उच्च न्यायालय ने पूछा: पुलिस मुठभेड़ में एक गोली, आरोपी के घुटने के नीचे क्यों लगी?

‘Day in and day out… police fire one shot and an accused is hit on the knee or below’: Allahabad High Court — concept mind map

उच्च न्यायालय ने पूछा: पुलिस मुठभेड़ में एक गोली, आरोपी के घुटने के नीचे क्यों लगी?

पुलिस मुठभेड़ घटनाअभियुक्तघुटने/नीचे गोलीगंभीर आरोपपुलिस टीमगोलीबारीआत्मरक्षा दावान्यायालयCBI जांचकानूनी सहायतामानवाधिकारउल्लंघन चिंतानिष्पक्ष प्रक्रिया
पुलिस मुठभेड़ घटना

✎ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का पुलिस मुठभेड़ों पर CBI जांच का आदेश न्यायिक समीक्षा के महत्व और आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, सरकार की नीतियाँ और हस्तक्षेप  |  GS Paper II — न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली  |  GS Paper IV — विधि का शासन, जवाबदेही और पारदर्शिता
  • Prelims: पुलिस मुठभेड़, न्यायिक समीक्षा, अनुच्छेद 226, आपराधिक न्याय प्रणाली, CBI जांच, मानवाधिकार, विधि का शासन
  • Essay: विधि का शासन और मानवाधिकारों का संरक्षण, न्यायपालिका की भूमिका: कार्यपालिका पर नियंत्रण और जवाबदेही

त्वरित पुनरावृत्ति: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का पुलिस मुठभेड़ों पर CBI जांच का आदेश न्यायिक समीक्षा के महत्व और आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने हाल ही में एक बलात्कार के आरोपी को मुठभेड़ में गोली लगने के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जांच का आदेश दिया है। न्यायालय ने पुलिस मुठभेड़ों के पैटर्न पर गंभीर चिंता व्यक्त की, जिसमें अक्सर आरोपी के घुटने या उससे नीचे गोली लगती है, जबकि पुलिसकर्मी पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। न्यायालय ने अभियोजन और दोषसिद्धि में ‘जल्दबाजी’ पर भी सवाल उठाए, जो न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करता है।

पृष्ठभूमि

  • उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में मई 2025 में एक बलात्कार के आरोपी को कथित पुलिस मुठभेड़ में दोनों पैरों में गोली लगी थी।
  • पुलिस के अनुसार, आरोपी ने पुलिस टीम पर गोली चलाई थी, जिसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई की।
  • न्यायालय ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह पुलिस आरोपपत्र के विरुद्ध दोषी की डिस्चार्ज याचिका पर पर्याप्त कानूनी सहायता प्रदान करने के बाद नया आदेश पारित करे।
  • यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस की जवाबदेही और मानवाधिकारों के सम्मान से संबंधित व्यापक चिंताओं को उजागर करता है।
  • भारत में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर लंबे समय से मानवाधिकार संगठनों और न्यायपालिका द्वारा जांच और पारदर्शिता की मांग की जाती रही है।

