08 Aug आंध्र प्रदेश में 52.4% वर्षा की कमी, सभी जिलों में सूखे के आसार
✎ आंध्र प्रदेश में गंभीर वर्षा की कमी अल नीनो के खतरे के बीच कृषि और जल सुरक्षा के लिए चुनौती प्रस्तुत करती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति से निपटने हेतु तत्काल सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल, जलवायु, वर्षा वितरण) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन (सूखा, कृषि पर प्रभाव), अर्थव्यवस्था (कृषि क्षेत्र)
- Prelims: वर्षा की कमी, अल नीनो, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), सूखा, कृषि पर प्रभाव, खाद्य सुरक्षा
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि पर इसके प्रभाव, भारत में जल संकट: कारण, परिणाम और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: आंध्र प्रदेश में गंभीर वर्षा की कमी अल नीनो के खतरे के बीच कृषि और जल सुरक्षा के लिए चुनौती प्रस्तुत करती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति से निपटने हेतु तत्काल सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
प्रकासम, पूर्वी गोदावरी, विशाखापत्तनम, अन्नामय्या और चित्तूर जैसे जिलों में बड़ी कमी देखी गई है, जबकि शेष जिलों में भी वर्षा अपर्याप्त रही है। इस स्थिति ने राज्य में सूखे की आशंका को बढ़ा दिया है और किसानों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर है, और वर्षा की कमी से कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय और खाद्य सुरक्षा पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- अल नीनो (El Niño) एक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी है, और यह अक्सर भारत में कमजोर मानसून और सूखे की स्थिति से संबंधित होती है।
- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department – IMD) देश में मौसम संबंधी पूर्वानुमान और चेतावनियाँ जारी करने वाली प्रमुख एजेंसी है, जो कृषि नियोजन के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है।
- सूखा एक गंभीर प्राकृतिक आपदा है जो जल संसाधनों की कमी के कारण होती है, जिससे कृषि, पेयजल आपूर्ति और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होते हैं।
- राज्य सरकारें सूखे जैसी स्थितियों से निपटने के लिए विभिन्न राहत उपाय और कृषि सहायता योजनाएँ लागू करती हैं, जिनमें फसल बीमा और ऋण माफी शामिल हैं।
- बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव के क्षेत्र और गहरे अवदाब (Deep Depression) अक्सर भारत के पूर्वी और मध्य राज्यों में वर्षा लाते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका मार्ग बदल जाता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी हो सकती है।
वर्षा की कमी और सूखा
- वर्षा की कमी तब होती है जब किसी क्षेत्र में सामान्य औसत वर्षा से काफी कम वर्षा दर्ज की जाती है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव पड़ता है।
- IMD के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में सामान्य वर्षा से 20% से 59% कम वर्षा होती है, तो उसे ‘कमी वाली वर्षा’ (Deficient Rainfall) माना जाता है। 60% या उससे अधिक की कमी को ‘बड़ी कमी’ (Large Deficient) कहा जाता है।
- सूखा एक जटिल घटना है जिसे विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है, जैसे कि मौसम संबंधी सूखा (Meteorological Drought), कृषि संबंधी सूखा (Agricultural Drought), जल विज्ञान संबंधी सूखा (Hydrological Drought) और सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-economic Drought)।
- कृषि संबंधी सूखा तब होता है जब मिट्टी की नमी फसल की वृद्धि और विकास के लिए अपर्याप्त होती है, जिससे फसल को नुकसान होता है।
- सूखे के मुख्य कारणों में मानसून की अनियमितता, अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु घटनाएँ, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं।
- सूखे के प्रभावों में फसल उत्पादन में कमी, पशुधन की हानि, पेयजल संकट, ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी में वृद्धि और खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) शामिल हैं।
- भारत में सूखे से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (State Disaster Management Authority – SDMA) जैसी संस्थाएँ कार्य करती हैं।
- सरकार सूखे के प्रभावों को कम करने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana), मनरेगा (MGNREGA) और जल संरक्षण परियोजनाओं जैसी योजनाएँ चलाती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| आंध्र प्रदेश में वर्षा की कमी | राज्य के सभी जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है, जो कृषि और जल सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। |
