12 Aug कर्नाटक सुप्रीम कोर्ट जाएगा, कावेरी जल विवाद पर उठाएगा कदम
Cauvery RiverKarnataka GovernmentSupreme CourtCWMACWDT✎ भारत में अंतर्राज्यीय जल विवादों का समाधान संवैधानिक रूप से अनुच्छेद 262 और अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित न्यायाधिकरणों तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से किया जाता है, जिसमें कावेरी जल प्रबंधन…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — विभिन्न घटकों के बीच विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ
- Prelims: कावेरी जल विवाद, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC), अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद, अनुच्छेद 262, जल राज्य सूची, सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
- Essay: भारत में संघीय ढाँचे के समक्ष अंतर्राज्यीय विवादों की चुनौतियाँ, जल सुरक्षा और अंतर्राज्यीय जल विवादों का स्थायी समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत में अंतर्राज्यीय जल विवादों का समाधान संवैधानिक रूप से अनुच्छेद 262 और अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित न्यायाधिकरणों तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से किया जाता है, जिसमें कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण जैसे निकाय कार्यान्वयन में सहायता करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक राज्य ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority – CWMA) के उस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में चुनौती देने का निर्णय लिया है, जिसमें कावेरी जल विनियमन समिति (Cauvery Water Regulation Committee – CWRC) द्वारा तमिलनाडु को 15 दिनों के लिए 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने के निर्देश को बरकरार रखा गया था। कर्नाटक सरकार का तर्क है कि राज्य में पीने के पानी की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, खासकर तब जब मानसून के शेष भाग में कम वर्षा का पूर्वानुमान है। यह घटनाक्रम भारत में अंतर्राज्यीय जल विवादों के प्रबंधन और संवैधानिक तंत्र की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
पृष्ठभूमि
- कावेरी नदी जल विवाद कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच एक लंबे समय से चला आ रहा विवाद है, जो नदी के जल के बँटवारे से संबंधित है।
- यह विवाद ब्रिटिश काल से चला आ रहा है, जब मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच समझौते हुए थे।
- स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन किया, जिसने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया।
- न्यायाधिकरण के निर्णय को विभिन्न राज्यों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसने 2018 में अपना अंतिम फैसला सुनाया और जल बँटवारे की योजना को संशोधित किया।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर, केंद्र सरकार ने 2018 में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन किया ताकि न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
- वर्तमान विवाद सूखे की स्थिति और मानसून की कमी के कारण उत्पन्न हुआ है, जहाँ कर्नाटक कावेरी बेसिन में कम जल उपलब्धता का हवाला दे रहा है।
अंतर्राज्यीय जल विवादों का संवैधानिक एवं संस्थागत ढाँचा
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर्राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 262(1) संसद को कानून द्वारा किसी अंतर्राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 262(2) संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून द्वारा यह उपबंध करे कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी विवाद में कोई अधिकारिता नहीं रखेगा।
- इस संवैधानिक प्रावधान के तहत, संसद ने अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया है।
- यह अधिनियम केंद्र सरकार को अंतर्राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और विवाद में शामिल पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है, और इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, हालांकि न्यायिक समीक्षा के कुछ सीमित आधार उपलब्ध हो सकते हैं।
- जल ‘राज्य सूची’ (State List) का विषय है (संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 17), लेकिन अंतर्राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास को ‘संघ सूची’ (Union List) में शामिल किया गया है (सूची I की प्रविष्टि 56)।
- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) जैसे निकाय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत स्थापित किए गए हैं ताकि जल बँटवारे के निर्णयों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कावेरी जल विवाद | यह भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जो दशकों से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच तनाव का कारण रहा है। |
| कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) | यह विवाद के समाधान के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित एक संस्था है, जो जल आवंटन और प्रबंधन पर निर्णय लेती है। |
| कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) | यह CWMA के अधीन कार्य करती है और जल प्रवाह तथा भंडारण की स्थिति के आधार पर राज्यों को जल छोड़ने के निर्देश जारी करती है। |
| सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप | अंतर-राज्यीय जल विवादों में अंतिम न्यायिक प्राधिकरण के रूप में, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सभी संबंधित पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है। |
| पेयजल की प्राथमिकता | संकट की स्थिति में, राज्यों द्वारा पेयजल आवश्यकताओं को सिंचाई या अन्य उपयोगों पर प्राथमिकता देना एक महत्वपूर्ण मानवीय और नीतिगत विचार है। |
महत्व
राजव्यवस्था एवं शासन
- यह मामला अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में संघीय ढांचे की जटिलताओं और न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका को उजागर करता है।
- CWMA और CWRC जैसे सांविधिक निकायों के निर्णयों को चुनौती देने की राज्यों की क्षमता न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को पुष्ट करती है।
आर्थिक प्रभाव
- कावेरी बेसिन में कृषि, विशेषकर धान की खेती, जल उपलब्धता पर अत्यधिक निर्भर करती है, जिससे जल आवंटन का सीधा प्रभाव किसानों की आय और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
- जल संकट की स्थिति में औद्योगिक और शहरी जल आपूर्ति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों में बाधा आ सकती है।
सामाजिक प्रभाव
- जल विवाद अक्सर संबंधित राज्यों के लोगों के बीच सामाजिक तनाव और विरोध प्रदर्शनों को जन्म देते हैं, जिससे कानून और व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होती है।
- पेयजल की कमी विशेष रूप से ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए गंभीर स्वास्थ्य और आजीविका संबंधी चुनौतियाँ पैदा करती है।
पर्यावरण
- नदी के निचले प्रवाह में कमी से पारिस्थितिक तंत्र, जैसे कि आर्द्रभूमि और डेल्टा क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे जैव विविधता को खतरा होता है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव और सूखे की बढ़ती आवृत्ति इन जल विवादों को और अधिक तीव्र कर रही है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान
- संबंधित राज्यों के बीच विश्वास की कमी और राजनीतिकरण के कारण सहमति बनाना कठिन हो जाता है।
- जल की कमी की स्थिति में, सभी राज्यों की मांगों को पूरा करना असंभव हो जाता है, जिससे असंतोष बढ़ता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- अनियमित मानसून और सूखे की बढ़ती आवृत्ति जल उपलब्धता को अप्रत्याशित बनाती है, जिससे जल प्रबंधन योजनाएँ बाधित होती हैं।
- भविष्य की जल आवश्यकताओं का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है, जिससे दीर्घकालिक समाधानों की योजना बनाना जटिल हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
3. डेटा की विश्वसनीयता और साझाकरण
- जल भंडारण, प्रवाह और उपयोग पर विश्वसनीय तथा साझा डेटा की कमी विवादों को बढ़ा सकती है।
- राज्यों के बीच डेटा साझाकरण और पारदर्शिता की कमी से अविश्वास पैदा होता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, ई-गवर्नेंस
4. पेयजल बनाम सिंचाई
- सूखे की स्थिति में, पेयजल और कृषि सिंचाई के लिए जल आवंटन के बीच संतुलन बनाना एक नैतिक और नीतिगत दुविधा प्रस्तुत करता है।
- कृषि पर निर्भर बड़ी आबादी वाले राज्यों के लिए सिंचाई के पानी में कटौती करना राजनीतिक रूप से कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: कृषि, सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल आवंटन पर CWMA का निर्णय | कर्नाटक का मानना है कि 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ना उसके लिए बहुत मुश्किल है, खासकर पेयजल आवश्यकताओं को देखते हुए। |
| सूखे की स्थिति | कर्नाटक में कम बारिश का अनुमान है, जिससे उसे जून 2027 तक पेयजल के लिए पानी संरक्षित करने की आवश्यकता है। |
| पेयजल बनाम अन्य उपयोग | कर्नाटक का तर्क है कि तमिलनाडु के पास पेयजल के लिए अधिक भंडारण है, जबकि उसे अपनी पेयजल आवश्यकताओं को प्राथमिकता देनी होगी। |
| अंतर-राज्यीय संबंध | यह विवाद दोनों राज्यों के बीच तनाव को बढ़ाता है और सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर करता है। |
| न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा | बार-बार सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना स्थायी समाधान खोजने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। |
आगे की राह
- अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए एक स्थायी तंत्र विकसित करना, जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो और वैज्ञानिक डेटा पर अधिक निर्भरता हो।
- जल-बंटवारे के लिए एक गतिशील मॉडल अपनाना जो वर्षा पैटर्न, भंडारण स्तर और प्रत्येक राज्य की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखे।
- जल-कुशल कृषि पद्धतियों (जैसे ड्रिप सिंचाई) को बढ़ावा देना और फसल पैटर्न को जल उपलब्धता के अनुरूप बदलना।
- जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण जैसी तकनीकों में निवेश बढ़ाना।
- सभी संबंधित राज्यों के बीच डेटा साझाकरण और पारदर्शिता में सुधार करना, ताकि अविश्वास कम हो सके।
- विवादों के समाधान के लिए बातचीत और मध्यस्थता को प्राथमिकता देना, न्यायिक हस्तक्षेप को अंतिम उपाय के रूप में देखना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और जल संसाधनों पर इसके प्रभावों के अनुकूल होने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ विकसित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 262’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘अनुच्छेद 136’: ‘सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील की विशेष अनुमति’}
- {‘अनुच्छेद 32’: ‘मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपचार’}
अवधारणा प्रवाह
कम वर्षा और सूखे की स्थिति → कावेरी जल की कमी → CWRC/CWMA द्वारा जल छोड़ने का निर्देश → कर्नाटक द्वारा निर्देशों का विरोध और चुनौती → सर्वोच्च न्यायालय में अपील → न्यायिक निर्णय और जल आवंटन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
2. अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) स्थापित करने का अधिकार देता है।
3. कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority – CWMA) का गठन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के निर्णय को लागू करने के लिए किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, केंद्र सरकार को ऐसे विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है। कथन 3 सही है। CWMA का गठन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम निर्णय को लागू करने के लिए किया गया था।
Q2. कथन (A): अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद भारत में संघवाद के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
कारण (R): ये विवाद अक्सर राज्यों के बीच राजनीतिक और आर्थिक तनाव को बढ़ाते हैं तथा संसाधनों के प्रबंधन में केंद्र की भूमिका को जटिल बनाते हैं।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — कथन (A) सही है क्योंकि अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद राज्यों के बीच गंभीर मतभेद पैदा करते हैं, जो संघवाद की भावना को कमजोर कर सकते हैं। कारण (R) भी सही है और कथन (A) का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि ये विवाद राज्यों के बीच तनाव बढ़ाते हैं और केंद्र के लिए एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चुनौतीपूर्ण बना देते हैं, जिससे संसाधन प्रबंधन जटिल हो जाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में संवैधानिक और वैधानिक तंत्रों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। कावेरी जल विवाद के संदर्भ में इन तंत्रों की प्रभावशीलता पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. परिचय: अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का संक्षिप्त उल्लेख और भारत में उनकी प्रासंगिकता।
2. संवैधानिक तंत्र: अनुच्छेद 262 का उल्लेख, जो संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
3. वैधानिक तंत्र: अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 का विस्तृत वर्णन, जिसमें न्यायाधिकरणों (Tribunals) की स्थापना और उनके निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति शामिल है।
4. कावेरी जल विवाद का संदर्भ: कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के गठन और उसके अंतिम निर्णय का उल्लेख। कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की भूमिका।
5. प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण: इन तंत्रों की सफलताएं (जैसे कुछ विवादों का समाधान) और सीमाएं (जैसे निर्णयों के कार्यान्वयन में चुनौतियां, राजनीतिकरण, डेटा की कमी, राज्यों के बीच सहयोग का अभाव, न्यायिक हस्तक्षेप)। विशेष रूप से कावेरी विवाद में निर्णयों के बावजूद लगातार राज्यों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना।
6. चुनौतियां: जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और बदलती कृषि पद्धतियों के कारण जल की बढ़ती मांग जैसी नई चुनौतियों पर चर्चा।
7. निष्कर्ष: सहकारी संघवाद, डेटा साझाकरण और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से भविष्य के समाधानों पर सुझाव।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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