पुलिस मुठभेड़ और न्यायिक समीक्षा

  • पुलिस मुठभेड़ (Police Encounter) उस स्थिति को संदर्भित करती है जहाँ पुलिस बल और कथित अपराधी के बीच सशस्त्र टकराव होता है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर अपराधी की मृत्यु या चोट होती है।
  • भारत में, पुलिस को आत्मरक्षा या गंभीर अपराधों को रोकने के लिए बल प्रयोग करने का अधिकार है, लेकिन यह बल प्रयोग आनुपातिक और परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने पुलिस मुठभेड़ों के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें प्रत्येक मुठभेड़ की अनिवार्य मजिस्ट्रियल जांच और मृतक के परिजनों को सूचना देना शामिल है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने पी.यू.सी.एल. बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में मुठभेड़ों की जांच के लिए विस्तृत दिशानिर्देश निर्धारित किए थे, जिनमें FIR दर्ज करना, स्वतंत्र जांच, और न्यायिक जांच शामिल है।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके तहत वह विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिकता की जांच करती है।
  • यह संविधान के अनुच्छेद 13, 32, 226 और 227 के तहत निहित है, जो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति प्रदान करते हैं।
  • वर्तमान मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपनी न्यायिक समीक्षा शक्ति का प्रयोग करते हुए पुलिस कार्रवाई की वैधता और प्रक्रियात्मक शुद्धता पर सवाल उठाए हैं।
  • न्यायिक समीक्षा विधि के शासन को बनाए रखने, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों के संतुलन को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
एनकाउंटर में गोली लगने का पैटर्न पुलिस कार्रवाई की वैधता और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का CBI जांच का आदेश पुलिस की भूमिका की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और न्यायपालिका की सक्रियता को दर्शाता है।
अभियुक्त को पर्याप्त कानूनी सहायता का निर्देश निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और न्याय तक पहुंच के संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करता है।
पुलिस के बयानों में विसंगतियां पुलिस जांच की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर संदेह उत्पन्न करती हैं।
त्वरित अभियोजन और दोषसिद्धि पर सवाल न्याय प्रक्रिया में जल्दबाजी से बचने और उचित प्रक्रिया के पालन की आवश्यकता पर बल देता है।

महत्व

न्यायिक सक्रियता और मानवाधिकार

  • उच्च न्यायालय ने पुलिस एनकाउंटरों की बढ़ती संख्या और उनके पैटर्न पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जो मानवाधिकारों के संभावित उल्लंघन की ओर इशारा करता है।
  • CBI जांच का आदेश यह सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है कि पुलिस बल अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करें और कानून के शासन का पालन करें।
  • यह मामला न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करता है, जो कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा करती है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है।

कानून का शासन और निष्पक्ष न्याय

  • अदालत का यह अवलोकन कि पुलिस अक्सर अभियुक्तों को घुटने या उससे नीचे गोली मारती है, यह दर्शाता है कि पुलिस बल ‘आत्मरक्षा’ के बहाने जानबूझकर चोट पहुँचाने की रणनीति अपना सकता है।
  • अभियुक्त को पर्याप्त कानूनी सहायता प्रदान करने का निर्देश निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार को मजबूत करता है, भले ही अभियुक्त गंभीर अपराधों का आरोपी हो।
  • पुलिस द्वारा प्रस्तुत तथ्यों में विसंगतियां और त्वरित दोषसिद्धि पर सवाल न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर बल देते हैं।

पुलिस सुधार

  • यह घटना पुलिस बल के भीतर जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी को उजागर करती है, जिससे पुलिस सुधारों की तत्काल आवश्यकता महसूस होती है।
  • पुलिस मुठभेड़ों की जांच के लिए एक स्वतंत्र तंत्र की आवश्यकता को बल मिलता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष और गहन जांच हो।
  • पुलिस प्रशिक्षण और संवेदीकरण में सुधार की आवश्यकता है ताकि बल मानवाधिकारों का सम्मान करे और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करे।

चुनौतियाँ

1. पुलिस जवाबदेही का अभाव

  • पुलिस मुठभेड़ों में अक्सर ‘आत्मरक्षा’ का तर्क दिया जाता है, लेकिन उच्च न्यायालय के अवलोकन से पता चलता है कि यह अक्सर एक पैटर्न का हिस्सा हो सकता है।
  • पुलिस कर्मियों के खिलाफ शायद ही कभी प्रभावी कार्रवाई की जाती है, जिससे उन्हें अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने की छूट मिल सकती है।

2. मानवाधिकारों का उल्लंघन

  • न्यायेतर हत्याएं (extrajudicial killings) और पुलिस हिरासत में चोटें मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हैं, जो भारत के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं।
  • अभियुक्तों को भी उचित प्रक्रिया और मानवाधिकारों का अधिकार है, भले ही वे गंभीर अपराधों के आरोपी हों।

3. न्याय प्रणाली पर दबाव

  • पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए गए संदिग्ध साक्ष्य और त्वरित न्याय की मांग न्यायपालिका पर दबाव डालती है, जिससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
  • न्यायिक प्रक्रिया में देरी और पुलिस जांच में खामियां न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को कम करती हैं।

