05 Nov केंद्र सरकार ने बदले पासपोर्ट-वीजा के नियम, कुछ पाकिस्तानी नागरिकों और अल्पसंख्यक शरणार्थियों को बड़ी राहत
✎ नागरिकता का निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से होता है, जबकि विदेशियों के पासपोर्ट-वीजा नियम विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अंतर्गत केंद्र सरकार के छूट-आदेशों से नियंत्रित…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय विरासत और भारतीय समाज (विभाजन के बाद का प्रवास, भारतीय मूल के लोग) | GS Paper II — राजव्यवस्था (नागरिकता, अनुच्छेद 5 से 11, नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके संशोधन, संसद की विधायी शक्ति) | GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध (भारत के पड़ोसी देश, भारत-नेपाल और भारत-भूटान विशेष संबंध, शरणार्थी मुद्दे) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (सीमा प्रबंधन, आव्रजन नियंत्रण, दस्तावेज़ सत्यापन)
- Prelims: इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एग्जेंप्शन) (अमेंडमेंट) ऑर्डर, 2026, विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946), पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (Passport Act, 1967), नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (Citizenship (Amendment) Act, 2019) और इसकी कट-ऑफ तिथि 31 दिसंबर 2014, भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) और भारतीय नागरिकता के लिए ओसीआई (OCI) कार्ड, भारत सरकार अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935), अनुच्छेद 5 से 11 (नागरिकता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान), शरणार्थी कन्वेंशन, 1951 पर भारत का हस्ताक्षर न होना और गैर-वापसी (Non-refoulement) का सिद्धांत
- Essay: सीमाओं के पार मानवीय संवेदना और राष्ट्रीय सुरक्षा: आव्रजन नीति में संतुलन, धार्मिक उत्पीड़न से भागे लोग और नागरिकता का प्रश्न: भारत का दृष्टिकोण
त्वरित पुनरावृत्ति: नागरिकता का निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से होता है, जबकि विदेशियों के पासपोर्ट-वीजा नियम विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अंतर्गत केंद्र सरकार के छूट-आदेशों से नियंत्रित होते हैं, और छूट मिलने का अर्थ नागरिकता मिलना नहीं है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एग्जेंप्शन) (अमेंडमेंट) ऑर्डर, 2026 जारी किया है, जिसके तहत विदेशी नागरिकों की कुछ श्रेणियों के लिए पासपोर्ट और वीजा नियमों में ढील दी गई है। इसमें वे पाकिस्तानी नागरिक शामिल हैं जो 31 दिसंबर 2009 को या उससे पहले स्थायी रूप से बसने के इरादे से भारत आए थे और जिनके पास पाकिस्तान का कंप्यूटराइज्ड नेशनल आइडेंटिटी कार्ड (CNIC) न होने से पासपोर्ट नवीनीकरण नहीं हो पा रहा था। अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न या उसके डर से 31 दिसंबर 2024 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भी छूट दी गई है। इसके साथ श्रीलंकाई तमिल और तिब्बती शरणार्थियों का उल्लेख भी है। मलेशिया या सिंगापुर की नागरिकता छोड़कर लौटे भारतीय मूल के लोगों के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। नेपाल और भूटान के नागरिकों के लिए सीमा-पार यात्रा के दस्तावेज़ों को सरल बनाया गया है, जबकि भारतीय नागरिकों के लिए वैध पासपोर्ट की अनिवार्यता बनी रहेगी। यह आदेश इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह आव्रजन नियंत्रण, दस्तावेज़ सत्यापन और मानवीय राहत के बीच संतुलन को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- भारत के नागरिकता ढांचे की नींव संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5 से 11) में है। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अधिग्रहण और समाप्ति से जुड़े सभी विषयों पर कानून बनाने की शक्ति देता है, जिसके आधार पर नागरिकता अधिनियम, 1955 बना।
- विभाजन (1947) और उसके बाद के वर्षों में पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर बड़े पैमाने पर प्रवास हुआ। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अल्पसंख्यक समुदायों के दीर्घकालिक शरणार्थियों की कानूनी स्थिति से जुड़े प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं।
- विदेशियों के प्रवेश, ठहराव और निष्कासन को विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 जैसे कानूनों से नियंत्रित किया जाता है। केंद्र सरकार इन कानूनों की शक्तियों के अंतर्गत कुछ श्रेणियों के विदेशी नागरिकों को विशेष आदेशों के माध्यम से नियमों से छूट दे सकती है।
- नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लिए नागरिकता की प्रक्रिया सरल की, जिसकी कट-ऑफ तिथि 31 दिसंबर 2014 रखी गई। इस आदेश की 31 दिसंबर 2024 की तिथि आव्रजन-छूट के दायरे से संबंधित है, जो नागरिकता अधिनियम की कट-ऑफ से अलग है।
- भारत 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन का पक्षकार नहीं है। फिर भी गैर-वापसी (Non-refoulement) का सिद्धांत प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय विधि का हिस्सा माना जाता है, जो शरणार्थियों को ऐसे देश में वापस भेजने से रोकता है जहां उन्हें जीवन या स्वतंत्रता का खतरा हो।
आव्रजन-छूट आदेश क्या है और इसके प्रमुख बिंदु क्या हैं?
