24 Sep यूपी में पहली बार तेंदुओं का बधियाकरण: मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकेगा अभियान
✎ उत्तर प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए तेंदुओं का बधियाकरण किया जाएगा, जिसकी शुरुआत बिजनौर से एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में होगी, जिससे वन्यजीव आबादी को वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित किया जा सके।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता
- Prelims: मानव-वन्यजीव संघर्ष, तेंदुओं का बधियाकरण, वन्यजीव संरक्षण, उत्तर प्रदेश वन विभाग, पायलट प्रोजेक्ट, वन्यजीव अस्पताल
- Essay: मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व: चुनौतियाँ और समाधान, विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: उत्तर प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए तेंदुओं का बधियाकरण किया जाएगा, जिसकी शुरुआत बिजनौर से एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में होगी, जिससे वन्यजीव आबादी को वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित किया जा सके।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उत्तर प्रदेश में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग ने एक विस्तृत मास्टर प्लान तैयार किया है। इस योजना के तहत, प्रदेश में पहली बार तेंदुओं (Leopards) का बधियाकरण (Sterilization) किया जाएगा। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसकी शुरुआत बिजनौर जिले से होगी, जिसके लिए 2.73 करोड़ रुपये की लागत से एक समर्पित वन्यजीव अस्पताल स्थापित किया जाएगा। यह पहल महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश को ऐसा कदम उठाने वाला देश का दूसरा राज्य बनाएगी।
पृष्ठभूमि
- उत्तर प्रदेश के कई जिलों जैसे बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी और बहराइच में तेंदुओं की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके कारण वे अक्सर मानव बस्तियों के करीब आ जाते हैं।
- वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले बिजनौर में लगभग 444 तेंदुए हैं, जिनकी संख्या अगले पांच वर्षों में 201 प्रतिशत बढ़कर 1,336 होने का अनुमान है, यदि कोई हस्तक्षेप न किया जाए।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण जान-माल का नुकसान होता है, जिससे स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों दोनों के लिए खतरा पैदा होता है।
- इस संघर्ष को कम करने के लिए, वन विभाग ने 601 करोड़ रुपये का एक व्यापक मास्टर प्लान तैयार किया है, जिसमें तेंदुओं के बधियाकरण के साथ-साथ अन्य उपाय भी शामिल हैं।
- योजना के तहत, अगले पांच वर्षों में 75 प्रतिशत (प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत) तेंदुओं के बधियाकरण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे उनकी संख्या को 755 तक सीमित किया जा सके।
- इस पहल के सफल होने पर, इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सके।
- वर्तमान में, उत्तर प्रदेश वन विभाग में कर्मचारियों की कमी और आपातकालीन चिकित्सा उपकरणों का अभाव है, जिससे वन्यजीवों के प्रबंधन में चुनौतियाँ आती हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष और इसके प्रबंधन के उपाय
- मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) तब उत्पन्न होता है जब मानव और वन्यजीव एक ही संसाधनों या क्षेत्रों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे दोनों को नकारात्मक परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
- भारत में, तेजी से शहरीकरण, वनों की कटाई और वन्यजीव गलियारों के अतिक्रमण के कारण यह संघर्ष बढ़ रहा है।
- तेंदुओं का बधियाकरण वन्यजीव आबादी को नियंत्रित करने का एक वैज्ञानिक तरीका है, जिससे उनकी संख्या को स्थायी रूप से प्रबंधित किया जा सकता है और संघर्ष को कम किया जा सकता है।
- इस प्रक्रिया में, पकड़े गए तेंदुओं की सर्जरी की जाती है और स्वस्थ होने के बाद उन्हें वापस उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाता है।
- मास्टर प्लान में 310 किलोमीटर लंबी चेन-लिंक फेंसिंग और नदियों व रास्तों पर थर्मल नाइट विजन कैमरे लगाने का भी प्रावधान है, जिनकी निगरानी कमांड सेंटर से की जाएगी।
- बिजनौर में स्थापित होने वाले वन्यजीव अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर, विशेष सर्जिकल उपकरण, अत्याधुनिक एनेस्थीसिया मशीन और मल्टीपैरामीटर मॉनिटर्स से लैस प्री और पोस्ट-ऑपरेटिव वार्ड होंगे।
- यह पहल वन्यजीवों के संरक्षण और मानव बस्तियों की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है, जिससे सह-अस्तित्व को बढ़ावा मिले।