4. पुलिस सुधारों की आवश्यकता

  • भारत में पुलिस सुधारों की लंबे समय से मांग की जा रही है, लेकिन उन्हें पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है, जिससे पुलिस बल में संरचनात्मक समस्याएं बनी हुई हैं।
  • पुलिस को आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर प्रशिक्षण, उपकरण और नैतिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पुलिस मुठभेड़ों का पैटर्न यह दर्शाता है कि पुलिस बल जानबूझकर अभियुक्तों को चोट पहुँचाने की रणनीति अपना सकता है, जो मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
पुलिस के बयानों में विसंगतियां पुलिस जांच की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर गंभीर संदेह उत्पन्न करती हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।
त्वरित अभियोजन और दोषसिद्धि न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकता है और अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को कमजोर कर सकता है।
कानूनी सहायता का अभाव गरीब और कमजोर अभियुक्तों को पर्याप्त कानूनी प्रतिनिधित्व से वंचित करता है, जिससे न्याय तक उनकी पहुंच बाधित होती है।
पुलिस की जवाबदेही पुलिस बल के भीतर जवाबदेही की कमी उन्हें अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने की छूट दे सकती है, जिससे कानून का शासन कमजोर होता है।

आगे की राह

  • पुलिस मुठभेड़ों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और पारदर्शी तंत्र स्थापित किया जाए।
  • पुलिस कर्मियों को मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के संबंध में गहन प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
  • पुलिस बल में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आंतरिक निगरानी और शिकायत निवारण प्रणालियों को मजबूत किया जाए।
  • अभियुक्तों को संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत पर्याप्त कानूनी सहायता सुनिश्चित की जाए, विशेषकर गंभीर मामलों में।
  • न्यायपालिका को पुलिस के बयानों और साक्ष्यों की गहन जांच करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि न्याय निष्पक्ष और उचित हो।
  • पुलिस सुधारों पर प्रकाश डालने वाली प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) जैसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
  • जनता में पुलिस की कार्रवाई के प्रति विश्वास बढ़ाने के लिए पुलिस-नागरिक संबंधों को बेहतर बनाने के प्रयास किए जाएं।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

न्यायिक समीक्षा · पुलिस मुठभेड़ · मानवाधिकार · कानून का शासन · निष्पक्ष जाँच · अनुच्छेद 21 · जीवन का अधिकार · स्वतंत्र न्यायपालिका · दंड प्रक्रिया संहिता · पुलिस सुधार · अधिकारों का उल्लंघन · जवाबदेही

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 22(1)’, ‘note’: ‘गिरफ्तारी और हिरासत में संरक्षण’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 20(3)’, ‘note’: ‘आत्म-अभिशंसा के विरुद्ध संरक्षण’}

अवधारणा प्रवाह

पुलिस द्वारा कथित मुठभेड़  →  अभियुक्त को घुटने या नीचे गोली लगना  →  इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा चिंता व्यक्त करना  →  CBI जांच का आदेश और कानूनी सहायता का निर्देश  →  पुलिस कार्रवाई की वैधता और मानवाधिकारों पर सवाल  →  न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका की समीक्षा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 केवल भारतीय नागरिकों को ही प्राप्त है।
2. ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ वाक्यांश का अर्थ है कि कानून की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, केवल प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
3. न्यायिक समीक्षा की शक्ति भारत में केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: कोई नहीं — कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 21 ‘किसी भी व्यक्ति’ को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें नागरिक और गैर-नागरिक दोनों शामिल हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के बावजूद, मेनका गांधी मामले (1978) के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने ‘उचित प्रक्रिया’ के सिद्धांत को भी शामिल किया, जिसका अर्थ है कि कानून स्वयं भी उचित, निष्पक्ष और न्यायसंगत होना चाहिए। कथन 3 गलत है क्योंकि न्यायिक समीक्षा की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32, 136, 142) और उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226, 227) दोनों के पास है।