- छूट आदेश केंद्र सरकार द्वारा जारी वह अधिसूचना है जिसमें कुछ श्रेणियों के विदेशी नागरिकों को सामान्य पासपोर्ट, वीजा या दस्तावेज़ नियमों से राहत दी जाती है। यह नियमों को समाप्त नहीं करता, बल्कि उनके प्रयोग में विशेष छूट देता है।
- पाकिस्तानी नागरिकों के लिए शर्तें: 31 दिसंबर 2009 को या उससे पहले स्थायी रूप से बसने के इरादे से भारत आना, CNIC के अभाव में नवीनीकरण न हो पाना, पाकिस्तान में रहते हुए विवाह न करना या अचल संपत्ति न खरीदना, परिवार के भारतीय नागरिक सदस्यों का होना, वापस न जाने का वचन और किसी प्रतिकूल पुलिस या सुरक्षा रिपोर्ट का न होना।
- भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) की परिभाषा में वे लोग आते हैं जिनके पास कभी भारतीय पासपोर्ट रहा हो, या जिनके माता-पिता, दादा-दादी या परदादा-परदादी भारत में जन्मे हों और भारत सरकार अधिनियम, 1935 में उल्लिखित या बाद में भारत का हिस्सा बने क्षेत्रों में स्थायी रूप से रहे हों। शर्त यह है कि ये व्यक्ति पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल या चीन के नागरिक न रहे हों।
- छूट प्राप्त होने के बाद भी इन श्रेणियों को भारत में प्रवास जारी रखने के लिए उचित श्रेणी का वीजा लेना होगा। यह प्रावधान स्थायी नागरिकता का अधिकार नहीं देता।
- नेपाल, भूटान और भारत के नागरिकों के लिए इन पड़ोसी देशों के बीच सड़क या हवाई मार्ग से सीधी यात्रा में सरकार के वीजा मैनुअल में बताए गए पहचान दस्तावेज़ मान्य हो सकते हैं। भारतीय नागरिकों पर यह छूट तभी लागू होती है जब वे नेपाल या भूटान के बीच यात्रा कर रहे हों।
- भारतीय नागरिक यदि नेपाल या भूटान के अलावा किसी अन्य देश से भारत-नेपाल या भारत-भूटान सीमा के रास्ते आ या जा रहे हों, तो उनके लिए वैध पासपोर्ट अनिवार्य है और उन्हें केवल निर्धारित आव्रजन चौकियों का उपयोग करना होगा।
- चीन, मकाऊ, हांगकांग या पाकिस्तान से होकर भारत आने-जाने वाले नेपाल और भूटान के नागरिकों के लिए वैध पासपोर्ट और वैध वीजा दोनों आवश्यक हैं। यह प्रावधान सुरक्षा और दस्तावेज़ सत्यापन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एग्जेंप्शन) (अमेंडमेंट) ऑर्डर, 2026 (Immigration and Foreigners (Exemption) (Amendment) Order, 2026) | केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी संशोधित आदेश, जो कुछ विदेशी श्रेणियों को पासपोर्ट और वीजा की सामान्य शर्तों से छूट देता है। यह प्रवासन (Immigration) से जुड़ी कार्यकारी शक्ति का उपयोग है। |
| पाकिस्तानी नागरिकों की छूट (31 दिसंबर 2009 तक आए) | जिन लोगों के पास पाकिस्तान का कंप्यूटराइज्ड नेशनल आइडेंटिटी कार्ड (CNIC) नहीं है, उनके यात्रा दस्तावेज़ों का नवीनीकरण संभव हो सकेगा। इसमें शादी न होने, अचल संपत्ति न खरीदने और वापस न जाने के वचन जैसी शर्तें हैं। |
| अल्पसंख्यक शरणार्थी (31 दिसंबर 2024 तक आए) | अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न या उसके डर से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों को छूट दी गई है। इसमें पंजीकरण की समय-सीमा का निर्धारण मुख्य तत्व है। |
| भारतीय मूल के व्यक्ति (Persons of Indian Origin) की श्रेणी | मलेशिया या सिंगापुर की नागरिकता लेकर 31 दिसंबर 2009 तक भारत लौटे लोगों के लिए नवीनीकरण की बाध्यता से राहत। ‘भारतीय मूल’ की परिभाषा में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 (Government of India Act, 1935) के क्षेत्रों का उल्लेख है। |
| श्रीलंकाई तमिल और तिब्बती | इन समूहों को भी छूट के दायरे में रखा गया है। यह दर्शाता है कि नीति किसी एक देश तक सीमित न होकर ऐतिहासिक विस्थापन की श्रेणियों पर आधारित है। |
| नेपाल, भूटान और भारत के नागरिकों हेतु सरलीकरण | सड़क या हवाई मार्ग से नेपाल और भूटान के बीच सीधी यात्रा पर सामान्य पासपोर्ट के स्थान पर ‘वीजा मैनुअल’ में बताए पहचान दस्तावेज़ मान्य होंगे। भारतीय नागरिकों पर यह छूट तीसरे देश से सीमा मार्ग द्वारा आने-जाने पर लागू नहीं है। |
महत्व
मानवीय और सामाजिक आयाम
- दस्तावेज़ों के अभाव में वर्षों से अधर में रहे लोगों को कानूनी पहचान और आवागमन की व्यावहारिक सुविधा मिलती है।
- धार्मिक उत्पीड़न से भागकर आए अल्पसंख्यकों के लिए प्रशासनिक स्तर पर स्थिरता का मार्ग खुलता है।
- परिवारों का विभाजन और शिक्षा, चिकित्सा या रोज़गार के लिए आवागमन में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं।
प्रशासनिक और कानूनी आयाम
- यह परिवर्तन विदेशियों से संबंधित मौजूदा कानूनों के भीतर, कार्यकारी आदेश (Executive Order) के रूप में किया गया है। इसका आधार विदेशी नागरिक (अधिनियम) और पासपोर्ट अधिनियम जैसे कानूनी ढाँचे में है।
- समय-सीमा (31 दिसंबर 2009 और 31 दिसंबर 2024) और शर्तों के माध्यम से पात्रता का स्पष्ट वर्गीकरण किया गया है, जिससे प्रशासनिक विवेक सीमित होता है।
- सुरक्षा जाँच (पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिकूल रिपोर्ट का अभाव) को पात्रता की शर्त बनाकर सुरक्षा और कल्याण के बीच संतुलन रखा गया है।
कूटनीतिक और क्षेत्रीय आयाम
- नेपाल और भूटान के साथ सीमा-पार आवागमन को सरल बनाना दक्षिण एशिया में पड़ोसी देशों के साथ विशेष संबंधों की भावना को दर्शाता है।
- मलेशिया और सिंगापुर में बसे भारतीय मूल के समुदायों से जुड़ाव बनाए रखने का व्यावहारिक आधार बनता है।
- चीन, मकाऊ, हांगकांग और पाकिस्तान से होकर आने-जाने वाले नेपाल और भूटान के नागरिकों पर सामान्य नियम लागू रहने से तीसरे देशों के मार्ग पर सुरक्षा नियंत्रण बना रहता है।
चुनौतियाँ
1. दस्तावेज़ी पहचान का सत्यापन
- CNIC न होने की स्थिति में व्यक्ति की पहचान और पाकिस्तान में उसके पूर्व निवास का प्रमाणन चुनौतीपूर्ण है।
- सत्यापन के लिए दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता और धोखाधड़ी की संभावना प्रशासन के सामने रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: आंतरिक सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र
2. समय-सीमा आधारित वर्गीकरण
- विभिन्न तिथियों (2009 और 2024) के आधार पर अलग-अलग समूहों की पात्रता तय करने से कुछ लोग सीमा से बाहर रह सकते हैं।
- समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के बीच तिथि-आधारित भेद पर समानता के सिद्धांत की दृष्टि से प्रश्न उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संविधान के मूल अधिकार और समानता का सिद्धांत
3. शर्तों का पालन और निगरानी
- ‘वापस न जाने’ का वचन और विवाह या संपत्ति संबंधी शर्तों की निगरानी व्यावहारिक रूप से कठिन है।
- पुलिस रिपोर्ट की जाँच का तंत्र राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय पर निर्भर करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य समन्वय और प्रशासनिक सुधार
