कृष्णा जल के उपयोग पर YSRCP का सरकार पर तीखा हमला, जानें पूरा मामला

Krishna water releases: YSRCP criticises government policy — concept mind map

कृष्णा जल के उपयोग पर YSRCP का सरकार पर तीखा हमला, जानें पूरा मामला

Map of Andhra Pradesh, Telangana, Karnataka, Maharashtra highlighted on the map of India — Krishna water policy UPSC
मानचित्र व माइंड-मैप: Krishna water dispute: Andhra vs Telangana

✎ कृष्णा नदी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जो संघवाद की चुनौतियों और जल संसाधन प्रबंधन की जटिलताओं को दर्शाता है, जिसके समाधान के लिए संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक न्यायाधिकरणों का उपयोग किया…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद समाधान तंत्र  |  GS Paper III — कृषि: सिंचाई, फसल पैटर्न, कृषि संकट
  • Prelims: कृष्णा नदी, कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT), अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, जलयुक्त शिवार योजना, श्रीशैलम बांध, जुराला परियोजना, पुलिचंतला परियोजना
  • Essay: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवाद: संघवाद की चुनौतियाँ और समाधान, जल सुरक्षा और कृषि संकट: एक विकासात्मक परिप्रेक्ष्य

त्वरित पुनरावृत्ति: कृष्णा नदी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जो संघवाद की चुनौतियों और जल संसाधन प्रबंधन की जटिलताओं को दर्शाता है, जिसके समाधान के लिए संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक न्यायाधिकरणों का उपयोग किया जाता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, YSRCP के महासचिव एम.वी.एस. नागि रेड्डी ने आंध्र प्रदेश सरकार की कृष्णा नदी के पानी के उपयोग की नीति की आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सूखाग्रस्त क्षेत्रों और कृष्णा डेल्टा में सिंचाई के लिए उपलब्ध कृष्णा नदी जल का उपयोग करने में विफल रही है, जिससे किसानों को खरीफ मौसम में धान की खेती न करने की सलाह दी जा रही है। यह घटना अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों और उनके प्रबंधन से संबंधित मुद्दों को उजागर करती है।

पृष्ठभूमि

  • कृष्णा नदी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल नदी जल विवादों में से एक है, जिसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य शामिल हैं।
  • कृष्णा नदी प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदियों में से एक है, जो महाराष्ट्र के महाबलेश्वर से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) के तहत विभिन्न न्यायाधिकरण (Tribunals) स्थापित किए गए हैं, जिनमें कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (Krishna Water Disputes Tribunal – KWDT) भी शामिल है, ताकि इन विवादों का समाधान किया जा सके।
  • KWDT-I ने 1973 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें राज्यों के बीच जल आवंटन का निर्धारण किया गया था, और KWDT-II का गठन 2004 में किया गया था ताकि जल आवंटन की समीक्षा की जा सके।
  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच राज्य के विभाजन के बाद, कृष्णा नदी जल के बंटवारे को लेकर नए सिरे से विवाद उत्पन्न हुए हैं, क्योंकि दोनों राज्य नदी के पानी पर अपने-अपने दावों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।
  • कृष्णा डेल्टा क्षेत्र आंध्र प्रदेश का एक महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र है, जहाँ धान, गन्ना और जलीय कृषि प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ हैं, और सिंचाई के लिए कृष्णा नदी के पानी पर अत्यधिक निर्भरता है।

भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद और समाधान तंत्र

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 (Article 262) संसद को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन (Adjudication) के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
  • इस अनुच्छेद के तहत, संसद ने दो कानून बनाए हैं: नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956।
  • नदी बोर्ड अधिनियम का उद्देश्य अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन और विकास के लिए नदी बोर्डों की स्थापना करना है।
  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक अस्थायी न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के पास सामान्यतः अंतर-राज्यीय जल विवादों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता है, यदि संसद ने कानून द्वारा अन्यथा प्रदान किया हो, जैसा कि अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम में है।
  • इन विवादों के मुख्य कारण जल की कमी, जल का असमान वितरण, राज्यों की बढ़ती कृषि और औद्योगिक आवश्यकताएँ, और विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण हैं।
  • समाधान तंत्र में बातचीत, मध्यस्थता और न्यायाधिकरणों द्वारा न्यायनिर्णयन शामिल हैं, लेकिन अक्सर इन समाधानों को लागू करने में चुनौतियाँ आती हैं।
  • संघवाद के सिद्धांत के तहत, राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय इन विवादों को सुलझाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी अक्सर बाधा डालती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
कृष्णा नदी जल विवाद यह भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जो संघवाद और जल संसाधन प्रबंधन से संबंधित चुनौतियों को दर्शाता है।
सिंचाई और कृषि कृष्णा डेल्टा क्षेत्र में धान की खेती के लिए जल की उपलब्धता महत्वपूर्ण है, जो लाखों किसानों की आजीविका और क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करती है।
जल प्रबंधन नीतियाँ राज्य सरकारों की जल प्रबंधन नीतियाँ सीधे तौर पर कृषि उत्पादन, पेयजल आपूर्ति और अंतर-राज्यीय संबंधों को प्रभावित करती हैं।
लिफ्ट सिंचाई योजनाएँ भीमा-I, भीमा-II, नेट्टमपाडु, कोइलसागर, कलवाकुर्ती, हंड्री-नीवा और मुचुमर्री जैसी योजनाएँ जल वितरण और उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पुलिचंतला और पट्टिसीमा परियोजनाएँ ये परियोजनाएँ कृष्णा डेल्टा को स्थिर करने और सिंचाई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके संचालन पर अक्सर विवाद होता है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • कृष्णा डेल्टा क्षेत्र में धान, गन्ना और जलीय कृषि प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ हैं। जल की कमी से कृषि उत्पादन में गिरावट आती है, जिससे किसानों की आय और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
  • जल की अनुपलब्धता के कारण किसानों को खरीफ मौसम में धान की खेती न करने की सलाह देना, हजारों बटाईदार किसानों के निवेश और आजीविका पर सीधा नकारात्मक प्रभाव डालता है।

