई गई हैं।
- अब तात्कालिक प्राथमिकता आय और रोजगार की सुरक्षा है, जिसके लिए लक्षित सहायता और रोजगार-आधारित उपाय आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आपदा प्रबंधन; GS-2: ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा
5. छोटे भूखंड और संसाधनों तक सीमित पहुँच
- छोटे भूखंडों पर उत्पादन कुशल हो सकता है, परंतु उन्नत बीज, सिंचाई-उपकरण और ऋण तक पहुँच सीमित रहती है।
- भूमि के छोटे आकार के कारण बड़े पैमाने की यांत्रिक खेती और सामूहिक विपणन कठिन हो जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: भूमि सुधार, कृषि-ऋण और लघु किसान
6. उच्च मूल्य फसलों में बाज़ार जोखिम
- सब्ज़ियाँ और प्याज़ जल्दी खराब होने वाली उपज हैं, इसलिए भंडारण और परिवहन की कमी से भाव में तीव्र उतार-चढ़ाव होता है।
- बाज़ार-मूल्य गिरने पर अधिक जल-कुशल फसल भी किसान की आय को सुरक्षित नहीं रख पाती।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि विपणन, शीत शृंखला और खाद्य प्रसंस्करण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| MSP का सीमित दायरा | सब्ज़ी और कई कम अवधि की फसलों पर प्रभावी न्यूनतम समर्थन मूल्य न होने से छोटे किसान बाज़ार-जोखिम अकेले झेलते हैं। |
| भूजल पर दबाव | नलकूपों पर बढ़ती निर्भरता से जल-स्तर गिरने का खतरा है, जिससे जल-कुशल फसलों के लाभ भी अल्पकालिक सिद्ध हो सकते हैं। |
| वर्षा का असमान वितरण | वार्षिक योग सामान्य होने पर भी बुवाई-समय और वर्षा की तीव्रता बिगड़ने से फसल-हानि होती है। |
| व्यापक सूखा और आय-संकट | 265 तालुकों में सूखे की घोषणा से ग्रामीण रोजगार और आय पर गंभीर दबाव है। |
| छोटे भूखंड और पूंजी की कमी | सीमित भूमि और ऋण-पहुँच के कारण उन्नत तकनीक और जल-प्रबंधन उपायों को अपनाना कठिन है। |
| भंडारण और विपणन अवसंरचना | जल्दी खराब होने वाली फसलों के लिए शीत शृंखला और भंडारण की कमी से मूल्य-अस्थिरता बढ़ती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchai Yojana, PMKSY)
आगे की राह
- जल-आधारित मूल्यांकन को फसल-नीति और सिंचाई-योजना का मानक बनाया जाए, ताकि भूमि के बजाय प्रति इकाई जल की आय और रोजगार को प्राथमिकता मिले।
- छोटे किसानों की सूक्ष्म सिंचाई, कम अवधि की किस्मों और जल-बचत तकनीकों तक पहुँच बढ़ाई जाए।
- वर्षा के वितरण और बुवाई-समय के आधार पर स्थानीय स्तर की फसल-सलाह उपलब्ध कराई जाए, ताकि ऋतु-निरपेक्ष फसल प्रणाली को व्यावहारिक बनाया जा सके।
- भूजल-दोहन पर स्थानीय स्तर की निगरानी और जल-बजट आधारित फसल-योजना लागू की जाए।
- कम अवधि की सब्ज़ी और उच्च मूल्य फसलों के लिए भंडारण, शीत शृंखला और प्रसंस्करण में निवेश बढ़ाया जाए।
- सूखा-प्रभावित तालुकों में ग्रामीण आय और रोजगार के लिए लक्षित सहायता को सूखा-प्रबंधन योजना के साथ समन्वित किया जाए।
- छोटे किसानों के लिए MSP या समकक्ष मूल्य-सुरक्षा के दायरे पर विचार करते हुए विपणन-समर्थन की व्यवस्था मज़बूत की जाए।
- फसल-चयन के आँकड़ों और किसानों के वास्तविक निर्णयों का नियमित अध्ययन करके नीति-निर्माण को साक्ष्य-आधारित बनाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मौसम-निरपेक्ष कृषि (Season-independent Agriculture) · जल-उत्पादकता (Water Productivity) · प्रकट अधिमान सिद्धांत (Revealed Preference Theory) · सूखा प्रबंधन (Drought Management) · राज्य सूची (State List) · न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) · कृषि लागत और मूल्य आयोग (Commission for Agricultural Costs and Prices) · फसल विविधीकरण (Crop Diversification) · भूजल दोहन (Groundwater Depletion) · प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) · प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana) · खाद्यान्न भंडार और ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48: कृषि और पशुपालन का आधुनिक संगठन