| जुलाई अंत तक 52.4% वर्षा की कमी | यह आंकड़ा दर्शाता है कि मॉनसून का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है, जिससे खरीफ फसलों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। |
| एल नीनो (El Niño) का खतरा | एल नीनो की उपस्थिति से भारत में मॉनसून कमजोर हो सकता है, जिससे भविष्य में भी वर्षा की कमी जारी रहने की आशंका है। |
| गहरे दबाव का ओडिशा और छत्तीसगढ़ पर केंद्रित होना | बंगाल की खाड़ी में बने गहरे दबाव का आंध्र प्रदेश को पर्याप्त लाभ नहीं मिला, जिससे राज्य में वर्षा की कमी बनी रही। |
| कृषि पर सीधा प्रभाव | कम वर्षा के कारण किसानों को व्यापक सहायता की आवश्यकता है, जिससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कृषि उत्पादन में गिरावट: वर्षा की कमी से खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का और दालों की बुवाई और उपज प्रभावित होगी, जिससे किसानों की आय कम होगी।
- खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: कम उत्पादन से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव बढ़ेगा और आम लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित होगी।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव: कृषि पर निर्भर ग्रामीण क्षेत्रों में आय में कमी से बेरोजगारी बढ़ सकती है और समग्र आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी हो सकती है।
सामाजिक महत्व
- पेयजल संकट: भूजल स्तर में गिरावट और सतही जल स्रोतों के सूखने से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पेयजल की कमी हो सकती है।
- किसानों का पलायन: कृषि संकट के कारण किसान शहरों की ओर पलायन कर सकते हैं, जिससे शहरी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ेगा और सामाजिक असंतुलन पैदा होगा।
- स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ: जलजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है, खासकर जब लोग असुरक्षित जल स्रोतों का उपयोग करने को मजबूर हों।
पर्यावरणीय महत्व
- जैव विविधता पर प्रभाव: सूखे की स्थिति से स्थानीय वनस्पति और जीव-जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है।
- भूजल स्तर में कमी: कम वर्षा के कारण भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) नहीं हो पाता, जिससे भूजल स्तर में लगातार गिरावट आती है, जो दीर्घकालिक पर्यावरणीय चिंता का विषय है।
- मिट्टी की उर्वरता में कमी: सूखे से मिट्टी की नमी कम हो जाती है, जिससे उसकी उर्वरता प्रभावित होती है और मरुस्थलीकरण (Desertification) का खतरा बढ़ जाता है।
चुनौतियाँ
1. कृषि उत्पादन और किसान आय
- कम वर्षा के कारण खरीफ फसलों की बुवाई और वृद्धि प्रभावित हुई है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है।
- किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ रही है, जिससे उनकी आय पर और दबाव पड़ रहा है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, कृषि
2. जल संकट
- राज्य में पेयजल और सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है, जिससे जल सुरक्षा पर खतरा है।
- भूजल स्तर में गिरावट एक दीर्घकालिक समस्या बन सकती है, जिससे भविष्य में जल आपूर्ति और भी मुश्किल हो जाएगी।
यूपीएससी लिंक: भूगोल, पर्यावरण
3. खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति
- कृषि उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
- मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ने से सरकार के लिए आर्थिक प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा
4. सरकारी प्रतिक्रिया और राहत उपाय
- सरकार को सूखे से प्रभावित किसानों और क्षेत्रों के लिए त्वरित और प्रभावी राहत उपाय लागू करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
- दीर्घकालिक समाधानों जैसे जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को लागू करने में भी बाधाएं आ सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कम वर्षा | राज्य के सभी जिलों में 52.4% की कमी, जिससे कृषि और जल आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव। |
| एल नीनो का खतरा | भविष्य में भी मॉनसून के कमजोर रहने की आशंका, जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है। |
| कृषि संकट | फसल उत्पादन में गिरावट, किसानों की आय में कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव। |
| पेयजल और सिंचाई | जल स्रोतों के सूखने और भूजल स्तर में गिरावट से गंभीर जल संकट की स्थिति। |
| खाद्य सुरक्षा | उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि और मुद्रास्फीति का दबाव। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana)
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (Rashtriya Krishi Vikas Yojana)
आगे की राह
