26 Sep कर्नाटक और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट: विकास बनाम पर्यावरण का संतुलन

✎ कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश करती है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है, लेकिन स्थानीय…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भौतिक भूगोल) | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन)
- Prelims: पश्चिमी घाट, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट, गाडगिल रिपोर्ट, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA), पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, जैव विविधता हॉटस्पॉट
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन की चुनौतियाँ, संघवाद और पर्यावरणीय शासन: राज्यों तथा केंद्र की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश करती है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है, लेकिन स्थानीय आजीविका संबंधी चिंताओं के कारण इसे राज्यों से विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक विधानसभा ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों को सर्वसम्मति से अस्वीकार कर दिया है, जिससे पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) के सीमांकन पर अनिश्चितता बढ़ गई है। राज्य सरकार का यह रुख आजीविका संबंधी चिंताओं और विकास परियोजनाओं पर संभावित प्रतिबंधों के कारण स्थानीय विरोध से प्रेरित है, जबकि केंद्र सरकार ने राज्यों को रिपोर्ट की सिफारिशों का जमीनी सत्यापन (ground-truthing) करने का निर्देश दिया था। यह स्थिति पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्रीय विकास की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को उजागर करती है।
पृष्ठभूमि
- पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली एक पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों से होकर गुजरती है।
- इसे जैव विविधता के आठ ‘हॉटस्पॉट’ में से एक के रूप में मान्यता प्राप्त है और यह कई स्थानिक प्रजातियों का घर है।
- पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) ने पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए सिफारिशें देने हेतु दो समितियों का गठन किया था: पहली, माधव गाडगिल की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) और दूसरी, के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय कार्य समूह (HLWG)।
- गाडगिल रिपोर्ट (2011) ने पश्चिमी घाट के लगभग 64% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की थी, जिसमें खनन, ताप विद्युत संयंत्र और बड़े बांधों पर पूर्ण प्रतिबंध का सुझाव दिया गया था।
- गाडगिल रिपोर्ट को स्थानीय समुदायों और राज्य सरकारों से व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि इसे विकास विरोधी और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला माना गया।
- इसके बाद, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट (2013) ने गाडगिल रिपोर्ट की कुछ सिफारिशों को संशोधित किया, जिसमें पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को ESA के रूप में नामित करने का सुझाव दिया गया, जो ‘नो-गो’ क्षेत्रों की तुलना में अधिक विकास-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाता है।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या हैं?
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट, जिसे ‘उच्च-स्तरीय कार्य समूह (HLWG) रिपोर्ट’ भी कहा जाता है, का गठन गाडगिल रिपोर्ट की समीक्षा करने और पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए एक व्यवहार्य ढांचा प्रदान करने के लिए किया गया था।
- इस रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 37% (लगभग 60,000 वर्ग किमी) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में सीमांकित करने की सिफारिश की।
- रिपोर्ट ने ESA क्षेत्रों में कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध या विनियमन का सुझाव दिया, जैसे खनन, उत्खनन, ‘रेड’ श्रेणी के उद्योग, बड़े निर्माण परियोजनाएं और ताप विद्युत संयंत्र।
- यह रिपोर्ट ‘प्राकृतिक परिदृश्य’ और ‘मानव-प्रधान परिदृश्य’ के बीच अंतर करने के लिए 2012 के रिमोट-सेंसिंग और उपग्रह डेटा का उपयोग करती है।
- एक प्रमुख सिफारिश यह थी कि यदि किसी राजस्व ग्राम का कम से कम 20% क्षेत्र संवेदनशील है, तो पूरे ग्राम को ESA के भीतर रखा जाना चाहिए, जिससे कृषि भूमि और मानव बस्तियों के भी ESA में शामिल होने की चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना था, जो गाडगिल रिपोर्ट की तुलना में अधिक उदार थी।
- केंद्र सरकार ने 2013-14 में राज्यों को रिपोर्ट की सिफारिशों का जमीनी सत्यापन (ground-truthing) करने का निर्देश दिया, ताकि स्थानीय वास्तविकताओं के आधार पर ESA की सीमाओं को परिष्कृत किया जा सके।