सामाजिक महत्व

  • जल विवाद और कृषि संकट ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक अशांति और पलायन को जन्म दे सकता है।
  • पेयजल और सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता सीधे तौर पर स्थानीय आबादी के जीवन स्तर और कल्याण को प्रभावित करती है।

प्रशासनिक एवं राजनीतिक महत्व

  • राज्य सरकारों की जल प्रबंधन नीतियाँ और अंतर-राज्यीय सहयोग की कमी राजनीतिक आलोचना और संघीय ढांचे में तनाव का कारण बनती हैं।
  • जल संसाधनों का कुशल और न्यायसंगत वितरण सुशासन (Good Governance) और क्षेत्रीय विकास के लिए आवश्यक है।

चुनौतियाँ

1. अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • कृष्णा नदी जल विवाद आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से चला आ रहा है।
  • विभिन्न परियोजनाओं से जल निकासी और भंडारण के संबंध में राज्यों के बीच समन्वय की कमी एक बड़ी चुनौती है।

2. कृषि संकट और किसान आजीविका

  • सिंचाई के लिए पर्याप्त जल की अनुपलब्धता के कारण किसानों को खरीफ मौसम में धान की खेती न करने की सलाह दी जा रही है, जिससे उनकी आय और खाद्य सुरक्षा खतरे में है।
  • हजारों बटाईदार किसानों द्वारा पहले से किए गए निवेश पर पानी फिरने का खतरा है, जिससे गहरा कृषि संकट उत्पन्न हो सकता है।

3. जल संसाधन प्रबंधन की चुनौतियाँ

  • जलाशयों में पर्याप्त जल स्तर होने के बावजूद सिंचाई के लिए जल छोड़ने में देरी या अनिच्छा।
  • पेयजल और सिंचाई की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने में कठिनाई, विशेषकर सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में।

4. बुनियादी ढाँचा और परियोजना कार्यान्वयन

  • लिफ्ट सिंचाई योजनाओं और अन्य जल परियोजनाओं के प्रभावी संचालन और रखरखाव में चुनौतियाँ।
  • परियोजनाओं के उद्देश्य और उनके वास्तविक कार्यान्वयन के बीच अंतर, जैसा कि पुलिचंतला और पट्टिसीमा परियोजनाओं के मामले में देखा गया है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
कृष्णा जल का अपर्याप्त उपयोग राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कृष्णा नदी जल का उपयोग सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों और कृष्णा डेल्टा में सिंचाई के लिए न करना।
खरीफ में धान की खेती पर प्रतिबंध किसानों को खरीफ मौसम में धान की खेती न करने की सलाह देना, जबकि यह डेल्टा क्षेत्र की प्रमुख आर्थिक गतिविधि है और इसका कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है।
जल परियोजनाओं का संचालन तेलंगाना द्वारा अपनी लिफ्ट सिंचाई योजनाओं से जल निकालने के बावजूद आंध्र प्रदेश द्वारा हंड्री-नीवा और मुचुमर्री योजनाओं से जल छोड़ने में देरी।
पुलिचंतला परियोजना का जल भंडारण पुलिचंतला परियोजना में 29 TMC फीट जल होने के बावजूद इसे जून 2027 तक पेयजल के लिए आरक्षित रखना, जबकि भारी प्रवाह हो रहा है।
कृषि संकट का गहराना जल की तत्काल रिहाई न होने से कृष्णा डेल्टा, हंड्री-नीवा परियोजना और के.सी. नहर के हजारों किसानों के लिए गहरा कृषि संकट उत्पन्न होने की आशंका।