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 14: कृषि संबंधी विषय
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 17: जल आपूर्ति, सिंचाई और नहरें
अवधारणा प्रवाह
वर्षा का वितरण बिगड़ता है (देरी, शुष्क अवधि, अधिक वर्षा)। → निश्चित बुवाई-कैलेंडर पर आधारित फसल-चक्र बाधित होता है और फसल-हानि होती है। → सूखे की घोषणा से ग्रामीण आय और रोजगार पर संकट आता है। → सीमित जल का उपयोग जल उत्पादकता के आधार पर देखा जाए, तो कम अवधि और कम जल वाली फसलें अधिक लाभ देती हैं। → किसानों के वास्तविक चुनाव (प्रकट अधिमान) से फसल-विविधीकरण और सिंचाई की प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं। → नीति में आय-सुरक्षा, जल-दक्षता, विपणन-समर्थन और भंडारण को जोड़ने से ऋतु-निरपेक्ष कृषि को व्यावहारिक आधार मिलता है। → परिणामस्वरूप ग्रामीण आजीविका अधिक सुरक्षित और व्यापक रूप से साझा होती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सूखे की घोषणा और उससे संबंधित राहत-उपाय मुख्यतः राज्य सरकार की पहल से शुरू होते हैं, और इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी सूखा प्रबंधन पुस्तिका (Manual for Drought Management, 2016) के दिशानिर्देश आधार होते हैं।
2. कृषि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में प्रविष्ट है।
3. जल संविधान की समवर्ती सूची का विषय है और इस पर केवल केंद्र सरकार कानून बना सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: सूखा घोषित करने का प्रारंभिक अधिकार राज्य सरकार के पास है और सूखा प्रबंधन पुस्तिका (2016) मार्गदर्शक दस्तावेज़ है। कथन 2 सही है: कृषि राज्य सूची की प्रविष्टि 14 में आती है। कथन 3 गलत है: जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 का विषय है, समवर्ती सूची का नहीं, और राज्य अपने क्षेत्र में इस पर कानून बनाते हैं।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक कथन-अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है।
अभिकथन (A): सीमित जल वाले क्षेत्रों में पानी-अधिक खपत वाली फसलों से हटकर अल्पावधि सब्ज़ी जैसी फसलें अपनाने से किसानों की आय बढ़ सकती है।
कारण (R): जब जल ही सीमित संसाधन हो, तब प्रति इकाई जल से प्राप्त आय, केवल प्रति एकड़ भूमि की आय की तुलना में, फसल-चयन का अधिक उपयुक्त मापदंड होती है।
सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं। जब जल सीमित संसाधन हो, तब जल-उत्पादकता (प्रति इकाई जल से आय) से फसल-चयन का मूल्यांकन अधिक सटीक होता है, और यही तर्क अभिकथन की व्याख्या करता है।
Q3. सूची-I (योजना/दस्तावेज़) को सूची-II (मुख्य उद्देश्य) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I
1. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना
2. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
3. कृषि लागत और मूल्य आयोग
4. सूखा प्रबंधन पुस्तिका (2016)
सूची-II
क. खरीफ और रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश
ख. फसल-हानि की स्थिति में बीमा-सुरक्षा प्रदान करना
ग. सूखे की स्थिति में घोषणा और प्रबंधन के मार्गदर्शक सिद्धांत
घ. सिंचाई-सुविधा का विस्तार और जल-उपयोग दक्षता में सुधार
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-ख, 2-घ, 3-क, 4-ग
- 1-क, 2-ख, 3-घ, 4-ग
- 1-ख, 2-क, 3-ग, 4-घ
- 1-घ, 2-ख, 3-क, 4-ग