- वन्यजीवों के हॉटस्पॉट और अति संवेदनशील इलाकों की पहचान कैमरा ट्रैप (Camera Traps) के माध्यम से की जाएगी, ताकि लक्षित हस्तक्षेप किया जा सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| तेंदुओं का बधियाकरण (Sterilization) | मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को कम करने और तेंदुओं की आबादी को नियंत्रित करने का एक अभिनव प्रयास। |
| बिजनौर में वन्यजीव अस्पताल का निर्माण | बधियाकरण और अन्य उपचार के लिए समर्पित चिकित्सा सुविधा, जिसमें ऑपरेशन थिएटर और आधुनिक उपकरण शामिल होंगे। |
| पायलट प्रोजेक्ट | बिजनौर से शुरुआत, सफलता के बाद पूरे प्रदेश में विस्तार की योजना, जिससे नीति निर्माण में सहायता मिलेगी। |
| चेन-लिंक फेंसिंग और थर्मल नाइट विजन कैमरे | वन्यजीवों की आवाजाही पर निगरानी रखने और उन्हें मानव बस्तियों में प्रवेश करने से रोकने के लिए तकनीकी समाधान। |
| महाराष्ट्र के बाद यूपी दूसरा राज्य | भारत में तेंदुओं के बधियाकरण की पहल करने वाला दूसरा राज्य, जो वन्यजीव प्रबंधन में अग्रणी भूमिका दर्शाता है। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी से वन्यजीवों और मानव जीवन दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
- तेंदुओं की आबादी का वैज्ञानिक प्रबंधन, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।
सामाजिक प्रभाव
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वन्यजीवों के हमलों से होने वाले जान-माल के नुकसान में कमी आएगी, जिससे स्थानीय समुदायों में सुरक्षा की भावना बढ़ेगी।
- वन्यजीव संरक्षण के प्रति जन जागरूकता और सहभागिता को बढ़ावा मिलेगा।
प्रशासनिक और नीतिगत
- वन्यजीव प्रबंधन के लिए एक व्यापक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास, जो अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बन सकता है।
- वन विभाग की क्षमता और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, विशेष रूप से आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के संदर्भ में।
चुनौतियाँ
1. परियोजना का कार्यान्वयन और निगरानी
- बधियाकरण प्रक्रिया की सफलता दर और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करना।
- बड़े पैमाने पर तेंदुओं को पकड़ने, सर्जरी करने और उनकी देखभाल करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मियों और संसाधनों की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; वन्यजीव प्रबंधन
2. वन विभाग में रिक्त पद और बुनियादी ढांचे की कमी
- वन विभाग में कर्मचारियों की कमी और आपातकालीन चिकित्सा उपकरणों का अभाव परियोजना के सुचारु संचालन में बाधा बन सकता है।
- समर्पित वन्यजीव पशु चिकित्सा इकाई के निर्माण और संचालन के लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: शासन; संस्थागत क्षमता निर्माण
3. जन स्वीकृति और नैतिक विचार
- वन्यजीवों के बधियाकरण जैसे हस्तक्षेपों के प्रति स्थानीय समुदायों और संरक्षणवादियों की स्वीकृति प्राप्त करना।
- वन्यजीवों के साथ नैतिक व्यवहार और उनके प्राकृतिक आवास में न्यूनतम हस्तक्षेप सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण नैतिकता; जन सहभागिता
4. वन्यजीवों का व्यवहार और अनुकूलन
- बधियाकरण के बाद तेंदुओं के व्यवहार पैटर्न में संभावित बदलाव और उनके प्राकृतिक आवास में पुनः अनुकूलन की चुनौती।
- कैमरा ट्रैप और फेंसिंग जैसी तकनीकों की प्रभावशीलता और उनकी निरंतर निगरानी की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: पारिस्थितिकी; वन्यजीव व्यवहार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि | वन्यजीवों के आवासों का सिकुड़ना, मानव बस्तियों का विस्तार और खाद्य संसाधनों की कमी संघर्ष को बढ़ा रही है। |
| तेंदुओं की बढ़ती आबादी | कुछ क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या में अनियंत्रित वृद्धि से मानव बस्तियों में उनके प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है। |
| वन विभाग की क्षमता | कर्मचारियों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र की कमजोरी। |
| वित्तीय और तकनीकी संसाधन | परियोजना के लिए आवश्यक 601 करोड़ रुपये के मास्टर प्लान को लागू करने के लिए पर्याप्त धन और विशेषज्ञता की उपलब्धता। |
| दीर्घकालिक प्रभाव | बधियाकरण के पारिस्थितिक और व्यवहारिक दीर्घकालिक प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन और निगरानी। |
आगे की राह
- वन्यजीवों के बधियाकरण जैसे वैज्ञानिक हस्तक्षेपों को लागू करने से पहले व्यापक शोध और पायलट परियोजनाओं का संचालन किया जाना चाहिए।
- वन विभाग की क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जिसमें कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता शामिल हो।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावी भूमि उपयोग योजना और कॉरिडोर प्रबंधन रणनीतियों को अपनाया जाना चाहिए।
- स्थानीय समुदायों को वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में शामिल किया जाना चाहिए और उन्हें संघर्ष से निपटने के लिए शिक्षित और सशक्त किया जाना चाहिए।
- वन्यजीवों के आवासों की सुरक्षा और बहाली के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए, जिसमें वनीकरण और अतिक्रमण हटाना शामिल है।
- थर्मल नाइट विजन कैमरे और चेन-लिंक फेंसिंग जैसी तकनीकी समाधानों को प्रभावी ढंग से तैनात और निगरानी की जानी चाहिए।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय स्थापित कर वन्यजीव संरक्षण के लिए आवश्यक वित्तीय और तकनीकी सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मानव-वन्यजीव संघर्ष · वन्यजीव संरक्षण · पारिस्थितिक संतुलन · जैव विविधता · वन्यजीव प्रबंधन · पशु बधियाकरण · संरक्षण नीतियाँ · पर्यावरण सुरक्षा · स्थानीय आबादी · वन्यजीव गलियारे
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48क’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51क (छ)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना’}
अवधारणा प्रवाह
मानव बस्तियों का विस्तार और वन क्षेत्रों का सिकुड़ना → तेंदुओं सहित वन्यजीवों का मानव आवासों में प्रवेश → मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि (जान-माल का नुकसान) → वन्यजीव आबादी को नियंत्रित करने की आवश्यकता → तेंदुओं के बधियाकरण की पहल (पायलट प्रोजेक्ट) → मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी और सह-अस्तित्व को बढ़ावा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए तेंदुओं का बधियाकरण (sterilization) करने वाला उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है।
2. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत तेंदुआ अनुसूची I में सूचीबद्ध एक संरक्षित प्रजाति है।
3. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) का उद्देश्य भारत में हरित हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देना है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। महाराष्ट्र (जुनार) के बाद उत्तर प्रदेश तेंदुओं का बधियाकरण करने वाला देश का दूसरा राज्य बनेगा। कथन 2 सही है। तेंदुआ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध है, जो इसे उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान करता है। कथन 3 सही है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।
Q2. भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-से संभावित कारण हो सकते हैं?
1. वनों की कटाई और पर्यावास का विखंडन।
2. शहरीकरण और कृषि भूमि का विस्तार।
3. वन्यजीव गलियारों का अवरुद्ध होना।
4. वन्यजीवों की आबादी में वृद्धि।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — मानव-वन्यजीव संघर्ष के कई कारण हैं, जिनमें वनों की कटाई, पर्यावास का विखंडन, शहरीकरण और कृषि भूमि का विस्तार, वन्यजीव गलियारों का अवरुद्ध होना और कुछ प्रजातियों की आबादी में वृद्धि शामिल हैं। ये सभी कारक वन्यजीवों को मानव बस्तियों के करीब आने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे संघर्ष बढ़ता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मानव-वन्यजीव संघर्ष भारत में एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती बन गया है। इस चुनौती के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए और इसके समाधान हेतु अपनाए जा सकने वाले विभिन्न उपायों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: मानव-वन्यजीव संघर्ष की संक्षिप्त परिभाषा और भारत में इसकी बढ़ती गंभीरता का उल्लेख।
2. संघर्ष के प्रमुख कारण: वनों की कटाई, पर्यावास का विखंडन, शहरीकरण, कृषि विस्तार, वन्यजीव गलियारों का अवरुद्ध होना, वन्यजीवों की आबादी में वृद्धि, शिकार की कमी, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव आदि का विस्तृत विश्लेषण।
3. समाधान हेतु उपाय:
क. प्रबंधन संबंधी उपाय: वन्यजीवों का बधियाकरण (जैसे तेंदुए के मामले में), स्थानांतरण, बाड़ लगाना, थर्मल नाइट विजन कैमरों का उपयोग, कमांड सेंटर से निगरानी।
ख. पर्यावास संरक्षण: वन क्षेत्र का विस्तार, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, degraded वनों का पुनरुद्धार।
ग. सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को शामिल करना, जागरूकता कार्यक्रम, क्षतिपूर्ति तंत्र।
घ. नीतिगत और कानूनी ढांचा: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का प्रभावी कार्यान्वयन, राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना।
ङ. प्रौद्योगिकी का उपयोग: निगरानी, डेटा संग्रह और विश्लेषण में प्रौद्योगिकी की भूमिका।
4. निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें संरक्षण और मानव कल्याण दोनों को प्राथमिकता दी जाए।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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