आगे की राह

  • अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड (Krishna River Management Board – KRMB) जैसी संस्थाओं को सशक्त बनाना और उनके निर्णयों का पालन सुनिश्चित करना।
  • राज्य सरकारों को जल प्रबंधन नीतियों में पारदर्शिता लानी चाहिए और सिंचाई तथा पेयजल आवश्यकताओं के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
  • किसानों को खरीफ मौसम में धान के विकल्प के रूप में कम पानी वाली फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
  • लिफ्ट सिंचाई योजनाओं और अन्य जल परियोजनाओं के प्रभावी संचालन और रखरखाव को सुनिश्चित करना, ताकि उपलब्ध जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके।
  • कृषि संकट को रोकने के लिए प्रभावित किसानों को तत्काल राहत उपाय प्रदान करना और भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ बनाना।
  • जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) प्रणालियों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना।
  • जल संचयन (Water Harvesting) और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharging) को प्रोत्साहित करना ताकि जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अंतर-राज्यीय जल विवाद · कृष्णा नदी जल विवाद · नदी जल प्रबंधन · सिंचाई परियोजनाएँ · कृषि संकट · फसल विविधीकरण · जल संसाधन · संघवाद · राज्य नीति · किसानों की आजीविका

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (राज्य सूची)’, ‘note’: ‘जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (संघ सूची)’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन और विकास’}

अवधारणा प्रवाह

कृष्णा नदी में जल की उपलब्धता  →  राज्य सरकारों की जल प्रबंधन नीतियाँ  →  सिंचाई के लिए जल की रिहाई में देरी  →  कृष्णा डेल्टा में कृषि संकट की आशंका  →  किसानों की आजीविका और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव  →  अंतर-राज्यीय जल विवादों का गहराना

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कृष्णा नदी का उद्गम महाबलेश्वर, महाराष्ट्र के पास होता है।
2. श्रीशैलम परियोजना कृष्णा नदी पर स्थित है।
3. पुलिचिंतला परियोजना का उद्देश्य कृष्णा डेल्टा को स्थिर करना है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। कृष्णा नदी पश्चिमी घाट में महाबलेश्वर के पास से निकलती है। कथन 2 सही है। श्रीशैलम परियोजना कृष्णा नदी पर निर्मित एक प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजना है। कथन 3 सही है। पुलिचिंतला परियोजना को कृष्णा डेल्टा में सिंचाई को स्थिर करने के उद्देश्य से बनाया गया था।

Q2. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I (लिफ्ट सिंचाई योजना)
A. भीमा-I
B. हंड्री-नीवा
C. कोइलसागर
सूची-II (राज्य)
1. आंध्र प्रदेश
2. तेलंगाना
3. कर्नाटक
कूट:
A B C

  1. 1 2 3
  2. 2 1 2
  3. 3 1 2
  4. 2 3 1

उत्तर: 2 1 2 — भीमा-I और कोइलसागर लिफ्ट सिंचाई योजनाएँ तेलंगाना में स्थित हैं, जबकि हंड्री-नीवा लिफ्ट सिंचाई योजना आंध्र प्रदेश में है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में केंद्र सरकार की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। कृष्णा नदी जल विवाद के संदर्भ में, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच जल बँटवारे से संबंधित चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के महत्व और केंद्र सरकार की भूमिका का संक्षिप्त परिचय।
मुख्य भाग 1: केंद्र सरकार की भूमिका:
* संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 262 (अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन) और संसद की शक्ति (नदी बोर्ड अधिनियम, 1956; अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956)।
* नदी बोर्ड अधिनियम, 1956: नदी घाटियों के विनियमन और विकास के लिए नदी बोर्डों की स्थापना।
* अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956: जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए न्यायाधिकरणों की स्थापना।
* केंद्र द्वारा उठाए गए कदम: न्यायाधिकरणों का गठन (जैसे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण), मध्यस्थता और समन्वय।
* चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण: न्यायाधिकरणों के निर्णयों को लागू करने में देरी, राजनीतिकरण, डेटा की कमी, राज्यों के बीच सहयोग का अभाव।
मुख्य भाग 2: कृष्णा नदी जल विवाद और आंध्र प्रदेश-तेलंगाना के बीच चुनौतियाँ:
* विवाद का इतिहास: कृष्णा नदी जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT-I और KWDT-II) के निर्णय।
* तेलंगाना के गठन के बाद की स्थिति: जल बँटवारे पर नए सिरे से विवाद, परियोजनाओं का संचालन, जल उपलब्धता और उपयोग पर असहमति।
* वर्तमान चुनौतियाँ: लिफ्ट सिंचाई योजनाओं का उपयोग, फसल पैटर्न पर सलाह, पीने के पानी और सिंचाई की जरूरतों के बीच संतुलन, जलाशयों का प्रबंधन।
* हालिया घटनाक्रम: कृष्णा डेल्टा में धान की खेती पर सरकार की सलाह और वाईएसआरसीपी की आलोचना का उल्लेख।
निष्कर्ष: अंतर-राज्यीय जल विवादों के स्थायी समाधान के लिए सहकारी संघवाद, वैज्ञानिक डेटा-आधारित निर्णय लेने और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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