उत्तर: 1-ख, 2-घ, 3-क, 4-ग — प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना फसल-हानि पर बीमा-सुरक्षा देती है (1-ख)। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना सिंचाई-विस्तार और जल-उपयोग दक्षता पर केंद्रित है (2-घ)। कृषि लागत और मूल्य आयोग एमएसपी की सिफारिश करता है (3-क)। सूखा प्रबंधन पुस्तिका घोषणा और प्रबंधन के दिशानिर्देश देती है (4-ग)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वर्षा की बढ़ती अनिश्चितता के दौर में यह तर्क दिया जाता है कि कृषि-नियोजन को वार्षिक वर्षा-योग के बजाय जल-उत्पादकता और मौसम-निरपेक्ष फसल-चयन पर आधारित होना चाहिए। इस तर्क का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि लघु और सीमांत किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी प्रत्यक्ष सुरक्षा के अभाव में ऐसी फसल-विविधता को सुरक्षित और व्यापक रूप से साझा आजीविका में बदलने के लिए किन नीतिगत उपायों की आवश्यकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर-संरचना (Model-answer skeleton):
1. भूमिका: महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति (सरकार द्वारा 358 में से 265 तालुकाओं में सूखा घोषित) और 1972 के सूखे से तुलना। 1972 में प्राथमिकता अकाल रोकना थी, आज उच्च खाद्यान्न भंडार के कारण प्राथमिकता ग्रामीण आय और रोज़गार की सुरक्षा है। अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज़ (Poverty and Famines, 1981) के अनुसार अकाल मुख्यतः उपलब्धता के बजाय हक़दारी की विफलता से जुड़ा है, जो आय-सुरक्षा का तर्क मज़बूत करता है।
2. वर्षा-योग बनाम वास्तविक जोखिम: लेख के अनुसार महाराष्ट्र में पिछले 10 वर्षों में 7 वर्ष सामान्य वार्षिक वर्षा हुई, फिर भी 5 वर्षों में खरीफ और रबी खेती बाधित हुई। विलंबित वर्षा, शुष्क अवधि और अतिवृष्टि, तीनों से बुआई-समय और उपज प्रभावित होते हैं। अतः वार्षिक योग के बजाय वितरण और समय पर ध्यान आवश्यक है।
3. प्रकट अधिमान सिद्धांत (Revealed Preference Theory, पॉल सैमुएलसन, 1938) की व्याख्या: किसानों के वास्तविक चुनाव (इंडापुर में गन्ने से अल्पावधि सब्ज़ियों की ओर परिवर्तन; शेटफल में 72,000 लीटर भूजल से पाँच गुंठा में फली-सब्ज़ी का लाभ लगभग 30,000 रुपये बनाम तीन गुंठा में मक्का लगभग 5,000 रुपये) से जल-उत्पादकता का तर्क।
4. समालोचनात्मक पक्ष (विरोधी दृष्टिकोण): (क) भूजल दोहन और जल-स्तर में गिरावट के कारण ऐसा परिवर्तन दीर्घकाल में टिकाऊ न हो; (ख) सब्ज़ी और अल्पावधि फसलों में बाज़ार-मूल्य की अस्थिरता (जैसे प्याज़ की कीमतों में उतार-चढ़ाव) और भंडारण-अभाव; (ग) ऋण, बीमा और विपणन-ढाँचे के बिना लघु किसान पर जोखिम का बोझ।
5. एमएसपी और संस्थागत ढाँचा: कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशें और एमएसपी का सीमित कवरेज; कृषि राज्य सूची (प्रविष्टि 14) का विषय होने से राज्य-केंद्र समन्वय की आवश्यकता; सूखा घोषणा के लिए सूखा प्रबंधन पुस्तिका (2016) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष/राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के प्रावधान।
6. नीतिगत उपाय: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का समय पर भुगतान; प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत सूक्ष्म सिंचाई और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ घटक; राष्ट्रीय जल नीति (2012) में जल-बजट और भूजल प्रबंधन के सिद्धांत; फसल-विविधीकरण के साथ मंडी-संपर्क, भंडारण और मूल्य-स्थिरीकरण व्यवस्था; वैकल्पिक सुरक्षा के रूप में लाभकारी मूल्य-आश्वासन के विचार का परीक्षण।
7. निष्कर्ष: तर्क की सीमा (जल-बचत बनाम जल-संरक्षण का अंतर) और संतुलित निष्कर्ष कि मौसम-निरपेक्षता को संस्थागत सुरक्षा-जाल के साथ जोड़कर ही लघु किसानों के लिए टिकाऊ आजीविका संभव है।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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