Q2. अभिकथन (A): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक कथित पुलिस मुठभेड़ की CBI जाँच का आदेश दिया है।
कारण (R): उच्च न्यायालयों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि समाचार के अनुसार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने CBI जाँच का आदेश दिया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है, जिसमें किसी मामले की जाँच का आदेश देना भी शामिल हो सकता है, खासकर जब मानवाधिकारों के उल्लंघन का संदेह हो। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है क्योंकि उच्च न्यायालय ने अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए जाँच का आदेश दिया।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा कथित पुलिस मुठभेड़ों पर की गई टिप्पणियों के आलोक में, भारत में ‘कानून के शासन’ के सिद्धांत को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** इलाहाबाद उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों का संक्षिप्त उल्लेख करें, जिसमें पुलिस मुठभेड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं। ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) की अवधारणा को परिभाषित करें (ए.वी. डाइसी के सिद्धांत और भारतीय संदर्भ में इसके निहितार्थ)।
2. **न्यायपालिका की भूमिका:**
* **संवैधानिक संरक्षक:** संविधान के अनुच्छेद 13, 32, 226 के तहत मौलिक अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की भूमिका।
* **कार्यपालिका पर नियंत्रण:** पुलिस और अन्य कार्यकारी एजेंसियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग को रोकने में न्यायपालिका की भूमिका। अवैध मुठभेड़ों, हिरासत में यातना आदि पर अंकुश लगाना।
* **न्यायिक समीक्षा:** कानूनों और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की जाँच की शक्ति।
* **निष्पक्ष जाँच का आदेश:** CBI या अन्य स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा जाँच का आदेश देने की शक्ति, जैसा कि प्रस्तुत मामले में देखा गया।
* **जवाबदेही सुनिश्चित करना:** पुलिस कर्मियों और अधिकारियों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराना।
3. **समालोचनात्मक परीक्षण (चुनौतियाँ और सीमाएँ):**
* **न्यायिक विलंब:** मामलों के निपटान में लगने वाला लंबा समय, जिससे न्याय में देरी होती है।
* **न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम:** न्यायिक सक्रियता की सीमा पर बहस और कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप के आरोप।
* **आदेशों का अनुपालन:** न्यायपालिका के आदेशों का पूर्ण और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ।
* **संसाधनों की कमी:** न्यायपालिका के पास मामलों की बढ़ती संख्या के अनुपात में संसाधनों की कमी।
* **सार्वजनिक धारणा:** कभी-कभी ‘त्वरित न्याय’ की सार्वजनिक मांग के दबाव में न्यायिक प्रक्रिया पर प्रभाव।
4. **आगे का मार्ग:** पुलिस सुधार (प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामला), न्यायिक प्रक्रियाओं का सुदृढ़ीकरण, मानवाधिकार आयोगों की भूमिका, और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए सभी स्तंभों (कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका) के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दें।
5. **निष्कर्ष:** न्यायपालिका भारत में कानून के शासन का एक अनिवार्य स्तंभ है, और इसकी सतर्कता नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहाँ राज्य की एजेंसियां शक्ति का दुरुपयोग करती हैं।

स्रोत: The Indian Express

Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पुलिस द्वारा किए गए गोलीबारी के संबंध में दिए गए निर्देशों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

  1. पुलिस द्वारा गोली चलाने के मामलों में आरोपी के घुटने या उससे नीचे निशाना लगाना अनिवार्य है।
  2. पुलिस द्वारा गोली चलाने के मामलों में न्यायालय ने बल प्रयोग की न्यूनतम आवश्यकता पर जोर दिया है।
  3. पुलिस द्वारा गोली चलाने के मामलों में आरोपी को घायल करने की बजाय मारने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  4. पुलिस द्वारा गोली चलाने के मामलों में गोली चलाने से पहले चेतावनी देना आवश्यक नहीं है।

उत्तर: पुलिस द्वारा गोली चलाने के मामलों में न्यायालय ने बल प्रयोग की न्यूनतम आवश्यकता पर जोर दिया है। — न्यायालय ने पुलिस द्वारा बल प्रयोग की न्यूनतम आवश्यकता पर जोर दिया है, ताकि अनावश्यक हिंसा से बचा जा सके।

Mains: उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा गोली चलाने के मामलों में उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा कीजिए। साथ ही, पुलिस द्वारा बल प्रयोग के सिद्धांतों के अनुपालन में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment