13 Aug केरल विधानसभा में ‘वंदे मातरम’ विवाद: राज्यपाल अरलेकर ने सरकार को कठोर शब्दों में आड़े हाथों लिया
✎ राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और 'वंदे मातरम' भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसका सम्मान संवैधानिक और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — केंद्र-राज्य संबंध
- Prelims: राज्यपाल की भूमिका और शक्तियाँ, राज्य विधानसभा सत्र, नीतिगत संबोधन, संविधान का अनुच्छेद 153, वंदे मातरम का ऐतिहासिक संदर्भ, राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान
- Essay: भारतीय संघवाद में राज्यपाल की भूमिका: चुनौतियाँ और समाधान, राष्ट्रीय प्रतीकों का महत्त्व और उनका सम्मान: एक संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और ‘वंदे मातरम’ भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसका सम्मान संवैधानिक और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल विधानसभा के 16वें सत्र के उद्घाटन के दौरान ‘वंदे मातरम’ को पूर्ण रूप से न बजाए जाने के बाद विवाद उत्पन्न हो गया। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने राज्य सरकार के इस निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद राज्यपाल की भूमिका और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े संवैधानिक तथा ऐतिहासिक पहलुओं पर बहस छिड़ गई है। यह घटना केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों पर भी प्रकाश डालती है।
पृष्ठभूमि
- केरल विधानसभा के उद्घाटन सत्र में केरल पुलिस बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम’ को आंशिक रूप से बजाया गया।
- राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने इस पर आपत्ति व्यक्त की, इसे सरकार का गलत निर्णय बताया।
- राज्यपाल का नीतिगत संबोधन (Policy Address) राज्य विधानसभा के सत्र की शुरुआत में एक संवैधानिक परंपरा है।
- राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं और राज्य सरकार के निर्णयों पर अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार रखते हैं।
- यह घटना राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच संभावित टकराव की स्थिति को दर्शाती है, जो अक्सर केंद्र-राज्य संबंधों में देखी जाती है।
- ‘वंदे मातरम’ भारत का एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय गीत है, जिसका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में विशेष स्थान है।
राज्यपाल की भूमिका और ‘वंदे मातरम’ का महत्त्व
- राज्यपाल (Governor) राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
- संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। वह राज्य के कार्यकारी कार्यों का प्रमुख होता है।
- राज्यपाल राज्य विधानसभा के सत्र को आहूत (summon) करने, सत्रावसान (prorogue) करने और भंग (dissolve) करने की शक्ति रखता है।
- वह राज्य विधानमंडल के प्रत्येक आम चुनाव के पहले सत्र और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में अभिभाषण (address) देता है, जिसमें सरकार की नीतियों और योजनाओं का उल्लेख होता है।
- राज्यपाल के पास कुछ विवेकाधीन शक्तियाँ (discretionary powers) भी होती हैं, जैसे कि किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना।
- ‘वंदे मातरम’ भारत का राष्ट्रीय गीत (National Song) है, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था।
- यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्ति और राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया था।
- संविधान सभा ने 24 जनवरी, 1950 को ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया था, और इसे राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा दिया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्यपाल का अभिभाषण | यह राज्य विधानसभा के सत्र की शुरुआत को चिह्नित करता है और सरकार की नीतियों तथा भविष्य के विधायी एजेंडे को रेखांकित करता है। |
| वंदे मातरम | यह भारत का राष्ट्रीय गीत है, जो भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्ति का प्रतीक रहा है। |
| राज्य विधानसभा | यह राज्य स्तर पर कानून बनाने वाली संस्था है, जो जनता के प्रतिनिधियों से बनी होती है। |
| संवैधानिक पद | राज्यपाल का पद भारतीय संविधान द्वारा स्थापित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है, जो राज्य के कार्यकारी प्रमुख के रूप में कार्य करता है। |
महत्व
संवैधानिक महत्व
- राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच संबंधों को रेखांकित करता है, विशेषकर जब राज्यपाल सरकार के निर्णयों पर आपत्ति व्यक्त करते हैं।
- यह राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों और राज्य सरकार के कार्यकारी निर्णयों के बीच संतुलन के मुद्दे को उजागर करता है।
सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व
- राष्ट्रीय प्रतीकों जैसे ‘वंदे मातरम’ के सम्मान और प्रस्तुति से संबंधित प्रोटोकॉल पर बहस को जन्म देता है।
- यह राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों के प्रति सम्मान सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, जो राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न अंग हैं।
शासनिक महत्व
- राज्य विधानसभा के भीतर और बाहर सरकार के निर्णयों पर संवैधानिक पदाधिकारियों की प्रतिक्रियाओं के महत्व को दर्शाता है।
- यह राज्य प्रशासन में संवैधानिक मर्यादाओं और स्थापित परंपराओं के पालन की आवश्यकता पर बल देता है।
चुनौतियाँ
1. राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच संबंध
- राज्यपाल और निर्वाचित राज्य सरकार के बीच संभावित टकराव, विशेषकर जब राज्यपाल सरकार के किसी निर्णय पर आपत्ति व्यक्त करते हैं।
- राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों और राज्य सरकार की लोकतांत्रिक वैधता के बीच संतुलन स्थापित करना।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान – संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान
- राष्ट्रीय गीत जैसे प्रतीकों की प्रस्तुति और उनके सम्मान से संबंधित प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना।
- राष्ट्रीय प्रतीकों के उपयोग और प्रस्तुति पर विभिन्न हितधारकों की अलग-अलग व्याख्याओं को संबोधित करना।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संस्कृति – राष्ट्रीय प्रतीक, स्वतंत्रता संग्राम
3. संवैधानिक मर्यादा और परंपराएँ
- संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा स्थापित संवैधानिक मर्यादाओं और परंपराओं का पालन सुनिश्चित करना।
- किसी भी विवाद की स्थिति में संवैधानिक प्रावधानों और स्थापित प्रथाओं के अनुसार समाधान खोजना।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान – संवैधानिक पद, संस्थाएँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राज्यपाल की आपत्ति | राज्य सरकार के कार्यकारी निर्णयों में राज्यपाल के हस्तक्षेप की सीमा। |
| वंदे मातरम की प्रस्तुति | राष्ट्रीय गीत के पूर्ण या आंशिक गायन पर प्रोटोकॉल और स्थापित परंपराओं का उल्लंघन। |
| केंद्र-राज्य संबंध | राज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच तनाव की संभावना। |
| संवैधानिक नैतिकता | संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा संवैधानिक मर्यादाओं और गरिमा का पालन। |
आगे की राह
- राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच संवाद और परामर्श के माध्यम से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना।
- राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और प्रस्तुति से संबंधित स्पष्ट प्रोटोकॉल और दिशानिर्देश स्थापित करना।
- संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा संवैधानिक मर्यादाओं और परंपराओं का सम्मान सुनिश्चित करना।
- किसी भी विवाद की स्थिति में संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक व्याख्याओं के आलोक में समाधान खोजना।
- राज्य विधानसभा में राष्ट्रीय प्रतीकों के उपयोग पर सर्वसम्मत दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास करना।
- जनता के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों के महत्व और उनके सम्मान के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्यपाल की भूमिका · राज्य विधानमंडल · संवैधानिक पद · केंद्र-राज्य संबंध · नीतिगत संबोधन · संवैधानिक नैतिकता · वंदे मातरम · राष्ट्रीय गीत · संवैधानिक मर्यादा · संघवाद
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 153’, ‘note’: ‘प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 163’, ‘note’: ‘राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 176’, ‘note’: ‘राज्यपाल का विशेष अभिभाषण’}
अवधारणा प्रवाह
केरल विधानसभा सत्र का उद्घाटन → केरल पुलिस बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम’ का आंशिक गायन → राज्यपाल द्वारा सरकार के निर्णय पर आपत्ति → राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विवाद → राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान पर बहस
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
2. राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग होता है।
3. राज्यपाल का नीतिगत संबोधन राज्य सरकार द्वारा तैयार किया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 153 में राज्यपाल के पद का प्रावधान है। कथन 2 भी सही है क्योंकि राज्यपाल राज्य विधानमंडल का एक अभिन्न अंग होता है और उसके सत्र को बुलाने, सत्रावसान करने और भंग करने की शक्ति रखता है। कथन 3 भी सही है। राज्यपाल का नीतिगत संबोधन (पॉलिसी एड्रेस) वास्तव में राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का एक विवरण होता है, जिसे राज्य मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया जाता है।
Q2. अभिकथन (A): राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करता है और राज्य मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करता है।
कारण (R): राज्यपाल के पास राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करने की विवेकाधीन शक्ति होती है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और सामान्यतः मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करता है। कारण (R) भी सही है क्योंकि राज्यपाल के पास कुछ विवेकाधीन शक्तियाँ होती हैं, जिनमें राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना शामिल है (अनुच्छेद 200)। यह विवेकाधीन शक्ति राज्यपाल को राज्य मंत्रिमंडल की सलाह के बिना कार्य करने की अनुमति देती है, जो उसके संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने के बावजूद उसकी भूमिका को जटिल बनाती है। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है क्योंकि यह राज्यपाल की भूमिका के एक महत्वपूर्ण पहलू को दर्शाता है जो उसकी संवैधानिक स्थिति को प्रभावित करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्यपाल की भूमिका अक्सर केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव का कारण बनती है। इस कथन के आलोक में, राज्यपाल के नीतिगत संबोधन की संवैधानिक मर्यादाओं और विवेकाधीन शक्तियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक)
रूपरेखा: उत्तर में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए:
1. **परिचय:** राज्यपाल के पद की संवैधानिक स्थिति (अनुच्छेद 153, 154, 155) और केंद्र-राज्य संबंधों में इसकी प्रासंगिकता का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **राज्यपाल का नीतिगत संबोधन:**
* अनुच्छेद 176 के तहत प्रावधान।
* यह राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का प्रतिबिंब होता है, जिसे मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया जाता है।
* राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किए गए भाषण को पढ़ता है।
* संवैधानिक नैतिकता और परंपराएं जो राज्यपाल को सरकार की नीतियों का सम्मान करने के लिए बाध्य करती हैं।
3. **विवेकाधीन शक्तियाँ:**
* संविधान में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों का उल्लेख (अनुच्छेद 163)।
* किन परिस्थितियों में राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग कर सकता है (जैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत न हो, विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना – अनुच्छेद 200)।
* नीतिगत संबोधन के संदर्भ में विवेकाधीन शक्तियों की सीमाएं – क्या राज्यपाल अपने संबोधन में सरकार द्वारा तैयार किए गए पाठ से हट सकता है?
4. **केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव के कारण:**
* राज्यपाल की दोहरी भूमिका: केंद्र के प्रतिनिधि और राज्य के संवैधानिक प्रमुख।
* विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारों के बीच टकराव।
* विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना या उन पर सहमति देने में देरी।
* नीतिगत संबोधन में सरकार के भाषण से हटने के उदाहरण और उनके निहितार्थ।
5. **न्यायिक व्याख्याएँ और समितियाँ:**
* सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णय जो राज्यपाल की शक्तियों और भूमिका को स्पष्ट करते हैं (जैसे एस.आर. बोम्मई मामला)।
* सरकारिया आयोग, पुंछी आयोग जैसी समितियों की सिफारिशें जो राज्यपाल की भूमिका को निष्पक्ष बनाने पर जोर देती हैं।
6. **निष्कर्ष:** राज्यपाल की भूमिका को संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर बनाए रखने और केंद्र-राज्य संबंधों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक सुझाव (जैसे राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार, ‘विवेकाधीन’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा)।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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