4. द्विपक्षीय और सीमा प्रबंधन
- भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा पर सरलीकृत आवागमन से तस्करी और अवैध प्रवेश की आशंका को संतुलित करना आवश्यक है।
- तीसरे देशों के मार्ग से आने वाले भारतीय नागरिकों पर अलग नियम लागू होने से प्रवर्तन में भ्रम की स्थिति बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: सीमा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा
5. विदेशी नागरिकता और भारतीय मूल की परिभाषा
- ‘भारतीय मूल के व्यक्ति’ की परिभाषा में वंश, जन्मस्थान और पूर्व पासपोर्ट जैसे कई आधार हैं, जिनका प्रमाण देना कठिन हो सकता है।
- जिन्होंने स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता ली है, उनकी भारतीय नागरिकता की स्थिति का प्रश्न संवैधानिक दृष्टि से संवेदनशील है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: नागरिकता के संवैधानिक प्रावधान
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| दस्तावेज़ों का अभाव | CNIC न होने से पात्र व्यक्तियों के नवीनीकरण में देरी और सत्यापन की कठिनाई। |
| समय-सीमा का निर्धारण | 2009 और 2024 की तिथियों के बीच आने वाले समूहों के बीच भेद पर प्रश्न। |
| शर्तों की निगरानी | वापस न जाने का वचन और विवाह-संपत्ति की शर्तों का वास्तविक पालन सुनिश्चित करना। |
| सीमा प्रवर्तन | नेपाल-भूटान सीमा पर सरलीकरण और तीसरे देशों के मार्ग पर कड़े नियमों के बीच संतुलन। |
| भारतीय मूल की परिभाषा | वंश और पूर्व पासपोर्ट के आधार पर प्रमाण जुटाने की कठिनाई और दुरुपयोग की आशंका। |
| नागरिकता की स्थिति | विदेशी नागरिकता ग्रहण करने के बाद भारतीय नागरिकता के पुनः दावे से जुड़े संवैधानिक प्रश्न। |
आगे की राह
- दस्तावेज़ सत्यापन के लिए राज्य सरकारों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच स्पष्ट प्रक्रिया और समय-सीमा तय की जाए।
- पात्रता के लिए आवश्यक साक्ष्यों की सूची सार्वजनिक और सरल भाषा में उपलब्ध कराई जाए।
- ‘भारतीय मूल’ और ‘शरणार्थी’ जैसी श्रेणियों की परिभाषाओं की व्याख्या में एकरूपता के लिए दिशा-निर्देश बनाए जाएँ।
- पुलिस और सुरक्षा रिपोर्ट के आधार पर निर्णय के लिए पारदर्शी समीक्षा और अपील का तंत्र रखा जाए।
- सीमा पर सरलीकृत आवागमन के साथ बायोमेट्रिक और डिजिटल निगरानी को मज़बूत किया जाए।
- दीर्घकालिक समाधान के लिए शरणार्थियों की स्थायी पुनर्वास नीति पर व्यापक संसदीय और सार्वजनिक चर्चा हो।
- प्रवासन कानूनों के संशोधनों की नियमित समीक्षा हो, ताकि नीति की प्रभावशीलता और मानवीय पहलू दोनों परखे जा सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नागरिकता (Citizenship) और विदेशी नागरिक का अंतर · कार्यपालिका आदेश (Executive Order) द्वारा छूट की संवैधानिक सीमा · अनुच्छेद 5 से 11: नागरिकता संबंधी संवैधानिक प्रावधान · अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गैर-नागरिकों के अधिकार · शरणार्थी संरक्षण और 1951 का शरणार्थी अभिसमय (Refugee Convention) · नागरिकता अधिनियम, 1955 और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 · विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 · भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) और भारतीय नागरिकता की ओर अग्रसर OCI व्यवस्था · सीमा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम मानवीय दृष्टिकोण · आप्रवासन नीति में पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 9: स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता ग्रहण करने का प्रभाव