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को तत्काल वित्तीय सहायता और फसल बीमा का लाभ सुनिश्चित किया जाए।
- सिंचाई के वैकल्पिक स्रोतों जैसे बोरवेल और नहरों के माध्यम से जल आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाए।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) संरचनाओं के निर्माण को बढ़ावा दिया जाए।
- किसानों को सूखा प्रतिरोधी फसलों की खेती और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
- मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों (Weather Forecasting Systems) को मजबूत किया जाए ताकि किसान समय पर निर्णय ले सकें।
- जल प्रबंधन और संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जाए।
- दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए नदियों को जोड़ने (River Interlinking) जैसी बड़ी परियोजनाओं पर विचार किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
वर्षा की कमी · सूखा · कृषि संकट · जलवायु परिवर्तन · मौसम विज्ञान विभाग · अल नीनो · फसल बीमा योजना · आपदा प्रबंधन · जल संरक्षण · खाद्य सुरक्षा · राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष · कृषि उत्पादकता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, कृषि, जल प्रबंधन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243W’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, जल आपूर्ति’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘राज्य सूची में कृषि और जल’}
अवधारणा प्रवाह
कम मॉनसून वर्षा → राज्य में वर्षा की कमी → कृषि उत्पादन में गिरावट → किसानों की आय में कमी और जल संकट → खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति का खतरा → ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
2. अल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से ठंडा होने की घटना है।
3. भारत में सूखे की घोषणा केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और यह मौसम संबंधी पूर्वानुमान तथा भूकम्प विज्ञान का कार्य करता है। कथन 2 गलत है। अल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है, न कि ठंडा होने की। कथन 3 गलत है। भारत में सूखे की घोषणा राज्य सरकार द्वारा की जाती है, केंद्र सरकार द्वारा नहीं।
Q2. भारत में ‘सूखा’ घोषित करने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा मानदंड उपयोग किया जाता है?
- केवल वर्षा की कमी
- फसल की पैदावार में कमी और वर्षा की कमी
- फसल की पैदावार में कमी, वर्षा की कमी, और मिट्टी की नमी का स्तर
- फसल की पैदावार में कमी, वर्षा की कमी, मिट्टी की नमी का स्तर, और जलस्तर में गिरावट
उत्तर: फसल की पैदावार में कमी, वर्षा की कमी, मिट्टी की नमी का स्तर, और जलस्तर में गिरावट — भारत में सूखे की घोषणा के लिए कई मानदंडों का उपयोग किया जाता है, जिनमें वर्षा की कमी, फसल की पैदावार में कमी, मिट्टी की नमी का स्तर और जलस्तर में गिरावट शामिल हैं। ये सभी कारक मिलकर सूखे की गंभीरता का आकलन करने में मदद करते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ आंध्र प्रदेश में हाल ही में हुई वर्षा की कमी को देखते हुए, भारत में सूखे की स्थिति के प्रबंधन में केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिकाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए अपनाई जा सकने वाली दीर्घकालिक रणनीतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: आंध्र प्रदेश में वर्षा की कमी के संदर्भ में सूखे की स्थिति का संक्षिप्त उल्लेख।
2. केंद्र सरकार की भूमिका: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), कृषि मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय की भूमिकाएँ। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख।
3. राज्य सरकार की भूमिका: सूखा घोषित करने का अधिकार, राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) का प्रबंधन, स्थानीय स्तर पर राहत कार्य, कृषि विभाग की भूमिका, जल संरक्षण और सिंचाई योजनाओं का कार्यान्वयन।
4. केंद्र और राज्य के बीच समन्वय: वित्तीय सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन, सूचना साझाकरण और संयुक्त कार्यवाहियों का महत्व।
5. चुनौतियाँ: अपर्याप्त वित्तपोषण, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, प्रभावी कार्यान्वयन में बाधाएँ, डेटा की कमी।
6. दीर्घकालिक रणनीतियाँ: जल संचयन (Water Harvesting), सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation), फसल विविधीकरण (Crop Diversification), सूखा प्रतिरोधी फसलों का विकास, जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-smart Agriculture), उन्नत मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता कार्यक्रम।
7. निष्कर्ष: एक समन्वित और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments