08 Aug आंध्र प्रदेश में 52.4% वर्षा कमी: जानें कारण, प्रभाव और सरकारी तैयारी

✎ आंध्र प्रदेश में व्यापक वर्षा की कमी ने कृषि संकट और सूखे की आशंका को बढ़ा दिया है, जो अल नीनो के संभावित प्रभावों के बीच मानसून पर भारत की निर्भरता को उजागर करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल, जलवायु विज्ञान) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, आपदा प्रबंधन) | GS Paper III — पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन के प्रभाव)
- Prelims: वर्षा की कमी, अल नीनो, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), सूखा, कृषि संकट, बंगाल की खाड़ी में अवदाब, मानसून, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि पर इसके प्रभाव, भारत में जल संकट: कारण, परिणाम और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: आंध्र प्रदेश में व्यापक वर्षा की कमी ने कृषि संकट और सूखे की आशंका को बढ़ा दिया है, जो अल नीनो के संभावित प्रभावों के बीच मानसून पर भारत की निर्भरता को उजागर करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
जुलाई के अंत तक आंध्र प्रदेश में वर्षा की कमी 52.4% दर्ज की गई है, जिसमें राज्य के सभी जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई है। प्रकाशम, पूर्वी गोदावरी, विशाखापत्तनम, अन्नामय्या और चित्तूर जिलों में भारी वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जबकि शेष जिलों में भी वर्षा कम रही है। इस स्थिति ने राज्य में सूखे की आशंका को बढ़ा दिया है और किसानों के लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता पर बल दिया है।
पृष्ठभूमि
- भारत की कृषि अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है, जो देश की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70% प्रदान करता है।
- वर्षा की कमी से कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आय और समग्र आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- अल नीनो (El Niño) जैसी वैश्विक जलवायु घटनाएँ भारतीय मानसून को कमजोर कर सकती हैं, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department – IMD) देश में मौसम पूर्वानुमान और जलवायु संबंधी जानकारी प्रदान करने वाली प्रमुख एजेंसी है।
- सूखा एक प्राकृतिक आपदा है जो लंबे समय तक वर्षा की कमी के कारण होती है, जिससे जल संसाधनों, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं।
- राज्य सरकारें सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और आबादी को राहत प्रदान करने के लिए विभिन्न उपाय करती हैं, जिनमें फसल बीमा, ऋण माफी और पेयजल आपूर्ति शामिल हैं।
वर्षा की कमी और सूखा
- वर्षा की कमी तब होती है जब किसी क्षेत्र में सामान्य या अपेक्षित वर्षा की तुलना में काफी कम वर्षा होती है।
- IMD वर्षा की कमी को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत करता है, जैसे ‘कम वर्षा’ (सामान्य से 20% से 59% कम) और ‘भारी वर्षा की कमी’ (सामान्य से 60% या अधिक कम)।
- सूखा एक जटिल घटना है जिसे आमतौर पर चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: मौसम संबंधी सूखा, कृषि संबंधी सूखा, जल विज्ञान संबंधी सूखा और सामाजिक-आर्थिक सूखा।
- मौसम संबंधी सूखा वर्षा की कमी से संबंधित है, जबकि कृषि संबंधी सूखा मिट्टी की नमी की कमी के कारण फसल उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाता है।
- अल नीनो दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation – ENSO) का एक गर्म चरण है, जो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ा है और अक्सर भारतीय उपमहाद्वीप में कमजोर मानसून का कारण बनता है।
- सूखे के प्रबंधन में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), कुशल सिंचाई तकनीकें, फसल विविधीकरण और सूखा प्रतिरोधी फसलों का उपयोग जैसे उपाय शामिल हैं।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA) भारत में आपदा प्रबंधन के लिए शीर्ष निकाय है, जो सूखे सहित विभिन्न आपदाओं के लिए नीतियां और दिशानिर्देश तैयार करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| आंध्र प्रदेश में वर्षा की कमी | राज्य के सभी जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है, जो कृषि और जल सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। |
| जुलाई के अंत तक 52.4% वर्षा की कमी | यह आंकड़ा दर्शाता है कि मॉनसून का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है, जिससे सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। |
| एल नीनो (El Niño) का खतरा | एल नीनो एक वैश्विक मौसमी घटना है जो भारत में मॉनसून को कमजोर करती है, जिससे वर्षा की कमी और बढ़ सकती है। |
| गहरे दबाव का ओडिशा और छत्तीसगढ़ पर केंद्रित होना | बंगाल की खाड़ी में बने गहरे दबाव का आंध्र प्रदेश को पर्याप्त लाभ नहीं मिला, जिससे राज्य में वर्षा की कमी बनी रही। |
| किसानों के लिए व्यापक सहायता का निर्देश | मुख्यमंत्री द्वारा किसानों को सहायता प्रदान करने का निर्देश स्थिति की गंभीरता और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कृषि उत्पादन में गिरावट: वर्षा की कमी से धान, मक्का, कपास जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे किसानों की आय कम होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव बढ़ेगा और आम जनता की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी।
- राजकोषीय बोझ: सरकार को सूखे से निपटने और किसानों को राहत प्रदान करने के लिए अतिरिक्त व्यय करना पड़ सकता है, जिससे राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ सकता है।
सामाजिक महत्व
- ग्रामीण आजीविका पर संकट: कृषि पर निर्भर लाखों परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित होगी, जिससे गरीबी और बेरोजगारी बढ़ सकती है।
- जल संकट: पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की कमी से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जल संकट गहरा सकता है, जिससे स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
- पलायन में वृद्धि: कृषि संकट के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ सकता है, जिससे शहरी बुनियादी ढांचे पर दबाव पड़ेगा।
पर्यावरणीय महत्व
- भूजल स्तर में गिरावट: कम वर्षा के कारण भूजल (Groundwater) का पुनर्भरण नहीं हो पाएगा, जिससे भूजल स्तर में और गिरावट आएगी।
- जैव विविधता पर प्रभाव: सूखे की स्थिति से स्थानीय वनस्पति और जीव-जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) बिगड़ सकता है।
चुनौतियाँ
1. कृषि उत्पादन और किसान आय पर प्रभाव
- फसल बर्बादी और कम उपज से किसानों की आय में भारी गिरावट आएगी, जिससे ग्रामीण ऋणग्रस्तता (Rural Indebtedness) बढ़ सकती है।
- सिंचाई के लिए पानी की कमी से रबी और खरीफ दोनों फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित होगा।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: कृषि, किसान कल्याण
2. जल संसाधन प्रबंधन
- पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होगी, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां भूजल पर निर्भरता अधिक है।
- मौजूदा जल निकायों और जलाशयों में पानी का स्तर गिरने से जल संकट गहरा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भूगोल: जल संसाधन, आपदा प्रबंधन
3. खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति
- फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बन जाएगी।
- खाद्य मुद्रास्फीति से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और आम जनता की क्रय शक्ति कम होगी।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: खाद्य सुरक्षा, मुद्रास्फीति
4. राज्य के वित्त पर दबाव
- सूखे से निपटने और किसानों को राहत प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने होंगे, जिससे राजकोषीय स्थिति पर दबाव पड़ेगा।
- राजस्व संग्रह में कमी और व्यय में वृद्धि से राज्य का बजट प्रभावित हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: राजकोषीय नीति, राज्य वित्त
5. जलवायु परिवर्तन और मौसमी अनिश्चितता
- एल नीनो जैसी मौसमी घटनाओं का बढ़ता प्रभाव और मॉनसून के पैटर्न में बदलाव जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिम को दर्शाता है।
- भविष्य में ऐसी अनिश्चितताओं से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| फसल उत्पादन में गिरावट | किसानों की आय में कमी, खाद्य सुरक्षा पर खतरा |
| जल संकट | पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की कमी, भूजल स्तर में गिरावट |
| ग्रामीण ऋणग्रस्तता | फसल बर्बादी के कारण किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ना |
| खाद्य मुद्रास्फीति | खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि, आम जनता पर आर्थिक बोझ |
| राज्य के वित्त पर दबाव | सूखा राहत के लिए अतिरिक्त व्यय, राजस्व संग्रह में कमी |
| पलायन | ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर आजीविका की तलाश में पलायन |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (Rashtriya Krishi Vikas Yojana)
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana)
आगे की राह
- सूखा प्रभावित मंडलों को तत्काल सूखाग्रस्त घोषित कर किसानों को वित्तीय सहायता और अन्य राहत उपाय प्रदान किए जाएं।
- फसल बीमा दावों का त्वरित निपटान सुनिश्चित किया जाए ताकि किसानों को समय पर मुआवजा मिल सके।
- जल संरक्षण और जल संचयन (Water Harvesting) के उपायों को प्राथमिकता दी जाए, जैसे चेक डैम, तालाब और वर्षा जल संचयन संरचनाओं का निर्माण।
- सूखा प्रतिरोधी फसलों की किस्मों को बढ़ावा दिया जाए और किसानों को उनके उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
- किसानों को वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान किए जाएं ताकि वे केवल कृषि पर निर्भर न रहें।
- मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को और अधिक सटीक बनाया जाए और किसानों तक समय पर जानकारी पहुंचाई जाए ताकि वे उचित निर्णय ले सकें।
- दीर्घकालिक जल प्रबंधन योजनाओं को लागू किया जाए, जिसमें अंतर-राज्यीय नदी जल बंटवारे के मुद्दों का समाधान भी शामिल हो।
- एल नीनो जैसी मौसमी घटनाओं के प्रभावों को कम करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाओं को मजबूत किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
वर्षा की कमी · सूखा · कृषि संकट · अल नीनो · भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) · जलवायु परिवर्तन · खाद्य सुरक्षा · आपदा प्रबंधन · फसल बीमा योजना · जल संरक्षण · राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) · राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘राज्य सूची में कृषि और जल’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘केंद्र द्वारा राज्यों को अनुदान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 355’, ‘note’: ‘राज्यों की रक्षा का संघ का कर्तव्य’}
अवधारणा प्रवाह
वर्षा की कमी (Deficient Rainfall) → फसल उत्पादन में गिरावट → किसानों की आय में कमी → खाद्य सुरक्षा पर खतरा → ग्रामीण संकट और पलायन → राज्य के वित्त पर दबाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
2. अल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य शीतलन से संबंधित एक मौसमी घटना है।
3. भारत में, सूखे की घोषणा केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। IMD पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन है। कथन 2 गलत है। अल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य उष्णता से संबंधित है, शीतलन से नहीं। कथन 3 गलत है। भारत में सूखे की घोषणा राज्य सरकार द्वारा की जाती है, केंद्र सरकार द्वारा नहीं।
Q2. अभिकथन (A): आंध्र प्रदेश में जुलाई के अंत तक 52.4% वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जिससे राज्य में कृषि संकट की आशंका बढ़ गई है।
कारण (R): बंगाल की खाड़ी में बना गहरा दबाव मुख्य रूप से ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों में केंद्रित था, जिससे आंध्र प्रदेश को पर्याप्त वर्षा प्राप्त नहीं हुई।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि आंध्र प्रदेश में भारी वर्षा की कमी दर्ज की गई है। कारण (R) भी सही है क्योंकि बंगाल की खाड़ी में बना गहरा दबाव ओडिशा और छत्तीसगढ़ में केंद्रित था, जिससे आंध्र प्रदेश में कम वर्षा हुई। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है क्योंकि इसी मौसमी घटना के कारण आंध्र प्रदेश में वर्षा की कमी हुई।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में कृषि पर वर्षा की कमी के प्रभावों की चर्चा कीजिए। सरकार द्वारा सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए किए गए उपायों का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में वर्षा की कमी और सूखे की अवधारणा को संक्षेप में समझाएँ। मुख्य भाग में, कृषि पर वर्षा की कमी के बहुआयामी प्रभावों का विस्तार से वर्णन करें, जैसे फसल उत्पादन में कमी, किसानों की आय पर प्रभाव, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर, खाद्य सुरक्षा के मुद्दे और पशुधन पर प्रभाव। इसके बाद, सरकार द्वारा सूखे से निपटने के लिए उठाए गए विभिन्न उपायों का विश्लेषण करें, जिसमें राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), मनरेगा (MGNREGA), जल संरक्षण योजनाएँ (जैसे अटल भूजल योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना), और अन्य राहत उपाय शामिल हैं। निष्कर्ष में, इन उपायों की प्रभावशीलता और भविष्य की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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