- ESA की घोषणा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत की जाती है, जिसका उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के क्षेत्रों में कुछ गतिविधियों को विनियमित करना है ताकि इन क्षेत्रों को ‘शॉक एब्जॉर्बर’ के रूप में कार्य करने में मदद मिल सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कस्तूरीरंगन रिपोर्ट | पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESAs) के सीमांकन और संरक्षण के लिए सिफारिशें प्रदान करती है। |
| पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) | ऐसे क्षेत्र जो जैव विविधता में समृद्ध हैं और जिन्हें संरक्षण की आवश्यकता है, लेकिन मानवीय गतिविधियों की अनुमति देते हुए। |
| रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट डेटा | रिपोर्ट में प्राकृतिक और मानव-प्रधान परिदृश्यों को अलग करने के लिए उपयोग किया गया डेटा, जिसकी सटीकता पर सवाल उठाए गए हैं। |
| ग्राउंड-ट्रूथिंग | केंद्र द्वारा राज्यों को रिपोर्ट की सिफारिशों की जमीनी स्तर पर पुष्टि करने का निर्देश, ताकि स्थानीय वास्तविकताओं को ध्यान में रखा जा सके। |
| राजस्व ग्राम का 20% नियम | सिफारिश कि यदि किसी राजस्व ग्राम का कम से कम 20% क्षेत्र संवेदनशील है, तो पूरे गांव को ESA में रखा जाए, जिससे कृषि भूमि और बस्तियों पर प्रभाव पड़ सकता है। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण
- पश्चिमी घाट भारत के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक है, जो कई स्थानिक प्रजातियों का घर है और देश की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
- ESA पदनाम का उद्देश्य इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को अनियंत्रित विकास और विनाशकारी गतिविधियों से बचाना है, जबकि स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी ध्यान में रखना है।
संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
- यह मुद्दा पर्यावरण संरक्षण और राज्यों के विकास संबंधी आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और संभावित टकराव को दर्शाता है।
- राज्यों को ESA के दायरे पर बातचीत करने का प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि उन्हें संरक्षण के आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का सामना करना पड़ता है, जबकि राष्ट्रीय लाभ पूरे देश को मिलता है।
सतत विकास
- रिपोर्ट का ‘विकास-समर्थक’ दृष्टिकोण मानव अधिभोग और आर्थिक गतिविधियों की अनुमति देता है, जो संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है।
- ESA के सीमांकन में देरी से संभावित ESA के भीतर सरकारों और व्यवसायों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है कि किस प्रकार के नियोजित विकास की अनुमति दी जाएगी।
चुनौतियाँ
1. आजीविका और विस्थापन की चिंताएँ
- स्थानीय समुदायों, विशेषकर किसानों और श्रमिकों को डर है कि ESA पदनाम से उनकी आजीविका प्रभावित होगी और उन्हें विस्थापित होना पड़ सकता है।
- खनन जैसी गतिविधियों में शामिल निहित स्वार्थ कथित तौर पर विस्थापन के डर को बढ़ा रहे हैं, जिससे स्थानीय प्रतिरोध बढ़ रहा है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, सामाजिक न्याय
2. डेटा की सटीकता और पद्धति
- रिपोर्ट में उपयोग किए गए 2012 के रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट डेटा की सटीकता पर सवाल उठाए गए हैं, विशेष रूप से प्राकृतिक और मानव-प्रधान परिदृश्यों को अलग करने में।
- एक राजस्व ग्राम के 20% क्षेत्र के संवेदनशील होने पर पूरे गांव को ESA में शामिल करने की सिफारिश से कृषि भूमि और मानव बस्तियां भी ESA के दायरे में आ सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी
3. केंद्र-राज्य समन्वय और सहमति
- राज्यों को ESA के दायरे पर बातचीत करने का प्रोत्साहन मिलता है, जिससे केंद्र के साथ सहमति तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
- कर्नाटक जैसे राज्यों के लिए एक समान रूप से विचारित विकल्प प्रस्तुत किए बिना पूरे ढांचे को अस्वीकार करना मुश्किल हो जाता है, खासकर जब अन्य राज्य प्रगति कर रहे हों।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
4. विकास बनाम संरक्षण का संतुलन
- राज्यों को स्थानीय प्रतिरोध और छोड़े गए विकास के आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का सामना करना पड़ता है, जबकि देश को घाटों के संरक्षण का राष्ट्रीय लाभ मिलता है।
- स्थानीय समुदायों की आकांक्षाओं को राज्य की जिम्मेदारियों के साथ कैसे सामंजस्य बिठाया जाए, यह एक बड़ी चुनौती है, खासकर कर्नाटक के लिए जिसका प्रस्तावित ESA में सबसे बड़ा हिस्सा है।
यूपीएससी लिंक: सतत विकास, पर्यावरण नीति
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की अस्वीकृति | कर्नाटक विधानसभा ने सर्वसम्मति से रिपोर्ट की सिफारिशों को खारिज कर दिया, जिससे ESA ढांचे के कार्यान्वयन में बाधा आई। |
| आजीविका पर प्रभाव | किसानों और श्रमिकों को अपनी आजीविका और संभावित विस्थापन के बारे में चिंता है, जिससे स्थानीय स्तर पर विरोध हो रहा है। |
| डेटा की सटीकता | रिपोर्ट में उपयोग किए गए 2012 के रिमोट सेंसिंग डेटा की सटीकता पर सवाल उठाए गए हैं, जिससे जमीनी वास्तविकताओं के साथ बेमेल होने की आशंका है। |
| राजस्व ग्राम का 20% नियम | यह सिफारिश कि यदि किसी गांव का 20% क्षेत्र संवेदनशील है, तो पूरे गांव को ESA में शामिल किया जाए, जिससे कृषि भूमि और बस्तियां प्रभावित हो सकती हैं। |
| अनिश्चितता और विकास में देरी | ESA पदनाम में देरी से संभावित ESA के भीतर नियोजित विकास के स्वरूप पर अनिश्चितता बनी रहती है। |
| अन्य राज्यों की प्रगति | गुजरात, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और गोवा जैसे अन्य राज्यों द्वारा ESA सीमांकन में प्रगति से कर्नाटक पर दबाव बढ़ रहा है। |
आगे की राह
- स्थानीय समुदायों, विशेषकर किसानों और श्रमिकों की चिंताओं को दूर करने के लिए व्यापक जन-परामर्श और जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- ESA के सीमांकन के लिए अधिक सटीक और अद्यतन जमीनी-सत्यापित (ground-truthed) डेटा का उपयोग किया जाए, जिसमें स्थानीय स्थलाकृति और मानवीय गतिविधियों को ध्यान में रखा जाए।
- राजस्व ग्राम के 20% नियम जैसे विवादास्पद प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए और अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाया जाए, जो केवल संवेदनशील क्षेत्रों को लक्षित करे।
- कर्नाटक को एक व्यवहार्य और वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ वैकल्पिक मानचित्र और ESA ढांचा प्रस्तुत करना चाहिए जो संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करे।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी समन्वय और संवाद स्थापित किया जाए ताकि आम सहमति बन सके और पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जा सके।
- स्थानीय समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसरों और पारिस्थितिक रूप से जिम्मेदार विकास मॉडल को बढ़ावा दिया जाए ताकि संरक्षण प्रयासों के साथ उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
- अन्य राज्यों द्वारा ESA सीमांकन में की गई प्रगति से सीख ली जाए और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाया जाए, जबकि कर्नाटक की विशिष्ट परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट · पश्चिमी घाट · पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) · पर्यावरण संरक्षण · संघवाद · केंद्र-राज्य संबंध · सतत विकास · आजीविका · जैव विविधता · पर्यावरण शासन · भू-सत्यापन · पर्यावरण प्रभाव आकलन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण और सुधार
- अनुच्छेद 246: संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण (सातवीं अनुसूची)
- अनुच्छेद 263: अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) (केंद्र-राज्य समन्वय)
अवधारणा प्रवाह
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशें (ESA का सीमांकन) → कर्नाटक विधानसभा द्वारा रिपोर्ट की अस्वीकृति (आजीविका/डेटा की चिंताएँ) → स्थानीय प्रतिरोध और राजनीतिक दबाव (खनन/विस्थापन का डर) → केंद्र का ग्राउंड-ट्रूथिंग निर्देश (राज्यों को जमीनी सत्यापन का कार्य) → ESA पदनाम में देरी और अनिश्चितता (विकास और संरक्षण के बीच गतिरोध) → अन्य राज्यों की प्रगति (कर्नाटक पर दबाव में वृद्धि) → संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की आवश्यकता (स्थानीय चिंताओं को दूर करना)
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पश्चिमी घाट छह राज्यों में फैला हुआ है।
2. कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के 20% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश की थी।
3. गाडगिल रिपोर्ट कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से पहले आई थी और पर्यावरण संरक्षण पर अधिक प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण रखती थी।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। पश्चिमी घाट गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में फैला हुआ है। कथन 2 गलत है। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने किसी विशिष्ट प्रतिशत का सुझाव नहीं दिया था, बल्कि राजस्व गांवों को ESA में शामिल करने के लिए 20% संवेदनशील क्षेत्र के मानदंड का प्रस्ताव किया था। कथन 3 सही है। गाडगिल रिपोर्ट (पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल रिपोर्ट) कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से पहले आई थी और पर्यावरण संरक्षण पर अधिक सख्त सिफारिशें की थीं, जिसमें खनन जैसी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल था।