- अनुच्छेद 11: संसद की नागरिकता संबंधी विधि-निर्माण शक्ति
- अनुच्छेद 14: वर्गीकरण में विधिक समानता का प्रश्न
अवधारणा प्रवाह
पाकिस्तान में CNIC न होने से कुछ विदेशी नागरिकों के यात्रा दस्तावेज़ों का नवीनीकरण रुक जाता है। → धार्मिक उत्पीड़न और ऐतिहासिक विस्थापन से प्रभावित समूहों की पात्रता के लिए तिथि और शर्तें तय की जाती हैं। → गृह मंत्रालय इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एग्जेंप्शन) (अमेंडमेंट) ऑर्डर, 2026 जारी करता है। → आदेश के तहत पात्र व्यक्तियों को नवीनीकरण या उचित श्रेणी का वीजा लेने की छूट मिलती है, जबकि सुरक्षा और शर्तों का पालन अनिवार्य रहता है। → सीमा-पार आवागमन के नियम नेपाल और भूटान के नागरिकों के लिए सरल और भारतीय नागरिकों के लिए सीमित किए जाते हैं। → प्रशासनिक क्रियान्वयन, सत्यापन और निगरानी से नीति के प्रभाव का मूल्यांकन होता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 5 संविधान प्रारंभ के समय नागरिकता से संबंधित है।
2. संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता से संबंधित विधि बनाने की शक्ति देता है।
3. भारत ने 1951 के शरणार्थी अभिसमय (Refugee Convention) पर हस्ताक्षर किए हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 5 संविधान प्रारंभ के समय नागरिकता की व्यवस्था करता है। कथन 2 भी सही है: अनुच्छेद 11 के अंतर्गत नागरिकता के अधिग्रहण और समाप्ति के विषय में विधि बनाने की शक्ति संसद के पास है। कथन 3 गलत है, क्योंकि भारत ने 1951 के अभिसमय और 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
Q2. कथन (A): केंद्र सरकार कुछ श्रेणियों के विदेशी नागरिकों को पासपोर्ट नवीनीकरण की सामान्य शर्तों से कार्यपालिका आदेश द्वारा छूट दे सकती है।
कारण (R): विदेशी नागरिकों के प्रवेश, प्रवास और प्रस्थान को विनियमित करने के लिए केंद्र सरकार को विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत आदेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 3 केंद्र सरकार को विदेशियों के आगमन, निवास और प्रस्थान के संबंध में आदेश जारी करने की शक्ति देती है। इसी शक्ति के आधार पर छूट संबंधी आदेश जारी किए जाते हैं, इसलिए (R), (A) की वैध व्याख्या है। पासपोर्ट संबंधी मूल विधि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए:
सूची I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 5
B. अनुच्छेद 6
C. अनुच्छेद 9
D. अनुच्छेद 11
सूची II (विषय)
1. किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से प्राप्त करने पर भारतीय नागरिकता की समाप्ति
2. संविधान प्रारंभ के समय नागरिकता का प्रावधान (निवास के आधार पर)
3. नागरिकता संबंधी विधि बनाने की संसद की शक्ति
4. 19 जुलाई 1948 से पहले पाकिस्तान से भारत आए प्रवासियों की नागरिकता
सही मिलान चुनिए:
- A-2, B-4, C-1, D-3
- A-4, B-2, C-3, D-1
- A-2, B-3, C-4, D-1
- A-1, B-2, C-4, D-3
उत्तर: A-2, B-4, C-1, D-3 — अनुच्छेद 5 संविधान प्रारंभ पर निवास आधारित नागरिकता देता है (2)। अनुच्छेद 6 उन प्रवासियों से संबंधित है जो 19 जुलाई 1948 से पहले पाकिस्तान से भारत आए (4)। अनुच्छेद 9 स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की समाप्ति की बात करता है (1)। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता पर विधि बनाने की शक्ति देता है (3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत ने 1951 के शरणार्थी अभिसमय और उसके 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, फिर भी शरणार्थियों और धार्मिक अल्पसंख्यक प्रवासियों के लिए पासपोर्ट और वीज़ा नियमों में कार्यपालिका आदेशों के माध्यम से छूट देने की व्यवस्था विकसित हुई है। इस व्यवस्था की संवैधानिक और विधिक सीमाओं की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही नागरिकता, दीर्घकालिक वीज़ा और शरणार्थी संरक्षण के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए बताइए कि ऐसी नीति को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने के लिए किन विधायी उपायों की आवश्यकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना: (1) भूमिका: 1951 अभिसमय पर भारत की स्थिति; शरणार्थी, प्रवासी और अवैध प्रवासी की श्रेणियों का अंतर; कार्यपालिका आदेश की प्रकृति। (2) संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 5 से 11 (नागरिकता); अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद की शक्ति; अनुच्छेद 14 में उचित वर्गीकरण का परीक्षण (बुद्धिगम्य अंतर और विधि के उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध); अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को उपलब्ध है, इसलिए गैर-नागरिक भी जीवन और गरिमा के अधिकार के हकदार हैं (NHRC बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य, 1996; रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष बनाम चंद्रिमा दास, 2000); अनुच्छेद 19 केवल नागरिकों को प्राप्त है; अनुच्छेद 51 और अनुच्छेद 253 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय दायित्व। (3) विधिक ढांचा: नागरिकता अधिनियम, 1955 (धारा 5 देशीयकरण, धारा 7A OCI); नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 और उससे जुड़ी संवैधानिक बहस; विदेशी अधिनियम, 1946 (धारा 3 आदेश-शक्ति); पासपोर्ट अधिनियम, 1967; आप्रवासन और विदेशी नागरिक अधिनियम, 2025। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय: असम सम्मिलित महासभा बनाम भारत संघ (2014) में धारा 6A की वैधता; सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ (2005) में अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम का निरस्त होना। (4) समीक्षा के बिंदु: कार्यपालिका आदेश की वैधता के लिए विधायी मानक और स्पष्ट मानदंड का अभाव; छूट की शर्तें (CNIC का अभाव, वचन-पत्र, पुलिस रिपोर्ट) और उनका भेदभाव-रहित प्रशासन; भारतीय नागरिकों पर सीमावर्ती प्रवेश संबंधी शर्तों की समरूपता। (5) संतुलित दृष्टिकोण: मानवीय दृष्टिकोण (जोसेफ कार्न्स का नैतिक तर्क, मानव गरिमा) बनाम सीमा सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन; पूर्वोत्तर राज्यों की संवेदनशीलता। (6) उपसंहार: आदेशों को संसद द्वारा अनुमोदित शरणार्थी नीति, स्पष्ट श्रेणीकरण, डेटा-आधारित निगरानी, और न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था से संतुलित करने की संस्तुति।
स्रोत: indiatv.in
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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