Q2. अभिकथन (A): कर्नाटक विधानसभा ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों को सर्वसम्मति से अस्वीकार कर दिया है।
कारण (R): रिपोर्ट में उपयोग किए गए रिमोट-सेंसिंग डेटा की सटीकता और ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ (ESA) में पूरे राजस्व गांव को शामिल करने की सिफारिश पर आजीविका संबंधी चिंताएँ थीं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि कर्नाटक विधानसभा ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया था। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि रिपोर्ट में उपयोग किए गए डेटा की सटीकता और ESA में पूरे राजस्व गांव को शामिल करने की सिफारिश पर स्थानीय आजीविका और विकास पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के कारण चिंताएँ व्यक्त की गई थीं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों पर चर्चा कीजिए और पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) के सीमांकन को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले संघवादी मुद्दों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का संक्षिप्त परिचय, इसका संदर्भ (गाडगिल रिपोर्ट के बाद) और पश्चिमी घाट के महत्व पर प्रकाश डालना।
2. **कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें:**
* पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करना।
* ESA में खनन, तापीय ऊर्जा संयंत्रों और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध।
* ESA में आने वाले गांवों के लिए ग्राम सभाओं की भूमिका को मजबूत करना।
* ‘नो-गो’ क्षेत्रों के बजाय ‘रेड’, ‘ऑरेंज’ और ‘ग्रीन’ श्रेणियों के माध्यम से विकासात्मक गतिविधियों की अनुमति देना।
* भू-सत्यापन (ground-truthing) के माध्यम से स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर।
3. **केंद्र और राज्यों के बीच संघवादी मुद्दे:**
* **राज्यों की आपत्तियाँ:** कर्नाटक जैसे राज्यों द्वारा रिपोर्ट को अस्वीकार करने के कारण (आजीविका पर प्रभाव, विकास की चिंताएँ, डेटा की सटीकता पर संदेह)।
* **राजकोषीय संघवाद:** राज्यों को संरक्षण के आर्थिक और राजनीतिक परिणाम भुगतने पड़ते हैं, जबकि राष्ट्रीय लाभ केंद्र को मिलता है, जिससे राज्यों को ESA के दायरे को कम करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
* **सहकारी संघवाद का अभाव:** केंद्र के निर्देशों और राज्यों की स्थानीय चिंताओं के बीच समन्वय की कमी।
* **स्थानीय स्वशासन बनाम केंद्रीय दिशानिर्देश:** ग्राम सभाओं की भूमिका और स्थानीय समुदायों की सहमति का मुद्दा।
* **संवैधानिक प्रावधान:** पर्यावरण संरक्षण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र की शक्तियाँ और राज्यों की स्वायत्तता का संतुलन।
4. **समालोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पक्ष:** जैव विविधता संरक्षण का महत्व, सतत विकास की आवश्यकता, अंतर-राज्यीय समन्वय का प्रयास।
* **नकारात्मक पक्ष:** राज्यों की संप्रभुता पर प्रभाव, स्थानीय आजीविका पर चिंताएँ, विकास परियोजनाओं में अनिश्चितता, राजनीतिकरण।
* **आगे का रास्ता:** केंद्र और राज्यों के बीच संवाद, भू-सत्यापन में पारदर्शिता, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी, क्षतिपूर्ति तंत्र और विकासात्मक विकल्पों का प्रावधान।
5. **निष्कर्ष:** पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए, सहकारी संघवाद के माध्यम से एक सर्वसम्मत समाधान की दिशा में बढ़ने का सुझाव।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक राज्य में ‘कस्तूरीरंगन रिपोर्ट’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- A. पश्चिमी घाट में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना
- B. कर्नाटक में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना
- C. कृषि उत्पादन में वृद्धि करना
- D. राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देना
उत्तर: A. पश्चिमी घाट में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना — कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए तैयार की गई थी, जिसमें कर्नाटक राज्य भी शामिल है।
Mains: कर्नाटक राज्य में ‘कस्तूरीरंगन रिपोर्ट’ के लागू होने से उत्पन्न चुनौतियों और अवसरों पर प्रकाश डालते हुए, राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीतियों का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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